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श्रीमद्भगवद्गीता वायु-प्रवाह चल रहा है, उसके आघात् करके सर्वस्थानसे ही सर्वदा, एक मुख बन्ध भंलेके भीतर वायु प्रवेशके शब्द उठता है, विराम नहीं। मन बाहरमें रहता है, इस करके वह शब्द सुननेमें नहीं आता। किन्तु मन को भीतर ले जानेसे, जितनो जितनी एकाग्रता भाती रहती है, उतना उतना वह सब शब्द भी स्पष्टसे स्पष्टतर होता रहता है, अच्छी तरह सुननेमें आता है। साधारणतः. कानको दाबनेसे भीतरसे जो एक तुमुल शब्द सुनने में आता है वही प्राण-निर्धोष शब्द है। उसीकी व्यंजन त्याग अवस्था ही प्रणव है। इस प्रणवका विराम नहीं कह करके प्रणव नित्य है। __ इन दो श्लोकोंमें "अन्नाद्भवन्ति” से “समुद्भवम्" पर्य्यन्त इन छ चरणों की रचना-कौशलके प्रति लक्ष्य करनेसे देखने में आता है कि प्रथम तीन चरणके लक्ष्य कारणसे काय्यमें, पश्चात् तीन चरणके लक्ष्य कार्यसे कारणमें रहा है, यज्ञ वा मणिपुरस्थ तेजस्तत्व ही इस मित्र कम्मका संयोगस्थल है। इस प्रकार रचनाका उद्देश्य यह है कि, साधक जबतक मणिपुर चक पार न होवेंगे, तबतक उनको विषयवाले समोकी खिंचाईसे नोचेकी तरफ कार्य्यमुखमें पड़ना ही होता है ; मणिपुर पार होते मात्र, तत्क्षणात् अवैषयिक तमोकी खिचाईसे ऊंचे तरफ कारण मुखमें उठते रहते हैं ; इसका कारण यह है कि, मणिपुर चकके नीचे पीठ, रजो अधिक कह करके, चंचलतामें कार्यविस्तार होता रहता है ; और ऊपर पीठमें सत्त्व अधिक कह करके चंचलताके अभावके लिये कार्यालय हो करके मूलकारणका विकाश होता रहता है। सत्त्वकी तुलनामें रजोके अल्पाधिक तार-तम्य करके शरीर रून क्षेत्रका द्वितीय विभाग धर्मक्षेत्र कुरु क्षेत्रको भी अर्थात् साधनमार्ग-षट्चकको भी दो अंश करके विभाग किया जा सकता है ; क्योंकि मूलाधार से मणिपुर पर्यन्त रजो अर्थात् चंचलता (कर्म) अधिक कह करके इसको 'कुरुक्षेत्र