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श्रीमद्भगवद्गीता • विहाय कामान् यः सर्वान् पुमाश्चरति निस्पृहः।।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥ १ ॥ अन्वयः। यः पुमान् सर्वान् कामान् विहाय निस्पृहः निर्ममः निरहंकारः ( सन् ) चरति, सः शान्ति अधिगच्छति ( प्राप्नोति ) ॥ १॥
अनुवाद। जो पुरुष समुदय कामना परित्याग करके निस्पृह, निर्मम, था निरहंकार होके विचरण करते हैं, शान्ति वही पाते हैं ॥ १॥
व्याख्या। भोगके विषयका नाम काम है ; (आकांक्षाभी काम )। मनुष्य मात्रके सन्मुख में भोगका विषय है। फिर जो साधक साधनामें थोड़ासा आगे पहुँचते हैं, उन सबके भोगके विषय (विभूति ) की प्राप्ति होती है। उन सब विषय-भोगमें मन देनेसे अर्थात् “कामकामी” होनेसे, बन्धनमें पड़ना होता है, उन्नति नहीं होती। जो पुरुप, सकल प्रकार भोगके विषयको झाडू मारके निकाल देके निस्पृह अर्थात् आकांक्षारहित होते हैं, अर्थात् "आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतं" इस प्रकार विचार-अनुष्ठानमें "सर्व ब्रह्ममयं” जान करके ममता-विहीन होते हैं, और अन्त में (सर्वशेषमें) "सोह” ज्ञानसे मतवाला हो करके, ममत्वका नाश करके अहंकारविहीन हो करके चरण करते हैं ; वही नित्यानन्द शान्ति लाभ करते हैं। (यह अवस्थाही कर्मका चरम फल-सिद्धावस्था है)॥७१ ॥
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुमति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥७२॥ अन्वयः। हे पार्थ । एषा ब्राह्मो स्थितिः, एनां प्राप्य ( पुमान् ) न विमुह्यति (संसारमोहं न प्राप्नोति ), अस्या स्थित्वा अपि अन्तकाले (मृत्युसमये) ब्रह्मनिर्षाणं (ब्रह्मणि लयं ) मृच्छति ( प्राप्नोति ) ॥ ७२ ॥
अनुवाद । यही ब्राह्मोस्थिति है। इस स्थितिको प्राप्त होनेसे विमोहित होना नहीं पड़ता, इसमें रह करके भी अन्तकाल में ब्रह्मनिर्वाण मिल जाता है ।। ७२॥