Book Title: Panchashak Prakaran me Pratipadit Jain Achar aur Vidhi Vidhan
Author(s): Kanakprabhashreeji
Publisher: Kanakprabhashreeji
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का भी चित्रण है। तीसरे अध्याय की वृत्ति में क्षुल्लक और महत् शब्द के अर्थ को प्रस्तुत किया है, साथ ही पाँच आचारों का मार्मिक विवेचन भी है। चतुर्थ अध्याय की वृत्ति में पंचमहाव्रत एवं रात्रिभोजन-विरमण के विषय में विशद वर्णन है। उसके पश्चात्, जीव के स्वरूप पर दार्शनिक दृष्टिकोण से व्याख्या प्रस्तुत की है। पंचम अध्याय की वृत्ति में व्रतषटक, कायषटक् और अठारह स्थाणु का उल्लेख है। षष्ठ अध्याय में क्षुल्लकाचार का प्रतिपादन किया है। सप्तम अध्याय की वृत्ति में भाषा के विवेक का विवरण है। अष्टम अध्याय की वृत्ति में आचार सम्बन्धी प्रक्रिया एवं फल का प्रतिपादन किया है। नवम् अध्याय की वृत्ति में विनय के प्रकार, फल तथा अविनय द्वारा होने वाली हानियों का विवरण है। दशम अध्याय की वृत्ति में भिक्षु के स्वरूप को दर्शाया है तथा दशवकालिक की वृत्ति की समाप्ति में आचार्य हरिभद्र ने अपना परिचय महत्तरा याकिनी के धर्मपुत्र के रूप में दिया है।
____ आवश्यकवृत्ति- आवश्यकवृत्ति नियुक्ति पर आधारित है। वृत्तिकार ने इस टीका का नाम शिष्यहित दिया है। यह वृत्ति 22.000 श्लोक-परिमाण है। इसमें आचार्य हरिभद्र ने आवश्यक सूत्रों का विवरण न देकर नियुक्ति गाथाओं की ही व्याख्या की है। नियुक्ति की प्रारम्भ की गाथा का प्रतिपादन करते हुए उसमें सर्वप्रथम पाँच ज्ञान का विवेचन है तथा पाँच ज्ञान के भेद-प्रभेदों को स्पष्ट किया गया है।
सामायिक-नियुक्ति का प्रतिपादन करते समय प्रवचन के प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए स्वभाव का परिचय दिया गया है कि इस जगत् में कुछ पुरुष ऐसे होते हैं, जिन्हें जिनवाणी अरुचिकर लगती है, लेकिन इसमें प्रवचन का क्या दोष? दोष तो प्रवचन श्रवण करने वालों का है। साथ ही, इसमें सामायिक के उद्देश, निर्देश, निर्गम आदि तेईस द्वारों का वर्णन है। सामायिक के निर्गम-द्वार के प्रसंग में कलकरों की उत्पत्ति, पूर्वभव आयु का विवरण दिया है तथा नाभिकुलकर के यहाँ भगवान् ऋषभदेव का जन्म एवं तीर्थंकर नाम-गोत्रकर्मबंधन के हेतुओं को प्रकाशित किया है। इसमें धनसार्थवाह का परिचय प्राकृत भाषा में दिया गया है। भगवान् ऋषभदेव के पारणे का उल्लेख करते हुए विस्तृत वर्णन जानने के लिए वसुदेव हिंडी का भी नामोल्लेख किया गया है। भगवान् महावीर के शासन में आविर्भूत चार अनुयोगों का विभाजन करने वाले आर्यरक्षित से सम्बन्धित गाथाओं का भी विवेचन किया गया है।
द्वितीय एवं तृतीय आवश्यकनियुक्ति के अनुसार विश्लेषण कर चतुर्थ आवश्यक के विवेचन में ध्यान पर विशेष जोर दिया गया है, साथ ही सात प्रकार के भय-स्थानों के अतिचार की आलोचना की गाथाएं उद्धृत की गई हैं। पंचम आवश्यक के रूप में कायोत्सर्ग का परिचय देकर षष्ठ प्रत्याख्यान के स्वरूप का उल्लेख करते हुए आवश्यकवृत्ति का समापन किया है।
35 18 स्थाणु-व्रतषट्क, कायषट्क, अकल्प्य भोजनवर्जन, गृहभाजनवर्जन, पर्यंकवर्जन, निषिध्यावर्जन, स्नानवर्जन और शोभावर्जन
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