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तृतीय अध्याय
१६७ अनुवाद। श्राभगवान कहते हैं। यह रजोगुणसे उत्पन्न हुआ दुष्पूरणीय अत्युग्र काम-यह क्रोध है, यहां (मोक्षमार्गमें ) इसको बरी ( शत्रु ) कहके जानो ॥ ३७॥
व्याख्या। साधक आत्मानुसन्धानमें जानते हैं कि काम ही इसका कारण है। कुछ किसीको लेने पानेकी इच्छा जैसे काम है, तैसे ही न लेनेकी तथा त्याग करनेकी इच्छा भी काम है। यह काम आज्ञा-मूलाधार-विस्तृत रजोगुणसे प्रकाशित होता है, क्योंकि आकांक्षा ही रजोगुणकी क्रिया * है। प्राणायाम करते करते जबतक मन ब्रह्मनाड़ी होकर आज्ञामें प्रवेश नहीं करता है, तबतक उस आकांक्षा और विषयका आकर्षण रहता है, मनको खोंच लेनेकी चेष्टा करते हैं, ऐसे कि अनजान भावसे ले भी लेते हैं। यदि वो खींचाई इच्छाके अनुकूल हो, तो काम आनन्दमें परिणत होता है; और यदि प्रतिकूल हो तो, आक्रोश रूपसे दिखाई देता है। वस्तुतः आनन्द
और आक्रोश काम ही के दो प्रकारके परिणाम-फल हैं। यह दोनों प्रकारके फल कार्य्यतः एकही हैं, क्योंकि दोनों ही मनको विषयमें श्राबद्ध करते हैं। परन्तु आक्रोशकी अनिष्टकरी शक्ति अधिक कह करके उसके ऊपर जोर लगाके, कोधनामसे कहा हुआ है। यह काम मनको मोहित करके आत्महारा, दिशाहारा करके, उसकी ऊर्द्धगति का रोध करता है। इसलिये काम बरी है। फिर अनन्त काल भोगविलासमें डूबे रहनेसे भी काम पूर्ण नहीं होता, इसलिये काम महाशन है, और किसी एक चीजको प्राप्त होकरके स्थिर भी नहीं होता, इससे काम महापाप्मा है। (इच्छा अनिच्छा कुछ न रखके कर्म फलका भी लक्ष्य न करके कर्त्तव्य बोधसे क्रियाका आश्रय करनेसे और चंचलतामें पड़ने नहीं होता)॥३७ ॥
* सत्वको क्रिया-सुप्ति (प्रकाश), समीकी क्रिया-सिाति..३७ ।।.
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