Book Title: Gommatasara Karma kanda
Author(s): Nemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
Publisher: Shivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan

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Page 22
________________ त्रिचूलिका नामक तृतीयाधिकारमें ३९८ से ४५० तक ४३ गाथाएँ हैं। ३९८ से ४०७ तक १० गाथाओंमें प्रथम नवप्रश्नधूलिकामें उदयव्युच्छित्तिके पहले बन्धव्युच्छित्तिको प्राम होनेवाली प्रकृतियाँ, उदयव्युच्छित्तिके पश्चात् बन्धयुच्छित्तिको प्राप्त होनेवाली प्रकृतियाँ, उदयव्युच्छित्तिके साथ बन्ध्र-व्युच्छित्तिको प्राप्त होनेवाली प्रकृतियाँ, स्वोदयबन्धी प्रकृतियाँ, परोदयबन्धी प्रकृतियाँ, स्व-परोदयबन्धी प्रकृतियाँ और सान्तर-निरन्तरबन्धी प्रकृतियाँ कौन-कौनसी हैं, इन नवप्रश्नोंके उत्तरका कथन पाया जाता है। पंचभागाहार नामक द्वितीय चूलिकामें गाथा ४०८. से ४३५ तक १५ गाथाओंमें उद्वेलन, विध्यात, अधःप्रवृत्त, गुणसंक्रम और सर्वसंक्रम इन पाँच भागहारोंका निरूपण है तथा संक्रमणसंबंधी कथन भी पाया जाता है। दशकरणनामक तृतीय चूलिका में ४३६ से ४५० तक १५ माथाएँ हैं। इनमें बन्ध, उत्कर्षण, अपकर्षण, संक्रमण, उदीरणा, सत्ता, उदय, उपशम, निधत्ति और निकाचना इन दश-करणोंका कथन करते हुए यह भी बताया है कि कौनसा करण किस गुणस्थानतक होता है? स्थानसमुत्कीर्तनाधिकारमें ४५१ से ७८४ तक ३३४ गाथाएं हैं। इस अधिकारमें गुणस्थानसम्बन्धी प्रकृतिसंख्या सहित बन्ध-उदय व सच का कथन है अर्थात् यह बताया गया है कि एक जीन के एक समय में कितनी प्रकृतियोंका बन्ध-उदय और सत्त्व सम्भव है। उपयोग, योग, संयम और लेश्या व सम्यक्त्वकी अपेक्षा मोहनीयकर्मके उदयस्थानोंका कथन है। मोहनीयके सत्त्वस्थानोंका कथन भी इस अधिकारमें है। साध ही नामकर्मके ४१ जीवपदोंका कथन करते हुए बंध-उदय-सत्त्वके त्रिसंयोगीभंग भी कहे गये हैं। ' प्रत्ययाधिकार में ७८५ से ८१० तक २५ गाथाएँ हैं। इसमें गुणस्थानोंकी अपेक्षा मूल व उत्तर प्रत्ययोंका तथा कर्मबन्धके कारणभूत आत्मपरिणामों अर्थात् ज्ञानावरणादि कर्मों के विशेष प्रत्ययोंका कथन है। भावचूलिका नामक सममअधिकारमें ८१५ से ८९५ तक ८५ गाथाओं द्वारा भावोंका, उनके उत्तरभेदोका तथा गुणस्थानोंकी अपेक्षा स्थानभंग व पदभंगका, ३६३ मिथ्यामत एवं एकान्त नियतिवाद आदि मिध्याम”का कथन है। त्रिकरणचूलिका नामक आठवें अधिकार में ८९६ से ९१२ तक १७ गाथाओंमें अध:करण, अपूर्वकरण तथा अनिवृत्तिकरण का स्वरूप व कालादिका कथन है। कर्मस्थितिरचनाधिकार में ९१३ से १६४ तक ५२ गाथाओंमें कर्मस्थितिरचना अझसन्दृष्टि, अर्थसन्दृष्टि, त्रिकोणयंत्ररचना तथा स्थितिबन्धके भेद व अध्यवसाय स्थानोंका कथन है। इसके पश्चात् आठ गाथाओंमें ग्रन्थकर्ताकी प्रशस्ति है। भारतीय ज्ञानपीठसे प्रकाशित पंचसंग्रह में प्राकृत व संस्कृतके पंचसंग्रहोंका संकलन है। इनके रचयिताओंके नाम व समय अज्ञात होनेके कारण यह नहीं कहा जा सकता है कि गोम्मटसार व पंचसंग्रहमें कौन प्राचीन है ? इस पंचसंग्रहके संपादक व अनुवादक श्री पं. हीरालालजी सिद्धान्तशास्त्री साढूमल (झांसी) हैं। प्राकृत पंचसंग्रहकी और गोम्मटसारकी अनेक गाथाएँ परस्पर सदृश हैं।

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