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द्वितीय अध्याय
१११ अर्जुन उवाच। स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत ब्रजेत किम् ॥५४॥ अन्वयः। अर्जुनः उवाच । हे केशव ! समाधिस्थस्य स्थितप्रज्ञस्य का भाषा ( लक्षणं ) ? स्थितधीः किं प्रभाषेत ? किं आसीत् ? किं ब्रजेत ? ॥५४॥
अनुवाद : अर्जुन कहते हैं हे केशव ! जो समाधिस्थ होकर स्थितप्रज्ञ हुये हैं उसके लक्षण कैसे हैं ? यह स्थितधी क्या कहते हैं ? किस प्रकार रहते हैं ? कैसी चाल चलते हैं ? ॥ ५४ ॥
व्याख्या। योगावस्थामें जो निस्पन्दन भाव होता है, एक दफा उस भावके प्राप्त होनेसे उससे नीचे उतर पानेसे भी, मन और पहले की तरह विषयमें आसक्त होता नहीं-प्रज्ञा चलते, बैठते, खाते, सोते सर्बदाही उस परमात्मामें लक्ष्य रख करके धीरे धीरे क्रम अनुसार जगतको भी ब्रह्ममय करा देती हैं; जाग्रत अवस्थामें रहनेसे भी मन उसी समाहित अवस्थाका भोग करता है और उस पुरुषमें ज्ञानकी ज्योति स्थिर धीर रहती है, इसीलिये इस अवस्थाको जाग्रत-समाधि कहते हैं। यह जाग्रत-समाधि-युक्त पुरुष ही जीवन्मुक्त हैं । इस प्रकार पुरुषोंका ही लक्षणादि प्रश्न चतुष्टयसे पूछा गया है। इन चार प्रश्न का पहिला तो सामान्य अन्य तीन विशेष हैं। ५५-७२ श्लोक प्रथम प्रश्नका उत्तर है। इसके भीतर ५६, ५७ श्लोक, क्या कहते हैं ? - इस प्रश्नका उत्तर; ५८, ६१, ६८, ६६, ७० श्लोक, किस प्रकार रहते हैं ? -इस प्रश्नका उत्तर; ७१, ७२ श्लोक, कैसे चलते हैं ? -इस प्रश्नका उत्तर है॥५४॥
श्रीभगवानुवाच । प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः विथतप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५ ॥ अन्वयः। श्रीभगवानुवाच । हे पार्थ ! यदा ( योगी ) मनोगतान् सर्वान्