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तृतीयोऽध्यायः
अर्जुन उवाच। ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनाईन ।
तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥१॥ अन्वयः। हे जनाईन ! हे केशव ! चेत् ( यदि ) कर्मणः ( सकाशात् ) बुद्धिः ज्यायसी ( अधिकतरा श्रेष्ठा ) ते मता, तत् ( तहि ) किं ( किमर्थ ) मा घोरे कर्मणि नियोजयसि (प्रवर्तयसि ) ? ॥१॥
अनुवाद। हे जनाईन ! हे केशव ! यदि तुम्हारी मतमें कमसे बुद्धि श्रेष्ठा है, तो घोर कर्ममें मुझको क्यों नियुक्त करते हो ? ॥१॥
व्याख्या। श्री गुरुदेव शिष्यके संसार मोह निवारण करनेके लिये पूर्व अध्यायमें आत्माका अज-नित्यत्व देखलायके, शारीरिक, जन्म-मृत्यु प्रवाह-वन्धन छेदन करनेका एक मात्र उपाय "उत्तिष्ठ" रूप प्रकरणमें ( उपदेश करके ) साधनमार्ग लक्ष्य करा दिये हैं; देखलाते हैं, इस मार्गमें दो काण्ड हैं,-प्रथम कर्म, दूसरा ज्ञान । मूलाधारसे आज्ञा पर्यन्त प्रति चक्रमें गुरुपदेशक्रमके अनुसार प्राणचालन करना ही साधनका कर्मकाण्ड है, और कूटस्थके ऊपर लक्ष्य स्थिर करके सर्व इन्द्रिय वृत्तिके साथ मनको आज्ञाके ऊपर उठाला के सहस्रार-स्थिति पदमें स्थिरभाव लेके "श्रवण-मनन-निदिध्यासन" अर्थात् प्रणव-नाद श्रवण, नादके अर्न्तगत ज्योति मनन (गुरुके दिखाये हुए मानस दृष्टिसे ध्यान ) करना, तथा देखना सुनना प्रभृति समुदय वृत्ति एकतान करके, तम्मय करना, यही सब बुद्धिकी क्रिया-ज्ञानकाण्ड है। बुद्धिकी क्रिया तथा अवस्था भेद करके दो अंशमें विभक्त है। प्रथम विभाग-उपासना; यह बुद्धियुक्त अवस्था (रय अः ५० श्लोक,) तथा शुत-श्रोतव्यको निर्वेद अवस्था २य ५२ श्लोक) इन दो भागों करके अन्तर्विभक्त है। २य विभाग-ज्ञान