Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapati Sutra Part 04 Stahanakvasi
Author(s): Madhukarmuni
Publisher: Agam Prakashan Samiti
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[ [ १३० प्र.] भगवन् ! निर्ग्रन्थ सकषायी होता है या अकषायी होता है ?
[१३० उ.] गौतम ! वह सकषायी नहीं होता, किन्तु अकषायी होता है। १३१. जदि अकसायी होज्जा किं उवसंतकसायी होज्जा, खीणकसायी होज्जा ? गोयमा ! उवसंतकसायी वा होज्जा, खीणकसायी वा होज्जा ?
[१३१ प्र.] भगवन् ! यदि निर्ग्रन्थ अकषायी होता है तो क्या उपशान्तकषायी होता है, अथवा क्षीणकषायी होता है ?
[ व्याख्याप्रज्ञप्तिसूत्र
[१३१ उ.] गौतम ! वह उपशान्तकषायी भी होता है और क्षीणकषायी भी होता है ।
१३२. सिणाए एवं चेव, नवरं नो उवसंतकसायी होज्जा, खीणकसायी होज्जा । [ दारं १८ ]। [१३२] स्नातक के विषय में भी इसी प्रकार जानना चाहिए । विशेष यह है कि वह उपशान्तकषायी नहीं होता, किन्तु क्षीणकषायी होता है। [ अठारहवाँ द्वार ]
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विवेचन — सकषायी या अकषायी ? पुलाक से लेकर प्रतिसेवनाकुशील तक क्रोधादि चारों कषायों से युक्त होते हैं, क्योंकि उनके कषायों का उपशम या क्षय नहीं होता। कषायकुशील में जो चार, तीन, दो और एक कषाय का कथन किया है, उसका तात्पर्य यह है कि जब वह चार कषाय में होता है, तब उसके संज्वलन क्रोध, मान, माया और लोभ, ये चारों कषाय होते हैं। उपशमश्रेणी या क्षपक श्रेणी में जब संज्वलनक्रोध
उपशम या क्षय हो जाता है, तब उसके तीन कषाय होते हैं। जब संज्वलन मान का उपशम या क्षय हो जाता हैं तब दो कषाय होते हैं और जब संज्वलन माया का उपशम या क्षय हो जाता है, तब सूक्ष्मसम्पराय नामक दसवें गुणस्थान में एक मात्र संज्वलन लोभ ही शेष रह जाता है। निर्ग्रन्थ और स्नातक दोनों अकषायी होते हैं । उन्नीसवां लेश्याद्वार : लेश्याओं की प्ररूपणा
१३३. पुलाए णं भंते ! किं सलेस्से होज्जा, अलेस्से होज्जा ?
गोयमा ! सलेस्से होज्जा, नो अलेस्से होज्जा ।
[१३३ प्र.] भगवन् ! पुलाक सलेश्य होता है या अलेश्य होता है ? [१३३ उ.] गौतम ! वह सलेश्य होता है अलेश्य नहीं होता है ।
१३४. जदि सलेस्से होज्जा से णं भंते ! कतिसु लेसासु होज्जा ?
गोयमा ! तिसु विसुद्धलेसासु होज्जा, तं जहा — तेउलेसाए, पम्हलेसाए, सुक्कलेसाए ।
[१३४ प्र.] भगवन् ! यदि वह सलेश्य होता है तो कितनी लेश्याओं में होता है ?
[१३४ उ.] गौतम ! वह तीन विशुद्ध लेश्याओं में होता है, यथा— तेजोलेश्या, पद्मलेश्या और
शुक्
१. (क) भगवती. अ. वृत्ति, पत्र ९०१
(ख) भगवती. (हिन्दी - विवेचन) भाग ७, पृ. ३३८६