Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 09 Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti

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Page 698
________________ ૬૩ भगवतीसूत्रे कलिकम्मा जाव सरीरा साहिं सएहिं गिहेहिं तो पडिनिक्खमेति ' ततः खलु ते श्रमणोपासकाः कल्ये - प्रभाते मादुष्प्रभातायां रजन्यां यावत्-सूर्ये ज्वलति - काशमाने सति स्नाताः कृतवलिकर्माणो- दत्तवायसाद्यन्नाः यावत्कृतकौतुक मङ्गलप्रायवित्ताः सर्वालङ्कारविभूषितशरीराः, स्वकेभ्यः स्वकेभ्यः - निजनिजेम्पो गृहेभ्यः प्रतिनिष्क्रामन्ति-निर्गच्छन्ति, 'पडिनिक्खमित्ता एगयओ मिलायंति ' प्रतिनिष्क्रम्य - निर्गत्य, एकतो मिलन्ति-एकत्री भवन्ति, 'मिलायित्ता सेसं जहा पढमं जाव पज्जुवासंति' एकतो मिलित्वा- एकत्रीभूय शेषं यथा द्वितीयशतके पदमोदेशके तुङ्गकनगरीवास्तव्यश्रावकाणां प्रथमं निर्गमनं प्रतिपादितम् तथैव इदमपि निर्गमनं प्रतिपत्तव्यम्, यावत् भगवतः समीपे गत्वा भगवन्तं वन्दित्वा नमस्त्विा, विनयेन माञ्जलिपुटाः सन्तो भगवन्तं पर्युपास्ते, 'तरणं समणे भगवं महावीरे तेर्सि समणोवासगाणं तीसेय महतिमहालियाए सभाए धम्मकहा जाव सएहिं गिर्हितो पडिनिक्वमंति' इसके बाद वे श्रमणोपासक प्रातः सूर्योदय होने पर स्नान करके, बलिकर्म कर के वायस आदिकों के लिये अनवितरण करके यावत्-कौतुक मंगल एवं प्रायश्चित्त करके और समस्त अलंकारों से विभूषित शरीर होकरके अपने २ घरों से निकले 'पडिनिक्aमित्ता एगयओ मिलायंति ' निकलकर फिर वे एक स्थान पर इकट्ठे हुए ' मिलायित्ता सेसं जहा पढमं जाव पज्जुवासंति' एक स्थान पर इकट्ठे होकर फिर वे इस प्रकार से चले कि जैसा प्रथम निर्गमन का वर्णन इसी के द्वितीयशतक के दशमोद्देशक में तुङ्गिकानगरी के रहने वाले श्रावकों का कहा गया है - यावत् भगवान् के समीप जाकर उन्हों ने भगवान को वन्दना की, नमस्कार किया और विनय " कब लिक्रम्मा, जाव सरीरा सहि सएहिं गेहेहिंतो पडिनिक्वमंति " हुवे ते ગામના અન્ય શ્રાવકે પણ પ્રભાતકાળે સૂર્યોદય થતાં જ સ્નાન કરીને, ખલિકમ કરીને (કાગડા આદિને અન્ન આપવું તેનું નામ મલિકમ' છે), કૌતુક મંગળ અને પ્રાયશ્ચિત્ત કરીને અને સમસ્ત અલકારાથી શરીરને વિભૂષિત કરીને, પાતપેાતાનાં ઘેરથી મહાવીર પ્રભુને ધ્રુણુાનમસ્કાર કરવા भाटे नीडजी पडया " पडिनिक्खमित्ता एगयओ मिलायंति " धेरथी नीडजीने તેઓ એક જગ્યાએ એકઠાં થયાં. " मिलायिता सेसं जहां पढम जाव पज्जुवासंति " तेथे महावीर स्वामी पासे देवी રીતે ગયા તેનુ વણુ ન ખીજા શતકના દસમાં ઉદ્દેશકમાં તુગિષ્ઠાનગરીના શ્રાવકોના નિગમનના વધુ ન પ્રમાણે સમજવું. “ તેમણે ભગવાનને વંદણા નમસ્કાર કર્યાં અને વિનયપૂર્વ ક બન્ને હાથ જોડીને તેમણે શ્રમણ ભગવાનની પર્યું`પાસના કરી. ’’ આ કથન શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૯

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