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श्रीमद्भगवद्गीता अनुसार में नाशको प्राप्त होता है, और संयमी ६४ श्लोक्के अनुसार विषयमें चरण करके भी निष्कामता हेतु प्रसाद अर्थात् शान्तिमय विष्णुके परम-पद का दर्शन पाते हैं। "प्रसादस्तु प्रसन्ता” ॥ ६४ ॥
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्माशु बुद्धिः पर्यावतिष्ठते ॥ ६५ ॥ अन्वयः। प्रसादे ( सति ) अस्य (यतेः) सर्वदुःखाना हानिः (विनाशः) उपजायते। प्रसन्नचेतसः हि बुद्धिः आशु ( शीघ्र पय॑वतिष्ठते (निश्चली) भवति ) ॥ ६॥
अनुवाद। प्रसाद प्राप्त होनेसे सर्वदुःस्त्रका शेष होता है; प्रसन्नचित्त पुरुषको बुद्धि शोधही स्थिर होती है ।। ६५ ।। ___ व्याख्या। पृथिवी जल, अग्नि, वायु, आकाश-इन पांचका नाम सर्व है। यह सर्व कश्मल रूप घरके अन्तराकाशको छाय (श्रावरण करके ) रहता है, उसी का नाम दुःख है । प्रसाद-लाभ होनेसे अर्थात् ज्योतिर्मय रूपके विकाश होनेसे, उसके प्रभाव करके सकल अधियारी कट जाती है, कोई प्रकार मयलाका चिह्न भी रहता नहीं ; इसलिये चित्त प्रसन्न होता है, अर्थात् निर्मलता हेतु चंचलता-विहीन होके स्थिर होता है। चित्त स्थिर होनेसे ही बोट-शक्ति शीघ्र ही अवलम्बन विहीन होके बुत जाता है । "चलच्चित्ते वसेच्छक्तिः स्थिरचित्त वसेच्छिवः”। इति ज्ञानसंकलनी तन्त्रम् ॥ ६५ ।।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य नचायुक्तस्य भावना।
नं चाभाक्यतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् । ६६ ।। अन्वयः। अयुकस्य बुद्धिः न अस्तिः अयुक्तस्य भावनां च न (अस्ति ) अभावयतः शान्तिः च न ( अस्ति ), अशान्तस्य सुखं कुतः ? ।। ६६ ।। . * इसको ही निर्वाण-स्थिति ( अमनस्कस्थिति) वा तुरीय अवस्था कहते हैं। ७२ श्लोकके ब्राह्मी-स्थिति जाग्रत अवस्थाके भो अन्तर्गत, तथा ब्रह्मनिर्वाण शरीर त्यागके पश्चात् होता है, जिसको विदेह-मुक्ति कहते हैं ।। ६५ ।।