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तृतीय अध्याय
१४६ न मे पार्थास्ति कर्त्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त्त एव च कर्मणि ॥ २२ ॥ अन्वयः हे पार्थ ! त्रिषु ले केषु ( भूर्भुवः स्वः इति त्रिजगतेषु ) मे किंचन (किञ्चदपि ) कतव्यं न अस्ति, अनवासं अवाप्तव्यं न ( अस्ति), कर्मणि एव च वत्त ॥ २२ ॥
अनुवाद। हे पाथ ! तीन लोकके भीतर हमारा कुछ भी कर्तव्य नहीं है, अप्राप्त तथा प्राप्तव्य भी कुछ नहीं; मात्र कर्ममें बर्तमान हूँ॥ २२ ॥
व्याख्या। भूः भूवः स्वः इस तीन शब्दमें ही समग्र विश्वको समझाय देता है। यह प्राकृतिक जगत एक अात्मासे ही उद्भूत हुआ है इस करके यह समस्तही आत्मामय- एक है; इस कारण करके यहां
आत्माके कत्तव्य, प्राप्तव्य तथा अप्राप्त कुछ है नहीं। ___ जो न करनेसे अपना अनिष्ट होता है, ऐसे कि, अपनेका अस्तित्व पर्यन्त रहता नहीं, उसोको हो कर्त्तव्य कहके जामना; -जैसे वैश्वानरमें ( पेटके भीतर ) प्रतिदिन आहुति न देनेसे जीवन रहता नहीं, इसलिये वो काम भनुष्यके कर्तव्य है ; इसी प्रकार मानवोंके लिये प्राकृतिक तथा आध्यात्मिक बहुत कर्त्तव्य हैं, जो न करनेसे रहा जाता ही नहीं। परन्तु परमात्मा सम्बन्धमें इस प्रकारका कर्त्तव्य कुछ नहीं है, रह सकता भी नहीं; क्योंकि जो विश्व "अात्मविनिर्गत", आत्माके अस्तित्वमें जिसके अस्तित्व, जिसके अस्तित्वमें आत्माका अस्तित्व नहीं है, इस प्रकार विश्वमें आत्माका कर्त्तव्य कैसे करके रहेगा ? अन्नही जीवका आश्रय है, जीव अन्नका आश्रय नहीं है। आश्रय-आश्रित भाव विचार करनेसे देखा जाता है कि, शरीरका आश्रय प्राण, प्राणका आश्रम मन, मनका आश्रय जीवात्मा, जीवात्माका आश्रय परमात्मा, -इनहीको उत्तम पुरुष ब्रह्मचैतन्य अन्न कह के जानना। यही परमात्मा रूप जो ' मैं"- जो सकलके श्राश्रय, जिनका आश्रय "कुछ" भी नहीं-उसी “मैं” का कर्त्तव्य नहीं है,-पदार्थके पृथक् सत्त्वा न