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. द्वितीय अध्याय अन्तराकाश भी ज्योति करके उज्वलतासे भर जाता है,-मनकी चंचलता-आवेग दूर होता है। इस समय उपासना (उप-समीपे, अासन = स्थिति ) होती रहती है, अर्थात् चित्राके विचित्र वर्णसे मन आकृष्ट होने पर प्राण-क्रियाकी आसक्ति मिट जाती है, इसलिये दृश्य-द्रष्टाका व्यवधान ( फरक ) भी कम हो जाने पर चिद् समीपमें अवस्थान होता है। तब द्वाद्वशदलके भीतर दूसरा एक अष्टदल कमल खिल उठता है; उसके ऊपर ज्योतिर्मण्डलमध्यस्था कृष्णवर्णा चतुर्भुजा त्रिनयना शंख-चक्र-गदा-पद्महस्ता युवती गरुडारूढ़ा वैष्णवी. शक्ति प्रत्यक्ष होती है, उसके साथ ही साथ मृदुमधुर सुस्पष्ट स्वरसे गायत्री मन्त्र निकट में दक्षिण दिशामें (दहिना कानके पीठकी ओरसे) उच्चारित होती रहती है। तत्पश्चात् अन्तर-शाम्भवीसे वो ज्योति भेद हो जानेसे निमेषके भीतर विशुद्ध में षोड़शदल कमल खिल उठता है, उसमें वही देवी फिर विद्य त्वर्णमें दर्शन देके ही अन्तहिता होती हैं। यह सत्त्व-बहुल उपासना-प्रधान सुखमय अनाहत-विशुद्ध क्षेत्रमें जो जाना जाता है, वही यजुर्वेद-“उ”। वो देवी ही यजुर्वेदकी अधिष्ठात्री देवी सावित्री'-गायत्रीकी दूसरी मूर्ति हैं । यही पहले कृष्णवर्ण करके पश्चात् विद्य त्वर्णसे प्रकाशिता होती हैं। इसलिये यजुर्वेद--कृष्णयजुः और शुक्लयजुः दो अंशमें विभक्त है ।
विशुद्धके ऊपर रजः क्रम अनुसार क्षीणसे क्षीणतम होकर श्राझा में शेष होता है। इस आज्ञामें सत्त्वका पूर्ण विकाश और शुद्ध तमो का प्रारम्भ है ( ३य चित्र देखो)। तीन गुणके भीतर तमोका ही प्राधान्य देखनेमें प्राता है; क्योंकि, (अनुलोममें देखा जाता है ) विशुद्ध तमोके ठीक ऊपरमें ही जगत्प्रसविनी महामाया-स्थिर आधारके ऊपर में ही क्रिया, क्रियाकी ही प्रकाश, फिर स्थिरमें ही