Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapati Sutra Part 04 Stahanakvasi
Author(s): Madhukarmuni
Publisher: Agam Prakashan Samiti

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Page 779
________________ ६४८] [व्याख्याप्रज्ञप्तिसूत्र [२-२ प्र.] भगवन् ! ऐसा क्यों कहा जाता है कि वह एक समय, दो समय अथवा ती समय की विग्रहगति से उत्पन्न होता है। [२-२ उ.] हे गौतम ! मैंने सात श्रेणियाँ कही हैं, यथा- (१) ऋज्वायता, (२) एकतोवक्रा, (३) उभयतोवक्रा, (४) एकत:खा, (५) उभयत:खा, (६) चक्रवाल और (७) अर्द्धचक्रवाल। जो पृथ्विकायिक ऋज्वायता श्रेणी से उत्पन्न होता है, वह एक समय की विग्रहगति से उत्पन्न होता है; जो एकतोवक्रा श्रेणी से उत्पन्न होता है, वह दो समय की विग्रहगति से उत्पन्न होता है, जो उभयतोवक्रा श्रेणी से उत्पन्न होता, वह तीन समय की विग्रहगति से उत्पन्न होता है। इस कारण से हे गौतम ! यह कहा जाता है कि वह एक, दो या तीन समय की विग्रहगति से उत्पन्न होता है ॥१॥ ३. अपज्जत्तसुहुमपुढविकाइए णं भंते ! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए पुरथिमिल्ले चरिमंते समोहए, समोहणित्ता जे भविए इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए पच्चत्थिमिल्ले चरिमंते पजत्तसुहुमपुढविकाइयत्ताए उववजित्तए से णं भंते ! कतिसमइएणं विग्गहेणं उववज्जेज्जा ? गोयमा ! एगसमइएण वा दुसमइएण वा, सेसं तं चेव जाव से तेणटेणं जाव विग्गहेणं उववज्जेज्जा । २। [३ प्र.] भगवन् ! अपर्याप्तक सूक्ष्मपृथ्वीकायिक जीव जो रत्नप्रभापृथ्वी के पूर्वदिशा के चरमान्त में मरणसमुद्घात करके इस रत्नप्रभापृथ्वी के पश्चिमदिशा के चरमान्त में पर्याप्त सूक्ष्मपृथ्वीकायिक-रूप से उत्पन्न होने योग्य है, तो हे भगवन् ! वह कितने समय की विग्रहगति से उत्पन्न होता है ? [३ उ.] गौतम ! वह एक समय, दो समयं अथवा तीन समय की विग्रहगति से उत्पन्न होता है, इत्यादि स कारण ................ तीन समय की विग्रहगति से उत्पन्न होता है, यहाँ तक कहना चाहिए। ॥ २॥ ४. एवं अपज्जत्तसुहुमपुढविकाइओ पुरथिमिल्ले चरिमंते समोहणावेत्ता पच्चत्थिमिल्ले चरिमंते बायरपुढविकाइएसु अपज्जत्तएसु उववातेयव्वो ॥३॥ [४] इसी प्रकार अपर्याप्त सूक्ष्मपृथ्वीकायिक जीव का पूर्वदिशा के चरमान्त में मरणसमुद्घात से मृत्यु प्राप्त कर पश्चिमदिशा के चरमान्त में बादर अपर्याप्त पृथ्वीकायिक-रूप से उपपात कहना चाहिए ॥ ३ ॥ ५. ताहे तेसु चेव पजत्तएसु ॥४॥ [५] और वही (पूर्ववत्) पर्याप्त-रूप से उपपात कहना चाहिए ॥४॥ ६. एवं आउकाइएसु वि चत्तारि आलावगा-सुहुमेहिं अपजत्तएहिं १, ताहे पज्जत्तएहिं २, वादरेहिं अपजत्तएहिं ३, ताहे पज्जत्तएहिं उववातेयव्वो ४। [६] इसी प्रकार अप्कायिक जीव के भी चार आलापक कहने चाहिए, यथा—(१) सूक्ष्म-अपर्याप्तक का, (२) उन्हीं (सूक्ष्म) के पर्याप्तक का, (३) बादर-अपर्याप्तक का तथा (४) उन्हीं (बादर) के पर्याप्तक


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