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श्रीमद्भगवद्गीता यह है कि मनुष्य * सर्व प्रकारसे आत्ममताका ही* * अनुवर्तन करता है, अर्थात् अपने विश्वासके अनुरूप गति पाता है।
जल मथन करनेसे उसमें जैसे बहुतता तरंग बुद्बुद् और फेन उत्पन्न होता है, उसी प्रकार भगवान अपनी इच्छा शक्तिसे ही अपने को मथन करके आपही आप इस विश्वजगतको साज लिये हैं। तरंग, बुबुद् और फेन जैसे जल बिना और कुछ नहीं है, केवल नाम और रूप करके अलग है; यह विश्वजगत् भी वैसे आत्मा बिना और कुछ नहीं। तब भी मनुष्य जो अपनेको आत्मासे अलग मनमें मान लेते हैं, उसका कारण है भ्रम; वह भ्रम ही है माया। जिसलिये मनुष्योंके मनमें जो कुछ भाव-सकाम हो, निष्काम हो, सु हो, कु हो, जैसे हो हो-सब एक आत्माके ही भाव हैं। जैसे एकही ज्योति लाल, नील, श्वेत, हरा प्रभृति कांचके भीतर होके बाहर आके भिन्न भिन्न रूपसे प्रकाश पाता है, वैसे एक आत्मा अपनी ही इच्छा शक्ति वा माया-शक्तिके विकार करके अपना हुआ चौबीस प्रकार तत्वके संयोगसे नाना प्रकार भावमें प्रकाश पाते हैं। ये चौबीस तत्व ही आत्माके वर्त्म वा पथ हैं, अर्थात् आत्मा इन सब तत्व क्रमसे ही मायाका विस्तार करके स्वयं विश्व-साजसे सजे हुये हैं, ये सब ही आत्मा हैं। इसलिये उनके जीव होनेका भाव, अपना ही इच्छाभ्रममें अपनेको आत्मासे भिन्न ज्ञान करके विविध-तत्वमयी मूर्ति करके पृथक ज्ञानमें मोहित होनेसे भी, उनके एक “मैं” को ही ग्रहण करना होता है; किन्तु उनके मनमें एक ज्ञान न होके बहुज्ञान रहनेसे, उनको अपना उस बहु-विश्वासके अनुरूप बहुत्त्वमें रहना पड़ता है, वह एकत्वमें
* सुसम्पन्न मनोवृत्तिशोल जीव ही मनुष्य है ।। ११ ॥
** जिस जिस विषयमें जिसके मतसे जो है, उस उस विषय में यह उसी उसी मतामें चलता है, दूसरे मतामें चलता नहीं, जिस लिये उसी उसो विषयमें उसके ..पने मता ही उसके अन्तःकरणके ( मनके ) वर्त्म अर्थात् पथ हैं ॥११॥