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प्रथम अध्याय
३१५ आबद्ध कर रखनेके लिये समर्थ है अर्थात् उन सबमें कोई एक भी रहनेसे जीवका निस्तार वा मुक्ति नहीं होती ॥८॥
अपर्याप्त तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् । पर्याप्त त्वि तेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥
अन्वयः। भोष्माभिरक्षितं अस्माकं तत् ( तथाभूतवेरैयुक्त) बलं (सैन्यं ) अपर्याप्तं ( असमर्थ भाति ), तु ( किन्तु ) एतेषां ( पाण्डवानां ) इदं बलं पर्याप्तं ( समर्थे भाति ) ॥ १०॥
अनुवाद। भीष्म द्वारा रक्षित हमलोगोंकी वह सन्य अपर्याप्त है, किन्तु भीम द्वारा रक्षित पाडवों की यह मैन्य पर्याप्त है ॥ १० ॥
व्याख्या। ३यसे १०म श्लोकका भावार्थ । -धृष्टद्युम्न द्रोणका शिष्य है, इसका अर्थ यह है कि, चतन्यज्योति बुद्धिके द्वारा हो प्रकाश पाती है। परन्तु चैतन्यज्योति प्रकाश होते ही बुद्धिको लय करने की चेष्टामें रहती है, तब साधकके मनमें वासना वृत्ति जागरूक होकर विषय बुद्धिको उत्तेजित करनेके लिये ही मानो कहती है, हे बुद्धि ! तुम जिसको प्यार करती हो और तुमसे हो जिसकी वृद्धि है, वह चैतन्यज्योति ही तुमको नष्ट करने पर उद्यत हुई है; अब उसको प्रभय न देना, शीघ्रही उसको विनष्ट करो। यद्यपि चतन्यज्योति द्वारा उद्भासित वो युयुधानादि वृत्ति समूह ही महारथ हैं ( जिस पर भन दिया जाय, वही मनको खींचके कामनाको स्तम्भन करनेकी शक्ति रखता है ) अर्थात् तीब्रवेगशाली, ऐसे कि वायु और तेज जैसे वेगवान, तथापि, वह सब कुछ भी नहीं, अस्मदादि पक्ष की तुलनामें वह सब अकिंचित्कर हैं, क्योंकि अस्मद् पक्षमें श्राप, भीष्म और कर्ण प्रभृति के रहनेसे हम सबमें क्षत्रियबल और ब्रह्मबल दोनों ही बल वर्तमान हैं। परन्तु उन सबके (दलमें) केवलमात्र क्षत्रियबल रहनेसे वह निस्तेज हैं। केवल ऐसा ही मही, अस्मदादिका दल अपरिमित