________________
संख्या ४]
रजनी ने कहा - - "बेटा, मैंने लड़कपनं से बड़ा मिज़ाज दिखाया है, मगर क़सम ले लो, मेरी यही इच्छा थी कि तुम जल्दी से जल्दी कुछ करने के लायक हो जानो । हरखू के बाप का अन्त समय है । अब उनका भरोसा ही क्या ? पेड़ के पके फल हैं । अब गिरे तब गिरे । मेरा हाल देखते ही हो । बहू तुम्हारे भाग्य से बड़ी होशियार और मेहनती मिली है। अब तुम गृहस्थी सँभालने लायक़ हो गये हो । मैं हरवू का तुमसे ज़्यादा प्यार करती हूँ । इसका मतलब यह नहीं है कि तुम ग़ैर के लड़के हो । मा हमेशा छोटे बच्चे का ज़्यादा प्यार करती है। फिर भी मैं अपनी भूल पर पछताती हूँ । अब तुम घर-गृहस्थी देखा, हरखू से खूब काम लो और उसे भी मार-पीट कर अपनी तरह मेहनती बनाओ ।"
रमई ने हरखू का फाँकनेवाली तम्बाकू लाने के लिए मेजा था। जब वह लौट कर वापस न श्राया तब वह खाँसता हुआ ख़ुद रजनी के कमरे में आया ।
रजनी ने कहा- "मैं तुमसे एक बात कहती हूँ, मानोगे ?"
मुर्ग
ܕܕ
( ६ )
माधेा रजनी के पास से उठा और सीधा गुदरी साहु के घर पहुँचा । उसने साहु से कहा - " मैं अधीनसिंह के पास चलता हूँ । तुम अपना काग़ज़ लेकर श्राश्रो । आज हिसाब हो जाय ।"
माधो- “साहु, कितने रुपये हैं ?”
रमई – “कहा भी ।"
"भैया सवा सौ थे । छः साल से ऊपर हो गया ।" अधीन सिंह -- "तब दावा क्यों नहीं किया ? और इतने ज्यादा कीमत का टिकट क्यों लगाया ? क्या रकम बढ़ाने का इरादा था ?" गुदरी की निकल आई, टुकुर टुकुर ताकने लगा । माधो ने रुपये गिन दिये और ठाकुर ने उठाकर टेंट “यही, मगर उसे घर के मामले में पूरा अधिकार में रख लिये । गुदरी ने बड़े लोभ से उन रुपयों को देखा । रहेगा ।" अधीन सिंह की नीयत उससे छिपी न रही ।
—
रजनी- - "देखो अब घर का मालिक माधो होगा ।" रमई - " बस, यही कि और कुछ
J
माधो ने गुदरी साहु का पक्ष लेना चाहा। ठाकुर गुदरी से काग़ज़ हाथ में लेकर कहा - " मैं तो अपना हिस्सा पा चुका हूँ। अगर माधो, तुम्हें रुपया देना मंज़ूर हो तो मैं इसी काग़ज़ पर पाँच सौ की रक़म लिखाये देता हूँ | बोलो मंज़ूर है ?"
माधोधनसिह को देखा । मुँह से कुछ न कहा, लेकिन आँखों से यही मालूम हुआ कि अब मैं एक पाई भी न दूँगा । हाँ, जो रुपये श्राप लिये जा रहे हैं ये गर गुदरी को मिल जायँ तो बहुत अच्छा हो I
अधीन सिंह ने कोई जवाब न पाकर काग़ज़ फाड़ डाला । (८) रजनी मर गई । माधो घर का मालिक हुआ । प्रोनोटवाले मामले का उसके दिल पर सख्त असर पड़ा । वह अनपढ़ और मूर्ख रहना ईश्वर का दण्ड समझता है । -
गुदरी अचम्भे में आ गया। अभी उसको काग़ज़ ठीक करना था । सचमुच उसके पास कोई बाकायदा काग़ज़ न था । सिर्फ़ एक सादे पन्ने पर टिकट लगाकर अँगूठे का निशान ले लिया था । वही रक्खा हुआ था । वह शोपेश में पड़ गया । "
अधीन गाँव के ज़मींदार थे। सच्चे और सीधे आदमी थे । मगर नज़र नज़राने के मामले में बड़ी सख्ती करते थे । सूखे असामियों को तो वे यों ही टाल देते थे । माधो का देखकर बोले—“कब श्राया चेला ? छाता तो बड़ा
।
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
३७५
अलबेला लाया । बोल और कुछ देगा कि बस यही । " - कहते हुए उन्होंने छाता अपने हाथ में ले लिया ।
माधो ने कहा--" सरकार की ख़ातिर जान हाज़िर है । छाता की क्या बिसात है ? श्राज श्राप गुदरी महाजन का हिसाब तय करा दें ।
अधीन सिंह ने कहा – “अभी चल" । और वे डंडा उठा कर चल पड़े ।
गुदरी प्रोनोट बनाने की तैयारी कर रहा था। वह टाल-मटोल करने लगा, लेकिन श्रधीनसिंह ने ऐसी डॉट बताई कि काग़ज़ निकालना ही पड़ा। प्रोनोट क्या था, सादे काग़ज़ पर टिकट लगाकर निशान लगाकर रख लिया था, न कहीं रकम का पता था और न तारीख़ दर्ज थी ।
धनसिंह ने डपट कर पूछा - "यह क्या है ? लाला, जाल करते हो ?"
#
www.umaragyanbhandar.com