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श्रीमद्भगवद्गीता पतित होनेके लिये बहुशाखायुक्त तथा अनन्त होती है । "बहुशाखायुक्त' अर्थात् भिन्न भिन्न विषयके संसर्गमें आकरके भिन्न भिन्न प्रकारकी होती है; और "अनन्त' अर्थात् विषय-भोगमें आबद्ध रह करके बार बार जन्म-मृत्युके आलोड़नमें वृद्धिको ही प्राप्त होती रहती है, विषय छोड़ करके ब्रह्ममें आके चिरविश्राम नहीं पाती"निर्वाणपरमां शान्ति” नहीं पाती ॥ ४१॥
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥ कामात्मानः स्वर्गपराः जन्मकर्मफलप्रदाम् । क्रियाविशेषबहुला भोगैश्वर्यगति प्रति ॥ ४३ ॥ भोगैश्वर्य्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥४४॥ अन्वयः। हे पार्थ ! अविपश्चितः कामात्मानः स्वर्गपरा8 ( ये जनाः ) वेदवादरताः ( अतएव ) अन्यत् न अस्ति इति वादिनः ( वदनशीलाः सन्तः ) इमां यां जन्मकर्मफलप्रदा भोगैश्वय्यंगति प्रति क्रियाविशेषबहुला पुष्पिता (विषलतावत् आपातरमणीयां ) वाचं प्रवदन्ति, तया ( वाचा ) अपहृतचेतसां भोगैश्वयंप्रसक्तानां ( तेषां ) बुद्धिः समाधौ व्यवसायात्मिका न विधीयते ( भवति ) ॥४२॥४३॥४४॥
अनुवाद। हे पार्थ! जो सब अविवेकि कामात्मा स्वर्गपरायण लोग वेदवादरत हैं अतएव 'अन्य कुछ है नहीं" इस प्रकारके वक्ता होकर ये जो जन्मकर्मफलदेनेवाला भोगैश्वर्य प्राप्तिकी उपाय स्वरूप क्रियाविशेषबहुल मनहरणकरनेवाली वाक्य कहती है, उसी वाक्य द्वारा अपहृतचित्त तथा भोगैश्वर्यमें आसक्त होनेसे उन सवको बुद्धि समाधिमें व्यवसायात्मिका नहीं होती ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ ४४ ।।
व्याख्या। विपश्चित् ( वि+प्रविप्रकृष्ट =चि= संग्रह करना+ क)-जो कोई विप्रकृष्टको अर्थात् दूरवतीको संग्रह करते हैं। दूर कितने प्रकारका है ? देशगत, कालगत तथा पात्रगत-ये तीन प्रकारके