________________
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra
www.kobatirth.org
Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir
टचकटर गिरि, और पविम की ओर सोनाचूर अर्थात् सोनेका प. हाड़ है। जङ्गल के राक्षसों को दूर रखने के लिये घाटी के द्वार पर नन्द (बैल) रूपी महादेव का ऐश्वर्य युक्त घोड़ा (वाहन) रखा गया, और उत्तर की ओर का यह (पहरे का) काम स्वयं कन्हैयाने किया। पवित्र अग्नि प्रज्वलित की गई; परन्तु (उस समय) ब्रह्मा की स्त्री सावित्री का पता कहीं नहीं लगा, और चूंकि एक स्त्रीके विना कर्म का प्रारम्भ हो नहीं सकताथ , ( इसलिये) एक युवा गूजरी (ब्रह्माके पास) सावित्री के स्थान पर बैठाई गई, जो (सा: वित्री) लौटने पर इस अपमान से इतनी कोपायमान हुई कि वह रत्नके पर्वत पर जाकर लुप्त हो गई। इस स्थानपर एक कुण्ड खुद निकला जो अभी तक उस (सावित्री) के नामसे प्रसिद्ध है। जिस के समीप ही उसका मन्दिर है जोकि पुष्कर की सोमा के अन्दर विशेष ध्यान देने योग्य नहीं है । इस यज्ञ के अन्दर महादेव, अर्थात् जैसे कि वे भोलानाथ कहलाते हैं, सदा भङ्ग आदि के नशोंके प्रयोगसे एक मूर्खता की दशामें आते थे, (उस यज्ञ की) पवित्र अग्नि को बुझाना भूल गये, जो कि (सवत्र) फैल गई, और सारे संसार को जला देने ही को थी, जब कि नमाने उसको बालू रेतसे बुझाई, और इस से घाटी के टीवे हुये । यह पुष्कर की पवित्रता की प्राचीन उत्पत्ति है। बहुत सपय के पश्चात् मण्डोर के एक पड़िहार राजा का अपनी शिकार का पीछा करने की आकाङ्क्षा में उस स्थान को जाना हो गया, और अपने हाथ उस कुण्ड में धोने से वे किसी रोग ( कुष्ट रोग) से आरोग्य हो गये । और इस विचार से कि उस स्थान को पीछा जान जाऊँ उन्होंने अपनी पगड़ी फाड़ के चिथड़े कर डाले और वे टुकड़े (पोछे आते समय मार्ग में के) क्षों पर बाँधते
For Private And Personal Use Only