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श्रीमद्भगवद्गीता व्याख्या। (श्रीभगवान् कर्म और ज्ञानमयी योगके जो दो प्रकारकी ब्रह्मनिष्ठा कह आये हैं, इस श्लोकमें और पर श्लोकमें उसी का उपसंहार करते हैं । )
प्राणमें मन देना रूप कर्मयोगका आश्रय करके प्राण और अपान को समायुक्त करके, पश्चात् मनमें मन देना रूप ज्ञानयोग द्वारा भ्रम मैं ( जीवात्मा ) और विशुद्ध मैं (परमात्मा ) का योग साधनसे द्विधाभावको नष्ट करके आत्मभावमें अवस्तिति करनेसे, प्रारब्ध भोग के लिये विषय-संस्पर्शमें आनेसे भी, कर्म बन्धनमें फंसना नहीं पड़ता ॥४१॥
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः । छित्त्वेनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥४२॥
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अन्वयः। हे भारत । तस्मात् ( हेतोः ) अज्ञानसम्भूतम् ( अधिवेकात् जातं) हृत्स्थं ( बुद्धौ स्थितं ) एनं (स्वविनाशहेतुभूतं ) संशयं आत्मनः ज्ञानासिना (ज्ञानखड्गेन ) छित्वा योगं (सम्यक् दर्शनोपायं कर्मानुष्टानं ) आतिष्ठ (कुर्व ),
उत्तिष्ठच ॥ ४२ ॥
अनुवाद। अतएव, हे भारत ! अविवेकसे उत्पन्न हृदयस्थ आत्मबिनाशके हेतुभूत इस संशयको अपने ज्ञानरूप खड्गसे छेदन करके योगावलम्बन पूर्वक उत्पित होओ ॥ ४२ ॥
व्याख्या। साधक ! "कथं भीष्ममहं संख्ये” इत्यादि प्रकारके आत्मविषयमें तुम्हारा यह जो संशय, यह तुम्हारे मनका भ्रम हैं; तुम विहित रूपसे कर्मका अनुष्ठान नहीं किया था, इस करके अबतक ज्ञान क्या है उसे नहीं जाननेसे, अज्ञानताके लिये तुम्हारा