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श्रीमद्भमवद्गीता कामनाके वर्तमान समयमें ज्ञानको ज्योति नहीं खिलती इसलिये हृदयाकाश विषयान्धकारसे ढका रहता है, देहीकी दृष्टि ऊंचे दिशामें विषय बिना श्रात्मपथको देखने नहीं पाता। तब काम मन-बुद्धिइन्द्रियोंमें विषयवाले मोहिनी रूपकी तरंगको उठाके, देहीको मोहित करके आत्महारा कराके-विषयमें नित्य सत्य ज्ञानका भ्रम लगा करके भ्रममें फेंकता है ॥४०॥
तस्मात् त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्यनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥४१॥ अन्वयः। हे भरतर्षभ ! तस्मात् ( हेतोः ) त्वम् आदौ इन्द्रियाणि नियम्य ज्ञानीवज्ञाननाशन पाप्मान ( पापरूपं ) एनं ( कामं ) हि ( स्फुट ) प्रजहि ( न शय, परेत्यज वा ) ॥ ४१॥
अनुवाद। हे भरतश्रेष्ठ ! इसीलिये तुभ पहले ही इन्द्रिय सकलको संयत करके ज्ञान-विज्ञान-नाशक ( नाश करनेवाले ) पापमय इस कामको सम्पूर्ण रूपसे विनष्ट करो ( परित्याग करो ) ।। ४१ ।।
व्याख्या : प्रदीपकी ज्योति जैसे वत्ती न रहनेसे तेलको जलाय नहीं सकती, वैसेही काम भी इन्द्रियादिके सहारा न पानेसे विषय भोग कर नहीं सकता। फिर वत्ती संयत (दृढ़ कठिन ) होनेसे उसके भीतरसे तेलको सोखनेको न पाके जैसे शिखा बुत जातो है, वैसेही इन्द्रिय सकलको संयत ( बाहरके विषयमें जाने न देके अन्तरके अविषयमें * अटक ) करनेसे, उन सबसे और विषय भोग होता नहीं,
*जाग्रत अवस्थामें जो दर्शन श्रवण होता है, वह सब बाहरके हैं, स्थूल शरीरमें ही उनका भोग होता है; उन सबको बहिविषय कहते हैं। किन्तु योगावलम्बनमें सकल इन्द्रियों को निरोध करके जो देखा सुना जाता है, वह बाहरका नहीं भीतरका है; अतीव सूक्ष्म कह करके वह सूक्ष्म शरीरमें भोग होता है; उन सबको अन्तविषय कहते हैं। यह अन्तविषय ही अविषय है। अन्तविषय गुण वा शक्ति स्वरूप है, बहिविषय उसके कार्य है ॥ ४१॥