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श्रीमद्भगवद्गीता संहा, व-शून्य ) सृष्टिसंहारशून्य कैवल्य पद हैं, तब क्यों फिर मुझको घोर (भयंकर) कर्म में नियुक्त करते हैं ॥१॥
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धि मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चत्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २॥ . अन्वयः। व्यामिश्रेण (क्वचित् कर्मप्रशंसा क्वचित् ज्ञानप्रशंसा इत्येवं सन्देहोत्पादकेन ) एव वाक्येन मे बुद्धि मोहयसि इच, येन ( अनुष्ठितेन ) अहं श्रेयः (मोक्ष) आप्नुयाम् ( प्राप्स्यामि ) तत् एकं निश्चित्य वद ॥ २॥
अनुवाद। विमिश्र वाक्यसे मेरी बुद्धिको जैसे मोहित कर देते हो; जिसमें मैं श्रेय लाभ करने सकू ऐसा एक निश्चय करके कहिये ॥ २॥
व्याख्या। साधक (अर्जुन) पूर्व अध्यायमें सांख्यबुद्धि (ज्ञानयोग) तथा योग-बुद्धि ( कर्मयोग ) इन दोनोंकी पृथकता जान करके सांख्य उपदेश मतमें ब्राह्मीस्थिति समझ कर उसको प्राप्तहोनेके लिये आग्रहा'न्वित हुये, तथा उस ब्राह्योस्थितिकी तुलनामें धर्म को घोर विपाक कह करके मनमें स्थिर मान लिया परन्तु भगवान "धाद्धि युद्धाच्छ्योक्षत्रियस्य न विद्यते" ( २ य अः ३१ श्लोक ) इस वाक्यसे समझा दिया है कि क्षत्रियोंके धर्म युद्ध (कर्म) बिना “दूसरा श्रेया कुछ है ही नहीं प्रशसा विद्यमान है। फिर "दूरेण झावरं कर्म बुद्धियोगा-द्धनंजय" (२ य अ. ४६ श्लोक) इस वाक्य द्वारा बुद्धि (ज्ञान) कर्मसे जो श्रेष्ठा है वह भी कहे हैं ; इसमें बुद्धिकी ही प्रशंसा विद्यमान है। इसलिये बुद्धिकी क्रिया में ब्राह्मीस्थिति प्राप्त होनेके लिये लालायित होने से भी, भगवानकी एकदफे कर्म प्रशंसा और एक दफे बुद्धि प्रशंसाकी बातें सुन करके, उनके मनमें सन्देह उपस्थित हो गया, बुद्धि भो मोहप्राप्त हो गई ; कौन श्रेय है-योगबुद्धिका आश्रम करना अच्छा, कि सांख्यबुद्धिका श्राश्रय लेना अच्छा, इसे और वह निश्चयकर नहीं सके। इस करके साधक आत्मजिज्ञासामें कूटस्थ गुरु-ब्रह्मके निकट कर्म