Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 09 Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti

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Page 701
________________ --- - मजयन्द्रिका टीका २०१२ उ०१ २० २ शसखभावकचरितनिरूपणम् १८७ ग्रतः-अनुपालयन्तो विहरिष्याम इति, 'तए णं तुमं पोसहसालाए जाव विहरिए' ततः खलु अस्माकं कथनानन्तरम् स्वया पौषधशालायाम् यावत्-पौषधिकेन ब्रह्म चारिणा उन्मुक्तमणिसुवर्णेन व्यपगतमालावर्णकविलेपनेन, निक्षिप्तशस्त्रमुसलेन एकेन अद्वितीयेन दर्भसंस्तारकोपगतेन पाक्षिकं पौषधं प्रतिजाग्रता-अनुपालयताविहतम् स्थितम्, 'तं सुटु णं तुमं देवाणुप्पिया! अम्हं हीलसि' तत् तस्मात् कारणात् भो देवानुप्रिय! त्वं सुष्टु अतिशयं खलु अस्मान् अबहेलयसि-अवमन्यसे ? 'अज्जो त्ति समणे भगवं महावीरे ते समणोवासए एवं बयासी'-ततः खलु तच्छत्वा विज्ञाय वा, हे आर्याः ! इति संबोध्य, श्रमणो भगवान महावीर स्तान् श्रमणोपासकान् , एवं-वक्ष्यमाणप्रकारेण आदीत्-' मा गं अज्जो तुम्मे संखं समणोवासगं हीलह, निंदह, खिंसह, गरहह, अवमन्नह ! भो आर्याः ! मा विपुल अशनादिक का आस्वादन, विस्वादन, भोजन एवं परिभाजन करते हुए पाक्षिक पौषध करेंगे। 'तएणं तुमं पोसहसालाए जाव विहरिए' इसके बाद तुमने पौषधशाला में यावत् पौषधिक होकर, ब्रह्मचर्य धारण कर, मणि सुवर्ण का त्याग कर, माला वर्णक विलेपन का परिहार कर, शस्त्र और मुशल को निक्षिप्त कर अकेले दर्भ संस्तारक पर बैठकर पाक्षिक पौषध को धारण कर लिया 'तं सुई णं तुमं देवाणुप्पिया! अम्हं हीलसि' तो हे देवानुप्रिय! तुमने बहुत अच्छा किया जो तुमने इस प्रकार से हमलोगों की अवहेलना की है। अज्जो त्ति समणे भगवं महावीरे ते समणोपासए एवं वयासी' तब हे आर्यों! इस प्रकार से सम्बोधित करते हुए श्रमण भगवान महावीर ने उनसे ऐसा कहा-'माणं अज्जो! तुम्भे संखं समणोयासगं हीलह, निदह, નાદિનું આસ્વાદન, વિસ્વાદન, લેજન અને પરિભાજન કરીને પાક્ષિક પોષधनी माराधना २." “तपण तुम पोसहसालाए जाव विहरिए" त्यार બાદ અમારી સાથે બેસીને તે ભેજનનું આસ્વાદન કરવાને બદલે તમે તે પિષધશાળામાં જઈને બહાચર્ય ધારણ કરીને, મણિસુવર્ણને ત્યાગ કરીને માલા અને વિલેપનનો ત્યાગ કરીને શસ્ત્ર અને મુશલને ત્યાગ કરીને એકલા જ દર્ભના સંસ્મારક પર વિરાજમાન થઈને પૌષધશ્રત ધારણ કરી લીધું છે.” "त' सुहण तुम देवाणुप्पिया ! अम्ह हीलसि” पानुप्रिय ! मा रे तमे अभाश२ अपडेसना . ध १ ॥३४. छ? "अन्जो! त्ति समणे भगव महावीरे ते समणोवासए एवं क्यासी" सारे “3ा!" આ પ્રમાણે સાધન કરીને શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે તે પ્રમાણે પાસકોને આ प्रभारी -" मा ण अज्जो! तुम्मे संख समणावासय हीलइ, निंदा, खिसइ, શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૯

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