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प्रथम अध्याय चक्र पर्यन्त तीन स्थितिका स्थान है-“दं” मूलाधार और स्वाधिष्ठान के मध्यस्थल कामपुरमें, “यं" अनाहतमें, और "पं" विशुद्ध कमलके ऊपर और आज्ञाके नीचे मस्तक-ग्रन्थिमें। मनोमय शरीर "द" स्थानमें रखनेसे केवल मूलाधारका ज्ञान होता है; "य" स्थानमें रखने से मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, और अनाहत, यह चार चक्रका ज्ञान होता है; और "प" स्थानमें रखनेसे षट्चक्रका मूलस्वरूप अपंचीकृत सूक्ष्म तत्व समूह कारणके साथ प्रत्यक्ष होता है। और भी वह "प" स्थानमें रहनेसे साधकको कपिध्वज तथा कृष्णसारथी होना होता है। इसीलिये साधन-कालमें उस स्थानको “रथोत्तम" कहा है। ___ "उभय सेना”—प्रवृत्ति ( संसारमुखी वृत्ति ) और निवृत्ति(असंसारमुखी वृत्ति )। "प्रवृत्ति"-वैषयिक अहंकार वा आभासचैतन्य (भीष्म ), एवं विषय-संस्कारज व्यभिचारी बुद्धि (द्रोण) द्वारा चालित वासनामुक्त काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मस्सरता
आदि, और इनही सबका पोषक निद्रा, तन्द्रा, संशय, अय, आलस्य, दीर्घसूत्रता प्रभृति साधन-प्रतिकूल विविध वृत्ति समूह है। "निवृत्ति”विवेक, वैराग्य, ज्ञान, भक्ति, श्रद्धा, शम, दम, तितिक्षा, उपरति, समाधान, मुमुक्षुत्त्व प्रभृति साधना के अनुकूल वृत्ति समूह हैं ।
कूटस्थमें लक्ष्य रख करके चैतन्य ज्योतिको सन्मुखमें प्राप्त हो करके "उत्तम” स्थान अधिकार करके विषयमुखी और श्रात्ममुखी दोनों वृत्तिके ठीक बीचमें रहनेसे भी जनमके प्रारम्भ दिनसे आज पर्यन्त वर्द्धित विषय-संस्कार इस समयमें अति सूक्ष्म हो करके सर्वतोमुखो हो जाता है; इसलिये साधकके मनमें "अहं ममत्व" भाव प्रबलतर हो उठता है। यह "अहंममत्व" भाव जीवका अपने प्रकृतिसे ही प्रकाश पाता है; प्रकृति ही जननी है। इसलिये साधकके उस अवस्थाको 'पार्थ' कहा गया है। पार्थपृथाका पुत्र अर्थात् मातृ