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प्रथम अध्याय
४३. सुख भोगकी कोई आवश्यकता नहीं, मैं जैसे हूँ वैसे ही अच्छा। पर जाऊं तो भी अच्छा है, तथापि भोग-वासना नष्ट करना अच्छा नहीं; संसारमें वासना पूरण नहीं होता केवल अभाव भोग करना पड़ता है। वह भी अच्छा है, तथापि इस प्रकार कष्ट सहा नहीं जाता; चक्षुकर्णादि संयत करनेसे अन्धा-बहिर होना पड़ेगा ऐसा होने से यह शरीर रूप मांसपिण्ड बहन करके व्यर्थ जीवनमुक्त नाम लेके घूमनेका प्रयोजन नहीं। और भी इस प्रकारकी अवस्या में भोगवासना त्याग करके जीवित रहनेसे कौन प्रयोजन सिद्ध होवेगा ? मरना ही अच्छा ह । ( अज्ञानताके लिये पहिले पहिले साधन कष्टसे अधीर होकरके साधकके मनमें इस प्रकारके सोच का तरंग उठता रहता है। साधन मार्गमें थोड़ीसो चेष्टा करनेसे ही यह सब अनुभव प्रत्यक्ष होता है )। __ "मधुसूदन"। -शरीरकी तथा मनकी यन्त्रणा (आधिव्याधि) में अधीर होकरके अपनेको नितान्त विपदग्रस्त समझके साधक "विपत्तेमधुसूदनः” इस वचनको स्मरण करके कूटस्थके तरफ लक्ष्य करके मधुसूदन शब्द उच्चारण करते रहते हैं। क्योंकि अशुभ नष्ट करते हैं कह करके हरि का नाम मधुसूदन है । यथा
"मधुक्लीवं च माध्वीके कृतकर्म शुभाशुभे। भक्तानां कर्मणाचैव सूदनं मधुसूदनः॥ परिणामाशुभं कर्म भ्रान्तानां मधुरं मधु ।
करोति सूदनं योहि स एव मधुसूदनः ॥ "प्राचार्य्याः पितरः पुत्राः” इत्यादि । -नाड़ी-चक्रके भीतर स्थिर वायुकी क्रिया द्वारा साधकमें जिस जिस प्रकार शक्ति लाभ होती हैं,
और उस उस शक्तिसे जिस जिस प्रकार की वृत्तियां उत्पन्न होती हैं, उन सबको इत्याकार जानिये। जो महाभाग क्रिया करके क्रियामें प्रतिष्ठा लाभ करते हैं. वही पुरुष अपने पाप यह सब समझते हैं।