Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 09 Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
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प्रमेयचन्द्रिका रीका श०११ उ०११ सू०६ सुदर्शनचरितनिरूपणम् ५२३ ता-पद्ममलताभक्तिचित्राम्-तत्र इहामृगाः-वृकाः, ऋषमा:-वृषभाः, नरतुरगमकरविहगास्तु प्रसिद्धा एव, व्याला:-श्वापदसाः, किन्नराः-व्यन्तरविशेषाः, रुरवः-मृगविशेषाः, शरभा:-आरण्याः अष्टापदवाच्याः पशवः, चमरा:-आटघ्याः गावा, कुअरा:-हस्तिनः, वनलता:-अशोकादिलताः, पद्मलता:-कमलिन्यः, एतासां या भक्तयो-विच्छित्तयो रचना स्ताभि श्चित्रा या सा तथाविधाम् , अभ्यन्तराम्अन्तःस्थितां यवनिकाम् आकर्षयति-पातयति, 'अंछावेत्ता नाणामणिरयणभत्तिचित्ते' आकृष्य-यवनिकां पातयित्वा नानामणिरत्नभक्तिचित्रम्-नानामणिरत्नानां भक्तिभिः रचनाभि विच्छित्तिभि युक्तानि चित्राणि यत्र तत, वक्ष्यमाणभद्रासनस्य विशेषणमेतत् , 'अत्थरयमउयमसूरगोत्थगं' आस्तरकमृदुकमसूरकावस्तृतम्उसने तनवाया यहां यावत् शब्द से " नर, तुरग, मकर, विहग, व्याल, किन्नर, रुरु, शरभ चमर, कुंजर, वनलता, पद्मलता' इन सब का ग्रहण हुआ है। ईहामृग एक जात के जंगली जानवर का नाम है-जिसे वृकभेडिया कहते हैं। ऋषभ नाम बैल का है। व्याल नाम सर्प का है। किन्नर नाम-व्यन्तर विशेष देव का है, रुरु नाममृगविशेषका है, शरभ नाम-अष्टापद् का है, चमर नाम-चमरी गायका है. कुंजर नाम-हामी का है, वनलता नाम-अशोकादिलताओं का है और पद्मलता-कमलिनी का नाम है इन सब के चित्र उस पड़दे पर अंकित किये हुए थे. 'अंछावेत्ता नाणामणिरयणभत्तिचित्ते' परदा तनवाकर फिर उसने उसके भीतर एक भद्रासन रखवाया वह भद्रासन अनेक प्रकार के मणि-रत्नों से युक्त था 'अस्थरयम उयमसूरगोत्थगं' इस पर कोमल गादी और तकिया विछाये गये थे भद्रासन पर जो वस्त्र विछाया गया भ४२, वि, व्यास, नि२, २२, २१, २२, १२, पलता भने पा. લતાનાં ચિત્ર ગ્રહણ કરવાના છે. એક જાતના જંગલી જાનવરનું નામ ઈહામૃગ (વરુ) છે અષભ એટલે બળદ, વ્યાલ એટલે સર્પ કિન્નર એટલે એક प्रारना व्य-त२विशेष हेव, '२२' में प्रा२ना भृगविशेषन छ, शल એટલે અષ્ટાપદ નામનું જાનવર, અમર એટલે ચમરી ગાય, કુંજર એટલે હાથી, અશોકાદિ લતાઓને વનલતા કહે છે, અને કમલિનીને પલતા કહે छ. ni चित्रात पहा ५२ होi di. “अंछावेत्ता नाणामणिरयणभत्तिचित्ते" पो तयाव्या पाहतो ते पानी पाछ सुर भद्रासन ગોઠવ્યું. તે ભદ્રાસન અનેક મણિ અને રત્નોથી મંડિત ચિત્રેથી યુક્ત હતું, "अत्थरयमउयमसरगोत्थग" तना ०५२ मा भने तय मि.
શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૯