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प्रथम अध्याय होती रहती है, इस प्रकारसे वृत्ति समूह मिश्र अमिश्र रूप करके अनन्त आकारमें उठती रहती है। शरीर-तत्वविद् भगवत्परायण आर्य्यऋषिगणने उन्हीं सबको रूपकमें परिणत करके संसारवाले नाना सम्बन्धसे सजाकर व्यक्त किया है। इसीलिये यहां पिता पितामह प्रभृति शब्दोंके प्रयोग है ॥ २६ ॥
तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान् ।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ॥ २७॥ अन्वयः। सः कौन्तेयः ( अर्जुनः ) तान् सर्वान् बन्धून् अवस्थितान् समोक्ष्य परया कृपया ( दयया ) आविष्टः ( गृहीतः ) विषीदन् ( सन् ) इदम् अब्रवीत् ॥२७॥
अनुवाद। उन कुन्तीपुत्र ( अर्जुन ) ने उन समस्त वन्धुगणको रणस्थलमें अवस्थित देख करके, अतिशय करुणाविष्ट तथा विषण्ण होकर यह बात कही ॥ २७॥
व्याख्या। साधक गुरूपदेश प्राप्त कर कैवल्य-स्थिति लेनेके समय देखते हैं कि, विषय-भोगकी समूची वृत्तियोंको नष्ट करना पड़ेगा; किन्तु कैवल्य-स्थितिके ऊपर लोभ रहनेसे भी विषय-भोगको इच्छा तब भी प्रबल रहनेके कारण साधक भोग-साधन वृत्तियोंको अधिक तरहसे अपना विचार, ममतापरायण हो, गुरूपदेशकी कठोरताको थोडासा ढीला करके अपना इच्छाके अनुसार उसको बना लेनेके लिये, वशीकरण मन्त्र स्वरूप निष्फल रोलाई रोते रहते हैं,-"विषय भोग भी करूंगा, योग भी करूंगा, साधु भी होउंगा”—ऐसा होनेसे ही मानो मनके माफिक होगा। साधकके इस प्रकार अपने वशमें रहनेकी चेष्टाको ही-"कौन्तेय" शब्द द्वारा प्रकाश किया गया है । कुन्ती आकर्षणी मन्त्र द्वारा अपनी इच्छानुसार देवताओंको अपने वशमें लाई थी। अर्जुन भी माताके स्वभावका अनुकरण करके कृष्णको (गुरुको ) अपने वशमें लाकरके एकही साथ भोगी तथा योगी दोनों हो होनेका चेष्टा करते हैं।