Book Title: Dhanna Shalibhadrano Ras
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa Inten 10000 ॥ अथ पंमित श्री जिन विजयमहाराज विरचित ॥ ॥ श्री धन्नाशालिभद्रनो रास ॥ ॥ प्रारंभ ॥ For Personal and Private Use Only Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa International For Personal and Private Use Only Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa International सुपात्रदानविषये, पंमित श्री जिनविजयमहाराज विरचितश्री ॥ धन्नाशालिभद्रनो रास ॥ जैनाइने माटे. पावी प्रसिद्ध करनार. श्रावक भीमसीह माणेक. श्रमदावाद - राजनगर मिन्टींग प्रेसमां शा. मगनलाल हठीसंगे बाप्यो. विक्रम संवत् १०६३. सने १२००७ किम्मत् १-४-० AAAAA For Personal and Private Use Only Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ For Personal and Private Use Only Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रस्तावना. आ संसारमा परिमण करता प्राणीनने चुल्लकादि दश दृष्टांते उर्लन एवो मनुष्य 18 नो जन्म, आर्यकेत्र, उत्तमकुल अने निरोगीकाया; ए सर्वे पामवं उर्लन ने. कदापी को। * सुकृतना नदयथी ते पण पामी शकाय, परंतु श्री जिनधर्म पामवो, ते तो घणोज उर्खन्न । ! ते धर्म दान, शीयल, तप अने नाव; ए चार प्रकारे . तेमां दानना प्रनावथी धनसार्थवाहादिक अनेक जीवो सुख संपत्ति पामी सजतिना नाजन श्रया; शीयलना प्रन्नावहाथी सुदर्शनशेग्ने शली फीटीने सिंहासन थयु; तपना प्रत्नावथी दृढप्रहारी जेवा चार | जीवनी हत्या करनारे पण मुक्ति मेलवी अने नावना प्रन्नावथी नरतेश्वर महाराजने प्रारीसानुवनमां केवलज्ञान नत्पन्न थयु. आ प्रकारे दान, शीयल, तप अने नाव, फल है। सिशंतमा प्रसि. तथापि ओहि दानधर्मनु प्रधानपणुं होवाश्री किंचित् दानधर्मनुं म-2 दत्वपणुं देखामीए बीए. सर्व धर्ममा सार पदार्थ ते दानधर्मज बे. राज, शहि, स्मृति दिनोग, शब्द, रूप, रस, गंध अने स्पर्श तेमज पोताना तथा परना देशमां जंश, महिमा | है अने मनोवांबित अर्थनो देनार ते दानधर्मज . रुपनदेव प्रन्नुए प्रश्रम धनसार्थवाहना नवमां मुनिजनोने घृतनुं दान दीधुं, तो तीर्थ Jain Education ational For Personal and Private Use Only C anelibrary.org Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २वना. प्रस्ता कर पद पाम्या; बाहु मुनिये पांचशे मुनियोने आहार पाणी लावी प्रापवाश्री आगल्या ज. न्ममां चरतचक्रवर्ति थवानुं पुण्य नपार्जन करयं; श्रेयांसकुमरे षन्नदेव नगवानने इकु रसश्री प्रतिलान्या, तो संसारनो अंत करी तेज नवमां मुक्तिने मेलवी; चंदनवालाये अम | दना बाकुला महावीर प्रन्नुने वहोराव्या, तो तेज वखत उर्दशानो अंत अयो, दीव्यरूप थंयुं । अने पंचदीव्य प्रगट थया; शांतिनाथ प्रनुए पूर्वनवे (मेघरथ राजाना नवमां) पारेवाने अन्नयदान दीधुं, जेश्री तीर्थकर अने चक्रवर्निपणानुं पुण्य प्रगट थयुं; मेघकुमारे हाथीना नवमां ससलाने अन्नयदान दीधुं, तो महाशक्ष्मिान श्रेणिकराजाने घेर नत्पन्न अयो; शं-13 खराजा अने यशोमति राणी मुनिने ज्ञदनुं पाणी वहोराववाथी नेमिनाथ अने राजीमती यां; मुनिने रत्नकंबल आपवान) रत्नवाई शेगणी मरुदेवीमाता अयां; सुदत्त मुनिने दान है। | देवाथी सुबाहुकुमर अत्यंत रूपवान श्रया; वीर प्रनुने बीजोरापाक देवाश्री रेवती श्रावि || | काए तीर्थकरगोत्र बांध्यु; तेमज मासखमणने पारणे मुनिने खीरनुं दान देवाश्री धनकुमर 13 अने शालिन्नकुमर आ नवमां अगणित शहिना नोगी थर वैराग्य पामी दीक्षा लेइ बन्ने / | जण सर्वार्थसिइ विमानमां गया. त्यांथी व्यवी महाविदेहकेत्रे को महोटा शेठने घेर जन्म पामशे, त्यांपण सजुरु समीपे दीक्षा ग्रहण करी कर्म खपावी सिपिदने वरशे. Jan Education S tional For Personal and Private Use Only nelibrary.org Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ HTTARAGHA धनकुमर अने शालिनकुमर मात्र मुनिने दान देवाथी अत्यंत शक्ष्विान थs सुखो थया, 3/ तथा पाडला नवमां मात्र दाननी अनुमोदना करवायी सुन्नज्ञादिक आठे धनकुमरनी स्त्रीयो थर; तेमज धनदत्त अने धनचंद, ए त्रय नाश्योए पावला नवमां दान दश्ने त्रण वार पश्चाताप कस्यो, जेथीत्रण वखत महापुःख पाम्या. एम जागी सर्व प्राणीनए दान A देवू. पा प्रकारे दान देवाथी, देवराववाथी अने अनुमोदना करवाथी सुख संपदा तेमज मो || द देवलोकनां सुख मले ने अने दान देने पश्चात्ताप करवाथी मुख नत्पन्न थाय .ते सर्व आ रास वांचवाथी पूरेपूरी रीते समजाशे. पंमित श्री जिनकीर्तिसूरि विरचित संस्कृत चरित्र ऊपरथी पंकित श्री जिनविजय है। महाराजे सूरत शेहेरमां आ रास बनाव्यो . असल प्रतमां इष्टांतिक श्लोकोना अर्थ नदि| होवाथी तेना, तथा कठण शब्दोना अर्थ (टिप्पण तरीके) नवा कराव्या ने. आ रासनी अंदर कानो, मात्रा, मीमी विगरे जे कांश जिनाझा विरुद लखाणुं होय । अथवा प्रुफ सुधारतां जे कोइ नूल रहि गइ होय, तो तेने माटे चतुर्विध श्री संघनी साखे । हुँ मिजामिऽक्कम देन बुं. प्रसिकर्ता. in Educabona on For Personal and Private Use Only helibrary.org Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नवं पुस्तक. ॥श्री वर्द्धमानदेशना भाषांतर॥ ____(शास्त्री अक्षरथी तथा गुजराती अक्षरथी पेलुं .) आ पुस्तकमां आणंद, कामदेव, चुलनीपिता, सुरादेव, चुलगशतक, कुंझकोलीक, | सदालपुत्र, महाशतक, नंदिनीप्रिय अने तेतलीप्रिय ए रीते दश श्रावकोनां चरित्र तथा बारव्रतर्नु स्वरुप, आळोवा अने अतिचार तथा बारव्रत उपर अदूनूत अने चमत्कारी क-151 | थान अने अगीआर परिमार्नु स्वरुप तथा बीजी केटलीक कथान विगेरे जे धर्मदेशना श्री महावीर प्रनुए दीधेली अने श्री सुधर्मास्वामीए जंबुस्वामीने कहेली तेनो समावेश करवामां आवेलो . _आ पुस्तक सारा नंचा कागळ उपर गपी मजबूत पाकां पुंगथी एम्बोसीन अने | | सोनेरी करावी बंधाववामां आव्यु ले. किंमत शास्त्री बुकना रु २-७-० अने गुजराती बुकना रु २-०-०, दपाल खर्च चार आना. ज्ञानप्रकाश ओफीस-अमदावाद. Jain Educa t ional For Personal and Private Use Only O lainelibrary.org Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | श्री चिंतामणि पार्श्वनाथाय नमः ॥ ॥ श्री धन्नाशा लिननो रास ॥ ॥ दोहा ॥ इति क्रम कमल, स्वस्तिश्री गुण धाम ॥ वीर धीरनिपति प्रते, प्रेमे करूं प्रणाम ॥ १ ॥ वसुधामे विद्या विपुल, वर दाता नितमेव ॥ समरुं चित चोरके करी, ते प्रतिदिन श्रुतदेवि ॥ २ ॥ गुरु चरणांबुज सेववा, मुज मन मधुकर लीन ॥ नपगारी अवनी तले, गुरु सम को न प्रवीन ॥ ३ ॥ सिद्धाचल वैनारगिरी, अष्टापद गिर नार । समेतादि ए पंच वर, तीर्थ नमुं नित सार ||४|| संघ चतुर्विधने सदा, त्रिकरण शुद्ध त्रिकाल || वंडु विधि वंदन थकी, सुकृत करण सुविशाल ॥ ५ ॥ धर्म चतुर्विध नपदिशो, जगपति जन हित काज ॥ दान शियल तप जावना, जलनिधि तरल जिहाज ॥ ६ ॥ यतः ॥ नृपजातिवृत्तम् ॥ दानं सुपात्रे विशदं च शीलं तपो विचित्रं शुभ भावना च ॥ नवार्णवोत्तारण यानपात्रं, धर्मं चतुर्द्धा मुनयो वदंति ॥ १ ॥ जावार्थ:- सुपात्रने विषे दान आपकुं, निर्मल शील पाल, विचित्र प्रकारनो तप करवो अने शुभ जावना जाववी; एरीते नव रूप समुश्री पार पमावाने काज समान एवो चार प्रकारनो धर्म, मुनियो नृपदिसे बे ॥ १ ॥ प्रथम दान पद धर्मना, दाख्या पंच प्रकार || अजय सुपात्र अनुकंप Jain Education international For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना तिम, नचित कीर्ति सुविचार ॥ ॥ इहलोके सुख संपजे, लहिये नित नवनीधि ॥ अन्न न ? 15 यदान देते थके, परनव शहि समृदि॥ ॥ एक शशक कगारते, पाम्यो झदि नदार ॥ गज नवथी नर नव लह्यो, मेघकुमर मनोहार ॥ ए॥तिम सुपात्र दाने करी, शिव सुख । है पामे जीव ॥ चित्त वित्त शुन्न पात्रथी, त्रिकरण शुक्ष अतीव ॥१०॥ पायसान्न दाने करी, पाम्यो लोग रसाल ॥ धनशाह धर्माग्रणी, पद पद मंगल माल ॥ ११ ॥ शालिन पिण दानश्री, सुख पाम्यो श्रीकार ॥ श्रेणिक किरियाणो कियो, नर नव सुर अवतार ॥१२॥ दीजे दान दया धरी, करी चित्त सुप्रकास।मनवंचित सुख पामीए, कल्पद्रुमपरे खास ॥१३॥ धन्नशाह गुण वर्णवू,वचनथकी लवलेशानिज्ञ विकथा बोझिने,श्रोता सुणो सुविशेष ॥१॥ ॥ ढाल १ ली. ॥ जंबूदीपना नरतमां-ए देशी ॥ जंबडीप सोहामणो, लाख जोयण परिमाणो रे॥ वृत्ताकारे विराजतो. जगति कनकमय जाणो रे॥जंबूदीप सोहामणो॥१॥ए आंकणी ॥ त्रिय लाख सोल सहसथी अधिक बस्से सत्तावीशो रे॥कोष त्रिक ऊपर कह्या, धनु शत एक जगीशो रे । जंबर ॥अठावीसे आगला, अंगूल सामातेर रे ॥ परिधि कही जंबूहीपनी, एहमां फार न फेर है। रे॥ जंबूप ॥३॥ नरतत्र दक्किण दीशे, सोहे जंबूदीपेरे ॥ पांचसे उबीस ब कला, जो CRACTOR-CANCHARACHAN Jain Education national For Personal and Private Use Only X ainelibrary.org Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यणथी अति दीपे रे ॥ जंबूप ॥ ४॥ पट खंम वैतान्ये करी, गंगा सिंधुयी सोहे रे ॥ नरत । 8तणी शोना घणी, देखी सुर नर मोहे रे ॥ जं॥५॥ मध्यखंझमें शोन्नतो, पत्तन पुरप-18 गणोरे॥पुरी सम नपतो, अति उत्तम अहिगणो रे ॥जं॥६॥चौराशी चहुटानलां, गढ मढ मंदिर दीपे रे ॥ देनल श्री जिनराजनां, अमर नुवनने जीपे रे ॥ ॥७॥ पौषधशाला पनवमी, तिम वली पठननी शालो रे ॥ दानशाला अति दीपती, इप्सित दान 15 रसालो रे॥ ॥॥ गोदावरी तटिनी तिहां, अह निशि वहे असरालो रे ।। मच मयर 18 18 क्रिमा करे, सुंदर, सोहे मरालो रे ॥ जं०॥ए। वन नपवन वामी घणी, वृक्षतणा बहर | वृंदो रे ॥ सघन गयाथी शोन्नता, पंथी पामे आणंदो रे ॥ जं ॥१०॥ जितशत्रु नपति तिहां, राजे धनदने तोले रे ॥ खाग त्याग गुणथी नलो, लोक सहू जय बोले रे ॥ ॥ ११ ॥ यतः ।। नपजातिवृत्तम् ॥ इंशत् नृपत्वं ज्वलनात्प्रतापं, क्रोधंयमाश्रिमणाच वित्तं ॥ सन्यस्थिति रामजनार्दनाच्या, मादायराझः क्रियते शरीरं ॥१॥नावार्थ:-इयकी रा-3 जापमुं, अनियकी प्रताप, यमनी पासेथी क्रोध, कुबेरनंमारी पासेयी धन, तेमज राम अने जनार्दननी पासेश्री सन्यस्थिति; ए सर्वे लेइने राजानुं शरीर कराय ने.॥ १॥ सुंदर रूप सोहामणी, गुणसुंदरी पटराणी रे ॥ वचनामृतथी वरसती, शीले सीता जाणी रे ॥ Jain Education For Personal and Private Use Only inelibrary.org Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बन्ना० ॥१२॥ रूपे रति पति सारीखो, सकल कलाये पूरो रे.॥ अरिदमनानिध गुण नीलो, न ? कुमर अ अति शरो रे ॥ ॥ १३ ॥ वरण अढार वसे सुखी, नृप आणा प्रतिपाले रे ।। सहु को निज निज धर्मथी, कुल मारग अजुबाले रे ॥ जं ॥१४॥ कोटीध्वज व्यवहारी-टू है या, नोग पुरंदर सारो रे ॥ दान गुणे करी आगला, निवसे अति सुखकारो रे ॥ जंग ॥१५ है। ॥ दृढधरमी गुरु रागीया, नत्तम कुल आचारो रे ॥ समाकतवंत सदा घरे, श्रावकनां व्रत बारो रे ॥ 5 ॥१६॥ दान कल्पद्रुम रासनी, प्रथम ढाल एह माखी रे ॥ जिन कहे श्री 13/ता सांजलो, मन वच तनु थिर राखी रे ॥ जं ॥ १७ ॥ ॥ दोहा. ॥ वमवखती व्यवहारियो, तिहां वसे धनसार ॥ज्ञहि वृद्धि दिन दिन अधिक, जलधि परे विस्तार ॥१॥ जलधितणा जिम रत्ननो, पार न पामे कोय ॥ तिम धनसारना धन तणो, लेखो कदिय न होय ॥२॥ दानादिक गुणथी अधिक, जिनधरम गु कोण गेह ॥ त्रिय तत्त्व सुधा धरे, व्रतधारी शुचि देह ॥ ३॥ शीलवती तस गेहिनी, नाम तिसो परिणाम ॥ दंपति जोमी अति उरस, जिम सीता ने राम ॥ ॥ पंच दान नितप्रति 81 दिये, व्रत पञ्चरकाण नलास ॥ दोगुंडक सुरनी परे, विलसे लोग विलास ॥५॥ ॥ ढाल २ जी, ॥ कोयलो परवत धूंधलो रे लो.-ए देशी ॥ ES ESSASSINSLOOMISE Jain Educati emational For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ SCARSANSAR ___ व्यवहारी धनसारने रे लो, विलसते सुख नोगरे ॥ सोनागी लाल ॥ पुत्र थया अति रूयमा रे लो, पूरव पुण्य संयोगे रे ॥ सोनागी लाल ॥ व्यवहारी धनसारने रे लो। १॥ए आंकणी॥धनदत्त ने धनदेवजीरे लो, धनचंशनिध बाल रे ॥ सो ॥ अध्यापक & पासे नण्या रे लो, शास्त्रादिक सुविशाल रे ॥सो ॥ व्य०॥२॥ विनयादिक गुण अन्यमे रेखो, सकल कला ग्रहे तेह से। सो० ॥ अति सुंदर सोहामणा रे लो, देवकुमर सम देह है रे॥ सो० ॥ व्य० ॥३॥ योवन वय आव्या यदा रे लो, ताते तव ततकाल रे ॥ सो०॥ प्रित थकी परणाविया रे लो, कन्या अति सुकुमाल रे ॥ सो०॥ व्य०॥४॥धनश्री धन* देवी नली रे लो, धनचंज्ञ सुखकार रे ।। सो०॥ अति रूयमीरलीयामणी रेलो, गुणमणि स्यण नंमार रे ॥ सो०॥ व्य० ॥५॥प्रमदाथी प्रेमे रमे रे लो, धनदत्तादिक पूत्र रे॥ सो०॥धरम करम विधि साचवे रे लो, राखे घरनो सूत्र रे ॥ सो०॥ व्य०॥६॥ निर्वामहक गृह नारना रे लो, जाणी पूत्र सुजात रे ॥ सो०॥ धनसारेच्य करे तदा रे लो, स्त्री-20 हायुत धर्म विख्यात रे । सो० ॥ व्य० ॥७॥ नवपद ध्यान धरे नलो रे लो, पश्चिम रात्रि 8 विनागरे । सो ॥ आवश्यक बे टंकनां रे लो, साचवे मन धरी राग रे ॥ सो०॥ व्य०॥ ॥चैत्यवंदन साते सदा रे लो, देवार्चन त्रिण्य टंक रे ॥सो॥ तिर्थार्चन युगते करे रे RES Jain Education national For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ न०१ रबर धन्ना लो, टालवा पापना पंक रे ॥ सो०॥ व्य० ॥ ए॥ रथयात्रा रलीयामणी रे लो, साधूने व- सती दान रे । सो ॥ पमिलाने नावे करी रे लो, निरवद्य असन ने पान रे॥सो० व्य ॥ १०॥ यतः॥ अनुष्टुब्वृत्तम्. ।। जयंति वंकचूलाद्या, कोश्या चाश्रय दानतः ।। अवंतिसुकुमालश्च, तिर्णा संसारसागरं ॥ १ ॥ जावार्थ:-साधु मुनिराजने रहेवा माटे स्थानक आपयाधी कोश्या वेश्या, अवंतिसुकुमाल अने वंकचूलादिक; ए सर्वे जयवंता वर्तो. कार के.तेन संसार सागरने तरी गया ॥डाना नित्य प्रत्ये सांजलेरेलो. दंपति ||धरी गम रे ॥ सो। सातदेत्रने साचवे रे लो, नियम धरे हित काम रे ॥ सो०॥ व्य० ॥११॥ पुण्य संयोगे अन्यदा रे लो, शीलवती सुकुमाल रे ॥ सो० ॥ गर्न धरे संयोगथी रेलो, निरुपम नाग्य विशाल रे । सो ॥ व्य० ॥१॥ देख्यो सुपनो दीपतो रे लो, - फल्यो फूल्यो 'सुरवृक्ष रे ॥ सो० ॥ देखी आनंद ऊपन्यो रे लो, कंतने कहे परतक रे ॥ सो०॥ व्य०॥ १३ ॥ कंत कहे कामिनी प्रते रे लो, दोशे पूत्र प्रधान रे ॥ सो०॥ कुल मंमण कुल दिनमणी रे लो, रूपे नूप समान रे ॥ सो० ॥ व्य० ॥१५॥ प्रत्यूषे प्रति प्रेमशं रेलो, तेड्या शास्त्रना जाग रे ॥ सो०॥ फल पूज्यां सुदणांतणारे लो, बोल्या तेह सुजा * कल्पवृक. सवारे. RECENCE Jain Education national For Personal and Private Use Only 177 linelibrary.org Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एम रे || सो० ॥ व्य० ॥ १५ ॥ अंगज अद्भूत रूपथी रे लो, होशे सुगुण निधान रे ॥ सो० ॥ सांगली शेठ खुशी या रे लो, दीधो प्रेमे दान रे || सो० ॥ व्य० ॥ १६ ॥ अनुक्रमे गर्न वधे सुखे रे लो, मानस सर जिम हंस रे || सो० ॥ जिन कहे बीजी ढालमां रे लो, पुण्ये | कुल अवतंस रे ॥ सो० ॥ व्य० ॥ १७ ॥ ॥ दोहा ॥ जे मासे प्रवल, दोहद उपजे ताम ॥ जिनपूजा गुरु सेवना, करवा उत्तम काम ॥ १ ॥ साधुने बस्त्रादिक दिनं, पोखूं संघ नदार | स्नात्र महो व साचवुं, विरचं जैन विहार ॥ २ ॥ पौषध सामायिक करूं, घरं नियम चितलाय ॥ नवपदने श्र द निशि जपुं, पालूं प्रवचन माय ॥ ३ ॥ जीवदया राखण यतन, करूं करावं सार ॥ - जरादिक प्रति सुभग, पहेरुं वेश नदार ॥ ४ ॥ इत्यादिक दोहद सकल, प्रतिदिन जेह न पन्न ॥ ते ते शेठे पूरीया, करते कोहि यतन्न ॥ ५ ॥ ॥ ढाल ३ जी ॥ दान नलट घरी दीजीए. - ए देशी. ॥ मास नव दिन साते थये, उत्तम योग तिथि वार रे । शीलवती सुत प्रसवीयो, हून हर्ष पार रे ॥ पुण्ये सयल सुख पामीये ॥ १ ॥ ए आंकणी ॥ वामिये दुरित दुःख दूर रे ॥ वंबित विपुल वेगे मिले, फले सुरवृक्ष जरपुर रे ॥ पुष्ये ॥ २ ॥ बाल नाल स्थापन For Personal and Private Use Only Jain Education national ainelibrary.org. Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना नणी, नूमि खनन करे जाम रे ॥ कनकनिधि परगट अयो, देखी प्रमुदित श्रया ताम रे ॥ न० १ | पुण्ये०॥३॥शेग्ने दीधी वधामणी, सुगी हरख्यो धनसार रे ॥ लाख पसाय तेहने की 5 यो, लीयो सुजस सुप्रकार रे ॥ पुण्ये०॥॥ नछव रंग वधामणां, धवल मंगल नवरंग रे ॥ याचक दान देवरावीयां, बांध्यां तोरण चंगरे ॥ पुण्ये०॥५॥चं सूर्यादि दर्शन की यां, तृतिय दिने ततखेव रे ॥रात्रि जागरण उठे दीने, धर्मकार्य जिनसेव रे ॥ पुण्ये० ॥६२ ॥ दश दिन स्थितिपतिका करी, अशुचि टाले ततकाल रे ॥ असन वसनादिके स्वजनने, | पोख्या नक्ति सुविशाल रे ॥ पुण्ये०॥७॥ जन्म समय धन प्रगटीयो, ते गुण हृदय संनार रे ॥नाम धनकुमर ताते दीयो, हुन सुजस विस्तार रे ॥ पुण्ये॥७॥ रूप लावण्य | गुणे करी,'अधिक नपे शुचि देह रे ॥ पंच धावे करी पालते, सुखमें वधे गुणगेह रे ॥ पुएये॥ए॥ अनुक्रमे अष्टवार्षिक अयो, पाठव्यो पितृ निशाल रे॥ यतनथी पठन करे त-P दा, धनकुमर नजमाल रे॥ पुण्ये॥१०॥ यतः॥ अनुष्टुवृत्तम् ॥ माता वैरी पिता शत्रु, बालोयेन न पाठितः॥ न शोनते सन्नामध्ये, हंसमध्ये बको यया ॥१॥ नावार्थ: जेमणे बालकनेनणाव्यो नथी, ते माता पिता बालकनांशत्रु जागवां; कारण के, ते अन्नण - राखेलो पुत्र, हंसोमां बगलानी पेठे विक्षनोनी सन्नामां शोलतो नश्री ॥१॥ हवे विद्याना Jain Educatie national For Personal and Private Use Only Antainelibrary.org Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गुण कहे . ॥शार्दूलविक्रीमितवृत्तम् ॥ विद्यानाम नरस्य रूपमधिकं प्रचन गुप्तं धनं, वि-12 द्या नोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः॥ विद्या बंधुजनो विदेश गमने विद्या परं8 है। देवत, विद्या राजसु पूज्यतेन हि धनं विद्या विहिनः पशुः ॥शानावार्थ:-विद्याज पुरुष । नुं अधिकरूप, ढांकेबुं गुप्त धन, नोग, यश, सुखने आपनारी, गुरुनी पण गुरु, प्रवासमा | वाटे जतां बंधुजन समान अने परम दैवत रूप; राजदरबारमा विद्याज पूजायचे, पण धन पूजातुं नयी; माटे विद्या रहित पुरुषने जनावर समान जाणवो. ॥ ॥ वली पण वि | द्याना गुण कहे . ॥ नपजातिवृत्तम्. ॥ न चोर हार्यं न च राज हार्य, न जात नाज्यं ना च नारकारि ॥ व्यये कृते वाईत एव नित्यं, विद्या धनं सर्व धन प्रधानं ॥३॥ नावार्थःविद्या रूप धन, चोर तथा राजाथी ले लेवातुं नथी, नाइयोथी वहेंची सेवातुं नथी, कांश नार करतुं नथी अने कोइने आपवायी घटवाने बदले निरंतर वधे जे; माटे विद्या रूप धन सर्व धनमां मुख्य धन . ॥३॥ अनुष्टुववृत्तम् ॥ रूप यौवन संपन्ना, विशाल कुल संन्नवाः ॥ विद्या हीना न शोनंते, निगंधा श्व किंशुकाः॥४॥नावार्थः-रूपाला, युवान अने म-81 F होटा कुलमां नत्पन्न भएला, एवा पण जो विद्या हीन होय, तो सुगंध विनानां कामांना फूलनी पेठे शोनता नथी. ॥४॥ विघ्त्वं च नृपत्वं च, नैव तुल्यं कदाचन ॥ स्वदेशे पू Jain Educato n ational For Personal and Private Use Only M ainelibrary.org Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धना० ज्यते राजा, विज्ञान सर्वत्र पूज्यते ॥ ५॥ नावार्थः-विधानपणुं अने राजापर्यु ए कदि ब-? 13 रोबर ज नहि. कारण के, राजा पोताना देशमां पूजाय अने विहान सर्वे ठेका पूजा | य .॥५॥ लिखित गणितादि बहोतेर कला, तिम वलो शुकन विचार रे॥ गीत नृत्यादि विधि ग्रही, शब्दशास्त्रादि व्यवहार रे ॥ पुण्ये ॥ ११ ॥ जोतिष निमित्त वैद्यक नलां, अ-18 हैल्प पसायथी तेहरे ॥ विस्मृत स्मरण ज्यू कीजीए, तेम नण्यो धरि नेह रे ॥ पुण्ये॥ १२॥ बुद्धि चारतणो नदधि ते, तिम वली नीतिनो जाण रे ॥ विणज व्यापारे कुशलपणो, परिक्षक मांहि सुप्रमाण रे ।। पुण्ये ॥१३॥ नीपन्यो पूत्र ते निरखीने, दिल धरी अधिक | आणंद रे ॥ अध्यापक धन आपने, संतोष्यो अतिहि अमंद रे ॥ पुण्ये०॥ १५ ॥ बाल वय गेमि बलवंत ते, श्रयो यौवन वेश रे ॥ अतुल्य अति रूप लावण्ययी, प्रगट्यो जाणे सुरेश रे ॥ पुण्ये०॥१५॥ पंच मिली पृश्न पूछे जीके, नत्तर दिये तस ठीक रे ॥ नीति रीते करी दाखवे, साहसपणे निरन्नीक रे ॥ पुण्ये ॥ १६ ॥ धन सुतथी धनसारनो, वध्यो सुजस | 8 जगमांह रे ॥ हिस्मृद्धि पामी घणी, दिन दिन अतिहि नचाह रे ॥ पुण्ये ॥ १७ ॥धव |ल पदे जिम चश्मा, प्रतिदिन अधिक दीपंत रे॥ तेम कुमर चढती कला, कोय न तास जीपंत रे ।। पुण्ये ॥१०॥ चतुरपणे मात तातनां, विनय वचन प्रतिपाल रे ॥ दान क Jain Educatio n ational For Personal and Private Use Only Y anelibrary.org Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa छपद्रुम रासनी, जिन कहे त्रीजी ढाल रे | पुण्ये० ॥ १७ ॥ ॥ दोहा ॥ कला कोष देखी करी, रूपवंत शिरदार | जाग्याधिक जाली करी, चित चिंते धनसार ॥ १ ॥ पुण्योदयश्री माहरे, श्री जिनधर्म पसाय ॥ अंगज अद्भूत रूपन्यो, सय सयल सुखदाय ॥ २ ॥ एथी घन वाध्यो अधिक, यश हुन जगत विख्यात ॥ पंचमे पति वधती थइ, वारू बनी ए वात ॥ ३ ॥ सदगुण स्तवना कीजीए, तेहमां कोई न लाज ॥ सुत पिरा चित राजी रहे, एक पंथ दो काज ॥ ४ ॥ पंचमे बेसी शेठजी, धन सुततां दखाल ॥ प्रतिदिन जांखे प्रेमर्श, विविध परे सुप्रमाण ॥ ५ ॥ जन्म काले ए बालना, घन प्रगथ्यो प्रति नूर || दुःख दोहग दूरे टल्यां, अम कुल अंबर सूर ॥ ६ ॥ विनय जिवंत विद्या निलो, प्रवर नहीं को श्राज || अमजात ए आागले, कोय न श्रावे काज ॥ ७ ॥ ॥ दाल ५ थी. ॥ पुण्य न भूकीए. - ए देशी. ॥ 'वण सुणी निज तातनां रे, व सुत अकुलाय ॥ त्रिएये मिलीने तातना रे, श्रावी प्रणमे पायो रे । तातजी सांजलो || एनी अरदासो रे, मूकी श्रमलो ॥ मन राखी विसवासो रे, तातजी सांजलो ॥ १ ॥ ए ओकली ॥ धन्नकुमर श्रम अनुज बेरे, रूप कला अभिराम ॥ तिले करी में प्रमुदितप रे, रहीए सदा शुभ कामो रे ।ता० ॥ २ ॥ 3 mational For Personal and Private Use Only gainelibrary.org. Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० Jain Educationa एमने प्रति वालदो रे, प्राणथकी निरधार || मामी जाया दोहीला रे, जागे सयल संसारो रे ॥ ता० ॥ ३ ॥ पिएा सुतनी गुण वर्णना रे, न घंटे तुमने रे तात ॥ नीति शास्त्र में पि कही रे, ते शृं वीसरी वातो रे ॥ ता० ॥ ४ ॥ यतः ॥ अनुष्टुब्वृत्तम् ॥ प्रत्यके गुरवः स्तुत्या, परोके मित्र बांधवा ॥ कर्मीते दास नृत्याश्च पुत्राश्चैव मृतास्त्रियः ॥ १ ॥ जावा:- प्रत्यक्षमां गुरुनां परोक्षमां मित्र श्रने बांधवोनां, श्रापणुं कार्य थइ रह्या पबी दास ने अनुचरोनां; तेमज पुत्र ने स्त्रीनां मरण पबी वखाण करवां ॥ १ ॥ आर्यावृत्तम् ॥ वन्नि कर निच गुणो, न परुरकं न य सुप्रस्स पच्चरकं || महिलान नोजयावि हु, ननस्सए जेल माहप्पं ॥ २ ॥ जावार्थ:-सेवकना गुण प्रत्यके कह्याथी, पुत्रना गुण परोके कह्याथी अने स्त्रीना गुण कदि पा नहि बोलवाथी पोतानुं महोटाइप सचवाय बे; तेम बतां जो कदि बोले, तो माननो नाश थाय. ॥ २ ॥ सुत गुण वर्णवते थके रे, लघुता लहीए रे आप || सु तपिश विनय न साचवे रे, मानतलो दोय व्यापो रे ॥ ता० ॥ ५ ॥ कुल मर्यादाश्री टले रे न गणे मातने बात ।। तातने पण नवि लेखवे रे, प्राज्ञक होय जो जात रे ॥ ता ॥ ६ ॥ ते माटे दवे प्रजथी रे, सुत गुण वर्णन वात ॥ मत करज्यो कोइ श्रागले रे, ए श्रम वचन विख्यातो रे ॥ ता० ॥ ७ ॥ वचन सुणी तव शेठजी रे, सुतने कड़े सुविचार ॥ गुण ग्राहक For Personal and Private Use Only national न० १ P ainelibrary.org Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तुम को नही रे, त्रिये मूढ गमारो रे । पुत्रजी सांजलो । ए अमची एक वातो रे, मूकी श्रमलो ॥ जिम पामो सुखशातो रे, पुत्रजी सांगलो ॥ ८ ॥ ए आंकणी ॥ तुम जाया प बी घरतो रे, धन दीयो थयो जोय ॥ व्यापारे होला पढ्या रे, कार न माने कोयो रे ॥ पू० ॥ ए ॥ घणुं कहेतां दीलप हुवे रे, विणसे घरनां रे काज ॥। निज सायल ऊघामते रे, पामीजे प्रति लाजो रे ॥ ५० ॥ १० ॥ ए अंगज आव्या थकी रे, लक्ष्मी लील करंत ॥ का र करूप वध्यो आपलो रे, सहु जल आण वदंत रे ॥ ५० ॥ ११ ॥ यतः । अनुष्टुब्वृत्तम् ॥ एकोपि गुणवान् पुत्रो, निर्गुणैः किं शतैरपि ॥ एकभ्रंशे जगच्चकु-नक्षत्रैः किं प्रयोजनम् ॥ ३ ॥ जावार्थ:- एक पण गुणवान पुत्र होय तो सारो, परंतु शेकको निर्गुण पुत्रोव मे शुं ? कारण के, एक चंद ते आखा जगत्नी आंख बे, पण घणा नक्षत्रोवमे शुं धाय ? कां नही ॥ ३ ॥ एकेन हि सुवृण, पुष्पितेन सुगंधिना ॥ वासितं तद्दनं सर्वे, सुपुत्रेण कुलं यथा ॥ ४ ॥ जावार्थ:- एक पण सुगंधीदार फूलवाला सारा वृक्षवमे जेम आखं वन सुगंधमय थाय बे, तेम सुपुत्रवमे पण आर्खु कुल सारुं कदेवाय बे. ॥ ४ ॥ वरमेको गुणी पुत्रो, न च मूर्ख शतान्यपि ॥ एकस्तमोइंति, न च तारागणोषि च ॥ ५ ॥ जावार्थ:- गुणवान एवो एक पुत्र होय ते सारो, पण शेंकको मूर्ख पुत्रो सारा नदि; कारण के, एक चंद श्राखा Jain Educatiemational For Personal and Private Use Only Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्नाण १० जगत्ना अंधाराने दूर करे बे, पण ताराननो समूह करतो नथी. ॥ ५ ॥ तात वचन सु ततकले रे, ऋटकी बोल्या रे तेह || एक पखो हम ताणतां रे, जाएयो तुमचो नेहो रे ॥ तातजी सांजलो ॥ १२ ॥ व्यवसायार्थे जलधिमें रे, श्रमे जाऊं प्रति दूर ॥ कष्ट खमू तोफाननां रे, जिहां नवि दीसे सूरो रे || ता० ॥ १३ ॥ तिहां जइ घन लावूं मेरे, राखुं प्र मे व्यवहार | वलि परदेशे थलवटे रे, जातं करण व्यापारो रे ॥ ता० ॥ १४ ॥ तरुका ताढ घणी खमुं रे, वशकाले रे वृष्टि ॥ भूख तृषा सहवी सदा रे, पंथ श्रम जुनं दृष्टो रे ॥ ता० ॥ १५ ॥ वली सेवा राजातली रे, असे करूं यह निशि खास ॥ ते पि धनने कारणे रे, जोवो हृदय विमासो रे ॥ ता० ॥ १६ ॥ यतः ॥ मंदाक्रांतावृत्तम्. ॥ मौनान्मूकः प्रवचनपटुः वातुलोजल्पकोवा, कांत्यांनीरु यदि न सहते प्रायशोजानिजातः ॥ दृष्टा पार्श्वे नवति सदा दूरतश्चाप्रगल्न, सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ॥ ६ ॥ जावार्थ:- मौन धा रण करवाथी मूगो, बोलवामां चतुर होवाथी वाचाल अथवा बहु बोलको, कमागुणथी बीकरण, सदन गुण न होवाथी तामसी, इस्मेशां पासे रहेनारो दोय तो जोनारो, अने दूर रहेतो होय तो गरिब; ए प्रकारे सेवा ( चाकरी) धर्म घलोज आकरो बे. अर्थात् ते योगी जनाने पल अगम्य . ॥ ६ ॥ कृषिकर्मादिक बहु करूं रे, वलि नेस्ती व्यवसाय ॥ दोशीवट Jain Educationa International For Personal and Private Use Only न० १ १० Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नाणावटी रे, कण व्यापार कहायो रे || ता० ॥ १७ ॥ इत्यादिक उपक्रम करी रे, अर्जन ' | करूं धन को || अमे सामर्थ सदा अनुं रे, किम घन्नो श्रम जोको रे ॥ ता० ॥ १८ ॥ ए द निशि रमतो फरे रे, न करे घरनी रे सार ॥ चोथी ढाले जिन कहे रे, पुण्ये जय जयकार रे ॥ ता० ॥ १५ ॥ ॥ दोहा ॥ धन्नाने अमथी अधिक, दाखो कवा प्रकार | वचन प्रयुक्त कह्या तणों, उत्तम नही प्राचार ॥ १ ॥ तातने तनुज सवे सद्दश, लेखववा हित लाय ॥ नयन सदृश गएणवा सदा, लोक कड़े ए न्याय ॥ ३ ॥ सुतमें अंतर राखते, यधे विरोध विख्यात ॥ लका लागे लोकमें, हीराप धर्म जात ॥३॥ तात सक लड़ा करे, सुत वांबित सुप्रकार ॥ जो सुतने पोखे नही, तो शो सगपण सार ॥ ४ ॥ ते माटे तुमे तातजी, सरिखा गण ज्यो सर्व ॥ विधि व्यवहारे चालतां, केहने न चढे गर्व ॥ ५ ॥ ॥ ढाल ५ मी. ॥ (रहो रहो रहो वालहा. - ए देशी.) Marathi, हुं गुणनो प्रासक्त लाल रे ॥ जात सदृश सवि माहरे, पिल सुमे बो अव्यक्त लाल रे || शेठ कदे सुत सांजलो ॥ ए प्रकली ॥ १ ॥ यतः ॥ अनुष्टुव वृत्तम्. ॥ गुणाः सर्वत्र पूज्यंते, पितृवंशो निरर्थकः ॥ वासुदेवं नमस्यति, वसुदेवनते नराः Jain Education national For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना०॥१॥ नावार्यः-सर्वे ठेकाणे गुणो.पूजाय जे, पण पितानो वंश पूजातो नश्री. अर्थात् ते न ? 15 नकामो के. केमके, सर्वे लोको वासुदेवने नमस्कार करे , पण तेमना पिता वसुदेवजीने नथी करता. ॥१॥ नहि जन्मनि जेष्ठत्वं, जेष्ठत्वं गुण नुच्यते ॥ गुणाद्गुरुत्व मायाति, दधि पुग्धं घृतं यथा ॥२॥नावार्थः-जन्मने विषे महोटापणुं नथी, परंतु गुणने विषे . ली P गुणथीज महोटा आवे . जेमके, दूध, दही अने घी; ए सर्वमां घी महोटुं गणाय . ॥२॥कुसुम प्रमुख गुणधी सदा, गुंथ्या नर धरे शीश लालरे ॥ गुणयुत वंशादिक प्रते, 18/ नृप कर धरे सुजगीश लाल रे ॥ शेठ ॥२॥ सुरनिगुणे मृगमद नणी, कीधो अतिही हूँ अमूल्य लाल रे। बावनाचंदन काटने, सहु चाहे बहु मूल्य लाल रे ॥शेठ ॥३॥ यतः ॥आनल फूल अति फलमां, पगे न पूजा होय ॥ चंपा फूल अमूल्य गुण, शीर चढे सहुदै P कोय ॥३॥ नावार्थः-जो के, आवलनां फूल देखीतां घणां सुंदर जणाय , तो पण ते मां सुगंधनो गुण नहि होवाथी, को पगे पण अमामतुं नथी; अने चंपानां फूल देखीतां फक्त घोलांडे, परंतु तेमां सुगंधनो गुण वधारे होवाथी सर्वे लोको तेने उत्तम फूलोनी पं.४ तिमां गणी माये चढावे . अर्थात् सहु तेनो नपन्नोग करे . ॥ ३ ॥ पुण्यप्रकृति गुण एदमां, प्रगट अ अहो पूत्र लाल रे ॥ ए अंगज जनम्या पठी, अधिक प्रयो घरसूत्र लाल ॐॐॐॐॐॐॐॐॐ-1* For Personal and Private Use Only Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रे ॥ शेव॥४॥ व्यवसायादिक पाधरा, आवे ने अहो जात लाल रे ॥ सकल समीहित 15 संपदा, पामी जगत विख्यात लाल रे ॥ शेठ॥५॥ जो तुमने ए बालना, गुण न गमे मनमांद लाल रे ॥ तो तुमे नाग्य पोतातणो, परखो अतिहि नद्यांह लाल रे ॥ शेठ०॥६ त॥त्रीश त्रीश मासा सुवर्णना, लेश करो व्यवसाय लाल रे ॥लान कमाई तेहनो, पोखो । स्वजन समवाय लाल रे ॥ शेठ०॥७॥श्म कही चारे पुत्रने, ये मासा त्रीश त्रीश ला-P कल रे ॥ एकेक दिन नोजन तुमे, देज्यो धरी सुजगीश लाल रे ॥शेठ ॥७॥ते लश्ने |आप प्रापणे, स्थानके जइ ततखेव लाल रे ॥धन अर्जन चिंता घरे, मनमें अति अहमेव लाल रे ॥शेठ०॥ए॥नोजन नक्ति जणी तदा, प्रथम दिने धनदत्त लाल रे ॥ व्यवसायोद्यमश्री करे. पिण फल लाग्यश्री मत्ति लाल रे॥ोठ॥१०॥ यतः॥अनुष्टबवृत्तम्॥ उद्यमं कुर्वतां पुंसां, नाग्य सर्वत्र कारणं ॥ समुह मथनालेने, हरि «दमी हरो विषं ॥ ॥नावार्थ:-उद्यमकर्ता पुरुषोने बधे ठेकाणे, माग्य कारणनूत के कारण के, समुश्म-18 थन करवाश्री, दरि लक्ष्मीने प्राप्त करता हवा अने शिव केरने मेलवता हवा.॥४॥ बहुल प्रयास थकी तिणे, लान्न लह्यो अति स्वल्प लाल रे ॥ चिंते नोजन शी विधे, देशं अतिहि अनप लाल रे ॥ शेठ० ॥११॥ वाल लिया सविशेषयी, तैलग्रही तेणिवार लाल रे ॥ Jain Education r ational For Personal and Private Use Only Saundainelibrary.org Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना १२ १परान्हे जोजन दियो, तेही निज परिवार लाघ रे || शेत० ॥ १२ ॥ तिम व्यवसाय प की तिदां, दिन बीजे धनदेव लाल रे ॥ जोजन चपलने तैलनो, ते पिए ये स्वयमेव लाल | रे || शेठ० ॥ १३ ॥ त्रीजे दिन धनचंदजी, करी उद्यम असमान लाल रे ॥ स्वोपार्जित ध | नथी दिये, श्माषने तैल निदान लाल रे || शेव ॥ १४ ॥ कुटुंब थयो प्रति आकलो, तुछोदनथी अशेष लाल रे || उदर व्या थइ आकरी, वायु प्रकोप विशेष लाल रे || शेव० ॥ १५ ॥ त्रिएये सुत ऊखा थया, शेव कहे तव तास लाल रे | देखो हवे धनकुमरनो, जाग्य प्रबल सुप्रकास लाल रे || शेत० ॥ १६ ॥ मौन करीने ते रह्या, त्रिएये सुत तिरा ताल लाल रे ॥ पांचमी ढाल कही जली, जिन मन घरी नजमाल लाल रे || शेव ॥ १७ ॥ ॥ दोहा ॥ अथ चोथे दिवसे अवल, सज करी सवि शृंगार ॥ पितृ दत्त मासा ग्र दी, दवे ते धन्नकुमार ॥ १ ॥ शुकन विचारी चित्तमें, स्वर साधी शुभ काम ॥ श्राव्यो चहुटे चोंपशुं व्यापारार्थे ताम ॥ २ ॥ दोशी ने नाणावटी, नेस्ती ने मलीहार || गांधी | सामरिया तिमज, लोहकार सोनार || ३ || फमिया सुखमिया वली, जोतो ऊवेरी नल ॥ कापड चोप प्रमुखना, पूढे पाम सतोल ॥ ४ ॥ महेश्वर इज्येशने, हाटे बेो देव ॥ नदी १ श्रीजे पोरं. २ अमद. ३ पीमा. Jain Education national For Personal and Private Use Only उ० १ १२ jainelibrary.org Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उहक ऊतावलो, समरे श्री गुरु देव ॥ ५ ॥ ॥ ढाल ६ सी. ॥ (गूरांजी थे मने गोमे न राख्यो.-ए देशी.) एहवे देशांतरि एक प्रेष्यक आयो, महेश्वरदत्त मन नायो हो ॥ सुनग सनेही साजन, अचरिज पेखो॥ ए आंकणी ॥ लेख अनोपम तेणे ततक्षण दीघो, महेश्वरे कर धर। लीधो हो । सुन्नग ॥१॥ गुप्तपणे तेणे वचनज कीधो, मनह मनोरथ सीधो हो ॥ सु॥ लेखमें लिख्यो मित्र सुमित्रे विचारी, स्थानपुरथी सुखकारी हो ॥ सु० ॥ २ ॥ ननर दिशिथी ए सार्थप सूरो, सकल क्रयागके पूरो हो ॥ सु॥ आवे ए पश्गणपुर पासे, ४ व्यवसायार्थे विलासे हो ॥ सु० ॥ ३ ॥ तेह नणी एने तुमे सनमुख जाज्यो, नेट मूकीने, मित्र श्राज्यो हो । सु०॥ दाय नपाय करी हाथे करेज्यो, पठे क्रियाणक सवि लेज्यो हो ॥ सु०॥४॥ लान घणो ले एहमां सनिलो नाई, खोट नहीं ले एहमां कोई हो।सुकाए | क पांती अमने तुमे देज्यो, पिण एह काज करेज्यो हो । सु०॥५॥ एहवो अवसर फि-४ रीने नहीं आवे, घj घणुं लिखे शं थावे दो ॥सु ॥ पत्र वांचीने महेश्वर मन हरख्यो, मित्रने साचो करी परख्यो हो । सु०॥६॥ चित्त में चिंते एह कार्य महोटो, नन्दकपलो हां खोदो हो।सु०॥ प्रथम तो घेर जश्नोजन कीजे, नीति वचन चित्त लीजे हो ॥ है . Jain Education national For Personal and Private Use Only Clainelibrary.org Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्नाण १३ | सु० ॥ ७ ॥ यतः ॥ अनुष्टुवृत्तम् ॥ शतं विहाय जोक्तव्यं, सहस्रं स्नानमाचरेत् ॥ लक्ष विहाय दातव्यं, कोटिं त्यक्त्वा जिनं भजेत् ॥ १ ॥ जावार्थ:- सो काम परुतां मूकीने ज मनुं, हजार काम परुतां मूकीने नहावुं, लाख काम परुतां मूकीने दान देवं श्रने क्रोम कामपतां मूकीने जिनराजने जजवा. ॥ १ ॥ एहवो अलोची जोजन जली पहोत्यो, महेश्वर मन गहगहतो हो | सु० ॥ महेश्वरदत्ते जे पत्र पिठाल्यो, ते धन्ने सवि १ जाएयो हो || || || धन्नकुमार चित्तमांही विचारे, एह विराज कुण हारे हो || सु०॥ ए व्यवसाय - श्री लाज थाशे, सकल कुटुंब संतोषाशे हो ॥ सु || || विलंब तो हवे समय न दीसे, कार्य करूं सुजगी से हो | सु० ॥ इम चिंती मित्र मंदिर आयो, रूमो ते वेश बनायो हो ॥ सु ॥ १० ॥ यतः ॥ सनायां व्यवहारे च, वैरिषु श्वसुरौकसि । ग्रामंबराणि पूज्यंते, स्त्रीषु राजकुलेषु च ॥ २ ॥ नावार्थ:-सनाने विषे, व्यवहारने विषे, वैरियाने विषे, सासराने घ र, स्त्रीयोने विषे ने राजकुलने विषे आनंबर पूजाय बे ॥ २ ॥ अश्व चढीने मित्रयुत सुख संगे, आव्यो प्रतिदी उमंगे हो ॥ सु० ॥ सार्थपने साहमो जई मिलीयो, विनय विवे के कर जलीयो हो । सु ॥ ११ ॥ कुशलागम पूठी स्नेह जगायो, सार्थपने मन जायो १ पालथी अबला अक्षरे वांच्यो. For Personal and Private Use Only नु० १ १३ Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हो । सु॥ वस्तु क्रयाक सवि साटवी लीधां, सत्यकार तस दीघां हो ॥ सु० ॥१२॥3 18 कार्य करी चित्त आणंद पावे, धन्नो बेमे वदावे हो ॥ सु०॥ एहवे महेश्वरदत्त सार्थप 3 तपासे, आवे अधिक नल्लासे हो ॥ सु०॥ १३ ॥ कुशलालाप पूछे हित आणी, मुख कहे म धुरी वाणी हो । सु०॥ क्रय विक्रयतणी वात जगावे, सार्थप तव समजावे हो ॥ सु॥ ॥१५॥ धनसारेच्यने पुत्रे अमारो, ग्रह्यो ए सर्वे सुविचारो हो । सु०॥ देवो लेवो हवे एक 5 दनी साथे, एह धनदाता अमारे हो । सु०॥ १५ ॥ महेश्वरदत्त कहे वांक अमारो, दोष न । कोई तुमारो हो ॥ सु०॥आलस कीधो तस फल लीधो, चिंतित काज न सीधो हो। है सु०॥१६॥ यतः॥ आलस्यं हि मनुष्याणां, शरीरस्थो महान रिपुः ॥ नास्त्युद्यम समोर धुः, कृत्वायं नावसीदति ॥१॥नावार्थः-आलस ए माणसोना शरीरमा रहेलो महोटो । ! वैरी , नद्यमना जेवो कोइ नाई नथी, जे करवाथी माणसोनो नाश थतो नथी ॥१॥ || आलस सम को वैरी न दाख्यो, नीतिमें एहवो नांख्यो हो ॥ सु पिण हवे लान ध-18 18 नाने दिवारो, काज अमारो सुधारो हो ॥ सु०॥१७॥ सार्थप महेश्वर बिहु मिली नांखे. धन्नाशं हित राखे हो ॥ सु॥ए सवि किरियाणां अमने दीजे, लक्ष लान्न धन लीजे होली सुमा १०॥ धनपति चिंते मुज कारज सीधो, में मनमान्यो कीघो हो ॥सु०॥ कण एक Jain Education tional For Personal and Private Use Only IPujainelibrary.org Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० | विचारीने इम बोले, नही को मित्रजी तुम तोले हो ॥ सु०॥१॥ ॥ जो तुमने ले खप ए १४ पण्य करो, तो राखो सरवे जलेरो हो । सु०॥श्म कही धन लद लेई नलावे, अन्यो अ न्ये समजावे हो ॥ सु०॥२०॥ धनकुमर तिहाथीनले नावे, मित्रयुत धन लेई आवे हो al॥ ॥ मात पिता मन बहु सुख पावे, 'त्रातृजाया ते गुण गावे हो ॥सु०॥ २१॥ सहस्र के व्ययथी नव्य नोजन देवो, यश बहुलो इहां लेवो हो ॥ सु०॥' ढाल ही म मन थिर का राखी, बुध जिनविजये दाखी हो ॥ सु०॥ १२ ॥ | ॥ दोहा. ॥ हवे कहे धन्नो तातने, ए एक लद दिनार ॥ न्यायाढित आण्या अडे, करी वाणिज्य सफार ॥१॥ तेह नणी सवि सयणने, संतोखो गुणगेह ।। सहस एक सु-१ - वर्णनो, व्यय करवो धरि नेह ।। ३॥ ताते तव आएया तुरत, नाति नाति पकवान ॥ मेवा मीगई घणी, वदन वधारण वान ।। ३ ।। शालि दालि घृत अति सरस, व्यंजननो नही। पार ॥ अढार जातथी अति घणी, करी रसोई त्यार ॥४॥पोषी सयण कुटुंब सवि, दीधां फोफल पान ॥ याचक जन संतोषिया, यथायोग्य देश दान ॥५॥ शेष नवाणु सहसनां, | मणिमय नूषण सार ॥नोजाईने नक्तिथी, आपे धनकुमार ॥६॥नोजाई हरषित थई, १नोजाश्यो. ☆あやかャンセントラを Jan Education R ational For Personal and Private Use Only Vahinelibrary.org Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आप अति आशीष ॥ देवरजी अम कुल तिलक, जीवो कोमी वरीष ॥ ७ ॥ ॥ ढाल ७ मी.॥ (करेलणां घम दे रे.-ए देशी.) हवे ते धनकुमारने, तेमी कहे धनसार ॥ कुल मंझण तुं माहरे, तुं मुज कुल शाण | & गार ॥ चतुर अन सनिलो रे ॥ सनिलो पुण्यनी वात, चतुर जन सांनलो रे ॥१॥ए आंस कणी ॥ अंगज तुज जनम्या पठी, अम कुल वाध्यो वान ॥ शहि वृद्धि अम घरे, जग जश थयो सुप्रमाण ॥ च ॥२॥ माता शीलवती तदा, हरषित वदन विख्यात ॥ सुतनां लिये वारणां, तुं मुज सुनग सुजात ॥ च० ॥३॥ नोजाई नली जातिशु, रंगे गाये 8 गीत ॥ लाम लगावे अति घणां, देवरने सुप्रतीत ॥ च॥४॥ सयण संबंधी सहु मिली, करे वखाण विशेष ॥ धनकुमर सरिखो नही, पुण्य प्रबल सुविशेष ॥ चणा॥ तव त्रिपये है। बांधव तिहां, रोष धरे मनमांहि ॥ अणख अदेखाई करे, अवगुण ग्राहक प्रांहि ॥च॥६॥ ते देखी धनसारजी, तमावीने तेह ॥ अगज त्रिएयेने तदा, समजावे ससनेह ॥च०॥॥ लघु बंधव ए तुम तणो, नाग्य बले नरपूर ॥ विनय विवेक विद्या नीलो, अम कुल अंबर 3 सूर ॥ च ॥॥ एहनी सेवाश्री तुमे, सुख लहशो श्रीकार ॥ कल्पवृक्ष सम एह , वंबित पूरणहार ॥ च॥ए । देखो इणे एक याममें, अर्ध्या लक्ष दीनार ॥ नोजन विधि CREHENGER Jain Education n ational For Personal and Private Use Only Lainelibrary.org Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना०लो साचवी, संतोष्यो परिवार ।। च ॥१०॥ वली नोजाईने जलां, नूषण विविध प्र-न कार ॥ मणिमय मन गमतां घणां, कीधां धनकुमार ॥ ॥११॥ एहमां गुण जे अति नघणा, जोवो हृदय विचार ।। मन्चर मूकी मन तणो, सेवो सुपरे सार ॥च०॥ १२ ॥ म. घर धस्यो मनमें घणो, कौरवे पांडव साथ ॥ तो ते खीया अति श्रया, हास्या सघली Pाथ ॥ च ॥१३॥ व्रतमाहे मछर धस्यो, पीठ अने महापीठ ॥ तो स्त्रोवेद लह्यो ईहां, P ब्राह्मी सुंदरी दी॥च०॥१४॥ एहवा नपनय अति घणा, दाख्या शास्त्र मकार ।। जिन कहे सातमी ढालमां, समजावे धनसार ॥ च०॥१५॥ ॥दोहा. ॥ गुण लीजे गिरुया तणा, नवि दाखीजे दोष ॥ जाति हीन पण गुण की, पामे सुखनो पोष ॥१॥ जाति रूप हीणो हतो, हरिकेशी चंमाल ॥ तेहने तपना गुण अकी, सेवे सुर नूपाल ॥२॥ गुण षी ते अपूज्य गे, गुणवंतो पूजाय ॥ नपनय इ हां सहु को कहे, वायस कोयल न्याय ॥ ३ ॥ यतः॥ अनुष्टुवृत्तम्. ॥ काकः कृष्णः पिका ६ कृष्णा, को लेदोपिक काकयोः ॥ वसंतमास संप्राप्ते, काकः काकः पिकापिका ॥१॥ नावार्थः-कागो अने कोयल, ए बे कालां होय बे, त्यारे कागमो अने कोयल ए बेमां शो फेर? ते वसंतमास आवे उते कागमोते कागमोज रहे ने अने कोयल ते कोयलज रहे . ! Jain Education P ational For Personal and Private Use Only Lainelibrary.org Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ ढाल ७ मी. ॥ (माननी मोहनी रे. अथवा नहानो नाहलो रे.-ए देशी.) शेव कहे सुत सानलो रे, मनोहर माहरी वात ॥ धन धन साधुजी रे ॥ शास्त्रश्रकी में संग्रह्यो रे, अनोपम ए अवदात ॥धन धन साधुजी रे॥१॥ ए आंकणी. ॥ मुनिवर | एक महाबली रे, तपसीमें शिरदार ॥ ध॥ पंच महाव्रत जालवे रे, साचवे पंचाचार ॥ ध०॥२॥ कायनी जयणा करे रे, पाले प्रवचन माय ॥ध०॥ मद आये अलगा धरे रे, टाले चार कषाय ॥१०॥३॥ मासखमणने पारणे रे, त्रिकरण शुरु अदीन ॥ध०॥ गौच । रिये पहोत्यो तिहां रे, संयमथी लयलीन ॥१०॥॥र्यासमितिये चालतो रे, कोश्क नगर ४ | मझार ॥१०॥ करतो शुः गवेषणा रे, ते गयो इन्य आगार ॥ध०॥५॥आव्यो देखी साधुजी ।। हरे, श्राविका था नजमाल ॥ध॥ पक्कानादिक जूजूआ रे, लावीनरी नरी पाल ॥ध॥ ६॥ स्वामीजी अनुग्रह करो रे, वहोरो एहज आहार ॥ध०॥ देखी सदोष ते साधुजी रे, करे अन्यत्र विहार ॥३०॥७॥ श्राविका चित्त विलखी थई रे, बेठी घरने बार ॥ध०॥ एह । ४ वे फिरतो गौचरी रे, आव्यो अवर अणगार ॥ध०॥७॥ सरलपणे विचरे सदा रे, गुणग्रा* हक गुण लीन ॥३०॥ अवगुण एक जोवे नही रे, सुविहितशु लयलीन ॥धणापा धर्मला | न देई करी रे, कनो घरने बार ॥१०॥ विकसित वदने श्राविका रे, वहोरावे ते आहार ॥ ॐॐॐॐॐॐॐE** Jain Education national For Personal and Private Use Only M ainelibrary.org Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना २-२-२-ARA ध॥१०॥ वांदी बे करजोमिने रे, पूरे मधुरी वात ॥ध ॥ तुमने अप्रीति न ऊपजे रे, तो न ? नाखू अवदात ॥३०॥११॥ तुम सरिखो एक साधुजी रे, आव्यो हतो इणे गण ॥३०॥ वि | ण वहोरे विचस्यो सही रे, नवि बोल्यो मुख वाण ॥३०॥१॥ तेदनो कारण साधुजी रे, | दाखो करीय पसाय ॥ध०॥ तव बोल्यो मुनिवर तिहां रे, सुण न सुखदाय ॥३०॥१३॥ ते मुनिवर महोटो यति रे, सम दम गुण संयुक्त ॥ध ॥ व्रतधारक वारू परे रे, पंचेंश्यि | थी गुप्त ॥ध०॥१४॥ दोष बेतालीश साचवे रे, एषणाना मन शुद्ध । ध०॥ ममलिक दोष ते पांचने रे, टाले ते अविरु६ ॥ध०॥ १५ ॥ तिणे मुनिवरे ए पिंकमां रे, दोष दीगे हशे K कोय ॥ध०॥ तिणे कारणे लीधो नही रे, सुविहित लक्षण जोय ॥ध०॥ १६ ॥ यतः ॥ & र्यावृत्तम् ॥ ससरीरेवि निरीहा, बाहिप्रंतर परिग्गह विमुक्का ॥ धम्मोवगरण मित्तं, वहंति चारित्तरस्कहा ॥१॥नावार्थ:-पोताना शरीरने विषेशचा विनाना, बाह्य अने अन्तर परिग्रहथी मूकाएला तथा चारित्रने रक्षण करवाना अर्थि एवा मुनियो, मात्र धर्मोपकरण नेज राखे .अर्थात् बीजु कांश पण पासे राखता नथी॥१॥ ते मुनि सुरमणि सारिखा 8 | रे, हूं लूं लोष्टु समान ॥ ध०॥ हूं वायस ते हंस बे रे, मुनि गुण रयण निधान ॥ध०॥१७ | हूं शृंगाल ते गज समो रे, हूं मृग मृगपति तेह ॥ध० ॥ नदरवृत्ति कारक अमे रे, ते सम NACACASH Jan Educat i onal For Personal and Private Use Only A anelibrary.org Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ * निता गुणगेह ॥ध०॥ १०॥श्म स्तवना करी साधुजी रे, विचरे महियल मांह ॥ध०॥ जिन कहे आठमी ढालमा रे, श्रोता सुणो नचाह । ध०॥१॥ ॥दोहा. ॥ सांजलीने ते श्राविका, हरखी चित्त मकार ॥ प्रमुदितपणे पाखे शश, धन धन ए अणगार ॥१॥ निंदा नही एहमें निकट, गुणग्राहक गंन्नीर ॥शांत दांत शुचि आतमा, तारण तरण सधीर ॥२॥ कृपावंत कोविद प्रथम, आत्मशुद्धि अविकार ॥ सुविहित साधु शिरोमणी, रत्नत्रयी नंमार॥३॥ मासखमणने पारणे, पिण नवि लीये 81 सदोष ॥ कायानी ममता नही, करे पुण्यनो पोष ॥४॥ तिम बीजो पण साधुजी, गुण लग्राहक विख्यात ॥ आप निंदा पर स्तुति करे, धन धन एहनी मात ॥ ५॥ ॥ ढाल ए मी.॥ (मन नमरा रे.-ए देशी.) A एहवे एक वलि मुनि तिहां, मन हरखे रे ॥ फिरतो आहारने काज ॥ लाल गुण पर खे रे॥आव्यो तेहने आंगणे, म०॥ ये धर्मलान समाज ॥ ला० ॥१॥ ए आंकणी ॥ ६ देखीने ते श्राविका, म०॥ वहोरावे अन्न पान ॥ ला०॥ पूजे अंजली जोमने, म० ॥ विनर यानत शुचि ध्यान ॥ला०॥शा अधुना साधु आव्या हता, म॥ गौजरोये गुणवंत ॥ला० प्रथम देखी पागे वख्यो, म॥ मुख नेवि बोल्यो संत ॥ ला ॥३॥ बीजो मुनि आव्यो ५ Main Education national RSSIBHASHA REIRE For Personal and Private Use Only Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 156+ Cre बन्ना तदा, मा वहोखो अन्न आहार ॥ ला॥ तेहने में पूग्यो तदा, म०॥ पूर्वागत व्यवहार ।। न? ला०॥४॥ गुण वर्णन तिणे मुनितणा, म०॥ कीधा निपट अत्यंत ॥ ला० ॥ ते निसुणी मन माहरो, म॥ प्रसन्न थयो अति संत॥ ला०॥५॥ एबे मुनिवरमें तुमे,मानांखो कर |रीय पसाय ॥ला०॥ अधिक गुणे करी कुश हशे, मण॥ ते दाखो सुखदायाला०॥६॥ तव ते झषि बोल्यों तिहां, म०॥ मनमें मछर आणला०॥स्व प्रसंशा पर निंदता, म०॥ करतो बोले वाण ला०॥७॥ प्रथम ते मुनि जन रंजवा, म ॥ मायाकारक जोर ला०॥ धूर्तपरे फिरतो फिरे, म ॥ न करे मुखथी सोर ॥ ला०॥॥ शुरु अशुइ गवेषणा, म॥ 18 पर वंचनने हेत ॥ला०॥ बगला परे पगला नरे,म० पिस नही धर्म संकेत ॥ला०॥णा बीजो । जे आव्यो हतो, म०॥ साधुने वेशे अत्र ला०॥पटु चाटुक वचने करी,म०॥वश्य करे जनस है। वत्र ला०॥१०॥ यतः॥मायावीया माणसां, केम पतीजण जाय॥ मोरपीट मधुरो लवे,साप । सपूंग खाय ॥१॥नावार्थ:-जे माया कपटी माणसो , तेनी शी रीते परतीज पर्यो? केम | 13 के, पींगवालो मोर मीठु बोले, परंतु पूंगमा सहित सापने खा जाय ॥१॥ दनरहित 81 IA अमे अति नला, म०॥ श्रेष्टाचारी साध ॥ ला॥ सत्य वाक्य बोलूं सही, म° ॥ विचरूं तिम निरबाध ॥ला ॥११॥ यथालब्ध वहोरं सदा, म०॥परिमित अन्नने पान ॥ ला॥ १७ Jain Educatol a tional For Personal and Private Use Only 10Lainelibrary.org Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अम सरिखा शह साधुने, म०॥ देजो सदा बहुमान ॥ला॥१२॥ अमे पिण पूर्वे एहवी, 18| म । विरची माया जाल । ला॥ जनरंजन कीधा घणा, म०॥ हवे ते सवि विसराल ॥8 ला ॥१३॥ श्म कही ते मुनि संचस्यो, म०॥ नगरी में तिणताल ॥ ला०॥ वचन सुगी ते श्राविका, मण॥ पामी पुःख असराल ।। ला ॥ १४॥ चिंते एह निर्गुणी, म०॥ वासवा । दिक उष्ट ॥ ला०॥जे शुभ साधु निंदा करे, माते कहीए निघृष्ट ॥ ला०॥ १५ ॥ प्रथम साधु अति हीनलो, मण सुविहितमां शिरदार ॥ला॥ बीजो पण गुण रागीयो, मण 8 जग जन तारणहार ॥ला०॥१६॥ त्रीजो ए गुण मन्चरी, मापापी मांही प्रधान ला०॥8 | एहनो मुख अवलोकते, म०॥ उकृत होवे निदान ला॥१७॥ए दृष्टांते सुणी तुमे, म०॥ | मबर गेमो पुत्र ला०॥ मचर मूक्याथी सदा, म०॥ लहेशो यश सर्वत्र ॥ला०॥१॥ श्म है। | धनसार अंगज प्रते, म०॥ समजावे अहनीश ॥ला०॥ नवमी ढाले जिन कहे, म०॥ विनय वहो सुजगीश ॥ ला०॥ १५ ॥ ॥दोहा. ॥ अथ धनसार तणा तनुज, त्रिएये मूढ महंत ॥ पितृदत्त शिक्षा सुगी, मनमें ष धरंत ॥१॥अवसर पामी एकदा, कहे तातने जात ॥ मया करी मुज ऊपरे, सुणो तातजी वात ॥२॥धने जे कारज कियो, तेहवो न करे कोय ॥ण विधि बल क Jain Education Alainelibrary.org For Personal and Private Use Only rational Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० १८ रते थके, जगमें हांसो दोय ॥ ३ ॥ कागल वांची कपटथी, सार्थपने समजाय ॥ गजा वि ना गौरव धर्यो, कस्यो सकल व्यवसाय ॥ ४ ॥ दाम काम जव रूपन्यो, तव तिहां सत्यं कार ॥ देई करनी मुश्किा, जिम तिम राख्यो कार ॥ ५ ॥ एदवे वखते श्रावियो, न्य महेश्वरदत्त || लक्ष लान देई करी, ग्रह्मां क्रयाक ऊत्त ॥ ६ ॥ आज पढी हवे एहवो, नवि करवो व्यवसाय | तेद लान शा कामनो, जिसे करी ईजत जाय ॥ ७ ॥ ॥ ढाल १० मी. ॥ ( कपूर होय प्रति कजलो रे. - ए देशी . ) निसुली सुतनी वीनती रे, तव बोल्यो धनसार ।। ए शी वात कही तुमे रे, अजाइवार | पुत्र जी, समजो शीख सुजाण ॥ तुमे म करो तासा तारा ॥ पुत्र जी, तु मे लहेशो दुःखनी खाएा । पुत्र जी, समजो शीख सुजाण ॥ १ ॥ ए आंकणी ॥ दाम विनापि कीजीए रे, बुद्धि बले व्यवसाय ॥ घननो इहां कारण नहीं रे, सहुको कहीए न्या ॥ ० ॥ ० ॥ २ ॥ यतः ॥ बलथी बुद्धि आागली, जो उपजे ततकाल ॥ वानर वाघ वि गोइया, एकलमे शीयाल ॥ १ ॥ व्यापारे धन दारवे रे, बुद्धि विना धनवंत ॥ बुद्धे सुर नर वश दूवे रे, बुद्धे यश पसरंत ||०|| स०|| ३ || धन्नकुमरे निज बुद्धिश्री रे, लोधा लक्ष दीना र ॥ तुमने बुद्धि नहीं तीसी रे, जिसे करी होय जयकार | पु० ॥ स० ॥ ४॥ होंश होय जो Jain Educationtemnational For Personal and Private Use Only १० १ १८ jainelibrary.org Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ * * तुम तणे रे, तो फिरी करो व्यवसाय ॥ एकेको दिन आजथी रे, नोजन नगति कराय ॥ 18/ पुस०॥५॥श्म कही मासा सुवर्णना रे, चारेने स्वयमेव ।। चोश चोश आपीया 31 रे, व्यापारार्थे हेव ॥पुणासण॥६॥ मुख्य तनुज त्रिएये तदा रे, पदोत्या पण्यागार ॥ किरिडू याणां लीधा घणां रे, जाणीलान अपार ॥ पु०॥ स०॥७॥ कर्मवशे ते वस्तुमा रे, लाननो है। न रह्यो लाग ॥ अर्धा दाम जूड्यो तदा रे, अति उद्यमश्री अन्नाग ॥पु०॥स०॥७॥ भोजन विधि नूली गया रे, त्रिएये दिवसे तेह ॥ शाम वदनश्री ते तदा रे, बेग श्रावी गेह ॥ पु॥ 18 स०॥॥ अथ चोथे दिन साहसी रे, धन्नकुमार नदार ॥ शकनादिक अवलोकन रे, निश्च-18 य करे तिणिवार ॥ पु०॥ स०॥१०॥ लान्न होशे पशुथी नलो रे, धारी श्म मन धीर ॥ नगरमां कौतुक जोवतो रे, पहोत्यो चोहटे सधीर ॥पुणाता११॥ पशु क्रय थाय ने जीP हां रे, तिहां श्राव्यो निरनीक ॥ बेगे सस्थानक ग्रही रे, चावंतो मुख पीक ॥ पु०॥स०॥ १॥ तेहवे एक आध्यो तिहां रे, श्हूम वेचण नर कोय ॥ लक्षण पूर्ण देखी करी रे, रेली धो धन्ने सोय ।।पु०॥स०॥१३॥ एहवे नृप जितशत्रुनो रे, अरिदमनानिध जात ॥ ध्मेष जणी क्रीमाववा रे, आव्यो ते सुविख्यात ॥ पु०॥स०॥१५॥ देखी पनरत्र धना तणो रे, | १ करियाणावालानी उकाने. २ बोकमो. ३ पांच मासा सुवर्ण आपी घेटो लीधो. बोकमो. ५ बोकमो. २-16 १ Jain Education national For Personal and Private Use Only I ainelibrary.org Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना बोलाये नृप जात ॥ युः करावीजे ईहां रे, तुम अम गग सादात ॥ पु० ॥ स ॥१५॥ न १ १५ जीते जेहनो बोकमो रे, ते पामे धन लद ॥ स्वर साधीने आदस्यो रे, पिण धन्ने परत ॥5 पुण्॥स०॥ १६ ॥ अन्योन्ये मस्तक थकी रे, घेटा युद्ध करंत ॥ हास्यो अज अरिदमननो रे, धन नरन्न जीपंत ॥ पुण्॥ स०॥१७॥ देखी पराक्रम अज तयो रे, चिंते राजकुमार है। P ए तुम जो हुवे आपणे रे, तो सहीये जश सार । पु०॥स०॥१०॥ लक्ष दीनार देई कहे । रे, ते अरिदमन आणंद ॥ ए आपो दूम अम प्रते रे, इप्सित गुम्ने अमंद ॥ पु०॥ स॥ ४१ए॥ धनकुमर कहे क्रीमवा रे, दूझ राख्यो महाराज । लक मूल्य द्यो अम प्रते रे, जो | तुम घेटा काज॥ पु०॥स०॥२०॥ ततक्षण रायकुमर तिहां रे, देई लक दीनार ॥ अज ले. ईने चालीयो रे, परिवृत निज परिवार ॥ पुण्॥ स०॥१॥लाख दोय धन लेईने रे, आ व्यो धन्न आगार ॥ मात पिता हरषित हुआ रे, तिम सघलो परिवार ॥ पु०॥ स ॥२२॥ नव्य नोजन सवि सयणने रे, नक्ति विशेषथी दीध ॥ ढाल दशमी श्रोता सुणो रे, जिन कहे.पुण्यश्री सिह ॥ पुण् ॥ स०॥ २३ ॥ ॥दोहा॥नोजन विधि करीनक्तिश्री, शेष व्य सुखकार ॥ नोजाईने आपीयो, वहेंचीने तिशिवार ॥१॥ नोजाई लीये नामणां, दिन में दो दो वार ॥ जीजीकार सदा Jain Educatio n ational For Personal and Private Use Only IPTwainelibrary.org Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 5NCE जपे, स्वारथ जगमें सार॥३॥ यतः ॥ आघा आवो आदर दिये स्वर्ण रुप्यादि दृष्टा, पासेस को बेसवा न दिये निर्धनानां जनानां ॥ तुमे अमारे जीवितप्राणः स्वार्थ एको हि नव्य, दाप्या विना अमे कोण तुमे कोण स्वार्थहीनान वदंति ॥१॥नावार्थ:-सोनुं अने रु' द जोश्ने श्राप पधारो साहेब ! एवी रीतनो आदर आपे अने निर्धन पुरुषोने कोइ पासे बेस वा पण न ये. तमे अमारे जीवितप्राण गे, ए बधामा एक स्वार्थज सारो छे. स्वार्थ रहित पुरुषोने एम कहे के, अमे कोण ? अने तमे कोण? ए रीतेसहु स्वार्थनी सगा ॥१॥ सयण सयल मुख नञ्चरे, धन धन धनकुमार ॥ बुझ्यिकी लक्ष्मी वरे, नदि संक्लेश लिगार ४ ॥ ३ ॥ ते सुणि धनदत्तादि सुत, त्रिएये करे विचार ॥ धन्ना आगल आपणो, किम चलशे 8 - व्यवहार ।। ४॥म आलोच। चित्तमें, वीन वियो धनसार ॥ तात सुणो एक वीनती, अम। मननी शनिवार ॥ ५ ॥ युः प्रतिज्ञाये करी, लाग्यो धन बे लक ॥ पिण जो घेटो हारतो, तो फल होत प्रत्यक्ष ॥६॥अविचास्यां एहवां करे, छूतादिकनां काज ॥ तिणे करी जा 8 णांग हवे, रहेशे नही घर लाज ॥ ७॥ तुमने लोन वध्यो घणो, तिणे ते वल्लन थाय ॥४ जो नूख्यो हुवे अति घणो, पिण कर क्ष्य न जिमाय ॥ ७॥ ते माटे वरजो तुमे, हृदय * करी सुविचार ॥ आज पठी हवे एडवो, न करे धनकुमार ॥ ए॥ Jain Education a lational For Personal and Private Use Only linelibrary.org Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ ढाल ११ मी.॥ (माला क्या डे रे.-ए देशी.) कहे धनसार ते त्रिण्य तनूजने, ए तुम वात में जाणी ॥ नाग्यहीनने कांई न सूके, नाग्यबले सुखखाणीरे ॥ मचर मूको रे ॥ मार्दवथी सुखवास, ते मत चूको रे ॥१॥ए है। आंकणी ॥ तुमने ए धनकुमर संगाथे, पूरव वेर को दीसे ॥ एहनो वचनादिक पिण तुम ने, न गमे विसवावीसे रे॥म०॥॥ यतः॥अनुष्टुब्वृत्तम्.॥ यं दृष्ट्रावाईते क्रोधः, स्ने । 5 हश्च परिहीयते ॥ सविज्ञेयो मनुष्येण, एष मे पूर्व वैरिकः ॥१॥नावार्थ:-जेने देखीने क्रोध वधे डे अने स्नेह घटे , ते उपरथी माणसे एम जाणवू के, जरूर आ पुरुष महारो पूवन्नवनो वैरी दशे.॥१॥ धन अर्जीने सयण संतोषां, कारज नत्तम कीधां ॥ मणिम &य नूषण मन गमतां, नोजाईने दीधारे॥म ॥३॥ ए निस्पृह निज कुलनो पोषक, सहुशुं हित बहु राखे । तुम विण सयल सयण ए सुतना, अह निशि गुण मुख नखे रे म॥४॥ महर मनमें अधिक धरते, पंकप्रिय पुःख पाम्यो ॥ ते दृष्टांत सुणो एक चित्ते, तस न श्रयो को कामो रे ॥ म०॥५॥ नयरी अयोझ कोशल देशे, नृप काकुस्थ सोहावे ॥ न्यायवंत दाने अति शूरो, राम समान कहावे रे ॥म०॥६॥ ते नगरीमें एक है प्रजापति, पंकप्रिय शे नामे ॥ स्त्री पुत्रादिक परिकर परिघल, तिणे करी सवि सुख पा 456-4 946 Jain Educa t ional For Personal and Private Use Only L ainelibrary.org Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मेरे ॥म०॥७॥ पिण तिणमें ले एक अपलकण, गुण कोइनो नवि सांसे ॥ईर्ष्याये करी ने सहु जनना, गुण ते अवगुण नांसे रे॥म०॥॥ जो कोईनो गुण आवश्यपणाथी, सां नले तो शीर दूखे ॥ पांच मिले जो गुणना रागी, तो तेहशू अति रूसे रे॥म०॥णायतः॥ दपिशुन कषाय न परिहरे, जो कीजे सो लल्ल ॥ अंबा गिरिमने वसे, तो हि कषायणि गुल्ल । ॥२॥नावार्थ:-जो कदि सो सारां काम करीए, तो पण चामियो माणस कदापि कषाय त्याग करे नही. जेम आंबो पर्वत नपर वसे, तो पण तेनी गोटली तो कषायेली ने कषाये लीज रहे ॥२॥ जो वारे कोई सऊन थश्ने, तो निज शिर ?आस्फाले ॥ वास्यो केह नो न रहे पापी, क्रोधे तनु परजाले रे ॥म०॥१०॥ यतः॥आर्यावृत्तम् ॥ क्रोधःपरितालपकरः, सर्वस्योगकारकः क्रोधः॥ वैरानुषंग जनकः,क्रोधेन सूगति हर्ताः॥३॥ नावार्थः क्रोध परिताप नपजावनारो, सर्वने नईग करावनारो, वैरनुं अनुसंधान करनारो अने सुगतिने हरनारो .॥ ३ ॥ तव तस पुत्र विचारे चित्ते, तातने वन मूकीजे ॥ तो सहूना मनमें सुख थावे, गृहकार्यादिक कीजे रे ॥ म॥११॥श्म निश्चय करी तातने नांखे, तुमे हवे वनमां पधारो ॥ इष्टदेवतुं नाम जपीने, निज अवतार सुधारो रे ॥म ॥१॥ जन १ माथु कूटे. Jain Educatio n ational For Personal and Private Use Only W ainelibrary.org Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० २१ संक्लेश थकी पंकप्रिये, सुत वचन पिल प्रेरयो । वनमा कोई सरोवर तीरे, तृणगृह रच्यो सुनलेरो रे ॥ ० ॥ १३ ॥ अन्नादिक वस्त्रादिक प्रतिदिन, पुत्र पिताने पूरे ॥ तिहां रहे पंकप्रिय मन हरखे, चिंता बांकी दूरे रे ॥ ८० ॥ १४ ॥ महारथी जून पंकप्रिय ए, एकाकी रह्यो वनमें ॥ ढाल इग्यारमी जिन इम जांखे, मन्चर म धरो मनमें रे ॥ म० ॥ १५ ॥ ॥ दोहा ॥ एक दिवस काकुस्थ नृप, परिवृत बहु परिवार ॥ आखेटक कार्यो गयो, वन गहने सुविचार ॥ १ ॥ बाण कबाले साचवी, नीलांबर घरी देह ॥ नृप मृगया करतो फिरे, पल काजे प्रति तेह ॥ २ ॥ यतः ॥ आर्यावृत्तम् ॥ मृग मीन सकनानां, तृण जल | संतोष विहित वृत्तिनां ॥ लुब्धक धीवर पिशुना, निष्कारण वैरिलो जगति ॥ १ ॥ नावार्थ:मृग तृणवके, माबलां जलवमे अने सजन पुरुषो संतोषवमे पोतानुं गुजरान चलावे बे; | तेम बतां तेमना अनुक्रमे पारधी, मी अने चामीयान विना कारणे जगत्मां वैरी बे. ॥ १ ॥ उष्णकाल प्रातप बहुल, नृपति सुकोमल काय ॥ कुधा तृषा श्रम प्रमुखथी, श्राकू ल व्याकूल थाय ॥ ३ ॥ सरोवर देखी सुनग, थावे जलने अर्थ । एहवे ते पंकप्रिये, नृप दीठों सामर्थ्य ॥ ४ ॥ जल आणी आमल घट्यो, अमृत सम अभिराम ॥ पारुल पुष्पा दिक श्रकी, वासित शीतल स्वाम ॥ ५ ॥ जोजन पिस जावे करी, दीधो नृपने ताम ॥ For Personal and Private Use Only Jain Educationmational न० १ २१ jainelibrary.org Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ शीतल गंयाये तिहां, राय करे विश्राम ॥६।। यतः ॥ सऊन आव्या प्राणा, मागे चार रतन ॥ वाणी पाणी सायरो, संपति सारु अन्न ॥२॥ अल्पन्नक्ति अवसर तणी, ते पण 8 | बहुली याय ॥ विण अवसर जे कीजिए, ते तो नावे दाय ॥ ७॥ ॥ ढाल १२ मी. ॥ (राजि मृगानयणीरी नागरी फूलो.-ए देशी.) __राजि नृप कहे तुं एकाकी, राजि किम रहे ने हां अहिकारी ॥ राजि किम विस-२ रेजी कहो नपगारी, राजि जेणे कीधी सेवा सारी, राजि नृप कहे तुं एकाकी ॥ ए आंक-3 दणी॥ राजि एणे वनमें एणे गमे, राजि इहां रहे ले कहे शे कामे ॥ राजि ॥१॥ राजि मृग मृगपति वलि मुनिवरने, राजि वलि विद्यासाधक नरने ॥ रा राजि पिण गृहवेसे है वनमें रहेवो, राजि एतो अचरिज कारण कहेवो ॥ रा॥२॥राजि तव बोल्यो पंकप्रिय वाणी, राजि सुण नूपति तु गुणखाणी ॥ रा०॥ राजि हुँतो नगरी अयोहानो वासी, रा जि कुनकार कला अन्न्यासी ॥राण॥३॥ राजि स्त्री पुत्रादिक ने बहुला, राजि माहरे तिहां 5 K कण सबला ॥रा०॥ राजि कोईना गुणवर्णन में न खमाये, राजि मुजश्री मौन न पाये राण॥॥ राजि कोई परगुण मुज संतलावे, राजि तो मुज शिर दूखण आवे । रा॥ राजि गुणवर्णन सुणतां टालूं , राजि नही तो निज शिर आस्फालूं ॥ रा॥५॥ राजि एह Jan Educat i onal For Personal and Private Use Only A ainelibrary.org Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्नाण 섬 २‍ अवगुण मुजमें होटो, राजि परगुरा न सदू थई छोटो ॥ रा० ॥ राजि नित्य कलहो हुवे बहु साधे, राजि तिले लाज न रही मुज हाथे ॥रा० ॥ ६ ॥ यतः ॥ श्रगणितिय नासर वि का, पिल्लिऊंति नासर पका । कुट्टिऊंतित्र नासर नका, इबोलंतित्र नासर लका ॥ १ ॥ जावार्थ:- फरव्या विना विद्या नाश पामे, पीरुवा थक। प्रजा नाश पामे, बहु मार वार्या नाश पामे अने घणुं बोलवाथी लगा नाश पामे. ॥ १ ॥ राजि तव प्रालोची निज मनमें, राजि तव वास की यो ए वनमें ॥ रा० ॥ राजि निज पिंक जणी प्रतिपालूं, राजि मनथी नदवेगने टालूं ॥ ० ॥ ७ ॥ राजि सुली वाक्य ईशां नूपाले, राजि चिंते तव चित्त विचाले ॥० ॥ राजि देखो एह दुःखीयो दीसे, राजि एतो दुःख पामे बेरी से ॥०॥ ॥ राजि पि एह माहरो नपगारी, राजि मुज सेवा कीधी सारी ॥ रा० ॥ राजि अवसर लही जेह न चूके, राजि सनता पिएस नवि मूके ॥ ० ॥ ॥ राजि तेहनी जइए वलिहारी, राजि तस कीजे सेवा सारी ॥रा० ॥ राजि कीधा गुणने जे लोपे, राजि तेहने परमेश्वर कोपे ॥ ० ॥ १० ॥ राजि एले अन्न नदक मुज दीधो, राजि एणे जीवित कारज कीधो ॥ रा० ॥ राजि वली सुंदर स्थानक ग्रापी, राजि मुज सेवे बे गुणव्यापी ॥ रा० ॥ ११ ॥ राजि दवे एहने सुखीयो कीजे, राजि उपकृति गुण संजारीजे ॥ रा० ॥ राजि नर Jain Educationa International For Personal and Private Use Only न०१ २२ Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ********** थश्ये एणे टाणे, राजि तो यश जगमें सहु जाणे ॥रा०॥ १२॥ यतः॥ आयोवृत्तम्.॥ दो पुरिसे धरणी धरे, अहवा दोएहिं धारिया धरणी ॥ नवयारे जस्स मई, नवयारं जो न नलवई ॥॥नावार्थ:-जगत्ने विषे बे पुरुषो धरतीने धारण करनारा , अथवा बे पुरु दषोवमे पृथ्वी धारण कराय . तेमां एक तो ए के, जेनी नपकार करवानी बुद्धि ते अने। बीजो जे उपकार नलवे नही ते; एंटले करेला नपकारनो बदलो वाले ते. ॥॥ राजि श्म ? चित्त चिंती नृप बोले, राजि पंकप्रियंथी निज दिल खोले ॥रा ॥ राजि तुं साचो बंधव ४ महारो, राजि तिण माटे नगर पधारो ॥रा०॥१३॥ राजि तुने असन वसन बहु देशू, राजि वली नगति विशेषे करेशू ॥रा०॥राजि रहेवाने सदन सजोमां, राजि देशृं बहु हा-16) थी घोमा ॥रा॥१५॥ राजि मुह मांगी लखमी लेज्यो, राजि मुज पासे बेग रहेज्यो॥ रा॥ राजि तुम पूरव वात जे कद्देशे, राजि ते तो तस्कर दंग लदेशे ॥ २०॥ १५॥ राजि इम कही नृप यो असवारी, राजि पासे पंकप्रिय कुंनकारी ॥रा ॥ राजि निज नगरी नणी जव चाले, राजि तव सेना मिली समकाले ॥रा०॥१६॥राजि मंत्री सामंत सं-18 मेला, राजि आवीने श्रया सहु नेला ॥ रा॥ राजि श्म बारमी ढाल ए नाखी, राजि जि १ घर. ********** Jain Education I ntional For Personal and Private Use Only W inelibrary.org Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नु०१ २३ धनः न कहे पुण्य संघले साखी ॥ रा०॥ १७ ॥ ॥ दोहा. ॥ चालते वनमें नृपे, दीन कन्या एक ॥ वृत बोरा वीणती, कुजपरे । दाई क ।।१॥ मृगनयणी चंज्ञननी, चंपकवरणी देह ॥ देखी नृप चित चिंतवे, शें रति है रंना एह ॥२॥ के उलवा मुजने शहां, आवी ने वनदेव ॥ के इंज्ञणी अपहरा, रमवा का । शरण देव ॥ ३ ॥ रूपवंत रलियामणी, शामामें शिरदार ॥ पूर्बु एहने प्रेमशं, नाम गम सु || प्रकार ॥४॥श्म चिंती पूढे नृपति, ते बाला प्रते ताम ॥रेन मुजने कहो, नाति नाम तिम गम. ॥५॥ ॥ ढाल १३ मी. ॥ (योगिणी मनमानी.-ए देशी.) तव बोली बाला सुकुमाला, करी लाज धुंघट सुविशाला रे ॥ कामिनी मन मानी॥ अहो नूनाथ सुणो मुज वाणी, हुं रे कहुं मुज करम कहाणी रे ॥ कामिनी मन मानी। १॥ए प्रांकणी ॥ अंगदेश चंपानो वासी, मुज तात हुतो सुखवासी रे ॥ का० ॥ निर्या-5 मिक विद्या अन्यासी, तप्त तनया हुं यूँ तुम दासी रे ॥ का०॥२॥ नाम खस्का मुज ताते 81 दीघो, मुज यतन घणो तेणे कीघोरे ॥ का०॥ तातजी मुजने लेई संगे, चाल्या जलवट वाटे रंगे रे ॥ का॥३॥ देवप्रयोगे प्रवहण लाग्यो, एक फलग हाथे तव लाग्यो रे ॥ का॥ Jain Education national For Personal and Private Use Only Plainelibrary.org Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तिणे तरती तरती नपकंठे, यावी हूं समुड़ने कंठे रे ॥ का० ॥ ४ ॥ ईए वनमें रही काल, गमावु, वननां फल फूलने खावूं रे || का० ॥ बात तात सवि रह्या परदेशे, हूं एकाकी ए लेवेशे रे ॥ का ॥ ५ ॥ राय सुखी मन प्रमुदित थावे, तव मंत्रीने समजावे रे | का० ॥ ए कन्यानां यतन करेज्यो, लेई वाहनी मांही घरेज्यो रे || का० ॥ ६ ॥ राजा कुशले नगरे श्राव्या, घणां जीत निशान बजाव्या रे || का० || रूप अधिक खरकानो जाली, तस राये की पटराणी रे || का || ७ || हित घरी नाम लीलावती थाप्यो, वलि आमंबर बहु आ यो रे || का० ॥ कामनोग तिती विलसे, राय अहनिशि मनशुं हरषे रे || का० ॥ ८ ॥ पंकप्रियने पिए सनमान्यो, कीधो गुण ते सवि जाएयो रे || का० ॥ असन विसन श्रावास अनेरा, दीघा तस प्रतिहि जलेरा रे ॥ का० ॥ ए ॥ गाम में परुह वजाव्यो जाली, सहु सांजलज्यो सुप्रमाणीरे || का० ॥ पंकप्रिय खरका वात जे कदेशे, ते तस्करनो फल लहे शेरे ॥ का ||१०||सुख विलसंतां दिवस गमावे, पुनरपि वली ते तु आवे रे || का० ॥ रा जास्वामी जावे, राणीयुत प्रति वरुदावे रे || का० ॥ ११ ॥ साधे पंकप्रिय पिण यावे, तव राणीने राय बोलावे रे || का० ॥ बदरी वृक्ष देखीने पूढे, एहनो नामने गुण कहो १ वोरडी. Jain Education international For Personal and Private Use Only jainelibrary.org. Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना RECOR- श्यो रे ॥ का०॥१॥ राणी कहे तव वृक्ष ए केहनां, हूं नाम न जाणुं एहनां रे ॥ का०॥ न २४ एदनां फल कहो प्रिय कुण खावे, मुख मनमें अचरिज थावे रे ॥का०॥१३॥निसुणीत्रटक चढी पंकप्रियने, कहे ईम शुं कहे जे एहने रे ॥का०॥ मुजश्री पिण बोल्यूं न रहेवाये, एह वचन ते किम सहेवाये रे ॥ का०॥१४॥ईम कही निज मस्तक आस्फाले, ग्रही दृषद है थकी ततकाले रे॥का ॥ प्राकृत दे दोधक नांखे, मन शंक किशी नवि राखे रे ॥ का० ॥१५॥ यतः ॥ काले बोरां वीणती, आज न जाणे खरक ॥ पुनरपि अटवी करीश घर, IA पिण न सदू ए अणक ॥१॥ नृप अवदात सुणी मन कोप्यो, ईणे वचन अमारो लोप्यो । हारे॥ का॥ में लीलावती नाम आरोप्यो, एणे खरका नाम न लोप्यो रे ॥का०॥ १६ ॥ मनथी लाज वले नही जेहने, शं कीजे कहो हवे तेहने रे ॥ का ॥ पुनरपि कांतारे लेईल मूक्यो, ते सघला सुखथी चूक्यो रे ॥ का ॥१॥ पूर्वपरे तृण गृह करी बेगे, पिण चिंता सागरमांपेगे रे॥का व्याघ्र आवी जव शब्द सणावे. तव पंकप्रिय छःख पावे रे॥ काण॥१॥ मरण नये तेणे गरौ कीधी, लघु मुखथी सुपरे सीधी रे ॥का०॥संध्या स-2 मये तेदमा पेसे, अंग संकुचित करी बेसे रे॥का०॥१॥ खाम की बाहिर जव आवे, १ पचर. १ अटवी. ३ खाम खोदी. ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ ACHARYA For Personal and Private Use Only Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तव मरण समय तस थावे रे ॥ का० ॥ गाथा बे लिखे ते बिहु पासे, पुत्र आवी वांचे ते नदासे रे || का०||२०|| गाथा यथा ॥ श्रार्यावृत्तम्. ॥ वग्घ जयेश पविठो, बुहाहन निग्गमं मिसमठो ॥ श्रवसो वसन, पुत्त य पत्तो श्रहं निहां ॥ १ ॥ जावार्थ:- वाघना जयथी खाममा पेठेलो, कुधाए पीमाएलो, खाममांश्री बहार नीकलवाने असमर्थ ने ग्राहट दोहट चित्तवालो एवो हुं मरण पामु बुं. ॥ १ ॥ इद लोगंमि दुरंतं, परलोग विवाहगे ह विवागे | वह वयले पावे, वतिका पुत्त सरकं ॥ २ ॥ नावार्थ:-वध रूप वचनथी जी व या लोक अने परलोकने विषे दुःखना विपाकने पामे. ते कारण माटे हे पुत्र ! तमे प्रदे खाइनो त्याग करजो. ॥ २ ॥ ते गाथानो अरथ विचारी, थया धर्मतला अधिकारी रे ॥ का० ॥ ख देखाई दूर निवारी, उपदेश अनोपम धारी रे ॥ का० ॥ २१ ॥ पंकप्रिय परे तुम दुःख लहशो, जो मन्चर मनमां वहशो रे || का०॥ कहे धनसार सुणो सुत साचो, एवात में कोई न काचो रे || का० ॥ २२ ॥ तेहनणी मन महर वारी, धरो प्रीति धन्नाथी सारी रे । का० ॥ तेरमी ढाल कही सुविचारी, जिनविजये प्रति जयकारी रे ॥ का० ॥ २३ ॥ ॥ दोहा ॥ तव बोल्या तिष्ये तनुज, साच कही तुमे वात ॥ श्रणख प्रदेखाई तल, फल विरुां सहितात ॥ १ ॥ श्रमे कहुं हुं हित वचनथी, द्यूत व्यसन दुःखदाय ॥ इह Jain Educationa International の For Personal and Private Use Only . Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 25ESHRASE लोके ईजत घटे, परन्नव पिण न खटाय ॥२॥ होम न कीजे होशश्री, होम की धन न०१ हाण ॥ नलराजा होमे करी, पाम्यो दुःखन। खाण ॥३॥ पांडव पांचे वन वश्या, होमे हारी राज्य ॥ सात व्यसन मांही प्रथम, एहिज कार्य अकार्य ॥४॥ यतः॥ नपजातिK वृत्तम्. ॥ द्यूतं च मांसंश्च सूरा ३ च वेश्या ५, पापईि चोरी ६ परदार सेवा ७॥ एता निः सप्त व्यसनानि लोके, घोरातिघोरं नरकं नयंति ॥१॥ नावार्थः-जूवटुं, मांस, मदिरा, वेश्यागमन, आहेमीकर्म, चोरी अने परस्त्रीगमन, आ सात व्यसनो अति घोर नरकने विषे लेई जाय ॥१॥ जे माटे ए होमथी, लाव्यो धन बेलक ॥ अमने ते कारण 3 श्रकी, ष वधे परतत ॥५॥ तात कहे तमे द्यूतनी, वात कही हित काज ॥ पिण बुझे ke कर लीजिए, वंबित सिदिसमाज ॥६॥नाग्यबले बुझेकर, चिंतित कार्य करत ॥ना | ग्यहीन नद्यम करे, ते सवि निष्फल जंत ॥७॥ ॥ ढाल १५ मी.॥ (ते तरिया नाइ, ते तरिया नाइ.-ए देशी.) __ कहे धनसार सुणो रे पूता, तुमे कां एम विगता रे ॥ कुमति रूप कादवमां खूत्या, 8/ | बोलो गे जेम कूता रे ॥ कहे धनसार सुणो रे पूता ॥१॥ए आंकणी ॥ नाग्यहीन तुमे | है परतख दीसे, शुं कहीए करि रीसे रे ॥ मूल व्य संन्नारो खोने, पडे नांखो सुजगीसे २५ Jan Education afternational For Personal and Private Use Only wwwjainelibrary.org Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रे ॥ कहे ० || २ || होंश तुमारे ते हजी दिल में, व्यवसाये धन वरवा रे ॥ इम कही १शत शत मासा आापे, व्यापारादिक करवा रे || कहे० ॥ ३ ॥ तव त्रिएये ते मासा लेई, दोशीमां यावेरे ॥ वस्त्र अनोपम त्रष्ये शतनां, लेई ग्रंथी बंधावे रे ॥ कहे० ॥ ४ ॥ चौटे श्रा चित् विमासी, एक गयो जल पीवा रे । एक तिहां क्रीमाविधि निरखे, एक अशुचाने करवा रे || कहे ० ॥ ५ ॥ एवे तस्कर अवसर जाली, ग्रंथी लेई नाठो रे । बल थकी तेत्रिये धूत्या, हृदय करीने काठो रे ॥ कहे ।। ६ ।। त्रिएये मिली ते वस्तुने जोवे, खूरो नना रोवे रे ॥ अन्योन्ये अत्यंत विगोवे, लाज पोतानी खोवें रें ॥ कहे० ॥ ७ ॥ काजल | सम निज वदन करीने, गृहमें घावी बेसे रे ॥ तात वात जाली मन चिंते, शुं होवे निष्फल होंगे रे ॥ क० ॥ ८ ॥ चोथे दिन धन्नकुमर विचारे, चतुर शुकन स्वर धारे रे । काठपीठ चौटे मलतो, व्यवसायार्थे पधारे रे ॥ का० ॥ ए ॥ एहवे ते नगरे व्यवहारी, धनप ति नामें कहावे रे || राठ कोमि दिनार तो पति, कृपणमें मुख्य सोहावे रे ॥ क० ॥ १० ॥ फाट्यां त्रूट्यां वस्त्र पूराणां, परनां लेई नढे रे || कुछ अन्न श्माषादिक खावे, ऊखरये नित पोढे रे ॥ क० ॥ ११ ॥ कहे घृतः गमे तैलादिक जीमे, मुनिपरे स्नाननो त्यागी रे ॥ १ सो सो मामा सुवर्ण. २ प्रमदादिक- ३ कां पाथ विना- सुई रहे.. Jain Educationmational For Personal and Private Use Only 17801 Mainelibrary.org Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० । तांबूल गमे 'कसेलो लेवे, परगृह नोजन रागी रे ॥क०॥१२॥ देवतणो दर्शन नवि वां में, देव इव्यने चाहे रे ॥ गुरुने गृहमें पेसण नापे, गुरुनु लेण नमाहे रे ॥क० ॥ १३ ॥ 1 निकाचर देखीने आपे, बार देई समकाले रे ॥ वली विशेषे गलहथ देई, संतोषे तस गाले | । रे॥क०॥१४॥कोमी व्यय करे कोईक काजे. तो विषमज्वर आवे रे ॥ दान देतां देखे है जो ततक्षण, मस्तक पीमा थावे रे ॥क ॥ १५॥ देवानी तो वात न जाणे, लेवा वेला शरोरे ॥ निंदा करवा तत्पर थाये, पाप की ते प्ररोरे॥ कहे०॥१६॥ यतः॥ मालिनी 2 वृत्तम् । कण कण जिम मेले कीटिका धान्य केरो, मधुकरी मधु संचे लोगवे को अनेरो ४॥ तिम धन कृपिकेरो नोपकारे दिवाये, इम हि विलय जाये अन्यथा अन्य खाये ॥१॥ नावार्थ:-जन! कीमियो दाणो दाणो नेगो करीने धान्यनो संग्रह करे , माखीनटीपे टीपे करी मधनो संचय करे; परंतु ते धान्यने अने मधने जेम बोजो कोई नोगवे ठे तेम कृपणनं धन पण नपकारने विषेन अपातां. एमने एमजतं रहे.अथवा बीजो को 3.ई खाई जाय ॥१॥पाणिगृहणादिक कोई कामे, नत्तम नोजन खावे रे ॥ लंघन न करे ते बीजे दिवसे, अतिसार तस थावे रे ॥ कदे॥१७॥ पुत्रने पिण एक पैसो नापे, १ आंबलीनो कचूको. Jan Educato national For Personal and Private Use Only I llainelibrary.org Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ का की धन मेले रे । सया कुटुंब मिली सवि तेहने, मातंग मांहे नेलं रे ॥ कहे ॥ १७ ॥ मरणतलो जय मनमां न गणे, न गणे सुजल सवाई रे || चौदमी ढाले जिन इम नांखे, कृपणनी कुटिल कमाई रे || कदे ॥ १९ ॥ ॥ दोहा ॥ चित्तमें चिंते कृपण ते, लोजवशे धरी गर्व ॥ बल करी माहरा पुत्र ए, रखे लीए धन सर्व ॥ १ ॥ ईम आलोचीने तुरत, लीधां रत्न नदार ॥ बासठ कोमि दिनार - नां, स्वल्पपणाथी सार || २ || मंचक जूदी करायने, कोरी घाल्यां तुरत ॥ सयनासन ते ऊपरे, कृपण करे दिन रात ॥ ३ ॥ इम करते तस एकदा, श्राव्यो अंगे रोग ॥ धन व्ययथी बीहतो थको, न करे औषध योग || ४ || मरण समय निज पुत्रने, तेकी करे अरदास ॥ | में धन को मिगमे विपुल, विलश्या जोग विलास ॥ ५ ॥ ते जगी ए पर्यंकने, सतीय परे | मुज साथ || प्रतवने संस्कारज्यो, शेष सकल तुम आथ । इम कहेतो ते मूढमति, पSafar || विलगी मूर्च्छांगत थयो, पहोत्यो जम आगार ॥ ७ ॥ गेमायो बूटे नही, मृतक खाटथी जाम ॥ तव तेहनी स्त्री तनुजने, कहे निसुणो गुण धाम ॥ ८ ॥ खाट स. हित एहने तुमे, करो अमिसंस्कार || सुणी कृपण सुत तेहने, लेइ चाल्या तिथिवार |||| १ चंकाल. २ स्मशान भूमिमां १३ बाकी रहे ते तमे लेज्यो. Jain Education national For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्नाण २७ प्रेतवने जव ते गया, तव तेहनो रखवाल ॥ कलह करी पर्यंकने, लेई चाल्यो चमाल ॥१॥ ॥ ढाल १५ मी ॥ ( गोरमी गुणवंती. - ए देशी . ) पक ते लेने रे सुरीजन, चौटा विचे चंगाल ॥ पूरव पुण्य फलियो || वेचणने बेगे तिहां रे सुरीजन, जोवे बाल गोपाल ॥ पूरव पुण्य फलियो ॥ १ ॥ ए कली ॥ साटवे पिरा लेवे नहि रे सु०, मृतकतलो तेह जाण || पू० || दीगे धन्ने दूरथी रे सु०, सुंदर खाट सूवाण | पू० ॥ २ ॥ स्वर साधीने मूलव्यो रे सु०, लीधो देई १दाम ॥ ५० ॥ न पावी घेर आलीयो रेसु०, पर्यंक धन्ने जाम ॥ पू० ॥ ३ ॥ अग्रज तव त्रिएये तिहां रे सु०, इसवा लाग्या तास ॥ पू० ॥ मृतक खाटथी पामशे रे सु०, दाम प्रमुख सुविलास ॥ ५० ॥ ४ ॥ खाट ग्रही गृहमें यदा रे सु०, बकावे धनसार ॥ ५० ॥ ततक्षण ईसने ऊपलां रे सु०, जूजू यां सुप्रकार || पू० ॥ ५ ॥ रतन अमूलिक नीसख्यां रे सु०, खाटयकी तिथिवार ॥ ५० ॥ बाठ कोमी दिनारनां रे सुप, हरख्यो तव धनसार ॥ पू० || ६ || सुतने कड़े सुयो एहना रे सुप, जाग्यतणो बल नूर ॥ ५० ॥ पग पग पामे संपदा रे सु०, पुण्यतरो - कूर ॥ ५० ॥ ७॥ यतः ॥ अनुष्टुत्तम् ॥ पदे पदे निधानानि, योजने रसकुंपिका ॥ जाग्य १ सात मासा सुवर्ण श्रापी.. Jain Educatiernational For Personal and Private Use Only न० १ १७ jainelibrary.org Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | ई.ना न पश्यं ते, बदरत्ना वसुंधरा ॥१॥ लावार्थः-पगले पगले निधान एटले धनना नं। माराने अने योजने योजने रसकुंपिका प्रत्ये, नाग्यहिन पुरुषो नश्री जोई शकता; परंतु * पृथ्वी तो बहु रत्नवाली बे.॥१॥ एह की अह निशि तुमे रे सु०, शू राखो गे रोश ॥ पू० ॥ राजाथी मवर धरे रे सु०, रांकने पीमतो सोश ॥५०॥॥ नांखी पिण लागे नहीरे है। सुरु, सूरज साहमी खेह ॥ पू॥ स्वान अमर्ष थकी नसे रे सुण, पिण गज सम किम तेह ॥पू०॥णा मृग मृगपति तुलना करे रे सुण, गुंजा कनकथी जेम ॥पू०॥ नत्पल खंग ४ मणि रत्नश्री रे सु०, उर्जन सहान तेम ॥पू०॥१०॥ नवलख ताराथी नही रे सु०, तेज प्र * काश पमूर । पू०॥ करे नद्योत अवनी तले रे सु, अंबर उग्यो सूर ॥ पू० ॥ ११ ॥ अवगु । राने आदर नही रे सु०, गुणवंतो पूजाय ॥ पू०॥ गुणवंता पंकज प्रते रे सु०, मस्तके राखे राय ॥ ५० ॥ १२ ॥ साहसिक गुणे एकलो रे. सु, रखवाले वन सिंह ॥ पू० ॥ शेषनाग पि Vण सत्वधी रे सु०, धारे धरा निरबीह ॥३०॥ १३ ॥ मन्चरथी दुःख पामीए रे सुष, म | [ चर कलह नंमार ॥ पू०॥मबर नरकनुं बार| रे सु०, मछरे नदी नव पार ॥पू०॥१४॥ रुक्षचार्य तणी परे रे सु, मत्ररथी उख दंद ॥ पू०॥ ढाल पंदरमी एथई रे सु, जिन कहे त हे वचन अमंद ॥ पू० ॥१५॥ Jain Educationa international For Personal and Private Use Only Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - S - - A धन्ना ॥ दोहा.॥ पंचाचार विचारधर, परिवृत बहु परिवार ॥ क्रिया कुशल विद्या बदल, रुज्ञचार्य गुणधार ॥१॥ चार साधु ते गबमें, सुविवेकी सुविख्यात ॥ दानादिक जिन धर्ममें, शोलनीक साहात ॥॥बंधुदत्त मुनिवर प्रथम, ज्ञानतणो नंमार ॥ षटदर्शनना शास्त्रनो, जाणे सकल विचार ॥३॥ वादलब्धियी विधिध परे, जीत्या तार्किक जोर ॥ जितकाशी जिनशासने, बिरुद वहे कवि मोर ॥॥ प्रनाकराख्य बीजो जलो, तपसी में शि सरदार ॥ मासखमणने पारणे, अविछिन्न व्यवहार ॥ ५॥ कनकावली रत्नावली, वजावली विचित्र ॥ सिंहनीकीमित तप प्रमुख, आराधे सुप्रवित्र ॥६॥त्रीजो सोमिल नाम मुनि, निमित्तशास्त्रनो जाण ॥ कालत्रय वेत्ता निपुण, श्रुतज्ञानी सुप्रमाण ॥ ७॥ कालिक नामे | मुनिवरू, क्रियापात्र शुचि गात्र ॥ चोथो चिहुं गति टालवा, पाले प्रवचन मात ॥७॥ चारे साधु शिरोमणी, रत्नत्रय नंमार ॥ पंचाश्रव दूरे करे, निर्मम निरहंकार ॥॥ गुण देखीने ? | जन सकल, करे सेवा सतकार ॥ मान दान मुनिवर प्रते, साधे विविध प्रकार ॥१०॥ ॥ ढाल १६ मी. ॥ (श्री जिनशासन जग जयकारी.-ए देशी.) ___ रूशचार्य तो मुनिवर पूजा, देखीने बुख पावे रे ॥ महरथी मन एम विचारे, ए में हमें शो गुण नावे रे ॥ अणिख तजो रे, अशीख तजो रे ॥ अणिख की दुःख सहीए रे । NSASSISTANTRASROS JainEducaticl: mational For Personal and Private Use Only Alinelibrary.org Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ पापस्थानक ए दुःखदाता, ते साचो सद्दहीए रे । लिख तजो रे, प्रणीख तजोरे ॥' १ ॥ ए की ॥ दूं आचार्य सकल गुण दरीयो, विद्यामृतथी नरीयो रे || पंचाचारादिक अनुसरीयो, तप जप संयम वरीयो रे । प्रणिख० ॥ २ ॥ मुज मूकीने एहने बहु जन, बहु | मानादिक प्रापे रे ॥ यश विस्तार करे सवि श्रह निशि, गुणमंदिर करी थापे रे ॥ ० ॥ ३ ॥ वो मर ग्रह निशि राखे, जन आगे पिल जांखे रे || गुण लेवे नहि विद्यादिकनो, तेहने तृरा सम दाखे रे ॥ ० ॥ ४ ॥ एदवे कुसुमपुरे परवादी, पटशास्त्री मद जरीयो रे ॥ पटदर्शनना वादने जीते, बात्र थकी परवरीयो रे ॥ ० ॥ ५ ॥ जीतकाशी थई जैनजतीने, निंदे मवर मातो रे || टींटोमी परे मन मद राखे, शिवमतथी प्रति रातो रे ॥ ० ॥ ६ ॥ कुसुमपुरेश्री संघे मिलीने, साधु वे शीघ्र पठाया रे || रुझचार्य समीपे ते पिण, विहार करता या रे ॥ ० ॥ ७ ॥ वात करी श्राचारज आगें, जो वादी जीताये रे ॥ तो जिनशासन के नन्नत्ति, अधिकी सहमें याये रे ॥ श्र० ॥ ८ ॥ सांजली रुाचारज तिलि दिशे, aaar की प्रयागो रे ॥ दीन शुकनथी विलंब विचारे, बहुश्रुत दोवे शालो रे ॥ || || बंधुदत्त निज साधुने प्रेषे, ते वादी जीतेवा रे || सूरज आगें तेज न सोदे, ११ मोकले. Jain Education national G For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ न०१ धन्ना० जो कीजे लख दीवारे॥॥१०॥ तिम ते सूर्य समोवम मुनिवर, पाटलीपुत्र आवे रे॥ राजसनामां वादस्थलथी, परवादीने दरावे रे । अ०॥११॥ सौगत मतवासी ते वादी, शक्षण क्षयता मत थापेरे॥ स्यादवादयी सुपरे तेहने, नत्तर नत्तम आपे रे । अ० ॥१२॥ समजावे तस न्याय निपुणधी, कुमति कदाग्रह बंदो रे ॥ शिवमारगने जो तुमे वंगे, तो जिनमतशुं रढ मंमोरे ॥१०॥१३॥ वादी नमीने मुनिवर चरणे, मान तजे तिणि वेला रे॥ जैनतणो जय जय सहू बोले, जैनमती थईनेला रे ॥॥॥१५॥ अनुक्रमे रुक्षचारज चरणे, बंधुदत्त मुनि आवे रे ॥ संघ सकल मिली ते मुनिवरनी, बिरुदावली बोलावे | रे॥०॥१५॥ वादी श्कदली कृपाण तुं साचो, वादी गज शिर सिंह रे ॥ वादि गरुम व गोविंद विषद तुं, वादीश्वर मांही लीह रे । अ०॥१६॥ वादी घूकने नास्कर सरिखो, वा दो कंद कूदालो रे । वादी गोधुम घरट विराजे, वादी जन नेपालो रे ॥०॥ १७ ॥ सरस्वति तुं कंगनरण सोह, जिनशासन शिणगारो रे ॥ सोलमी ढाले जिन श्म नांखे, पुण्ये बिरुद नदारो रे ॥ अ० ॥१७॥ ॥दोहा. ॥ बंदीजनमा मुख यकी, सुणि विरुदावली सार ॥ धमधमीयो रोषे करी, १ मुक्तिना मार्गने. १ केलने कापवा माटे खमग जेवो. ३ घनं. ५ घंटी. CHORSESSEREER gu Jain Educati emnational For Personal and Private Use Only nelibrary.org Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ M रुचार्य तिणिवार ॥१॥ सानाशी ते साधुने, देवी तो रही दूर ॥ पिण मन्चरश्री रूइने, 12 18 कोप चल्यो भरपूर ॥२॥ बंधुदत्त झांखो थयो, देखी गुरु अपमान ॥ संधे पिण प्राचार्य नो, मचर खह्यो असमान ॥३॥ __ ॥ ढाळ १७ मी.॥ (ईमर आंबा आंबली रे, ईमर दामम शख.-ए देशी.) एहवे सांकेतनपत्तने रे, कृपापाल विख्यात ॥ नृप हिंसक ने अति घणोरे, असत्य वचन अवदात ।। नरेसर, पापी मांही प्रधान ॥ नरक तणो ए निदान, नरेसर पापी मांही प्रधान ॥१॥ए आंकणी. ॥ पंचाश्रव पूरा करे रे, मिथ्यात्व श्रुति राग ॥ अश्वमेघ अजमे 2 धनारे, नरमेधादिक याग ॥ न ॥२॥ दान दीये श्वामव प्रते रे, जाणीने गुरु जोग ॥५ तिल तैलादिक नूकन्यका रे, लवणादिक शुन योग ।। न० ॥३॥ जैनतणो क्षेषी घणो रे, की साधूने ये अति उःख ॥ परदेशी राजा परें रे ॥ पापतको करे पोष नि०॥४॥ साकेतनपुर । परग्व्यो रे, नपसर्गे करी साधु ।। नीलाना मुनि मृग कह्या रे, विचरे सदा निराबाध ॥ न०. ॥५॥ रुज्ञचार्ये ते अन्यदा रे, सांजल्यो ते अधिकार ॥ तव सोमिल मुनि बोलियारे, अनुमति द्यो एहसार ॥ न०॥६॥ गुरु आज्ञायी आवीया रे, साकेतनपुर मांदि|गुप्तपणे NEXTER SEARCH Jain Educatolerational For Personal and Private Use Only Painelibrary.org Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ न? ३० धना मंत्री घरे रे, पहोत्या अतिहि नबांहि ॥न॥७॥ पुष्य नक्षत्रे निपाईया रे, नूपे नुवन न | 13/ दार ॥वसवानी वेला नणी रे, पूज्या विप्र तिवार ॥ न०॥७॥ नृपने वसवा मंदिरे रे, जे दिन दाख्यो विप्र ॥ लोमिले मंत्री आगले रे, नथाप्यो ते क्षिप्र ॥न०॥ए॥ यामिनी मध्य समय सही रे, थाशे विद्युत्पात ॥ नृप मंदिर परशे तिणे रे, जोज्यो ते सादात ॥ न०॥ १०॥ मंत्रीये सवि नूपने रे, नांष्यो तेह वृत्तांत ॥ राय कहे मंदिर तजी रे, रहिशु जई एकांत ॥ न ॥११॥ रात्रि समय नृप मंदिरे रे, विद्युत्पात ते थाय ॥ देखी नृप विस्मय र 18 श्रयो रे, प्रणमे मुनिना पाय ॥न ॥१२॥ धर्मोपदेश देई करी रे, कीधो समकितवंत ॥ वामव मान मर्दन कीयोरे, नैमित्त शास्त्रथी तंत ॥न०॥ १३ ॥ बंधुदत्त परें आवीयो रे, k| आमंबरथी पूर ॥ शोना तेहनी सनिली रे, कोप्यो ते रुश्सूर ।। न० ॥१५॥प्रनाकर तप सी नलो रे, कालिक तिम क्रियावंत ॥ देखीने गुण तेहना रे, स्तवना करे सदू संत ॥ न0 ॥१५॥ ते श्लाघा रुझचार्यने रे, सांजलतां न सुदाय ॥ तिणे करीने चारे मुनि रे, शिथि- 2 लाचारी ते थाय ॥ न० ॥१६॥ गह शिथिल गुणथी थयो रे, व्यवहारे पिण हीण ॥ सरो-5 वर पिण फाटे सदा रे, पाल होवे जो खीण ॥ न०॥१७॥यतः॥अनुष्टुब्वृत्तम् ॥राधि मिणो धर्मिष्ठाः, पापे पापाः समे समाः॥राजान मनुवर्तते, यथा राजास्तथा प्रजाः॥१॥ ३ Jain Education national For Personal and Private Use Only W anelibrary.org Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नावार्थ:-धर्मि राजा बते प्रजा पण मिष्ट श्राय; पापी राजा बते पापी; सम बते सम; ए. रीते प्रजा राजाने अनुसरीने चाले . माटे जेवो राजा तेवी प्रजा.॥१॥ गुण न गमेत स कोयनों रे, आप मुरारी थाय ॥ तिणे करी रूझचार्यनो रे, पापे पिंम नराय ॥न०॥ १०॥ किल्विष ध्यानथकी मरी रे, थयो किल्विष सूर तेह ॥ पापे करी सुरलोकमें रे, पे- सी न शके जेह ॥ न० ॥ १५ ॥ तिहाथी चवि ब्राह्मण कुले रे, होशे मूक दरिद ॥ रोगाक्रां त पुःखी घणो रे, व्यसनादिक शत दिन ॥२०॥नव पूरण करीने पळे रे, नमशे नवजल मांय । कर्म दय करशे यदा रे, तव लहेशे सुख गय ।। न०॥ १॥ चारित्रियो ? ॐ सूधो हतो रे, ज्ञान क्रिया पिण सार ॥ ते मुनिवर मचर की रे, पाम्यो फुःख संसार ॥ न०॥॥ते माटे तुमे चित्तथी रे, महर टालो हेव ॥ ए लघु बंधव तुम तणो रे, एहनीले करज्यो सेव ॥ न ॥ २३॥ लघु तो पिण गुरु गुण थको रे, गुरु करी जाणे संत ॥ श्मस मजावे पुत्रन रे, सुपरें तात अत्यंत ॥ न० ॥॥ यतः॥ शार्दूलविक्रीमितवृत्तम्. ॥ हस्ति । स्थूल तरःसचांकुशवशः किं दस्तिमात्रांकुशः, दीपे प्रज्वलिते प्रणश्यति तमः किं दीपमात्रं तमः॥ वजेनिहताः पतंति गिरयः किं वजमात्रोंगिरिः, तेजो यस्य विराजते सबलवान ली स्थूलेषुकः प्रत्ययः॥२॥नावार्थ:-हाथी घणो जामो , तेम बतां पण ते अंकूशने वश Jain Education r ational For Personal and Private Use Only I Minelibrary.org Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना ३१ होय , माटे अहाथी जेटदै अंकूश ने ? दीवो अजवाले उते अंधारु नाश पामे , त्यारे न? शं दीवा जेटलुं अंधारु में ? वजवके करीने हणाएला एवा पर्वतो पो , त्यारे अ॒ वज जेटलो गिरि ने ? ना नही. जेनामां विशेष सामर्थ्य होय, तेज बलवान गणाय ; माटे महो। टापणानो शो विश्वास राखवो ॥शा दान कल्पद्रुम रासनो रे, प्रथम श्रयो कल्हास ।। धकुमर पुण्ये करी रें; सहेशे सील विसास माश्या पंतिमाही मनोमणी रे, हितविज य बुधराय ।। सत्तर ढालेधी रच्यो रे, जिनविजये सुखदाय ।। नरेसर० ॥१६॥ इति श्री घनशालिनचरित्रेप्राकृतप्रबंधेदानकल्पद्रुमाख्येप्रथमशाखारूपचनशाह पुण्यवर्णनीयप्रथमौल्हासः समाप्तम् ॥१॥ अस्मिनोल्हासे दाल ॥१७॥ For Personal and Private Use Only Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ उल्लास २ जो.॥ ___॥ दोहा.॥ सकल समीहित पूरवा, समरथ जिन चोवीश ॥ तिम शारद सदगुरु || प्रते, प्रणमुं विश्वावीश ॥ १॥ दान कल्पद्रुम रासनो, अथ बीजो नल्हास ॥ वर्णवशुं श्रुत 8 शास्त्रथी, सुणो सकल सुविलास ॥२॥अग्रज धनकुमर तणा, त्रिण्ये ते नितमेव ॥ तात | तणा अपरोधथी, करे धनानी सेव ॥३॥ोजाई जगते करी, धरे सदा शिर आण ॥ स । यण सकल जी जी करे, नाग्यबले सुंप्रमाण ॥४॥स्वजनादिक पोखे सदा, दिये बंधवने | | मान ॥ मात तात सेवा करे, धन्नो बुद्धि निधान ॥५॥ ॥ ढाल १ ली.॥ (दील लाग्यो रे वरणी.-ए देशी.) पश्गणपुर पासे एक दिवसे, जलनिधि जलने पूरे ॥ तुमे देखो रे पुण्य कमाणी, जे । जगमांदे गवाणी ॥तुमे०॥ प्रवहण पाव्या पवने प्रेस्यां, देखे सहु कोई दूरे ॥तु०॥१॥ए । कणी. ॥ ते प्रवहणनो पति परलोके, पहोत्यो जलनिधि माहे ॥ तु०॥ तव निर्यामिके ते प्रवहणने, प्राण्यां तेथी उडांदे ॥तु०॥२॥ ताम सियांत्रिक मिलि सवि नृपने, नेट धरी. ने मलीया ॥तु॥ नृप सत्कार लहीने ते पिण, अति नत्कर्षे नलीया ॥तु०॥३॥ नौकाप. १ खारुआ. २ खास्वा. ३ ते वहालनो धणी.. Jan Education Intemational For Personal and Private Use Only Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्नाण ३२ Jain Education ति जलनिधिमें सांप्रति, यमपूरे पहोत्यो स्वामी ॥ तु०॥ ते माटे ए 'पोत संजाली, लीजे शिर नामी ॥ ० ॥ ४ ॥ वात सुणीने नरपति ततक्षण, प्रमुदित मनमें थावे ॥ तु ॥ यांत्रिक सन्मान हीने, निज निज थानक जावे ॥ तु ॥ ५ ॥ श्यानपात्र गोदावरी महे, वाहणे वारू ॥ तु० ॥ नागर नांखीने जलकंठे, ठेले केइक तारू ॥ तु० ॥ ६ ॥ मादिकलां तारयां, प्रवदाथी तेली वेला ॥ तु० ॥ लवण जरया तिहां कलश अनोपम, दीवा ते समेला ॥ तु० ॥ ७ ॥ लवण कुंन देखी नृप चिंते, परदेशे हशे मघो ॥ तु० ॥ ते माटे ए प्रवहण मांही, पुस्यो बे लेइ सोंघो || तु० ॥ ८ ॥ राजा तत्र व्यवहारी सघला, तेमीने ईम जाखे ॥ तु० || लेई ५ क्रियाकने धन प्रापो, अमचे एकुण राखे ॥ तु ॥ ए ॥ ते व्यवहारी समग्र मिल्या जिदां, धन्नो पिस तिहां प्रावे ॥ तु० ॥ लवणादिक कि रियाणां निरखे, ते पिएस सरल स्वभावे || तु ॥ १० ॥ मृगमद प्रमुख समस्त क्रियाणक, वर्हेचीने ते लेवे ॥ तु० ॥ बालक जाली लवण कलश ते, धन्नाने सवि देवे ॥ तु० ॥ ११ ॥ बुकी सवितेने, नृपमाने करी लीधा ॥ तु० ॥ तेजमतूरीना जालीने, तात प्रते जई दीघा ॥ तु ॥ १२ ॥ ताम्र धमीने प्रतिदिन धन्नो, तेजमतूरी महेले ॥ तु ॥ कंचन१, बहाए मां रहेलो माल. २ वहाण. ३ गोदावरीनदीमां. ४ वासलो. ५ करियालां. ६ कस्तूरी. ७ तांबू. mational For Personal and Private Use Only २० २ ३१ Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education नी निष्पत्ति अनोपम, थाये अमिय ते शहेले ॥ तु ॥ १३ ॥ इरख्यो तात स्वजन सवि दरख्यां, बुद्धि निधान ते जाणी || तु ॥ ढाल प्रथम ए बीजे नव्हासे, बुध ''जिनविजये' | | वखा ॥ तुमे ॥ १४ ॥ ॥ दोहा ॥ भूपे जाग्याधिक लदी, धन्नाने तिला ताल ॥ नगरशेठ पदवी दिये, जाणि बुद्धि विशाल ॥ १ ॥ सामंतादिक सचिव सवि, आपे प्रति सन्मान | नगर लोक जी - जी करे, नूप दिये बहुमान ॥ २ ॥ एक दिवस दरबारथी, हय ऊपर सवार ॥ परिवृत बहु परिवारशुं आवे निज आगार || ३ || नाटक विविध प्रकारनां, आागल हय गय थाट ॥ बंदीजन बोले बिरुद, याचक जोजक जाट ॥ ४ ॥ अतुल श६ि देखी अवल, हरख्या मात ने तात || पिा त्रिएये कांखा थया, धन्नाना अग्रजात ॥ ५ ॥ ॥ ढाल २ जी. ॥ ( सनेहीं वहाला, लाग्यो नेह निवाहो. - ए देशी. ) हवे धनदत्तादि विचारे, धन्नकुमरथी रोश वधारे रे ॥ सनेही प्यारे, ए दुःख केम खमीजे ॥ कहो केदने नलंजो दीजे रे, स० ॥ ए अनुज थयो अधिकारी, एणे श्रधमनी संग ति धारी रे ॥ स० ॥ १ ॥ एतो कूल कपट बहु राखे, तिथे सहु को रूको जाखे रे ॥ स० ॥ एले कूरु करी धन मेल्यो, जिहां तिहांथो कीधो जेलो रे ॥ स० ॥ २ ॥ जोयो सार्थपने बल დ pational For Personal and Private Use Only w.jainelibrary.org Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० कीधो, तिहांथी एणे धन बहु लीधो रे ॥स०॥ वली होमे घेटो लमायो, तिहाथी पिण स! ३३ । बलो फाव्यो रे ॥स०॥ ३ ॥ देखो कृपणनी खाट ते लोधी, मनमें तस सूग न कीधी रे॥ स०॥तिम लवण कलशमें खाट्यो, एणे लोने लक्षण दाट्यो रे ॥स०॥॥ मात तात नो त जाई साथे, धन देई करयां सह हाथे रे ॥स०॥ एह आपणने न बोलावे, अम दरशन पिण न सुहावे रे ॥ स०॥५॥ एद आपणथी रहे अलगो, तो किम जाईजे विलग्यो रे ॥ स०॥ सही एहमें तो स्नेह न कांई, एह तो नामथी कहीए नाईरे ॥स ॥६॥ हवे एहने तो सही हणीए, ईहां पापने दोष न गणीए रे ॥ स॥ विष शस्त्रादिक कोई कीजे, एहने १५-5 चत्व पद दीजे रे ॥ स०॥७॥ उल जोता रहे त्रिण्ये नाई, ते जाणे सकल नोजाई रे॥ स०॥ लवलेश देवरने दाखे, तेह गुह्य धन्नो चित्त राखे रे॥ साायतः।। वंशस्थवृत्तम्॥ नदीरितोर्थः पशुनापि गृह्यते, हयाश्च नागाश्च वहंति नोदिताः॥ अनुक्तमप्युदति पंहितो जर नः, परेंगित ज्ञानफला हि बुझ्यः॥१॥नावार्थः-कहेलो अर्थ तो, पशु पण जाणी शके 3/; घोमा अने हाथीन तेनने हांकीए तो, ते पण चाले बे; परंतु पंमित पुरुष तो वगर कहे-15 ॐ बुं पण तर्कथी जाणी जाय . माटे परना मनमा रहेली वातने जाणनारी ज्ञानरूप बुद्धि १ मरण. *ॐॐॐॐ Jain Education national * For Personal and Private Use Only Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यो ने. अर्थात् बुध्थिी परना मनमा रहेलो वात जाणी शकायचे.॥१॥ चित्तमें हवे धनो विचारे, कहे कलह ते कोण वधारे रे ॥ स०॥ जिहां बंधव चित्त दुःख पावे, तेह शं कीजे वमदावे रे । स०॥ए॥ चित्त नाग्यां साजां नवि थाये, सहु शास्त्रे पिण कहेवाये । रे॥स ॥ नत्तम नर तेहज जाणे, तव विचरे समय प्रमाणे रे ।। स० ॥१०॥ यतः॥ न पजातिवृत्तम् ॥नमा हि शाखा न विलंबनीया, नमेषु चित्तेषु कुत्तः प्रपंचः ॥ गंतव्यमन्यत्र विचरणेन, पूर्णा मही सुंदरी सुंदरेति ॥ ॥नावार्थ:-जे वृदनी शाखा नागी गई हो। य अने जेनी मालियो नागेलो होय, त्यां प्राश्रय शो करवो? मन जूदां थयां, त्यां प्रपंच शो करवो? अर्थात् कांश पण न करवू. एवे समये तो माह्या पुरुषे बीजे ठेकाणे जवं. कारण के, पृथ्वी विशाल पमी डे अने मनोहर स्त्री जेवी ने.॥२॥ देशाटनं पंमित मित्रता च, वारांगना राजसन्ना प्रवेशः ॥ अनेक शास्त्रानि विलोक्यतानि, चातूर्य मूलानि नवंति पं. च ॥३॥ लावार्थः-देशाटन करवू, पंमितनी मित्राई करवी, गणिकानी धन हरण करवा || नी चतुराई जाणवी, राज्यसनामा प्रवेश करवो अने अनेक शास्त्रो, अवलोकन करवू, ए है पांच कारण चतुराईनां मूल . ॥ ३ ॥ तेहनणी परदेशे जईए, निज नाग्य परीक्षा करिये । रे ॥ स॥नुजबल परतद करीजे, तिम नव नव देश देखीजे रे ॥ स ॥ ११ ॥ रखे। SSORSR4545 Jain Education national For Personal and Private Use Only w w.jainelibrary.org Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ घना० दुःख एहने कोई आये, मुजयी अप्रीति जणाये रे ॥स०॥ईम चिंती यो सावधान, 'म३०ध्य सत्रे कीध प्रयाण रे ॥ स०॥१२॥ शुकन सबल तव श्रावे, मालव नणी सिदिसोहावे रे॥ स०॥ कौतुक कीमा बहू करतो, मनमाहे उमेद धरतो रे ॥स०॥ १३॥ मध्यान स-4 लमय जव थाये, तव पंथनो खेद जणाये रे ॥ स०॥ तिहां खेत्र खेतो हाली, एक दीगे नयम निहालो रे ॥ स०॥१४॥ तरु शीतल गया देखी, तिहां बेगे पंथ नवेखी रे॥ स०। ढाल बीजे नल्हासे ए बीजी, कही जिनविजये मन रीको रे ॥ स० ॥१५॥ 8 ॥दोहा. ॥ हालिक धन्नाने निरखि, विकसित वदन सुबोल ॥ नोजन आणे नक्ति थी, झाल दाल घृत गोल ॥१॥ धन्नो कहे नपक्रम विना, न करूं नोजन लिगार ॥ मृगप ति परे निज नपक्रमे, सवि राखं विवहार ॥शाते माटे तुम हलतणां, एक बे वालुं चास ॥ पनि तुम आग्रहश्री सही, करशुंनोजन खास ॥३॥ श्म कही हल खेड्यो तुरत, धन्न । कुमर ग्रही राश ॥ प्रगट्यो ततकण देखते, नूमियी निधि सुप्रकाश ॥४॥हाली कहे तुम नाग्यथी, प्रगट्यो एह निधान ॥ धनो कहे हालिक प्रते, ए तुम पुण्य प्रमाण ॥ ए॥ नप 5 कति करी नोजन कस्यां, श्रम टाली तिण गंहि ॥ कार्षिकशं मैत्री करी, गमन करे - १ हालीथी. ३३. Jain Educationalaelational For Personal and Private Use Only TA.jainelibrary.org Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बांहि ॥६॥ कृषि जाई निज नृप प्रते, सकल कह्यो अवदात ॥ दमापति पण प्रमुदित जणे, धनकुमर शुन्न जात ॥ ७ ॥ जो धन धन्ने तुम प्रते, दीधो ए असमान ॥ तो में पिण सबखो तने. नोगवोनोग प्रधान ॥॥ तव हालिक हर्षित थई, निधि प्रगट्यो जिण गमला ॥ वाशं तिण थानके नलं. धनपुर नामे गाम ||ए। नत्तम नर आव्या थकी. पामीशविले. विशाल ॥ दाली वे ततस अयो, ग्राम तणों नूपाल ॥ १०॥ यतः ॥ आर्यावृत्तम्. ॥ नत्त । म जण संसग्गी, सीलदरिईपि कुण सीलहूं ॥जह मेरुगिरिवि लग्गं, तिणमवि कणगत्त | णमुवेई ॥१॥नावार्थः-जेम मेरुगिरिने लागेलां तृणां पण सुवर्णपणाने पामे , तेम नत्तम जननो संसर्ग पण शील रहित पुरुषने शीलयुक्त करे . ॥१॥ ॥ ढाल ३ जी. ॥ (प्रवहण तिहाथो पूरीयां रे लाल.-ए देशी.) । हवे धनकुमर तिहां थकी रे लाल, पंथे चाल्यो जाय रे ॥ सुगुण नर ॥ जोवे देश | विदेशनां रे लाल, कौतुक अति सुखदाय रे ॥ सुगुण नर, पुण्ये मनवंबित मिले रे लाल ॥ 18 ॥ए आंकणी. ॥ पुण्ये सयल संयोग रे॥ सुणा पुण्ये सुर सानिध्य करे रे लाल, पुण्ये वरित लोग रे ॥सु॥पु०॥॥ तिहां कणे वन देखे जला रे लाल, वृक्षतणां तिहां लाख रे ट्र सु॥ आंबा जांबू करममा रे लाल, दामिम सूफने शख रे ।। सु०॥ पु० ॥ ३ ॥ ताल त है Jain Education L ational For Personal and Private Use Only Wanelibrary.org Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ना माल राजादनी रे लाल, व पीपलने निंब रे ॥सु ॥ धवखरादि हरीतकी रे लाल, चंदन । अगर कदंब रे ।। सु०॥ पु०॥४॥ सोपारी श्रीफल घणां रे लाल, ताम अशोक अखोकरे 5 ॥ सु॥ नार अढार तणा तिहां रे लाल, सोहे वृक्ष सजोम रे ॥ सु०॥ पु॥ ५ ॥ जाई से जूई केवमा रे लाल, महेके केतकी फूल रे ॥ सु० ।। बोलसिरी वालोवली रे लाल, सेवंत्री है जासूल रे ॥ सुणापु०॥६॥ ममरो मरून मोगरो रे लाल, कणयर करेणा खास रे॥सु०॥ पुन्नाग नाग अंकोलनां रे लाल, मालती प्रमुख सुवास रे॥ सु० ॥पु०॥ ७॥ गिरि महोटा । तिहां अति घणा रे लाल, नूकामिनी कूच जेम रे ॥ सु० ॥ शिखर सोहे तस नपरे रे लाल, कंचुपरे अति तेम रे ॥ सु॥ पु०॥७॥ स्तनधारा परे नीसरी रे लाल, तटणी तोय नदार रे ॥ सु ॥ जाणे मुगताफल तणा रे लाल, जूनामिनी नर हार रे ॥ सुणापुणा ॥ पंखी जलक्रीमा करे रे लाल, मोर चकोर मराल रे ॥ सु०॥ चकवा चकवी कपोतनां रे । लाल, बकनी पंक्ति विशाल रे । सु०॥पु० ॥१०॥ नपकंठे मुनि आश्रया रे लाल, नमवले हा एकत्र रे ॥सु०॥ तपसी तप विधि साचवे रे लाल, असन करे फल पत्र रे ॥सु०॥पु०॥११॥ सबर तणां स्थानक घणां रे लाल, पुलिंद प्रमुख केई पद रे ॥ सु॥ नर रूपे पशु सारिखा रे लाल, शाखा मृग प्रत्यक्ष रे । सु०॥ पु०॥१२॥ गज टोलां वनमें नलां रे लाल, न Jain Education national For Personal and Private Use Only M w.jainelibrary.org Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ न्मूले केई वृक्ष रे॥सु०॥ वानर यूय विशेषयी रे लाल, महिष तणां तिहां लक्ष रे ॥सु०॥ 15 पु॥१३॥ मृग चित्रक शावर ससा रे लाल, व्याघ्र विशेषनो वासरे । स०॥ मृगपति । तिहां संचरे रे लाल.करता कल अभ्यास रे॥स०प०१४॥ इत्यादिक जोतो श्रहै को रे लाल, कौतुक विविध प्रकार रे ।। सु० ॥ अनुक्रमे मालव देशमां रे लाल, आव्यो पु। एयप्राग्नार रे॥ सु०॥पु०॥१५॥ तटनी तीरे अन्यदा रे लाल, करी वेलुक संधार रे ॥सु०॥ शयन करे धन्नो तिहां रे लाल, ध्यान धरी नवकार रे॥ सु०॥पुण॥ १६ ॥ निर्जयश्री निश करे रे लाल, साहसिकमें शिरदार रे ॥ सु०॥ बीजे नल्हासे जिन कहे रे लाल, ढाल त्री-8 जी मनुहार रे ।। सु ॥ पु०॥ १७ ॥ ॥ दोहा. ॥ एडवे श्यामिनीए तिहां, याम रही जव शेष ॥ शिवा शब्द तिहां सांमजल्यो, चमक्यो चित्त विशेष ॥१॥शकन शास्त्र अनुसारथी, करे निश्चय चित्त मांहि॥ रात्रि शिवा पुरगा दिवस, शब्द ते निष्फल नाहि ॥ २॥ वसंतराज्य ग्रंथादिके, शुकन त। यो अधिकार ॥ ते आलोचे चित्तमें, शुनपरे धनकुमार ॥ ३ ॥ शिवा कहे शब पासथी, 5 धन ग्रहीने दृढ चित्त ॥ अमने लक्षण जे दीये, ते नर अति सुपवित्र ॥४॥ निश्चय करी १ रात्रिये. शियालणी. ३ कोयल. ४ मडउ. Jain Education Trational For Personal and Private Use Only Kaw.jainelibrary.org Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धना० निमित्तनो, शिवा शब्द अनुसार ॥ तटनी तीरे ततक्षणे, चाल्यो धनकुमार ॥ ५॥ शबन ३६ 8 दीगे एक आवतो, नीर पूरेथी जाम ॥ धन्ने ग्रही शब निरखते, रत्नराशि लही ताम ॥६॥ रत्न ग्रह्यां शब काढिने, दीघो जंबूक नद । देखो नैमित शास्त्रनां, पाम्यो फल परतक॥ ॥अनुक्रमे नवंध्यो तिहां, वंध्याचल नगराज ॥ नऊयनी आव्यो तुरत, साइप्लिकमां है। | शिरताज ॥ ७॥ ॥ ढाल थी. ॥ (चित्रोमा राजा रे.-ए देशी.) उऊयनी निरखे रे, मनमांही परखे रे ॥ शुं दीसे डे रे, सरिखी स्वर्गपुरी समीरे ॥2 १॥ लंका पिण लाजी रे, ईण आगल नांजी रे॥ मनमें नही राजी रे, तव जलमें पमी रे ॥२॥ करी पूरी रे, सुन्नटे करी शरीरे॥कोई वाते न अधूर। रे, सुंदर शोन्नती रे॥ ३॥ चंप्रद्योत राजा रे, जश अधिक दिवाजा रे ॥ वसुधामे ताजा रे, यश ने जेहना रे ॥ ॥ गज रथने घोमा रे, पायक दल जोमा रे ॥ नहि तेहने योमा रे, नृपने पायके रे ॥५॥ Kalशवादेवी राणी रे.सीता सम जागीरे॥पटराणी पाणी रे, नत्तम गुण थक। रे॥६ एक दिन नृप चिंते रे, मन केरी खंते रे ॥ बुध्विंत संकेते रे, मंत्रि न माहरे रे ॥७॥ १ पर्वत Jan Education 12 lational For Personal and Private Use Only F ullu.sainelibrary.org Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तेहनणी निरधारी रे, करी परिक्षा सारी रे ॥ मतिवंत विचारी रे, कीजे मंत्री रे ॥७॥ पाहो वजमावे रे, नृप निज मन नावे रे ॥ करे अति वदावे रे, ए नदघोषणा रे ॥ ॥ | सरोवर लाखेटे रे, जे ले अति लेटे रे ॥ ते थंनने वींटे रे, बेगे पालथी रे ॥ १० ॥ नृप त - दस धन प्रापे रे, मंत्री पद थापे रे ॥ यश तेहनो व्यापे रे, बुबिले नलो रे ॥११॥ सुण्यो । धनकुमारे रे, मनमें तव धारे रे ॥ एह वात विचारे रे, विलंब न कीजीए रे ॥१२॥ पम-IA दो नवि आवे रे, सर कंठे सोहावे रे । अति हर्ष न मावे रे, नृपने निरखतां रे ॥ १३॥ ए-18 क दोरी ते लीधी रे, रतरु मूलमें सीधी रे ॥ यतने करी बांधी रे, धुसर पाउल फिस्यो रे॥ १५ ॥ रझुथी वीटाणो रे, देखी तव राणो रे ॥ बुध्विंत वखाण्यो रे, थाप्यो मंत्रवो रे ॥१५ ॥ पुरजन सहु हरख्यां रे, सुणी बुद्धि परिकारे ॥ तस पुण्य आकर्यो रे, सवि भावी नमे १ सरोवरनी वच्चे. २ ते तलावनी पाले बेसीने तलावनी वचमा रहेला थनने बांधे. ३ तलाव. नी पाले एक वृदना मूले दोरमानो डेमो बांध्यो. ४पी बीजो बेमोलेश्ने तलावनी एक कोरथी चौफेर फरी यावी, प्रथम वृदना मले बांधेला दोरमाना बेमा साथे, या मानी आंटी देने प्रथम चाल्यो हतो, ते तरफ चाल्यो, प्रथम बेमो बांध्यो हतो, तेनी सन्मुख पाले जश्ने मो खेंच्यो एटने स्थिंने गांठ जा पहोती, एटले पागे तेज मार्गे वली आव्यो, पनी ये मानेगा हाथमा लेश धनकुमर 19 बेगे सारे राजाए जाण्यु के, आ बुद्धिवंत ने. 35S-SSSGE १० Jan Education Intional For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धनTo ३७ | |रे ॥ १६ ॥ पुरजन प्रते पोखे रे, नृपने संतोखे रे ॥ कोई बुद्धि विशेषे रे, सुपरे जाग्यथी रे ॥ १७ ॥ यतः ॥ मालिनीवृत्तम् ॥ नरपति हितकर्त्ता द्वेषतांयाति लोके, जनपद हितकर्त्ता त्यज्यते पार्थिवेन ॥ इति महति विरोधे वर्त्तमाने समाने, नृपति जनपदानां दुर्जनः कार्य| कर्त्ता ॥ १ ॥ जावार्थ:- राजानुं सारुं करनार माणसना उपर लोको द्वेष राखे बे, देशनुं सा रुं करनार पुरुष, राजावने त्याग कराय बे; एवो महोटो ने सरखो विरोध वर्त्तते ते, राजानुं अने देशनुं जलुं करनार तो उर्लनज मली आवे बे. ॥ १ ॥ नृप दत्त आवासे रे, र| देतां सुखवासे रे ॥ जुए मनने उल्लासे रे, पुर शोना जली रे ॥ १८ ॥ कल्पद्रुम रासे रे, जिन कहे सुविलासे रे || एह बीजे नव्हासे रे, ढाल चोथी सदी रे ॥ १८ ॥ ॥ दोहा ॥ दीवा दूरथी आवतां, १पांशु विलिप्त शरीर ॥ मलिन वसन शत खं तस, मात पिता तिम वीर ॥ १ ॥ कांति दिए कुत्सितपणे, जन जांग ग्रही हाथ ॥ दीन | खीण दीवी तिहां, जोजाई पिए साथ || २ || देखी चिंते धन्नकुमर, विस्मयश्री चित्तमांदि ॥ मात पितादिक मादरा, किम आवे ईरा गहिं ॥ ३ ॥ श६ि घणी के तस घरे, पुण्यथकी सुविलीन | ते किम संभविये इहां, एदतो दीसे दीन ॥ ४ ॥ दीसे वे तेह्र सारिखा, ते पि १ धूल. Jain Educationa International For Personal and Private Use Only ०१ ३७ Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ केम कहा | माहरी माने वांऊली, श्राव्यो इहां ए न्याय ॥ ए ॥ ॥ ढाल ५ मी. ॥ ( चरणाली चामुंमा रण चढे. - ए देशी.) कुमर मन चिंतवे, ए परिजन ईहां केम आवे रे । धन संपद घरमें घी, ए.वि |स्मय बहुलो थावे रे || जुन जुन पुण्य पटंतरो ॥ १ ॥ ए आंकली. ॥ पुण्ये वंबित सीजे रे ॥ पुण्यबले लक्ष्मी मिजे, पुण्ये राजा रीजे रे ॥ जु० ॥ २ ॥ जई जोनं दवे एहने, इम चिंती तिहां श्रावेरे ॥ मात पिताने तुलखी, विनये शीश नमावे रे ॥ जु० ॥ ३ ॥ श्र शुं यूं माततातने, बोले एहवी वाली रे | दरि तली एद सामटी, कीधी केम कमाली ॥ जु० ॥ ४ ॥ तव कड़े तात तनुज सुलो, तुमे चाब्या श्रम मूकी रे ॥ लक्ष्मी तुम साथे चली, सतीय परे नवि चूको रे || जु०||५|| १प्रत्यूषे श्रमे तुम तली खबर करावी श्चावी रे ॥ पि किहांथी परगर्मी, तुमची शुद्धि न पावी रे || जु० ||६|| तुम विरहे अमे आकूलां, थइने रोदन कीजे रे ॥ जोर न चाले कोयश्री, दोष ते केहने दीजे रे ॥ जु० ॥ ७ ॥ नोजाई तुम जक्तिथी, गुणलीली दुःख पावे रे || परिजन पिस मिली सामटा, तुम शुद्धि पू | आवे रे || जु० ॥ ८ ॥ एहवे नृप राणी तणो, हार दासीये लीधो रे ॥ पछन्नपणे धनदेवने, १ सवारे. २ मोठाम. ३ सारी ४ तमारी खबर न मली.. Jain Educationational For Personal and Private Use Only vjainelibrary.org Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना०वेचवा काजे दीघोरे ॥ जु॥॥ वात गनी ते नाव रदी, राजाये जब जाणी रे ॥ अनु न चर मूकी आपणा, धन लीधो सवि ताणी रे॥जु ॥१०॥ काईक बाकी रह्यो हतो, तेह गया चोर लेई रे । सेवक संबंधी हता, ते पिण ले गया केई रे ॥ जु०॥ ११ ॥जलवटनो 8 * जलवटे गयो, नूमीश्री लेई गया यह रे ॥ नाग्यहीननो ततकणे, फल दागे परतह रे॥ जु॥१२॥ गृहपातन अनले कस्वां, तव रदेवानो नही लागो रे ॥ कुकीसंबल घई नीस है। स्या, जिम शषि नपने वैरागो रे ॥ जु०॥१३॥ यतः॥ दिवस पलट्यो ही बुरो, जागि श ४ के तो जाग ॥ पाणी नपर पवर तरे, सोने सलगी आग ॥१॥ फिरता देश विदेशमें, नद | 19 रनो तरण वहंता रे ॥ शीत तापादिक अति घणा, ते पिण सकल सहता रे ॥ जु० ॥१४॥ यहां आव्या तुमने मिल्या, दवे अम सहु कुःख नाग्यां रे ॥ कुलदीपक तुम पेखतां, सुकृत है। तणा दिन जाग्या रे ॥ जु० ॥१५॥ नाई पिण भावी मिल्या, कपटथी हेत नपाई रे॥ अधिक आनंद श्रको तिहां, आवी मिली नोजाई रे ॥ जु० ॥१६॥ सयल सयण हुआ साम 18टा, धनो मन सुख पावे रे ॥ बीजे नल्हासे पांचमी, जिन मन रंगे गावे रे ॥ जु॥१७॥ - ॥दोहा. ॥ धन्नाशाहे नेहज धरी, तात प्रमुख तिणिवार ॥ गुप्तपणेथी लेश्ने, आ १ अग्नि थवाथी घर बनी गया. Jain Educational international For Personal and Private Use Only Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ % RASIC %2595 एया निज आगार ॥१॥ स्नान करावी शुचि कस्वा, पहिराव्या शुल वेश ॥ वस्त्रानरणा दिक थकी, संतोषा सुविशेष ॥२॥ वसवाने आवास अति, सुंदर दोधा तास ॥ पितृ ब्रातृ परिवार सवि, सुखी थया सविलास ॥३॥अति तेजस्वी धनकमर. बहिवंत प्रधान ॥ प्र जा सकल जी जी करे, नृप ये अति सनमान ॥४॥असहता ते तेजाति, धनदत्तादिक जात ॥ जिम रवि तेज न सांसहे, कौशिक खेचर व्रात ॥ ५ ॥ पिता प्रते प्रणमी कहे, अहमने धननो नाग ॥ देवरावो दिलमें धरी, जिम रहे वधतो राग ॥६॥ तात कहे रे अति निघृण, हजीय न आवे लाज । इप्सित जोगने नोगवो, कां विसामो काज ॥ ७॥ तुम * गृहथी ए धनकुमर, लाव्यो नहि लिमार ॥ लक्ष्मी एहना नाग्यनी, किम करो होंश ग. ल मार॥5॥ तव त्रिएये त्रटकी कहे, अम गृहनो जे सार ॥ रत्नादिक ते ए सकल, लाव्योत * निरधार ॥ ए ॥ अन्योन्ये पितु पुत्रना, वचन विरोध विशेष ॥ शीख न माने साखिया, लोने ग्रस्त अशेष ॥ १० ॥ पितृ त्रातृ विरतंत सवि, जाण्यो धन्ने जाम ॥ एकांते आवी करी, आलोचे अनिराम ॥ ११ ॥ ॥ढाल ६ ही.॥ (कर्म परीक्षा करण कमर चाल्यो रे.-देशी.) धनकुमर मन धीर धरी तिहां रे, चिंतवे चित्त महार ॥ इहां रहेतां लाइने छःख हुवे । RECE5 * JanEducationaMewational For Personal and Private Use Only Maw.jainelibrary.org Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ३ ॥ रे, मुज हुंती निरधार ॥ धन्नकुमर मन धीर घरी तिदां रे ॥ १ ॥ ए प्रांकली. ॥ श्रई निशा ये की नीसयो रे, साहसिक थइ सुविवेक ॥ स्वरबल साधीने ते संचरे रे, शुकन थया शुभ बेक ॥ ६० ॥ २ ॥ अनुक्रमे कौतुक विधि निहालतो रे, पहोत्यो काशी देश ॥ वाणार शी पुर पासे श्रावीयो रे, जोवे नगर निवेश ॥ घ० || ३ || पार्श्व सुपार्श्व जिणंदना जन्मनो | रे, ए उत्तम अहिाण || देखीने मनमां सुख कपन्यो रे, जन्म थयो सुप्रमाण ॥ ६० ॥ ४ ॥ गंगा तीरे निरमल नीरमां रे, करे जलक्रीमा काम ॥ एहवे श्रावी अंबरथी तिहां रे, गंगादे वी ताम ॥ घ० ॥ ५ ॥ देखी धन्नकुमरना रूपने रे, मोही मनमें अत्यंत ॥ पंच विषय सुख विलसण तेहथी रे, खरी राखे मन खंत ||६० || ६ || वैक्रिय रूप विकूर्वी ने नवो रे, प्रपन्चर सम अदभूत | हाव जाव विक्रम करिने तिहां रे, वचन वदे सदभूत ॥६॥ ७ ॥ स्वामी हुँ तुम सेवक हूं सदा रे, नेहथकी लयलीन || प्रीत बंधाली प्रेम रसे करी रे, जेहवी जलने मीन ||०|| || पंच विषयसुख मुज साधे मुदा रे, जोगवो जाग्य निधान ॥ हूं हूं गंगादेवी गुण जरी रे, जाली यो मुज मान ॥ घ० ॥ ॥ यतः ॥ श्राया श्राश करेय, तास निराश न मूकीए । निपटजना कारेश, निरसुं दीसे नागरा ॥ १ ॥ तुम गुण रूप लावण्य लीलायकी रे, हुं मोदी सुप्रकास ॥ विनती मानी वालेशर माहरा रे, आवो मुज आवास ॥ ६० ॥ १० ॥ For Personal and Private Use Only Jain Educationa International नु० १ ३ Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Pइन्सित सकल पदारथ संपदा रे, परशुं मनने कोम ॥ोजन नगति नली पर साचवी रे, रहेझुंबे कर जोक ॥ध० ॥११॥ तव धनो सुणोने वाणी तदारे, धैर्य धरी निज चित्त ॥ शील सन्नाह सजी सुपरे तिहां रे, बोले वचन पवित्र ॥ध०॥ १२॥ वात कही जे चित्त | चालण नणी रे, ते जागी में मांय ॥ अमे श्रावक व्रतधारी वाणिया रे, पालूं व्रत हित ला य॥१०॥ १३ ॥ परस्त्री संग सदा वरजूं सही रे, परस्त्री संगम पाप ॥ परस्त्री संगमयी । दु:ख पामीये रे, नरक गमननी गप ॥ ॥१४॥रावण लंकाधिप सीताथको रे, बेदा | 8 व्यां दश शीश ॥ पांझव नारीश्री पदमोत्तरे रे, खोई जग सुजगीश ॥ ३०॥ १५ ॥ मणिर || थे जुगबाहु जाता हण्यो रे, मयणरेहाने काज ॥ मुंज मृणाला संगे रोलव्यो रे, इंश्लह्यो । कु:ख साज ॥ध॥१६॥ इत्यादिक बहु परस्त्री संगथी रे, उःख पाम्या इह लोक ॥ परलोके दुःखीया परवश पड्या रे, ते जाणे सहु लोक ॥ध०॥१७॥ नत्तम नर ते परस्त्रीने । गणे रे, माता नगिनी समान ॥शेठ सुदर्शननी परे सुख लहे रे,सुजस वधे असमान ॥ ॥१०॥ यतः॥ अनुष्टुब्वृत्तम् ॥ प्रात्मवत्सर्व नूतेषु, परव्येषु लोष्टुवत् ॥ मातृवत्परदारे-श घु, यःपश्यति स पंमितः॥१॥नावार्थ:-सर्व प्राणी मात्रोने पोताना जेवा; पारका झ्य ने माटी समान; परस्त्रीने माता समान; एवी रीते जे पुरुष जाणे , तेज पुरुष जगत्ने +5% 5 S- Jain Educationalernational For Personal and Private Use Only Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्नाण ४० विषे पंकित बे. ॥ १ ॥ परणी विलसे ते अति सुंदर कह्या रे, पर जोवे ते हीन ॥ वीजे नव्हासे ढाल बही जिने कही रे, शील थकी सुख चीन ॥ ६० ॥ १७‍ ॥ ॥ दोहा ॥ रे जड़े जिनधर्मना, दान शियल तप जाव ॥ तेहमां शील विशेष बे, जवजल तारण नाव ॥ १ ॥ सिंह सर्प गज अनलना, जय सवि शीले जाय || शीले बित सवि फले, शील वको सुखदाय ॥ २ ॥ यतः ॥ शार्दूलविक्री कितवृत्तम्. ॥ तोयत्यनिरपि जत्य दिरपि व्याघ्रोपि सारंगति, व्यालोप्यश्वति पर्वतोप्युपलति वेकोपिपीयूषति ॥ वि नोप्युत्सवति प्रियत्यरिरपि क्रीमातमागत्यपां, नाथोपिस्वगृहत्यटव्यपिनृणांशील प्रजावाद् ध्रुवं ॥ १ ॥ जावार्थः - शीलना प्रभावथी मनुष्यने, अनि जल रूप याय बे; सर्प फूलनी मा ला रूप थाय बे; वाघ दरण रूप थाय बे; पृष्ट गज अश्व रूप याय बे; पर्वत पाषाण जेवो श्राम बे; विष मृत समान थाय बे; विघ्न उत्सव रूप याय बे; शत्रु मित्र रूप थाय बे; समुश् क्रिमा करवाना सरोवर रूप थाय बे; अने अटवी पोताना घर रूप थाय बे. ॥ १ ॥ शीलं प्राणभृतां कुलोदयकरं शीलं वपुर्नृषणं, शीलं शौचकरं विपन्नयहरं दौर्गत्य दुःखापहं ॥ शीलं पुर्नगतादि कंददद्दनं चिंतामणिः प्रार्थितो, व्याघ्रव्याल जलानलादि शमनं स्वर्गापवर्ग प्रदं ॥ २ ॥ नावार्थः - प्रालियोने शील, कुलनो उदय करनाएं, शरीरने भूषण रूप पवित्र Jain Educationational For Personal and Private Use Only न० ‍ ४० w.jainelibrary.org Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education ता करना; विपत्ति अजयने इरना; दुर्गति श्रने दुःखनो नाश करना; दुर्भाग्यादि कंदने दहन करना; प्रार्थना करेल चिंतामणिरत्न सरखं; वाघ, सर्प, जल ने अमिना नप | सर्गने शमन करनारुं; तेमज स्वर्ग अने मोक्ष प्रापनारुं बे ॥ २ ॥ शरीर अनित्य संस. रमें, | रोग शोग जंकार | मल मूत्रादिकथी जरी, अशुचि वहे नित द्वार || ३ || आयु वायु सम अधिर बे, जोग रोग सम जोय ॥ धन मद संध्या रंग सम, सयण सुपन सम होय ॥ ४ ॥ यतः । अनुष्टुवृत्तम् ॥ अनित्यानि शरीराणि, वैजवो नैव शाश्वतः ॥ नित्यं समीहतों मृ त्युः, कर्त्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥ ३ ॥ जावार्थ:- शरीर अनित्य बे; वैजव अशाश्वता वे अने मृत्यु नित पासे श्रावतुं जाय बे; माटे धर्मनो संग्रह करवो. ॥ ३ ॥ तिसरा कारण माता तुमे, म हिमवंत महंत । पुत्र विनती सांजली, घरो धर्म गुणवंत ॥ ५ ॥ ( शिरोहीनो सालू हो के ऊपर योधपुरी. - ए देश . ) ॥ ढालमी. ॥ तव वचन सुणीने हो के, धन्नकुमार तणां ॥ शील रतन यतननां हो के, प्रतिहि सो | हामणां ॥ ते सांजली देवी हो के, गंगा मन हरखी ॥ निज मन नव्हासे दो के, कुमरनुं मुख निरखी ॥ १ ॥ करजोमी बोले हो के कुमर प्रते वाली ॥ तुम हृदयतली में हो के, वात सयल जाली ॥ तूं धर्म धुरंधर हो के, मनुष्यमांदे मोटो || वीजो तुज आागल हो के, ?? mational For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ४१ नर सघलो गेटो ॥ २ ॥ तुमे पर उपगारी हो के, गुरामसिना दरिया || तुमे सहज सुरंगा हो के, संतोष जरिया । सुविवेक विचारी हो के, सारी तुम करली || जिनमत अनुसँग हो के, पुण्यातली जरणी ॥ ३ ॥ तुमे मुजने तारी हो के, वारी हुं रजानं तुमची ॥ सम कित सुरम शिशुं हो के, मति जागी श्रमची ॥ संसार जलधिमें हो के, पतीने राखी ॥ समजावी विगते हो के, मधुर वचन जाखी ॥ ४ ॥ उपकृति हवे तुमची हो के, करण किम याऊँ ॥ तुमे धर्मना धोरी हो के, नाम के जाऊं ॥ इम कहोंने कुमरने हो के, गंगा | देवी तिहां ॥ शुज रयण चिंतामणि हो के, आपे आणि तिहां ॥ ५ ॥ देश रत्न अमूलिक हो के, कुमर प्रते बोले | जिनधर्मने अगल हो के, एद बे कुण तोले ॥ करिने विधि वंदन हो के, देवी गम गई । धन्नकुमरना मननी हो के, चिंतित वात थई ॥ ६ ॥ लेइ रत्नने संगे दों के, रंगे प्रयास करे | अनुक्रमे नू क्रमतो हो के, मगधे पान घरे ॥ अति देश रंगोलो दो के, नीलो उपवनथी ॥ सवि देशमें महोदो हो के, ग्राम नगर पुरथी ॥ ७ ॥ लिए | देश दीपंती हो के, धनगरी मांदि वमी ॥ उपमाने एहने हो के, अवर न कोय जमी ॥ २ तुमारे वारणे जातं ३ तमे मने उपकार कर्यो, ते गुणनशीं १ जिनमत माथे प्रीति बे. गए केम थचं ? Jain Educationational ४ राजगृही नगरी. For Personal and Private Use Only उ०‍ ४१ inelibrary.org Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तोले करी तुलता हो के, सुरपुरी हीण भई ॥ तव ते कारणधी हो के,ळंची स्वर्ग गई ॥॥ लंका पिण लाजी हो के, जलधीमें ऊंपन्नई। अलका तिम सलको हो के, अलगी नास गइ रेसुरलोक समाणी हो के, जे जगमें जाणी॥ परसिह गवाणी हो के, श्नुत्तम नर खाणील ॥ ॥ गढ कोट रंगा हो के, चिंगा कोशीशा ॥ कोग नवरंगा हो के, फलके आरीसा तिहां नाल विराजे हो के, मेघपरे गाजे ॥ जस नाद अवाजे हो के, वैरी दल नाजे॥ १०॥पोल पिण अति पोढी हो के, दोढी अति दीपे ॥ चारार्गल सारी हो के, नारी अरि जीपे॥ चहुटांचोराशी हो के, विविध वाणिज्य तणां ॥ तिहां हाट वखारे हो के, कीरियाणां रेघणां ॥११॥ वसे वरण अढारे हो के, ते सघला सुखीया । निज पुण्य प्रबलथी हो के, दीसे नही दुःखीया ॥ अति नन्नत मंदिर हो के, सुंदर सुविशाला ॥ गोखे मन हरखे हो। के, रमण करे बाला ॥१२॥ प्रासाद सोहावे हो के, जैनने शैवतणां ॥ तिहां पूजा नाटक हो के, बत्रिशबघणां ।। कमहथ व्यवहारी हो के, धनथी धनद समा॥ दाने करी शरा हो के, सुरतरु सम नपमा ।। १३ ॥ गौनइ सुदर्शन हो के, श्री जिनदास जशा ॥ कोटी ध्वज कहीए दो के, जिनमत चित्त वशा॥ जिण नगरे सुपरे हो के, चौद चोमास किया १ देवलोक सरखी. २ ज्यां उत्तम. नत्तम पुरुफो अयः... कांगराः मोटो पोत. + 956 Jan Educator Anational For Personal and Private Use Only Jainelibrary.org Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्नाण ४२ श्री वीर जिणंद हो के धर्मोपदेश दिया ।। १४ ।। वैज्ञार विपुलने हो के, कंचन देव गिरी ॥ उदयाचल नामे हो के, ए पंचे शिखरी ॥ तिले करि पुर सोहे हो के, कहे जिन एम वली ॥ बीजे नव्हासे हो के, सातमी ढाल जली ॥ १५ ॥ ॥ दोहा ॥ ते राजगृहीनो जलो, 'नसार राजन | रियाने हि गरल सम, सनने मान ॥ १ ॥ कर करवाले कंपीया. वैरी श्वात विकराल || ते सेवे नृप पदकम ल, मानसरे ज्युं मराल ॥ २ ॥ दानी मानी अनम्नम, साहसिकमां शिर ताज ॥ ज्ञानी ध्यानी जिन गुणे, सदा रहे सुखसाज ॥३॥ कायिक समकित श्राचरे, स्प्रकय पढ़ने हेत ॥ अष्टोत्तरशत जव थकी, स्वस्तिक जिन संकेत || ४ || नंदा धारणी चेलणा, प्रमुख एक शत नार ॥ अजय मेघ कोलिक प्रमुख, शत कुमार सुखकार ॥ ५ ॥ चारे बुतिलो न दधि, अजयकुमार प्रधान ॥ राज काज सवि साचवे, "नूधवनो बहुमान ॥ ६ ॥ अरि कटक अलग करी, न्याय मार्ग करे शुद्ध ॥ श्रनय ध्वांत टाले तुरत, सुनय तेज अविरुद्ध ||७|| ॥ ढाल मी ॥ (हां रे महारे शीतल जिनशुं लागी पूरण प्रीत जो. - ए देश . ) हवे ते राजगृही नगरीए नगरनो शेठ जो, कुसुमपाल नामे ते जगमें जालियो रे लो १ श्रेणिक राजा. २ समूह ३ मोहने माटे. ४ एकसो. ५ राजानुं बहुमान हनुं. Jain Education national For Personal and Private Use Only नु०‍ ४‍ inelibrary.org Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २॥ नृप श्रेणिकनो ठे अधिको तसुपरी मान जो, दानादिक गुण निपुण विशेषे वखाणियो रेलो ॥१॥ तस कांता शांता कुसुममाला मनोहार जो, पुत्री ने गुणवंती कुसुमश्रीनवाली रे लो॥ कला चोशग्नुं गृह रूपे रति अवतार जो, बुझेनारति दानगुणे लक्ष्मी वली रे लो ॥२॥ तस शेउने वन हुतो नंदनवन सम एक जो, कोई कारण वशश्री सूकाइ ते ग । यो रे लो॥ एहवे ते धनकुमर तिहां आवे रंग जो, पुण्य प्रत्नावे वन सवि नवपल्लव थयो । शारे लो॥३॥ ते देखी पुरजन हरखित हृदय सकार जो, आवीने प्रत्यूषे आपो वधामणीरे लो ॥ सुणी प्रमुदित मनथी शेठ सकल परिवार जो, आवीने निरखे तव वन शोना घणी रे । लो॥४॥ मन चिंते विस्मित प्रश्ने एदवी वात जो, केहने पुण्ये वन सर्वे फूल्यो फल्यो। दरे लो ॥ तव वन ढुंढतां चंपक तरुवर हे जो, बेगे रे दागे ते नाग्यथी अटकल्यो रे लो। P॥५॥ तस इंगितने आकारे ते शुन्न रूप जो, देखी रे मन हरखो परखे ततहणे रे लो॥ जिम रत्नपरिक्षक परखे रत्नने काच जो, बुबिलीने परिक्षा तिम कवियण गणे रे लो॥ ६ 18/॥ हवे आवी धन्ना पासे शेठ तिवार जो, कुशलालाप पूडीने प्रमुदित मन कियो रे लो ॥ कहे स्वामी पधारो अम मंदिर महाराज जो, तुम मिलवाश्री लान्न घणो प्रत्नु अमर | थयो रे लो ॥ ७ ॥श्मनांखी शेठ ते धन्नाने ततखेव जो, अश्वारूढ करीने घर तेकी गया है। Jain Education n a tional For Personal and Private Use Only Lainelibrary.org Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ घन ० ४३ रे को ॥ तैलादिक मर्दन ऊगटसादिक चंग जो, स्नान सुगंध। जलथी करी पावन थया रे लो ॥ ८ ॥ मन गमतां जोजन कीधां एक थाल जो, बेठा रे करे कीमा तिहां वातायने रे लो || कई शेठ धन्नाने सुपरे श्रमची बाल जो, परणोने प्रेमे खेमे शुभ मने रे ला ॥ ए ॥ तव बोले धन्नो शेठ जणी सुविचार जो, विरा मुलखियां अमने किम परणावशो रे लो || कुल जाति पूक्या विस एवमां म्होटां काज जो, कीजे जे कहो किस विधि मन हादसो रे लो ॥ १० ॥ तव बोल्या शेठ धन्नाने करि मनुहार जो, रूप कला गुण लावण्यथी तुम कुल लह्यो रे लो ॥ वली आचारथी जाली उत्तम जाति जो, श्रम वन फलेश्री श्रमे मनमें निश्वय ग्रह्यो रे लो ॥ ११ ॥ तव मौन करी रह्या धन्नोशाद तिवार जो, शेठे तव विवाहनां परवा तिहां कियां रे लो ॥ तव गोरी गावे कोकिल स्वरथी गीत जो श्रीफलने सोपारी | पान प्रमुख दियां रे लो || १२ || हवे धन्नाशाहे चिंत्यो मनमें ताम जो, सुसराने घेर रदेतां लाज वधे नही रे लो || वलि पाणिगृहणनो किम होवे नबरंग जो, नात प्रमुखने पोखवी पिल मादरे सही रे लो ||१३|| यतः ॥ नत्तम श्राप गुणे जया, मध्यम तात गुलेरा ॥ प्रथम सुया मातुल गुणे, श्रधमाधम सुसरेण ॥ १ ॥ जावार्थ:- पोताना गुणथी नलखाय ते नतम, पिताना गुणथी नलखाय ते मध्यम, माताना गुणश्री नलखाय ते प्रथम अने सस For Personal and Private Use Only Jain Educationa International न० १ ५३ . Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ राना गुणथी अर्थात् ससराना नामश्री नवखाय ते अधममां पण अधम जावो. ॥ १ ॥ इम चिंती लीधां ततक्षण महोटां घाम जो, काम चलायो सघलो मणि महिमा थकी रे लो ॥ जस चिंतामणी घर तेहने शी बे खोम जो, मनचिंतित सवि थावे इम सघले वकी | रे लो || १४ || हवे सुरमणि पूजी जे जे चिंते काज जो, ते ते रे ततकाले यह आवे जलों रे 'लो || बहु सेवक सेना हय गय रथ परिवार जो, सेवे रे करजोमी यश पिण कजलो रे लो ॥ १५ ॥ जे जाग्यवली बे तेहने पग पग शद्धि जो, विएण नद्यमयी आवे जावे आपदा रे लो || जिम नत्कर तुरतमें विस प्रायासे वृद्ध जो, थाये रे तिम यावे मिली सवि संपदा रे लो ॥ १६ ॥ जेणे पूरवे सुकृत करतां राखी खोम जो, तेहने रे मनबंबित कहो कि हाथी मिले रे लो || एह बीजे नव्हासे आवसी ढाल रसाल जो कहे जिन रंगे पुण्ये पंक्ति सवि फले रे लो ॥ १७ ॥ 19 ॥ दोहा ॥ कुसुमपाल शेवे तुरत, तेमाच्या भूदेव ॥ आदर वई प्रति घणो, पूबेल गन सुदेव ॥ १ ॥ जोशी जोई टीपणुं, शुभ मुहूर्त्त शूज वार ॥ कुसुमश्री पुत्री तलो, लगन कस्यो निरधार ॥ २ ॥ दवे विवाद तणां तिहां, मदोटां करे मंकाल || अागलश्री पापम क्की, प्रमुख शाक परियारा ॥ ३ ॥ कंदाई बेवा करे, विविध जात पकवान || दोवाथी दा Jain Educational National For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ४४ ढ्यो गले, सुख लदे सुणतां कान ॥ ४ ॥ मंरुप बांध्या मोटका, पंचरंगी परगट्ट ॥ रचना न०‍ जोवाने रसिक, श्रावे नरना यह ॥ ५ ॥ मी ॥ (करको तिहां कोटवाल. - ए. देशी. ) हवे ते धन्नाशाह, लगन दिवस जब आयो रंगशुं जी ॥ पकवाने करी पांति, पोखे परिघल प्रति नवरंगशुं जी ॥ १ ॥ उपर शालि ने दालि, तिम घृत ताजां पिरसे प्रेमशुजी ॥ व्यंजन नविनविज्ञात, आणे ने वली टाणे सहु जिमे खेमथी जी ॥ २ ॥ गोरस सरस आहार, करीने सहु को मन प्रमुदित थया जी ॥ ऊपर फोफल पान, ते लेइने सहु निज | मंदिर गया जी ॥ ३ ॥ लगन वेला थइ जाम, तव वरघोमे वधु वरवा जणी जी ॥ चढिया मन घरी चोंप, आभूषणन ते शोना प्रतिदे बनी जी ॥ ४ ॥ हय गय रथ परिवार, शेठ सामंत सचिव परिवस्या जी ॥ देतां दान नदार, सुंदर खुप ते शिर ऊपर धरयो जी ॥ ५ ॥ वाजे तूर बत्रीश, नादे अंबर सवि गाजी रह्यो जी ॥ देवध्वनिनां गीत, तेहनो वर्णन किम जाए को जी ॥ ६ ॥ जुगते लेई जान, धनपति आव्या सुसरा प्रांगणे जी ॥ सुस | रो थयो रलीयात, सासुं पण मनमें धन्य दिन ते गणे जी ॥ ७ ॥ पुंखणे पोंखी ताम, ली धा जमाइने दरषे मांयरे जी ॥ तेमी कन्या तिवार, वर कन्याने करमेलो करे जी ॥ ८ ॥ Jain Education national For Personal and Private Use Only ४५ w.jainelibrary.org Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३ चोरी मणिमय चंग, रंगे बांधी ते नली नातिशुं जी॥ फेरा फरे तिहां सार; मंगल वरत्यां। 18 चारे खातिशुं जी॥ ए॥ वेद नणे हिज ताम, स्वर नद्दामे होम हवन करे जी॥ करमो 8 चननां दान, सुसरो सासू देवे बहु परे जी॥१०॥ आरोग्या कंसार, दंपतिनां दिल हेजे । हरखीयां जी ॥ मांहो मांहे अयो राग, गुण लक्षण सुपरे सचि परखीया जी ॥ ११ ॥ परि। P जन पोख्यो ताम, शेठे सुपरें सघलो आपणो जी ॥ दीधां याचक दान, लाहो लीधो लख २ मीनो अगण्यो जी ॥१२॥ण विध कीध विवाह, जय जय बोले बे बिहुंतणो जी॥ 8 बिहुं मन आणंद पूर, हेज वध्यो तिम बिहुंने अति घणो जी ॥ १३ ॥ कुसुमश्री ले संग, 12 है रंगे धन्नो आव्यो गृह प्रापणे जी ॥ नोगवे लोग विलास; सुर सुखने (पण तृण सरिखां । गणे जी॥१४॥ पुण्यतसे संयोम, सरिखा सरिखो जोको आवी मिले जी॥नवमी बीजे नल्हास, जिन कहे ढाल ए सोहलामें नले जी॥१५॥ ... ॥ दोहा. ॥ एहवे मालवदेश पति, चंप्रद्योतन नूप ॥ कोश्क वयण विरोधश्री, युद्ध | करण यश् चूंप ॥१॥ वजमावी रणनेर तव, दीया निशाणे घाव ॥ सामंत सविनेला था है या, तेमाव्या नमराव ॥२॥ चौद मुगटबह राजवी, महा वीर अति धीर ॥ सहस युद्ध हो शूरा घणा, वमवागीया वजीर ॥ ३॥ हय गय रथ पायकतणो, कोय न दोसे पार ॥ चालं | MAASIKASUSAKURA Jan Educatio n ational For Personal and Private Use Only IMGainelibrary.org Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वत्रा० ते नूं धणहणे, शेष करे सलकार ॥४॥ शशि रवि गया खेहथी, खोच्या जलधी अ नु० २ Uएगाध ॥ व्यंतर पिस चित्त चमकिया. मागी वो विराध ॥५॥ अति अविचिन्न प्रयास थी, आव्यो ममध मकार ॥श्रेणिकने पिस प्रश् खबर, सैन्यतणी तिणिवार ॥६॥ गढरोहो करि राय तव, बेगे फूऊण काज ॥राजगृही आव्यो तुरत, प्रद्योतन नर राज ॥ ७॥ * ॥ढाल १.मी.॥ (आघा आम पधारो प्रज्य, अम घर वहोरण वेला.-ए देशी.) P . अन्नयकुमरने तेमी श्रेणीक, पर दल वात प्रकासे ॥ चंप्रद्योतनने जीतेवा, बुद्धि 5 करो सुविलासे ॥ देखो कुमर राय, बुबिले अरि जीपे॥१॥ए आंकणी ॥ तव बोले कुमर सुणो स्वामी, तुमे चिंता मत करज्यो । दाय नपाये जीतशु एहने, ते निश्चय चित धरज्यो ॥ देखो०॥॥ एहने सैन्य घणो के साथे, पिण ए नाग्ये हीणो ॥ एदनो है। - जय करतां नही उर्लन्न, ए बल बुझे खीणो ॥दे॥३॥ एणे संग्रामे लाज गमावी, जय। PI नृप साथे (युइ) करीने ॥ मुगट नणी लेवा मन कीधो, मान अधिक मन धरिने ॥ दे०॥ १ लश्करना घणणाटथी पातालमा रहेला शेषनाग पण जय पाम्या. २ सरोवरनां पाणी सूकावा मांड्यां. ३ एने जीतवो ते कांड कठण नथी: कारण के. एनी पासे लश्कर ने पण बाईनथी. अपर नामे उम्मुह राना साथे मुगर लेवा माटे युद्ध करयुं, सां पण एणे पोतानी लाज गमावी हती. KYOSHO RASARASHISHISHISHIO** ४५ For Personal and Private Use Only Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ || कोशंबी पण काज न सीध्यो, मृगावतीथी एहनो.।। नजयिनं। गढ पाई। एणे, रदूर्ग 18/ कराव्यो तेहनों ।। दे॥५॥ दासी काजे नदयन आगल, युद्ध करंतां जागो ॥ मम दासी पति नाम एडवो, निलवट मांदी लखाणो॥ दे०॥६॥ धुंधुमारगुं धंध मचायो, अंगारव तीने देते ॥ तिहां पण शरम गमावी पापी, परण्यो नाग्य संकेते । दे०॥७॥ युद्ध करता है जन हय पाए, सकल प्रजा सीदाये ॥ यु कख्या विण जय थाए तो, युछ न कीजे प्राये। ३॥०॥७॥ यतः॥ अनुष्टुवृत्तम्. ॥ पुष्पैरपि न योव्यं, किं पुनर्निशितैः शरैः ॥ युर | विजयसंदेह, प्रधान पुरुष दयः॥१॥ नावार्थः-फूलवमे पण युइन करवू जोए, तो धारवाला बाणवमे युक्ष करवानी तो वातज शी? कारण के, युको जीतनो संदेह ने अने तेमां प्रधान एटले नुत्तम पुरुषोनो दय थाय .॥१॥ अन्नयकुमारे बुद्धि नपाई, धन है धरतीमें धराव्यां ।। गुप्तपणेथी झैन्य स्थलमें, अति प्रसन्न कराव्यां ।। दे॥॥पत्र लि-17 154334COM १संतानिक राजानी राणी अने चेमाराजानी पुत्रीएवी मृगावती राणीसाथे, विषय मुख जोगवा नी तालचथी र चम्पद्योतने पोतानी नायिनी नगरीनो कोट पाडी नांखी, ते योथी कांशंबी नगरी नो कोट करावी याप्यो, तथापि तेनुं काम बन्यु नहीं. बीजा ग्रंथोमां. एम ने के, नायिनी नगरीथी हार बंध मागासो नजा राखी नऊयिनीनी अयोथी कोट करवी बाप्पो.. Jan EducatE ational For Personal and Private Use Only Mandiainelibrary.org Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ख्यो प्रेमे करी युगते, विनयानत अरु अनये ॥ स्वामी तुम पूज्योपम अमचे, सुणो वात न०२ ५६ क निन्नये ॥ दे॥१०॥ शिवादेवी तुमची पटराणी, चेलणा सम में जाण ॥ तेहन-5 पाणी स्नेह अमने अधिको, तुमथी के गुणखाणी ॥ दे०॥११॥ अम ताते धन प्रापी बहुलो, सामंत सवि पतलाव्या ॥ ते ग्रही तुमने देशे सुपरें, जे साथे इहां पाव्या ॥ दे ॥१२॥ जो अम वचननो प्रत्यय नावे, तो जोज्यो निरधारी ॥ सामंतादिक पटकुटी पासे, नुक्ति लेज्यो सारी॥ दे ॥ १३ ॥ धन देखो तो वचननो प्रत्यय, निश्चेथी चित्त धरज्यो ॥ तुमे गे| समयतणा नपलक, जिम जाणो तिम करज्यो ।। दे०॥१४॥श्म लिखी पत्र प्रचन्नप-51 थी, प्रद्योतरायने प्रेक्षो ॥ तिणे पण एकांते अवसरथी, वांचीने सवि देख्यो ॥ दे ॥१५ ॥ प्रत्यय माटे नृप पटकुटीने, पासे तव जोवरावे ॥नूपति निधि देखीने ततक्षण, ब्रांति * अधिक मन थावे ॥ दे० ॥ १६ ॥ यामिनीये निज प्राण ग्रहीने, चंप्रद्योतन नागे ॥ मर-2 तणा नयश्री मति हीणो, कीधो तिहां मन कागे ॥०॥ १७ ॥ यतः॥ नपजातिवृतम्. ॥ विपदवर्गेण बलाधिकेन, स्वयं विवादो विषा न कार्यः॥ नष्वापि रदं किल जी-31 वितव्यं, जीवनरो नए शतानि पश्यति ॥२॥नावार्थः-अधिक बलवाला शत्रुनी साथे विधान पुरुषे वाद विवाद अर्थात कजीयो न करवो; नासीने पण जीवितव्यने राखq जो ४६ 44 Jain Educat iemational For Personal and Private Use Only lainelibrary.org Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ए; कारण के, जीवतो माणस शैकमो सुखने जूए ने.॥ ॥ सैन्य सकल पिण चिहुं दि. शि जावे, नृपनी शुद्धिकरंतो ॥ अनुक्रमे नऊयन। ते पहोत्यो, नृप मन शोक धरंतो॥5 दे० ।। १७ ॥ सामंत राय सन्नामें बोल्या, शं श्म स्वामी नाग्या ॥जत सहुन एले गIdमावी, केहने केहणे लाग्या ॥ दे ॥१॥चंप्रद्योत कहे तुम धनश्री, लपटाणा में जा एया ॥ तव ते कहे अमे किम पलटानं, फोगट तुमे नरमाणा ॥ दे०॥ २० ॥ अन्नयकु. मारनी चम्प्रद्योते, कपट वात ते जाणी॥ चिंते मनमें ए शं कीg, खोई लाज पुराण।। दे ॥ १ ॥ हवे कोइ दाय नपाय करीने, अन्नयकुमरने आणुं ॥ चरण नमावीने वश रा-18 ॐ खं, कोश्क जोई टाणुं ॥ दे॥२॥ देखो हवे.प्रद्योत नरेसर, कपट उपाय ते करशे ॥ ढाल दशमी बीजे नल्हासे, जिन वचने सुख वरशे ॥ देखो ॥ २३ ॥ A ॥ दोहा. ॥ सत्ना समक्ष एकण दिने, कहे प्रद्योतन राय ।। अन्नयकुमारने जे ग्रहे, तेहने करूं पसाय ॥ को शरो को साहसी, को ब्ल बलनो जाण ॥ जे ग्रही अन्नय-13 कुमारने, लावे ते सुप्रमाण ॥ ॥ सुगी कहे सामंत सवि, स्वामी ए नवि थाय ॥ इंच नागेश्री, अन्नय बल्यो नवि जाय ॥ ३ ॥ समुश् तरंतां सोहलो, मृगपति ग्रहण सुकाज व्याघ्रने वश करवो सुलन, पिण ए उर्जन काज ॥ ४ ॥ पमहोघोषण नगरमें, ताम क Jan Education W ational For Personal and Private Use Only N inelibrary.org Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ४७ रावे राय ॥ अजयकुमर प्राणे जिके, ते लहे लाख पसाय ॥ ५ ॥ परुह बन्यो गणिका तु रत, राय लह्यो आदेश | परिकर युत आावी प्रबल, मगधदेश सुविशेष ॥ ६ ॥ ॥ ढाल ११ मी. ॥ (वाद वाद बनायो वींऊलो. - ए देशी.) हवे ते गणिका कपटी मली, करे कपट श्राविका वेशो रे ॥ मुखवस्त्रादिक उपग रणने, मुखे राखी दिये उपदेशो रे ॥ तुमे देखो कपट गणिकातणां ॥ १ ॥ ए आंकली. ॥ एतो परिपाटी श्राविका तली, सवि शीखी सुपरे राखी रे । तेणे वेश धरया श्राविकात गा, वचनादिकथी मृडु जाषी रे || तु ॥ २ ॥ केइ धवयुत केइ विधवा थइ, वृ 用 | केइ बाला रे जीवाजीवादि पद जणे, करे त्रस यावर रखवाला रे ॥ तु० ॥ ३ ॥ इम वेश बनावी विगतशुं, राजगृही नगरी में आवे रे | उपवनमें मेरा थापीया, अति उन्नति अधि की फा रे ॥ तु ॥ ॥ प्रत्युषे पुष्पादिक ग्रदी, थई नेली नगरीमां जावे रे | फिरती फिरे ते देरासरे, सहु श्रावकने मन नावे रे ॥ तु० ॥ ५ ॥ एक दिन नृप चैत्यालये, श्रावे प्रति हर्ष घरती रे ॥ श्रजये दीली जिनमंदिरे, विधि सहित जिनार्चना करती रे ॥ तु ॥ ६ ॥ देखी कहे अजयकुमर शुं, तमे कोण हो किदां रहो बाई रे ॥ किस कारण श्रव्यां बोईहां, किहां जाशो कहो चिन लाई रे ॥ तु० ॥ ७ ॥ तव बोली विमासीने तिहां, एक Jain Educatioernational For Personal and Private Use Only २०१ w.jainelibrary.org Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वृक्षा विधवा वेशे रे ॥ सुणो अजयजी अर्थ ए वयणनो, जिशो धास्यो गुरु नपदेशे रे ॥तु13 मे०॥ ॥अमे चेतना लक्षणथी सही, नए संसारी शुन्न प्राणो रे ॥ रहिये के एह सं. ४सारमां, योनी चोराशी लख खाणी रे ॥ तु॥ए॥ को निमित्त विशेष साधवा, शुन | फल लह्यो नर अवतारो रे ॥ तिहां साधन शिवपूर कारणे, पाव्यां जिनमार्गमें सारो रे॥ तु॥१०॥ सार्थप श्री वीरजिणंद मिख्या, निर्जय शिवपुर पहोचामे रे ॥ तिहां जावानो सही मन रहे, पिण तनु आलस देखामे रे ॥ तु.॥११॥ साधु मारग अति दोहिलो, स| देवा परिसहना कांटा रे ॥ पंच महाव्रत नार नपामवो, ते वदेतां रहे पग आंटा रे ॥ तु ॥१२॥ पार लग्थी बल करी चालवो, तेवीश विषय वश करवा रे ॥ पचवीशने पासे न राखवा, पांच वैरी विश्वास न धरवा रे॥ तु॥ १३ ॥ एक निल्लाधिप विचे उष्ट , तस सेवक दो माग रे ॥ तेदने पिण यतने वर्जवा, जेह उर्जय ने अति काग रे ॥ तु॥ १४ ॥श्म उद्यमश्री पंथे चालतां, चौदमे वासे पहोचे रे ॥ए मार्ग विषम सुसाश्रपे, देखा-१ 1 ड्यो मननी होंशे रे ॥ तु ॥१५॥ पिण ते पंथनो पूगे नवि पके, तव सार्थप वली म || नाखे रे ॥ एक वाट सुगम बीजी अजे, शिवपुर जावा जे मन राखे रे ॥ तु०॥ १६ ॥ अ-4 णुव्रतनो नार अलप ग्रही, दानादिक रक्षक संगे रे ॥ तप विनयादि अश्वे चढी, पहोचे शिल Jan Educatio IAlainelibrary.org n For Personal and Private Use Only ational Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना०' ধ वपुर मन रंगे रे ॥ तु० ॥ १७ ॥ तब ते मारग मनमें वशेो, ते पंथे मे हवे चालु रे ॥ पंथवाहक साधुने पूछतां, शिव नगरने नजरे जातुं रे ॥ तु० ॥ १७ ॥ तिहां जध वसवानुं म न अबे, सुखराम जी थिर जाली रे ॥ इग्यारमी बीजा नव्हासमी, ढाल जिनविजये खाली रे || तुमे ॥ १७ ॥ ॥ दोहा ॥ जय कहे सादमिली सुलो, तुमे कही जे वात ॥ जाव की सवि अनुभवी, ए तुमची खियात ॥ १ ॥ इव्य थकी हवे दाखवो, नाम गमने काम ॥ तव बोले ते यत्नश्री, अजयने करी प्रणाम ॥ चंपाये प्राहिं रहुं, वहुं सदा जिन आए | सत्य वचन मुखथी कहुं, लहुं अध्यात्म प्रमाण || ३ || संसारिकना कार्यश्री, धर्मकार्य शुं रंग ॥ राखुं बुं निश्चय श्रकी, अविहरु रंग अभंग ॥ ४ ॥ देवार्चन गुरु सेवना, पात्रदान सुपवित्र ॥ तप जप काया शक्ति सम, करूं मे सुचरित्र ॥ ५ ॥ सिद्धाचल यात्रा निमित्त, मन राखुं बुं प्राहिं ॥ चैत्यालय नमवा जली, श्राव्यां बुं श्रमे श्रांहिं ॥ ६ ॥ यतः ॥ श्रार्यावृत्तम्. ॥ अनल जल चौर याचक, नृप खल दायाद संहृतंयाति ॥ धन्यो सो यस्य धनं, जिनयात्रादौ शुभे लग्नं ॥ १ ॥ जावार्थ:- धनने अमि, पाणी, चोर, याचक, राजा, खललोको ने गोत्रीयो हरण करी जाय बे; माटे तेज पुरुषने धन्य बे के, जेनुं धन जिन यात्रादिक शुभ Jain Educatiomernational For Personal and Private Use Only न० १ ४ jainelibrary.org Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कार्यने विषे वपराय . ॥१॥ . ॥ ढाल १२ मी.॥ (श्रा लाल.-ए देशी.) वचन सणी तेणीवार हरख्यो अन्नयकमार ॥ सोनागी लाल ॥धन्य धन्य एश श्राविका जी ॥ जीवाजीवादिक जाग, शिर वहे. श्री जिन आण ॥ सो ॥ जिनमतना है। एशोनाविका जी॥१॥ एह तो नत्तम पात्र, एहनो निर्मल गात्र । सो०॥ यात्रा अमुज1 ने नली जी। एहनोन्नक्ति नदार, कीजे विविध प्रकार ॥ सो०॥सारपणाय। वलं| वल। जी॥२॥श्म आलोची चित्त, बोल्यो अन्नय पवित्र ॥ सो॥ अम घर तुमे पावन क-2 रोजी ॥ तव बोली ततखेव, धर्मबांधव तुम देव ॥ सो०॥ वचन अमारूं चित्त धरो जी॥ ३॥आज ने तीर्थोपवास, सवि साहमिणीने खास ॥ सो ॥नोजन हर किम कीजीएल जी ॥ सुणि चमक्यो चित्तमांदि, वचन अनोपम त्यांहि ॥ सो० ॥ लान प्रत्यूषे लीजिये ॥जी॥४॥बीजे दिन सुप्रकार, नक्ति करे मनुहार ॥सो| अन्नयकुमर नोजन तणी जी ॥ तव ते कपटी वेश, अन्नय थकी सुविशेष ॥ सो० ॥ प्रीति करे वचने घणी जी॥५॥ ॐ यतः ॥ अनुष्टुब्वृत्तम्. ॥ सुप्रयुक्तस्य दंनस्य, ब्रह्माप्यं तं न गवति ॥ कोलिको विश्नु रूपे श, राजकन्यां निषेवते ॥१॥नावार्थः-सारी रीते करेला कपटना पारने ब्रह्मा पग जाल Jain Education national For Personal and Private Use Only O lainelibrary.org Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना०ाणी शकता नश्री; जेम कोलीए विष्णर्नु रूप करी राजकन्या नोगवी तेम.॥१॥ प्रामंत्रेन ध नबांहि, अन्नयने मेरे त्यांहि ॥ सो० ॥ अन्य दिवस अवसर लहीजी ॥ पिरशांनोजन दा.सार, व्यंजन विविध प्रकार ॥ सो० ॥शालि दालि घृतथी सही जी॥६॥ तऽपरि गोरस ।। गम, चंहास्य शशे नाम ॥ सो ॥ मदिराने मन मोदझुं जी ॥ जिमतां बेंत तिवार, घू णित नयन विकार ॥ सो ॥ निश लहे आणंदशं जी ॥७॥ घाली रथमें ताम, चालीने क रिने काम ॥ सो० ॥ गणिका राजगृहि थकी जी॥पोहती नऊयिनी तेह, नृपने कहे सस नेह ॥ सो०॥ अन्नय प्राण्यो अमे बल थकी जो ॥॥ सुणि प्रद्योतन राय, कीधो लाख 31 पसाय ॥ सो० ॥ गणिकाने अति सादरे जी ॥ अन्नयकुमरने ताम, तेमावी तिण गम ॥ | सो०॥ गणिका गृहथी आदरे जी॥॥ तव प्रद्योत नरेश, अन्नय थकी सुविशेष ॥ सो०॥ । हास्यादिक विधि बहु करे जी॥ बुझितयो नंमार, देखी अन्नयकुमार ॥ सो०॥ चंप्रद्योत । पण हित धरे जी ॥१०॥ अन्नय कहे सुण राय, बंमी अवर उपाय ॥ सो ॥ धरम तणो । 15/बल मुज कस्यो जी॥ एह अघटतो काज, तुजने न लागी लाज |सो०॥ नीति वचन पिण 81 नवि धस्यो जी ॥११॥ धिग धिग तुज अवतार, कूम कण्ट कोगर ॥ सो०॥ जिनमतने । & मेलो कस्यो जी ॥ मुज मासीने गेह, रहेगुं धरी बहु नेद ॥ न नमुं तुजने वीफस्यो जी ॥ Jain Educatd e ational For Personal and Private Use Only P a inelibrary.org Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ -5 % १२॥इम कहीने सुविचार, मासीने आमार ॥ सो० ॥अनय रहे पाणंदमें जी ॥ ढाल ए 5 बारमी खास, कही बोजे नल्हास ॥ सो० ॥ बुध जिनविजये मन गमे जो ॥१३॥ ॥ दोहा. ॥ एहवे राजगृह नगर, नृप श्रेणिक दरबार । सेचन गज मदश्री अयो, वि| है कल विरूप तिवार ॥१॥ आलानर्थन नपामने, पामे गोपुर पोल ।। मंदिर ढाहे मोजयो, से चरे हाटनी नल ॥२॥ नाणावटी कमिया प्रमुख, देखि दिशो दिशि जाय ॥ विखेरी तस 15 वस्तुने, वलि पागल ऊजाय ॥३॥ नार सहस अयमयः निविम, त्रोमी सांकल ताम॥15 का पुरजनने मूंढापथी, ग्रहे क्रिमाने काम ॥ सयल नयरने ततदणे, कोधो हाल कहोल | K नगर लोक आकुल भयो, गजथी अतिहि अतोल ॥ ५॥ ॥ढाल १३ मी. ॥ (कोई शूर सुन्नटने नांखो रे.-ए देशी.) 5 गज बटो देखीने नूपति, मनमा एम विमासे रे॥ बुहिवंत बलथी पिण शूरो, अन्न 15| य नही मुज पासे रे ॥ तुमे लावो रे, कोश् गयवर पकझी लावो रे ॥ को दाय नपाय बतावो रे ॥१॥ए आंकणी ॥ तेह अवंति मांडे विराजे, प्रद्योतन गृह गाजे रे ॥ अवर न k ण नगरे को एहवो, जे ए को संकट नाजे रे ॥ तु०॥॥ सुन्नट सकल सेना प्रवि हं दिशि, पिण गज हाथ न आवे रे ॥. विलखा घाने वीर हुताते, नालीने घर जावे रे । 5 Jain Education national For Personal and Private Use Only Tamilw.jainelibrary.org 1 Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ५० न० २ तुमे० ॥ ३ ॥ परुह वजाव्यो प्रगटपणे तव, जे गज वश्य करी लावे रे || सोमश्री पुत्री M परणे, ग्राम सहस्र वली पावे रे || तु ॥ ४ ॥ परुह सुलीने धन्नकुमर तव, सुरमलिने पर जावे रे || गजमदनी विद्याना बलश्री, गज ततक्षण वश आवे रे ॥ तु० ॥ ५ ॥ फेरवी गज आकुल करी तपरि, बलथी बेठगे कुंने रे ॥ मस्तक में अंकुश देश गजने, आायो श्राला नथंने रे || ० ||६|| बांध्या गजने स्वल्प प्रयासे, सहु को प्रचरिज निरखे रे ॥ नव रूपे ए देव कोक, इम मनमें सहु परखे रे || || ७ || नृप निरखी परखी तस गुएाथी, निज वच प्रत्यय या रे || सोमश्री पुत्रीनुं श्रीफल, धन्नाशाहने श्राप रे ॥ तु ॥ ८ ॥ लगन यापीने तिलक वधावी, धवल मंगल देवरावे रे ॥ नचव अधिक करी धन्नाने, सोमश्री पर सवेरे ॥ ० ॥ ॥ गाम सहस दीघां मनगमतां, दोधा गज रथ वाजी रे ॥ ि | राजाये मनमोदे, कीधा जमाइ राजी रे ॥ तु० || १० || धन्ने पिस पाणिगृहाने देते, धन व्यय बहुलो कीधो रे । स्वजनादिक जन सवि संतोष्या, दान याचकने दीधो रे ॥ तु० ॥ ११ ॥ जश लीधो जुगते जय वरत्यो, पूरव पुण्य संयोगे रे || वे स्त्रीथी आसक्त रहे जिम, चेतन बे उपयोगे रे ॥ तु० ॥ १२ ॥ देव दोगुंदकन परे विलसे, जोग संयोग सवाई रे ॥ ते रमी ढाले बीजे नव्हासे, बुध जिनविजये गाई रे || तु० || १३ || For Personal and Private Use Only Jain Educatiomational प Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ * ॥ दोहा. ॥ धन्नाशाह प्रसंगश्री, शालिन संबंध ॥ वर्णवशं संकेपथी, सुगजो तेह प्रबंध ।। १ ।। राजगृह पासे अडे, शालिग्राम सुविख्यात ॥ ?पशुपालिक तिहां कणे र 1 हे, संगम केरो तात ॥२॥ धन्ना तेहनी शुन्नमती, घरणी पुण्य पवित्र ॥ संगम सुत ने ते-18 दीदने, लघु वयथी सुचरित्र ॥ ३॥ रोग योगथी अन्यदा, धना धव व्युत्पन्न ॥ लक्ष्मी पिण साथे गश, कर्म योग निष्पन्न ॥ ४ ॥ ॥ ढाल १५ मी. ॥ (देशी नणदलनी.) तव धन्ना सुतने ग्रही, राजगृहीमें वास हो ॥ सुंदर ॥ वसीने इत्यादिक घरे, करे ति हां कार्य अन्यास हो ॥ सुंदर ॥ पुण्यतणां फल सांजलो ॥१॥ ए आंकणी ॥ पुण्य विना नवि सिहि हो ॥सुंणा पुण्य अधिक जगमें कह्यो, पुण्यश्रको नव नीधि हो ॥सुंगापु॥॥ संगम चारे सामटा, वानरुत्रां वन मांहि हो ॥ सुं० ॥ एक दिवस पायस तणो, नोजन देखे त्यांहि हो ॥ सुं० ॥ पु ॥३॥ माताशं हठ माम्ने, मागे पायस ताम हो ।सुं०॥ आंखे । आंसु नाखती, माता बोले आम हो ॥ सुं०॥पु०॥४॥ न मिले पूरा कूशका, नोजन वेला लिनात हो ॥सुं०॥ तैलादिक पिण दोहिलो, तो पायसनी शी तात हो ॥सुंगापु०॥५॥ रुदन १ पशुपातिक नामे गावाल. २ धन्ना नामे स्त्रीनो धणी मरण पाम्यो. ३ मजूरी करे . AA-AIRCRA *** १.२.* *** Jan Educationalrational For Personal and Private Use Only AChinelibrary.org Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 1-91-C धन्ना करे वालक ठे, माता तव दुःख दीन हो ॥ सुं॥ देखी पामोशणो मीली, पूरे ते सुप्रवी- न०२ ५१ न हो ॥सुंणापु०॥६॥ बात कही सवि बालनी, मागे ए 'परमान हो ।। सुं०॥ ते बोलीयो । इसी ततकणे, एहमांशू ने अज्ञान दो ॥ सुं०॥ पु०॥७॥ दूध खांझ घृत शालिने, आणी ये एकेक हो ।। सुंग ॥ सर्व संजोगे नीपनी, खीर ते अति ही सुक हो । सुं० ॥ पुगा बालक तेकी हपशु, पिरसे ते परमात्र हो ॥ सुं॥ पवन थकी शीतल करे, राखी निश्चय ध्यान हो ।सुंगापु०॥ए। एहवे मुनिवर गौचरी, फिरता आहारने काज हो ॥ सुं०॥मा-18 ४ सखमणने पारणे, तिहां पहोत्या सुखसाज हो । सुंणापु० ॥१०॥ देखी मुनिवरने तिहां, 8 जागी दाननी बुद्धि हो ॥ सुं०॥ समकित कायोपसम थकी, आत्म थयो सविशुइ हो ॥ है सुं०॥ पुण॥११॥ दान दियो ऊलट धरी, न करी विमासण कोय हो । हुँ०॥ काईक नाव में विशेषथी, अल्प संसारी होय हो ॥ सुं॥पु॥१॥ मुनिवर वहोर। संचस्या, संगम चाटे याल हो ॥ सुंण् ॥ देखी माता चिंतवे, नूख्यो ने हजी बाल हो ॥सुं०॥ पु०॥१६॥ पिरशी 1 शेष हती तिके, खाधी खीर सवाद हो ।। सुं०॥ नूख्यो बालक मुज रहे. इम धरे मन वि.8 ट्राषवाद हो ॥सुं०॥पु०॥१५॥ माता आगल मुनितणी, वात न कीधी काय हो।सुं॥रा CA49-9-4-9647 Jain Education rational For Personal and Private Use Only inelibrary.org Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ त्री समय नदरे व्यथा, अन्न अजीर्ण ते पाय हो।गापु०॥१५॥ यतः ॥ अनुष्टुवृत्तम्.॥ अजीर्णतपसःक्रोधो, ज्ञानाजीर्णमहंकृतिः ॥ परतापिक्रियाजीर्ण, मन्नाजीर्ण विषचिका ॥ १॥ नावार्थः-तपर्नु अजीर्ण क्रोध, ज्ञान- अजीर्ण अहंकार, कोयानु अजीर्ण परने परि । ताप नपजाववो तेमज अन्ननुं अजीर्ण नलटी अने कामो जाणवू. ॥१॥ ते पीमायी मृ । त्युने, पामे संगम वाल हो । सुं०॥ बीजे नुहासे जिन कहे, चौदमी ढाल रसाल हो ॥ सु०॥ पु० ॥१६॥ ॥दोहा॥ ते राजगृहमें वसे, गौन शेठ गुणवंत ॥ धनश्री धनद समान , न्याय नीति पुण्यवंत ॥१॥नश लामिनी तेहनी, रूप कला आगार ॥ राधा कृष्णतणी परे, विलसे विविध प्रकार ॥२॥ हवे ते संगम जीव चवी, ना नर नुत्पन्न ॥ सुपन मांहि तव शालिनो, दीगे केत्र निष्पन्न ॥ ३ ॥ फल पूब्यो नरतारने, सुणी शेठ सुविलास ॥ पुत्र । रत्न होशे नलो, कुलमंझन सुप्रकाश ॥ ४ ॥ दंपति दिन दिन अति मुदित, रहे सदा सुप्र 18 सन्न ॥ पूर्ण मास पहोते अके, जनम्यो पुत्र रतन ॥५॥ ॥ ढाल १५ मी. ॥ रामचंद के बागमें, चांपो मोरी रह्योरी,- ए देशी.) प्रसव्यो पुत्र सुरंग, नज्ञ हर्ष धरेरी ॥ शेठ सुणी तव वात, नचच अधिक करेरी ।। RIGANGANAGARIKAAGAR বে-৭--৭-৭--৬-৬- ০৯-ফেৰে Jain Education P ational For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० १॥पंच शब्द वाजिंत्र, घर आंगणे वाजेरी ॥ नेरी मुंगल घन घोर, अंबर लगि गाजेरी ०२ ५२ ॥२॥ सोहव गावे गीत, ये आशीष घणेरी ॥ तुं कुलमान पुत्र, मुखथी एम नणे।। 31 ३ ॥ याचकने दिये दान, वंगित तेह तणेरी ॥ सयण संबंधीने मान, विविध प्रकारे घरी ॥ ॥ पूजा परिघल चित्त, जिनमंदिर विरचेरी ॥ कुलदेव्याने ताम, चंदनश्री चरचररी ।। P५॥ दश नतामण एम, कुल मर्याद कियोरी ॥ पोखी नात पवित्र, नाम विचारी दियो || ॥६॥ सुपनमें शालिनो क्षेत्र, दीठो अति सुखकारी॥ तिणे करी शालिन कुमार, नाम | दियो निरधारी ॥ ७ ॥ रूपे अमर कुमार, के रति पति सम कहीए ॥ तणे अनुहार, अ. वर न इण युग लहीए॥७॥सुंदर वाणी सार, गज गतिनी परे चाले ॥ उमक उमक उवे । it पाय, मात पिता मन महाले । ए॥ अल्प प्रयासे ताम, विद्याभ्यास करावे ॥ पठित संना रे जेम, तिम तस सघल। आवे ॥१०॥ योवन आव्यो जाम, ताम बत्रोश कुमार। ॥ शुन्न | वेला शुन्न लग्न, परणावे सुविचारी ॥११॥ तेहशुं विविध प्रकार ॥ पंच विषय सुख वि. 1 लसे, जाणे न रातने दीह, चरण धरणि नही फरसे ॥१२॥ अहमिंनो अवतार, ते 81 शालिन सोनागी॥ बीजे नल्हासे ढाल, पंदरमी गुणरागी ॥ १३ ॥ ॥दोहा.॥ एहवे राजगृह नगर, अन्नय मंत्रि विण ताम ॥ न्यायादिक व्यवहार ५२ Jain Education n ational For Personal and Private Use Only nelibrary.org Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विण, थयुं अने निष्काम ॥१॥ निशा चं विण जेहवी, देत रहित गजराज ॥ कुमुद वि 18 ना जिम सर सही, (कुसुम गंध सर जल विना,) चरण हीण शषिराज ॥ २॥ तिम मंत्री * विण नृप सन्ना, दीसे दिन दिन दीन, अन्नयकुमरने अनुदिने, संन्नारे सह लीन ॥३॥ धून IA एक एडवे तिहां. एकाकी अविवेक ॥ लोनवशे धनवंतने, धते ए तस टेक ॥१॥ वेदाधर सुपरे सुनग, सार्थवाहनो ताम ॥ गौन शेठ तणे घरे, आव्यो पूर्वी नाम ॥५॥ _ ढाल १६ मी. ॥ (मेतारज मुनिवर, धन धन तुम अवतार.-ए देशी.) 4 धूतारो तस धूतवा जी, आव्यो गौन आगार ॥ आसन बेसण आपियो जी, कीधी ४ घणी मनुहार ॥ सोनागी साजन, देखो धूर्त विचार ॥ १॥ ए आंकगी ॥ कुशालालाप ने तिहां जी, गौनइनश्क शेठ॥ ?एकाक्षी जी जी करे जी, राखी नीची । सो ॥२॥ वलतो धूर्त कहे सुणो जी, शेठजी सेवक वात ॥ चंपाये आव्या हुता जी, तुमे व्यव साये विख्यात ॥ सो०॥३॥ लक्ष दिनार लोया तिहां जी, में तुम पाले सुपात्र ॥ नयन एक दीधुं अ जी, देखो ते मुज गात्र ॥ सो० ॥ ४॥ ते धन लक लेई घणो जी, कोधो में | व्यवसाय ॥ वृद्धिथई तेहनी घणी जी, पूरव पुण्य पसाय ॥ सो० ॥५॥ व्याज युक्त धन १ एक आंखवालो काणो. YEARS ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ Jain Education Tylatona For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ५३ A लेयने जी, द्यो मुज लोचन तेह ॥ ढील हवे करवी नही जी, राखो पूरव नेह ॥सो० ॥६॥ कहे गौन सुणो शेठजी जी, ए शी खोटी रे तात ॥ चंपा पिण दीठ नथजी, लोचन नीशी वात ॥ सोगा। आज लगें नवि सनिल्यो जी, लोचननो व्यवहार ॥ खोटी वात प्रकाशतांजी, किम रहेशे इतबार ॥ सो० ॥6॥ तव कांगो आक्रोशथी जो, बोले व बरु | वेण ॥ कोमिथकी बहु मूल्य के जी, निर्मल माहरु नेण ॥ सो०॥ ॥ रुडुं देखी राखशो जी, शुं मुज नेत्र सुजाण ॥ आखर हुं गेडुं नहीं जी, जो मुज पिंझमें प्राण ॥सो०॥१॥ गौनशेठने ग्रही तदा जी, लेई गया दरबार ॥ श्रेणिक नृप संशय पड्यो जी, निसुणो वा त विचार ॥ सो० ॥११॥ अजयकुमरने अति घणुं जी, संन्नारे सहु ताम ॥ जो एक सूर्य न ! दय हुवे जी, तो किशं दीपक्ष काम ॥सो॥१२॥ न्याय न थाये कोईथी जी, तव श्रेणिक नूपाल ॥ पुरमें पमह वजावियोजी, सनिलजो चनसाल ॥ सो ॥१३॥ काणे जे ऊग | मो रच्यो जी, तेहनो जे करे न्याय ॥ गौनश्शेठ पुत्री तणो जी, पाणिग्रहण तस थाय ॥ सो०॥ १४ ॥ पमह सुगी धन्ने बच्यो जी, आव्यो नृप दरबार ॥ तेमावी काणा प्रते जी, A ४ कहे श्म वात विचार ॥ सो॥१५॥ गौनश्शेग्ना घर तणा जी, बु अमे लेखक धीर ॥ * वात सकल अम दफतरे जी, लिखि राखी ने वीर ॥ सो० ॥ १६ ॥ शेग्ने खवर न को पके Jain Education & hational For Personal and Private Use Only H ainelibrary.org Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जी, देण लेण धन वात ॥ नामु गमु एहनु जी, जाणुं हुं अम ब्रात ॥ सो० ॥ १७॥ पूग्यो । शेटे अमनणी जी, नयन तणो व्यवसाय ॥ संन्नाली अमे जोश्युं जी, तव पाम्या सवि गय । सो ॥१॥ लाख दोय धन अम प्रते जी, आपो प्रथम एक वार ॥ तव धूतारे तत दी। कणे जी, कीधो च्य तैयार ॥सो ॥१॥ कहे धनो श्रम शेग्ने जी, घरमें नेत्र अनेक ।। मुक्यां ने ते बहु जणे जी, धन कारण सुविवेक ॥ सो० ॥२०॥ ते कारण तुमे तुम तयो । जी, यो लोचन सुप्रकार ॥ जोश्ने ते सारिखो जी, दीजे नेत्र ईवार ॥ सो०॥१॥ सुणि 18 कांणो विलखो यो जी, नेत्र ते केम कढाय ॥ लेहणायी देहणो थयो जी, मूकी धन ते जाय ॥ सो ॥ २२॥ नूपति मन हरखित श्रयो जी, बुद्धि की ततखेव ॥ पकड़ी धूतारो है &तदा जी, काढ्यो देशथी हेव ।। सो ॥२॥ जयलक्ष्मी धन्ने वरी जी, पूरव पुण्य पसाय॥ बीजे नल्हासे सोलमी जी, ढाल ए जिन सुखदाय ॥ सो० ॥ ॥ ॥ दोहा. ॥ गौनइ शेग्नो नय गयो, हृदय अयो नन्हाह ॥ धन्नो मतिवादण तस्यो, 5 चिंता समुइ अथाह ॥१॥ पुत्रि सुन्नज्ञनो तिहां, धन्नाशाहने साथ ॥ विवाहनो निश्चय | करे, आपी बहुली पाथ ॥२॥ लगन लीयां पूरी उरस, वहेंच्यां फोफल पान ॥ नात जा तने पोखवा, परिघल कियां पकवान ॥ ३॥ मंझप महोटा मामिला बिहुं गमे बहु जत्तिा Jan Educational Lone For Personal and Private Use Only nelibrary.org Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० एव सरिखे सरिखा योगथी, युगते मली युगति ॥ ४ ॥ परण्या ते प्रमुदित पणे, जिम सीता रघुनंद ॥ दान मान दीघां डुरस, पोख्यो परिजन वृंद ॥ ५ ॥ नारी त्रिएयथको तिहां, वि लसे पूरण जोग । जिम मुनिवर लीलो रहे, गुप्ति त्रय संयोग ॥ ६ ॥ राजा परा माने घयुं, देखी बुद्धि प्रथाह ॥ शेठ सेनापति सर्वने, वल्लन धन्नोशाद ॥ ७ ॥ ॥ ढाल १७ मी. ॥ ( घणराढोलानी देशी.) एहवे वीर समोसख्या रे, परिवृत बहु परिवार ॥ गुणना पूरा | गौतम प्रमुख गुरो नया रे, चौद सहस अणगार || गुणना पूरा | श्रावो आवो रे, ए जिनपति पासे ॥ जावो: नावो रे, भक्ति सुविलासे । एहनी सेवाथी सुख थाय, पुण्यना पूरा ॥ १ ॥ ए झांकली ॥ चंदनबालादिक तिहां रे, साधवी सहस वत्रीस ॥ गु० ॥ अतिशयथी अति नृपता रे, जगगुरु श्री जगदीश ॥ गु० ॥ श्र० ॥ २॥ श्रेणिक वंदन चालिया रे, चतुरंगी सेना साथ ॥ गुण ॥ पंचानिगम ते साचवी रे, नेट्या त्रिभुवन नाथ ॥ गु० ॥ श्रा० ॥ ३ ॥ गौन शेव सुली तदा रे, जिन ग्रागमन अनूप ॥ गुण जाव घरी वंदन तदा रे, पहोत्यो ते जिम नूप ॥ गुण ० ॥ ४ ॥ बारे पर्षद तिहां मली रे, इंशदिक सुर कोमि ॥ गुण || देशना द्ये तव वीरजी रे, वचनामृत रस जोकि | गु०॥ श्रा ॥ ५ ॥ श्रनित्यपणो संसारमें रे, धन यौवननो जाएग ॥ Jain Educationa intemational For Personal and Private Use Only उ० २ ५४ Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥गु॥ समण परुण विध्वंसणा रे, तनु लक्षण निरवाण ॥ गु०॥ प्रा० ॥ ६ ॥ जाली धर्म करे जिकेरे, ते लहे शिवसुख गम ॥ गु० ॥ धर्म विना ए जीवने रे, कोय न धावे काम ॥ | ॥ ० ॥ ७ ॥ जीवतली हिंसा तजो रे, अलिक वचन परिहार ॥ गु० ॥ चोरी न कीजे सुपनमें रे, मैथुन दूर निवार || गु० ॥ ० ॥ ८ ॥ परिग्रहनी ममता तजो रे, निशि जोजन करो दूर | गु० ॥ पंच महाव्रत पालते रे, लहिये सुजस सनूर | गु०॥ ० ॥ ए ॥ गौज शेव ते देशना रे, सुशि बृज्यो ततकाल ॥ गु० ॥ जाने पूर्वी तदा रे, ले चारित्र विशाल ॥ | गु० ॥ श्र० ||१०|| सिंह परे व्रत यादरे रे, पाले मृगपति जेम ॥ गु० ॥ प्रणसरा आराधन करी रे, सुर पद पाम्यो खेम ॥ ० ॥ ० ॥ ११ ॥ प्रथम सुरालये रूपन्यो रे, |मान ॥ गु० ॥ सागर दोयने प्रानखे रे, जोगवे जोग प्रधान ॥ गु० ॥० ॥ १२॥ पुत्र स्नेह | प्रेरयो को रे, गौन शेग्नो जीव ॥ गु० ॥ पेटी नवाणुं प्रतिदिन रे, प्रगट करे ते तीव ||०||०||१३|| भूषण वस्त्र जोजन तली रे, वर वधुने परिभोग ॥ गु० ॥ पूरे वंबित नि |त नवा रे, पूरव स्नेह संयोग ॥ ०॥ ॥ १४ ॥ शालिकुमर सुख जोगवे रे, मन चिंतित मनुहार ॥ गु० ॥ पात्र दान फल देखजो रे, हृदाय की नर नार || गु०॥ प्रा० ॥ १५ ॥ यतः ॥ अनुष्टुवृत्तम्. ॥ व्याजेस्याद्विगुणं वित्तं, व्यवसायेचतुर्गुणं ॥ कुषशतगुणैप्रोक्तं, पात्रे इंस Jain Education pational For Personal and Private Use Only Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना०२ गतगुणैनवेत् ॥१॥ नावार्थ:-धन जे ते, व्याजे आपवाश्री बमj, व्यापार करवाथी चो न०२ ५५ । गणं, खेतो करवाश्री सोगणुं अने सुपात्रने विष दवाथी अनंतगणुं याय . ॥१॥ बीजो 81 उल्हास पूरो थयो रे, सत्तर ढाले सुरंग ॥ गुण ॥ दान कल्पद्रुम रासनो रे, सुणतां अति न बरंग ।। गु०॥पाण॥ १६॥ सवि पंमितमा परगमो रे, कोविद तिलक समान ॥गुणा गजवि । जय गुरु नामथी रे, लहिये सुख बहुमान ॥ गु०॥०॥१७॥ तसु विनयी विद्या नीलो रे, P| हितविजय बुधराय ॥ गु०॥ जेहना चरण प्रसादथी रे, दिन दिन सुजस सवाय ॥ गु०॥ 15/०॥१॥ तस सेवा करतां लह्यो रे, अनुपम ए अधिकार ॥ गु०॥ जिनविजय कहे पुण्य ४ थी रे, नित्य नित्य जय जयकार ॥ गु॥ आ० ॥१५॥ इति श्री धनशालिचरित्रेप्राकृतप्रबंधेदानकल्पद्रुमाख्ये हितीयशाखारूपचनशाहबुदिपरा 5 ___ क्रमवर्णनोनाम हितीयोल्हासः समाप्तम्. । अस्मिनोल्हासे ॥ ढाल १७ ॥ ARSANSAR JainEducationaKaManational For Personal and Private Use Only L an.jainelibrary.org Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education ॥ उल्लास ३ जो. ॥ ॥ दोहा ॥ श्री जिनगुरु प्रणमुं मुदा, धर्मध्यान घरि खास ॥ दान कल्पद्रुम रासनो, थी जो नहास ॥ १ ॥ वर्णवशुं मन मोदी, श्रुतदेवी सुपसाय ॥ श्रोता जन सवि | सांजलो, अति उत्तम सुखदाय || २ || शाह धन्नो सुखमें रहे, सप्तभूमि ग्रावास ॥ नाटक | विविध प्रकारथी, निरखे चित्त नव्हास || ३ || एहवे एक दिन श्रावता, दीग पितृस्वरूप || त्रिपि तिहां, कांतायुत विद्रूप ॥ ४ ॥ वस्त्र जीर्ण वसुधी रहित, पशु विलिप्त | शरीर || दंग खंम करमें घरी, प्रातुरवंत अधीर ॥ ५ ॥ चाले पग पग पूबता, राजगृहनी | पोल || देखीने चित चिंतवे, ए शी दीसे बल ॥ ६ ॥ नकयनीमां एहने, मूक्या बेशुन काम || हवी अवस्था किम थइ, एहतो वो विराम ॥ ७ ॥ इम चिंती कट्यो तुरत, म होल थकी मनरंग ॥ प्राव्यो अति उतावलो, मात तातने संग ॥ ८ ॥ तात चरण सुपरें नमी, मिल्यो मन दरखे मात ॥ बांधव जोजाई प्रते, प्रणमी पूढे वात ॥ एए ॥ ॥ ढाल १ ली. ॥ ( देशी चोपाइनी. ) पूरे धन्नो विनयेवात, कहो तात ए शो अवदात ॥ में मुक्या हता सुख ग्रावास, एह अवस्था किम हुए तास ॥ १ ॥ तव कदे तात सुलो रे पूत्र, तुम जातां विषठ्यो घर सूत्र ॥ national For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना लक्ष्मी सवि तुम साथे थर, मंदिर शोन्ना पिण तिम गई ॥२॥राजानो नपन्यो अपमान, न०३ ५६ ।धन लीधो तिणे सकल निदान ॥ धरतीनो धन धरती गल्यो, शेष रह्या ते अनले बच्यो ॥5 ३॥ शेषाशेष ग्रही गृह सार, नऊयनीथी करिय जुहार ॥ चाल्या पंथे पाकला, मारग मांही तस्कर मल्या या लूटी लीधा अमने तिहां, फिरता फिरता आव्या इहां ॥ करिये। २ पेट पूरण अति उखे, तुज विरदे नवि बेग सुखे ॥५॥ तुज मिलवेहवे थयो संतोष, पाम्या R हवे अमे पूरण पोष ॥ तुं अम कुल मंझण कुल दीव, कुल आधार घगो तुं जीव ॥६॥ तव धन्नो मन चिंते इशो, नाग्योदय एहनो नहि तिशो ॥ प्रचन्नपणे राखी तिणे गन, बचान रण थकी सुखदाय ॥॥ करि शोना सहुनी तिणिवार, पठी पदोत्यो ते निज आगार ते माव्या तिहां व्यवहारिया, मान देने पासे लीया ॥७॥ कुसुमपाल गौना सुजन, देवपाल महिपाल देवें ॥ अमिततेज महितेज दयाल, पुण्यपाल जिनपाल कृपाल ॥ ॥ धनपाल धर्मपाल मयाल, जूधर श्रीधर ने श्रीपाल ॥ आसपाल गुणपाल पवित्र, खेमकरण जयक रण सुचित्त ॥१०॥ देवकरण कुंभकरण सुवास, विजयकरण गजकरण गोदास ।जिनरक्षि त जिनदत्त जयंत, देवदत्त शषिदत्त महंत ॥११॥ सागरचंद शिवचंद मुकुंद, गोविंद माधव धवल आणंद ॥ शंख सुनंद सुजश जयशेन, वीरसेन महसेन देवसेन ॥१२॥ इत्यादिक For Personal and Private Use Only PHiran.jainelibrary.org Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्राव्या शुन्न रीत, धन्नाशाह मिल्या एक चित्त ॥ करि हय रथ शिणगारी किया, व्यवहारी सवि साधे लिया ॥१३॥ वाजंते वाजिंत्र सुचंग, चाल्या तात तेमण मनरंग॥ प्रावी तातने ६ लाग्या पाय, सह व्यवहारी मिख्या तिण गय ॥१४॥ कुशलालाप पूछे अन्योन्य, मात दी पिता हरख्या बहु मन्न ॥ मात तात सुखासने सार, बांधवने दिया तरल तुखार ॥१५॥ नोजाइ रथे बेसारियां, आदर मान विशेष दियां ॥ तेमि आव्या निज आवास, सह साजननी पूगी आश ॥ १६ ॥ याचक जनने संतोषिया, परिघल पकवाने पोषिया ॥त्रीजे न-13 लहासे पहेली ढाल, जिन कहे पुण्ये मंगल माल ॥ १७ ॥ ॥ दोहा. ॥ धन्ने पिण धीरज धरी, निज बांधवने ताम ॥ श्राप्यां मन नत्कर्षथी, * एक एक शत गाम ॥ १॥ वस्त्रानरण गृहादिके, पोख्या घणुं अतीव ॥ तो पिण गुण लेवे है नही, अवगुण वदे सदैव ॥२॥ यतः॥ अनुष्टुब्वृत्तम्. ॥ खलःसक्रियमाणोपि, ददाति कर लहं सतां ॥ उग्धधौतोपि किं याति, वायसः कलहंसतां ॥१॥ नावार्थः-सत्कार करातो ६ एवो पण खल पुरुष जे ते, कलहंसताने आपे ने एटले नहेग करावे ; अर्थात् ते कदि पण * पोतानुं खलपणुं बोमतो नथी. जेम कागमाने दूध वझे धोयो होय, तो पण शं ते राजहंस नी पेठे धोलो थाय ? नज पाय.॥१॥अणिख अदेखाई धरे, ते त्रिएये शठ सींह ॥ शाम में Jain Educationalp ational For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० Այ वदन ग्रहनिशि रहे, जाग्यहीनमां लीह ॥ ३ ॥ ते देखी धनशाहजी, चिंते चित्त विशेष ॥ एहने हितकारण जली, हुं जाइश परदेश ॥ ४ ॥ यतः ॥ आर्यावृत्तम्. ॥ दिसइविविरियं, जाणिकइसकणकण विसेसो ॥ अप्पाणं च किलकर, हिंमऊ तेण पुहविए ॥ २ ॥ जावार्थ:- परदेश जवाथी विविध प्रकारनां चरित्र देखवामां आवे बे, सन ने दुर्जनमां शुं फेर बे? ते जाणवामां आवे वे अने आत्मानी कलना थाय बे; ते माटे पृथ्वीमां चालवं जोए ॥ २ ॥ ए लक्ष्मी ए गृह प्रमुख, विलसो एह निश्चिंत | सुख संयोग लहिशुं मे, | जो देशे जगवंत ॥ ५ ॥ इम निश्चय करि चित्तथी, गृहि चिंतामणी पास || एकाकी दृढ मन करी, चालण कियो प्रयास || ६ || राजाने पूग्यो नहीं, त्रिएये स्त्रीने तेम ॥ श्वसुर प्रमुख सवि सयाने, नाग कंचुकी जेम ॥ ७ ॥ बांमीने चाल्यो चतुर, यामिनिये तिल ताल || देश विदेश विलोकतो, नवनव कौतुक ख्याल ॥ ८ ॥ ॥ ढाल २ जी. ॥ ( मगधदेशको राज राजेसर. - ए देशी. ) शाह ते पुण्य प्रयोगे, चिंतामणी संयोगे ॥ चिंतित कार्य सकल साधतो, ना ग्यबले सुख जोगे रे ॥ नवियां, फल देखो || पुण्ये सयल पदारथ सीके, पुण्य प्रबल जग देखो रे || || पु० ॥ १ ॥ ए प्रकली ॥ वचदेशे कोशंबी नगरी, अनुक्रमे तिहां Jain Educationmational For Personal and Private Use Only नु०३ Այ n w.jainelibrary.org Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ HEE मकणे आवे ॥ स्थानक सुंदर सेई धनथी, सुखमय काल गमावे रे ॥०॥पुणा॥राय सं. 15 तानिक तिहांनो राजा, सहस्रानिकनो बेटो ॥ त्रीश राज्यगुणे करी पूरो, त्यागी मांस आखेटो रे ॥न०॥पु०॥३॥ यतः॥आर्यावृतम. ॥शग्दमनाशपालण-माश्रितन्नरणं च राज्यचिन्हानि ॥ अनिषेकपट्टबंधो, वालव्यजनं व्रणस्यापि ॥१॥नावार्थ:-शग्ने दम, अश, पालण करवं अने आश्रितजनो एटले शरणे आवेलानुं नरण पोषण करवू, एज त्रण राज्यचिन्ह ; परंतु शब्दमनादिक विना राज्यानिषेक, मस्तके पट्टबंध अने बन्ने बा13 जु चामरोनुं विंजावq, ते गूममा तुल्य छे. अर्थात् गूममाने जेम पाणीनो अनिषेक, पाटो । अने मांखीननु नझाम, थाय , तेम पूर्वोक्त राज्यचिन्द विना अनिषेकादिक पण गूममा तुल्य जाणवा.॥१॥ जेहनी नगिनी जयंती जाणी, सतियो मांदे गवाणी ॥ बालकुमाकरी प्रथम शय्यातरी, वीरे जेह वखाणी रे ॥ ज० ॥ पु०॥॥ राय संतानिकनी पटरा णी, मृगावती सपराणी ॥ चेमा महाराजानी पुत्री, चावी जगमा जागी रे ॥न०॥पुर ६॥५॥ पुत्र नदायन नामे शूरो, सकल कलाये पूरो ॥ वीणा नाद विशेषे वजावे, गांधर्वि क गुणे पूरो रे॥न ॥ पु०॥६॥ सौनाग्यमंजरी नृपनी बेटी, रूपे रतिनी जोमी ।ल क्ष्मीनी परे लक्षणवंती, कोय न दीसे खोमी रे ॥न ॥ पु०॥७॥राय संतानिकने नंमा RSE-5-%E Jain Education national For Personal and Private Use Only C ainelibrary.org Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धबारे, सहस्रकिरण मणि सोहे ॥ पढी परंपर सह को पूजे, दर्शन करी दिल मोहे रे ॥०॥ ०३ प पु०॥ना पिण तेहनो गुण कोय न जाणे, तव नृपे परिक्षक तेड्या ॥ मान देइने मणि गु दण पूछे, पिण कोइ न कहे बेड्या रे॥०॥पु०॥णा तव नृपे नगरमा पमह वजायो, सुण 8 । जो सकल लोकाश् । जे ए मणिनो गुण देखामे, प्रत्यय प्रगट बना रे ॥०॥पुणा १०॥ & तेहने नृप बेग्यो दिये हरखे, पांचशे गाम नदार ॥ पांचशे दापी पांचशे घोमा, वलि थे। अवर प्रकार रे ॥न०॥पु०॥११॥ बेटी गुणनी जे ने पेटी, सौन्नाग्यमंजरी सारी ॥ परणा वे नृप तेहने रंगे, मणि परिक्षक जे विचारी रे ॥न०॥पुण॥१॥ सांजली पमह बव्यो ते । जाणी, धन्नाशाहे ताम ॥ राजसन्नामां आव्यो वेगे, नृपने करी प्रणाम रे ॥नापु॥१३६ ॥ देखी नृप लघु वयथी बोले, रे कच! तूं इजी नहानो ॥ रत्न परिक्षा करवा समरथ, कोश न परगट गनो रे ॥०॥पुण॥१॥ बुद्धि विशेष जो होये तुमची, तो ए मणी गुण दाखो। ॥ ढाल ए बीजी त्रीजे नल्हासे, जिन कहे मन दृढ राखो रे ॥न०॥ पु॥ १५ ॥ ॥दोहा. ॥ कहे धनशाह नृपति सुणो, रत्न परिक्षा वात ॥ शास्त्र सकल जोयां अने, || गुरु समीप सुविख्यात ॥१॥ हीरो मोती निलमणी, माणिक्य मरकत संच॥ मूल रत्न नानेद ए, शास्त्रे बोल्या पंच ॥२॥ पुष्कराज वैडूर्य तिम, विद्रुम ने गोमेद ॥ ए चारे UN Jain Education national For Personal and Private Use Only Gujainelibrary.org Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नपरत्नना, दाख्या ने शुननेद ॥३॥ ए नव रत्नने आश्रया, नव ग्रह के निरधार ॥ फल | पिण देखामे तुरत, श्रेष्ट नेष्ट तिशिवार ॥ ४॥ पद्मराग रवि । मौक्तिक शशा, २ विद्रुम नौम ३ विख्यात | बुध मरकत धनगु वजू ५ तिम, पुष्कराज गुरु ६ जात ॥५॥ ६६ नील शनिनो ७ करो, राहु गोमेद गणिऊ ॥ केतु वैमूर्य ते लसगियो ए, नव विध एह नणिऊ ॥६॥ स्फटिक रत्न चिहुं नेदश्री, सूर्यकांत १ शशिकांत २॥ हंसगर्न ३ जलकांत तिम, गुण निष्पन्न एकांत ॥ ७॥ साउनेद रत्नना, रत्नपरिक्षा मांह । गुण अवगुण पिण तेहना, दाख्या सोबाह ॥ ७॥ ॥ ढाल ३ जी.॥ (काज सीध्यां सकल दवे सार.-ए देशी.) है पीरोजा अवर प्रकार, नील गंयावंत नदार ॥ पीत रक्त प्रत्ना पिण होवे, शाम रंग ते सवि विष खोवे ॥१॥ए चारे पीरोजा जाते, गुण एहना नव नव नांते ॥ पारापत ग्री वा रंगे, मणि सिंदूर वर्ण अन्नंगे ॥२॥रेखायुत अवर प्रकार, मणि नेद अनेक विचार ॥ 18 हवे चिंतामणिनो लेद, निसुणो कहुं टाली खेद ॥ ३ ॥ दीरानी कांति समान, नासूर अ-15 ति देदिप्यमान ॥ रेखा त्रिएये करी युक्त, मणि दोष थकी विप्रमुक्त ॥ ४ ॥ षटकोण जलो पर तरतो, सवाटांक प्रमाणे धरतो॥ ते चिंतामणि श्म कहीए, सेव्याश्री सवि सुख ल *55555 Jain Education national For Personal and Private Use Only Ixhujainelibrary.org Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 17 ३ एपद 5 धन्ना० । हिये ॥ ५॥ रति नपरलो जेह रत्न, तेहना कीजे बहु यत्न ॥ रत्नाकरनो निष्पन्न, स्वान्नावि- क घाट संपन्न ।। ६ ॥ तेह रत्न सकल फल आपे, खंमित कुःख स्थानके थापे ॥ हवे मौक्ति क आठ प्रकारे, नत्पत्ति कही अनुसारे॥७॥ीपोदर १ गजने शीश २, म ३ शंख ४ से वराह ए जगीश ॥ वंशमूल ६ मंमूकने ७ नाग , ए आठ स्थानक शुन्न लाग॥७॥ मगिरत्न तथा बहु नेद, दाख्या शास्त्र तजीने खेद ॥ तुम मणि ए बहु मूल्य, चिंतामणी | रत्नने तुल्य ॥ए॥ एह मणिने राखी संग, करे युः ते होय अनंग ॥ एह जेहने गृहे पू-14 जाये, इति सात तिहाथी जाये ॥१०॥ नूत प्रेतादिक साहात, जे कोप्या करे नत्पात ॥ ते पिण एह रत्न प्रनावे, शुन्न शांति होवे वदावे ॥११॥ ज्वर वमन शूलादिक रोग, ते एल मणिने संयोग । सवि कष्ट ते दूरे प्रावे, जिम रवि तेजे तम जावे ॥१२॥ एहनो प्रत्यय 8 तुमे देखो, सुविशेष थकी तुमे पेखो। महोटो एक थाल मंगावो, शुन्न शालि कणेथी न-2 रावो॥ १३ ॥ मध्यस्थाने ए मणि मूको, पडे निरखंतां मत चूको ॥ को पंखी जात न 8 खाशे, तो ए मणि परिक्षा थाशे ॥१४॥राजाये ततक्षण कीधो, को पंखोये कण नवि लीधो॥ मणि लीधो थालथी जाम, कण खाधा पंखीए ताम ॥ १५ ॥ सुणो स्वामी रत्ननो | एह, प्रत्यक्ष प्रताप अव्ह ॥ थाल पासे व्रमण खगे कीधो, कण मात्र किणे नवि लीधो ॥.. -A- SACARENESS 45%4545%25% Jain Educatio ational For Personal and Private Use Only T w.jainelibrary.org Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ *** १६॥तिम ए मणि जेहनी पासे, वैरी गद इति ते नासे ॥ नूतादिक तेहने नवि कोपे, एई 18 मणिने कोय न लोपे ॥१७॥ सुणी राजा प्रत्यय पाम्यो, मन हरख्यो जे हुवो कामो॥ध-12 नाने ये सनमान, परख्यो ए बुद्धि निधान ॥ १७॥ जोतां मिल्यो जुगते जमाइ, पुत्रीनी पूरण पुन्या ॥त्रीजे नल्हासे सवाइ, ढाल त्रीजी जिन श्म गाइ ॥ १५ ॥ ॥दोहा॥राजाये तव धन प्रते, करीनव श्रीकार ॥ पुत्री परणावी तुरत, सौन्ना ग्यमंजरि सार ॥१॥ ग्राम पंच शत सोपियां, तिम हय गय शत पंच ॥ बीजो पिण दी धो बहुल, वस्त्रादिक सवि संच ॥२॥ सुख विलसे दंपति सुखे, चक्रवर्ति सम नूर ॥ बुद्धि तेज बलवंत तस, जिम गयणांगण सूर ॥३॥कोशंबीधी बाहिरे, वाशो धनपुर गाम ॥ गढ मढ पोल प्रसादथी, सुंदर अति शुन्न गम ॥४॥ जिनमंदिर महोटां रच्यां, थाप्या है श्री जिनराज ॥पूजा सत्तर प्रकारथी, दिन दिन अधिके साज॥ ५॥ चोराशी चहुटां सुनग, विसरी तिहां बजार ॥ वरण अढार विशेषथी, करे विविध रोजगार ॥६॥ सुख संघ लो तिहां लोकने, पिण नहि नदि य निवाण ॥ तिणे आतुर धन्नो रहे, जल विण शो अहि | गण ॥ ७॥श्म चिंतीने ततक्षणे, सर करवा सुविलास ॥ स्थानक निरखीने पुरस, आरं बन्यो आयास ।। ७ ॥ शुल वेला अवलोकने, मांड्यो कार्य महंत ॥ महेनतिया महेनत करे, -** १७६१-६२०८ Jain Education Litional For Personal and Private Use Only AAjainelibrary.org Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ६० नकपणे अत्यंत ॥ एए ॥ एक कर्ष अबला प्रते, पुरुषने दोय दिनार । जोजन चोला तैल श्री, टंक दोय व्यवहार ॥ १० ॥ धन्नो राजगृही थकी, निसरियो तिथिवार ॥ जे जे कार नीपन्यो, ते निसु अधिकार ॥ ११ ॥ ॥ ढाल ४ श्री. ॥ ( कल लाखोली रे जाय. - ए देशी. ) धन्नोशाद जब नीसस्यो जी, बंकी नार। प्रसंग ॥ नारी त्रिएये ततक्षणे जी, नवि देखे पियु संग रे || प्रीतम किहां गया श्रमने रे बोकि || हांसीनी वेला नहीं जी, प्रावो वालम | दो कि रे ॥ प्री० ॥ १ ॥ प्रकल]. ॥ श्रमे तुम पालव बांधिया जी, तुमे श्रमचा जरतार ॥ तुम श्राधार वालेशरू जी, जीव जीवन निरधार रे || प्री० ||२|| मात पिताये तुम प्रते जी, सोप्या पंचनी साख ॥ केरु न बोडुं जोवतां जी, ते निश्चय मन राख रे ॥ प्री० ॥ ३ ॥ ए मंदिर ए मालियां जी, ए सुखसेज सुवास ॥ सरवे वल्लन तिहां लगे जी, जिहां लगे तुं पियु पास रे ॥ प्री० ॥ ४ ॥ इम कहती त्रिएये सती जी, जोया सयल ग्रावास ॥ नवि दीगे. वल्लन तदा जी, श्रावी सासू पास रे ॥ प्री० ॥ ५ ॥ श्रम प्राणेश दीसे नही जी, श्रम मंदिर इलिवार || बाइजी तुम जाया पखे जी, अवर कवण आधार रे || प्री० ॥ ६ ॥ इम कती रमती थकी जी, ते त्रिएये तिथिवार ॥ विरह विलाप करे घणा जी, कहेतां नावे Jain Education national For Personal and Private Use Only न० ३ ६० v.jainelibrary.org Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पार रे॥ प्री ॥७॥शीलवती पिण सानली जी, धरणी ढली ततखेव ॥ वारंवार ए पु. त्रनो जी, विरह दिये कां दैव रे ॥प्री०॥जा तुं मुज आंधा लाकमो जी, कुलमंझण कुल जाण ॥ पर नपगारी परगमो जी, पैतृक दुःखनो जाग रे ॥प्री० ॥ वय पाकी हवे असे म तणी जी, तूं किम मूकी रे जाय ॥ घरपणमें सेवा तणो जी, फल अधिको कहिवाय रे । प्री॥१॥ यतः॥ अनुष्टुववृत्तम् ॥ पतिताः पितरस्त्याज्याः, माता नैव कदाचन ॥गर्न धारण पोषान्यां, नवेन्माता गरीयसी॥१॥नावार्थः-पतित थएला पिता त्याग करवा 31 | योग्य , परंतु माता तो कदि पण त्याग करवा योग्य नथी; कारण के, गर्भधारण अने पो Hषण करवाश्री माता वधारे मान्य बे.॥१॥श्म निष्टुर मन तुम तणो जी, किम थाये ।। रे पूत ॥ तुजविण कणमां अम तो जी, विणले ने घरसूत्र रे ॥जी॥११॥ धनसारे पि सांनली जी, पुत्र गमननी रे वात ॥ शोकातुर विलवे घj जी, करे अशेष अश्रुपात रे । प्री०॥१॥नोजाई त्रिएये तिहां जी, श्रावी ते समकाल ॥ धन्ना गुणधी गोरमी जो, रे 51 हृदय विचाल रे ॥ देवर०॥ १३ ॥ अमने तुमे सुखीया कीयां जी, वारंवार पवित्र ॥नालग्यहीन दु अति अमे जी, तुमे देवर सुचरित्र रे ॥ दे॥१४॥ यतः॥ आर्यावृत्तम्. ॥ सायरी * तुझन दोसो, दोसो अह्माण पुवकम्माणं ॥ रयणायरंमि पत्ते, सालूरो हाल मे लग्गो ॥२॥ For Personal and Private Use Only M .jainelibrary.org Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 8 - धन्ना० नावार्थ:-हे समुइ! आमां तारो कांश पण दोष नथी, दोष तो अमारा पूर्व कर्मनोज ६१ / केमके, रत्ननी खाण एवो तुं मल्यां उतां, मारा हाश्रमां तो पचरज आव्यो! ॥२॥ दोष 5 नथी इहां तुम तणो जी, ने अम दोष सुजाण ॥ पिण शुं कीजे तेदशं जी, कोइ न चाले । त प्राण रे ॥ दे॥१५॥ अम अवगुण जो देखशो जी, तो अम कोय न गय ।। सऊन कल्पद्रु । म कह्या जी, उहव्या फल दे जाय रे ॥ दे० ॥१६॥ यतः ॥ सोन सऊन अंब सम, अवगुः । पण तजी गुण लेय ॥ नन तथे पवर हणे, नन तथे फल देय ॥ ३॥ नावार्थ:-तेज सऊन 18| के, जे आंबाना वृक्ष जेवा होय . केमके, कोइ माणस जो तेने पपरो मारे , तो ते आं-15 बानो वृक्ष नलटो तेने फल प्रापे रे.!॥३॥ रात्रि सकल सवि सयणने जी, रुदन करता है विहाय ॥ प्रत्यूषे नृप प्रमुखने जी, सवि विरतांत जणाय रे ॥ पूता॥१॥ गम गम तुरि । दोमव्या जी, मूक्या प्रेष्य अनेक ॥ पिण धनाशाहनी तिहां जी, खबर न लाव्यो एक रे॥ पूता० ॥१७॥ विस्मय सवि पामी रह्या जी, देखी धन्न चरित्र ।। त्रीजे नव्हासे जिने कही जी, चोथी ढाल पवित्र रे ॥ पूता०॥ १ ॥ ॥ दोहा. ॥ राय कोपी धनसारने, कहे रे सांजल शेठ ॥ अम जमाइ उपर अधिक, । राखी विरुश् ॥ १ ॥ अम जमाइ जाते थके, अमे मूळाणा आज ॥ बुहिवंत नहि अवर Jain Education national For Personal and Private Use Only a w.jainelibrary.org Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ को, जेह चलावे काज ॥२॥ अन्नय कुमरना विरहथी, दाम्या दूता पूर ॥ ऊपर खूण थ यो इहां, विरह धन्नानो नूर ॥३॥अम पुत्री दुःखणी थइ, पति वियोगथी प्राय ॥ एह स ४ है यल अस्वास्थिनो, कारण तूं हि कहाय ॥४॥ तव बोल्यो धनसार श्म, नृपने करी प्रणाहम ॥ धनपति मुज वल्लन घणो, आशानो विश्राम ॥ ५॥ मुजश्री दुःख पाम्यो नथी, पि Pण ए अग्रज वेण ॥ निसुणी रात्रे नीकल्यो, मी सघलो सेण ॥६॥यतः॥अनुष्टुब्वृत्तम्.॥ रेजिह्वे कुरु मर्यादां, नोजने वचने तथा ॥ वचने प्राण संदेहो, नोजने च अजीर्णता ॥१॥ नावार्थ:-हे जीन! तुंनोजन करवाने विषे अने वचन बोलवाने विषे मर्यादा राख; कार- 15 - के, जो वचनने विषे मर्यादा नहि राखे तो, को वखत जीव जशे अने नोजनने विषे । मर्यादा नदि राखे तो अजीर्ण थशे. ॥१॥ सुणि नूपति ते त्रिएयने, दंझी लीधो दाम ॥ ग्राम प्रमुख खाँची लियां, पामो संघली माम ॥७॥ धन हीणो धनसारजी, थयो ते थो 5 काल ॥ न मिले असन व्यसन प्रमुख, दुःख पामे अप्सराल ॥ ॥ धन हीणो शोने नहीं, | ज्यूं आवलनो फूल ॥ धनवंतो आदर लहे, चंपा फूल अमूल ॥॥ यतः॥धनमऊय का कुस्थ, धनमूल मिदंजगत् ॥ अंतरं नैव पश्यामि, निईनस्य शबस्य च ॥॥नावार्थ:-हे राम! तुं धन पेदा कर, कारण के, पालुं जगत् धनना पर आधार राखनारंडे, केमके । Jain Education a tions For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नु०३ ६२ घन्ना० निर्धन अने निर्जीव एवं ममई, तेने विष हुं कां फेर देखतो नश्री. अर्थात् जो पासे धन होय, तोज सहु मान आपे; परंतु को ममदानी पेठे निर्धनना सामु जोतुं नथी. ॥२॥ ॥ ढाल ५ मी. ॥ (त्रिपदीनी देशी.) धन नझित धनसार रे, चित्तमें चिंतवे ॥ इहां रहेवो जुगतो नहीं ए ॥ महोटाशुं सं-12 बंध रे, सगपणनो सदा ॥ तिणे करी लाजीजे सही ए॥१॥ धना विण घरसूत्र रे, धूल ली मिली गयो । लाज गइ सवि माहरी ए ॥ तिणे करी हवे परदेश रे, पिंमने पालशं ॥ मूल | मजूरीने करी ए॥२॥ धन्नाशाहनी नार रे, त्रिण्ये तेमीने ॥ सुपरे सुसरोजी कहे ए॥ 18 पीयर जान पुत्र रे, सुखमें तिहां रहो ।। तुम पति दुःख अमने दहे ए ॥ ३ ॥ अमे जाशुं || परदेश रे, धनाशाह नणी॥ गोति करीने लावश ए॥ जो मिलशे ए पुत्र रे, तो तेहने इ-11 I हां ॥ तेमी वदेला आवशु ए॥४॥ सोमश्री कुसुमश्री रे, सुसराझा थकी ॥ प्रणमीने पीली यर गइ ए॥ कदे सुन्नज्ञ ताम रे, साश्रु लोचन करी ॥ विनय श्रको अवनत थई ए ॥५॥ ४हूं आवोश तुम साथ रे, निश्चयश्री करी॥तुम सेवा करती थकी ए॥ स्त्रीने रहेवो सास | रे, प्रतिपके सदा ॥ शास्त्रे पिण ए वकी ए॥६॥ स्त्रीने पीयर जेम रे,तिम नर सासरे॥ थिरवासे मुनिने सही ए॥ तेग रहित नृप तेम रे, मंत्री मति विना ॥ एटला सुयस लहे ६२ SAGAR Jain Educatio n ational For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नहीं ए ॥७॥ यतः॥ स्त्री पीयर नर सासरे, संयमिया सहवास ॥ एता होय अलखामगा, जो मंझे थिरवास ॥१॥नावार्थ:-स्त्री पीयर, पुरुष सासरे अने मुनि एक नपायमां, एत्रणे पूर्वोक्त स्थानकमां घणा दिवस रहे, तो जरूर अलखामणा थाय. ॥१॥ जिण दिन धन होय पात रे, पति संगे होवे ॥ ते दिन पीयर रूयमो ए ॥ पिण लही आपद योग रे, बंझी सासरो ॥ पीयर जावो कूयमो ए॥७॥ सुख दुःख सवि तुम साथ रे, नोगविद्यु सदा ॥ धीर धरो तुमे तातजी ए ॥ जो मिलशे पियु योग रे, तो पीयर हवे ॥ आवशंस18| यल संपद नजी ए॥ ए॥ सुणी दरख्यो धनसार रे, धन धन ए वहु ॥ सहमें ए आधार 8 ने ए॥मात तात ने जात रे, सासरियां यकी । लेखवीया सघला पळे ए ॥ १० ॥ चाल्यो । हवे धनसार रे, राजगृही थकी ॥ अंगज स्त्री वधु परिवस्यो ए ॥ वस्त्र विनूषण हीन रे, से दीनपणा थकी।नंमोपगरण शिरे धस्यां ए ॥ ११ ॥ अष्ट करमथी जीव रे, जिम संसार २ मां॥ परित्रमणां करे परगमो ए॥तिम धनसार तिवार रे, आये जन थकी ॥ देश विदेश फिरे वमो ए॥ १ ॥ जोतां वन आराम रे, ग्राम घणांनमे ॥ पिण घिरता न लहे किहां जए॥ काशंबीपुरि पास रे, आवे अन्यदा ॥ वार्ता वृत्तिनी लहे ए॥ १३ ॥ धनपुरमें धनशेठ रे, शर खानन नणी ॥ आपे प्रबल आजीविका ए ॥ स्त्रीने एक दिनार रे, युग्म पुरुष प्रते CHECORRECRॐ Jain Education national For Personal and Private Use Only K a inelibrary.org Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ * * * ॐॐ** * धन्ना० ॥ तैल चोलादि हितथकी ए॥१४॥सणी हरख्यो धनसार रे, सार नपाय ए॥नदर न. ६३ ४ रण करवा नणी ए ॥ ढाल पांचमी एह रे, त्रीजा नल्हासनी ॥ कही जिनविजये सोहामणी ए ॥ १५ ॥ ॥दोहा. ॥ श्राव्यो धनपुरमें तुरत, पतिवृत ते धनसार ॥ देखे व्यापारी तिहां, नां है। तिनांति तिमिवार ॥१॥ नाणावटी दोशी तिमज, पारेखने मणिहार ॥ सौक्तिक मुक्ता फल क्रयिक, घृत तैलादि विचार ॥॥ सोनी मांधी सामटा, फमीया ने तांबूल ॥ साथ। रिया सुखन्नदिका, कारक तिहां करे मूल ॥३॥ देखी व्यापारी सकल, पूछे तव धनसार K॥ व्यापारीने वणिजना, धननो कवण दातार ॥४॥ तव ते कहे अम नगरनो, स्वामी है। 8 धनशेठ ॥ ते धन आपे व्याज विण, नाग्यवंत लही ॥ ५ ॥ निर्धनने पिण शर खनन, कीधो आधार ॥ सन्निलिने हरखित थयो, परिकर युत धनसार ॥६॥ ॥ढाल ६ ही.॥ (नदी यमुनाके तीर नमे दोय पंखीयां.-ए देशी.) पुत्र सहित धनसार सरोवरमें तदा, करे तिहां खननन कार्य धरी मनमें मुदा ॥ बां-181 धी कोटा तंग सुरंग पणे करी, कोश कोदाली तेम खणे ते करे धरी ॥१॥ शीलवती है। नी साथ वढू चार तिहां, माटी वहे न। पात्र ते खात्र खणे जिहां ।। क्लिष्ट कार्य करी एम ६३ * * ॐ Jain Educationa l atonal For Personal and Private Use Only P ainelibrary.org S Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दिवस सवि निर्गमे, नोजन चोला तलै प्रनात संध्या समे॥२॥ एहवे धनपतिशाह सरो 5/ वर देखवा, आवे धरीय नमाह कारीगर पेखवा ।। साथे सवि सामंत मंत्रीश्वर नृप तणा, दशेठ सेनापति वृंद सेवक पिण अति घणा ॥३॥ शिरपर सोवन स्त्र सूरज परे जगमगे, त याचक नोजक नाट अनेक ते नलगे ॥ जय जय तूं चिरंजीव तुं स्थित दुःख हरु, आश्रित जन आधार सयणने सुखकरु. ॥४॥ आवी सरोवर पाल जोवे चिहुं दिशि फिरी, 2 सरोवर केरो काम ते नद्यम मन धरी ॥ देखो तातने मात बांधव नान्नी वहु, चिंते चित्त मकार ए किम आव्यां सहु ॥ ५ ॥ जोईने निरधार करी मन चिंतवे, मात पिताने जात प्र मुख सवि संनवे ॥ पिण मुज कामिनी एह सुन्नज्ञ नामिनी, माटी वहे सहे कष्ट देखो गति कर्मनी ॥६॥ यतः॥ अनुष्टुब्वृत्तम्. ॥ कृतकर्म कयो नास्ति, कटपकोटीशतैरपि ॥ अवश्यमेव नोक्तव्यं, कृतंकर्म शुन्नाशुन्न ॥१॥ नावार्थ:-अजोना अजो कल्प (युग)२ जाय, तो पण करेला कर्मनो कय अतो नथी; केमके, सारु अश्रवा नरतुं, जे कर्म करयु हो य, ते अवश्य नोगवद्ज पमे .॥१॥ कर्मवशे दमयंती नल प्रिया दुःख लहे, राम घरनगी तिम सीत लंकागढ दुःख सहे॥ कलावतीने कर्म नदय पाव्यां यदा, शंख नृपे धरील । रोष बेदाव्या कर तदा ॥ ७॥ सुरसुंदरीने कंत वने मेली गयो, शैपदीने वनवासमें :ख है Jain Education Pational For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ سه धन्ना० बहुलो अयो॥ प्रत्नावतीने कंत वियोग थयो वली, मृगावतीनो कष्ट ते जाणे केवली ॥७॥न. 18 नृप पवनजय नारी सहे दुःख अंजना, नर्मदासुंदर तेम करी पति रंजना ॥ मयगरेहा सती कष्ट लही ते सहु कहे, अचंकारी तेम अतूल पीमा सहे ॥ए|| चंदनवाल विशाल गुणेथी वखाणीए, कर्मोदयथी तेह वेचाणी जाणीए ॥ हरिचंरायने पुत्र स्त्री तारा लोचना, वेचायां परतक्ष शी करवी सोचना ॥ १०॥ देखो कर्मनी वात प्रावी वनी एहने, नो-2 | गोलमर शालिन बांधव ने जेहने ॥गौनइ सम तात मात नज्ञ सती, मुज सरिखोन ६ रतार ने सुख न लहे रती ॥ ११ ।। जुन जुन मात ने तात अनेक विपद सहे, नदरत्नरणने काज नपल मस्तके वहे ॥ जगमें उनर पेट कह्यो ने शास्त्रमें, कुण कुण न करे अकाज जनते अनुक्रमे ॥१॥ यतः॥सवैयो तेत्रीगो.॥जख कलीन करे अकलीनके नख घरो घर नीख मगावे, नीचकी चाकरी नूख करावे निर्मल बंशकु मेल लगावे ॥ नूख । | नमावे विदेश विपनिमें दीन दुःखी मसकीन कहावे, नूख समो नही दुःख जसा कोई पापिणी नूख अन्नद नखावे ॥२॥ देखो धनावद शेठ अन्नद नक्षण कस्यो, सुसमा पु त्री मांसलखी तन निज धस्यो॥ नदरार्थे नलराय समारपणो कीयो, घर घर मंज नरेश माग टूकमो लीयो ॥ १३ ॥ आषाढनूती आहार निमित्ने विद्या करी, नव नव रूप बनाय । ANS-S--NCRECTOR-NCR-CRORE Jan Education to For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मोदक लिया फिरी फिरी ॥ राय यशोधर मांस नख्यो नयनावली, डुमर नदरने काज'। अकाज करे वली ॥ १४ ॥ कर्मतले वश जात ए दुःख बहूलां सहे, लक्ष्मी गृह सुखवास तिहां ए दुःख लदे ॥ न लड़े विनय विवेक विचार आचार ए, मान मगन रहे मस्त न धर्म विचार ए ।। १५ ।। एहना संगथी मात अज्ञात घणी सहे, तिम वली तात विख्यात विटं बनता लदे || जोजाई पि चातृथी आपदमें पकी, मुज -रामा इस साथ लहे दुःख बापमी ॥ १६ ॥ यतः ॥ अनुष्टुवृत्तम्. ॥ कुसंगा संग दोवेरा, साधवो यांति विक्रियां ॥ एकरात्रि प्रसंगेन, काष्टघंटा विटंबना ॥ ३ ॥ नावार्थ:- खराब मालसनी सोबतथी सारा माणसो पण विक्रिया पामे बे; कारण के, हराइ गायनी साधे ( सारी गायने ) एक रात सोबत.. रहेवाथी बे पर बच्चे लाकरुं अने गलामां घंटमीनी विटंबना थर ॥ ३ ॥ हवे हुं मातने ता त प्रिया प्रतिपालशुं, ए बांधवने दूर करी रखवालशुं ॥ इम आलोची वात धन्ने धीरज धरी, त्रीजे नल्हासे ढाल बही जिन जयवरी ॥ १७ ॥ ॥ दोहा ॥ तात प्रते पूछें तुरत, धनपतिशाह सुजाण ॥ कवल तुमे कोण ग्रामश्री, श्राव्या वो इल ठाय ॥ १ ॥ तव लकाश्री गोपवी, अवर कह्यो अधिकार ।। पिरा धन्ने निश्चय कियो, एद सही निरधार ॥ २ ॥ धन्नोशाह चित चिंतवे, धन विएा लाजे ए ॥ ति १७ Jain Educatioemational For Personal and Private Use Only v.jainelibrary.org Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६ धन्ना० करी निज कुल गोपवे, तिणमें नही संदेह ॥ ३॥ कारवाइने कहे, मोलो मोसी वृक्ष ॥ न ३ 5 एहने घृत गुरु अन्न शुक्ल, देजो तुमे अविरु६॥४॥ सर्व 'नृत्यमा वृक्ष ए, थाये करी प्रा | देश ॥ तव धनसार खुशी अयो, तूग्यो मुज इन्येश ॥ ५ ॥ ॥ढाल ७ मी.॥ (सीता तो रूपे रूमो.-ए देशी.) । हवे बीजे दिन धनो, आवे तिहां अति सुप्रसन्नो हो । सुकृत फल एहवां ।। ए आंकसणी॥ बोलावे हित आणी, धनसार नणी शुन्न वाणी हो ॥ सु० ॥१॥ तांबुलादिक तस २ आपे, तव हर्ष घणो तस व्यापे हो ॥ सु०॥त्रीजे दिन तिम हेव, धनपति आवे धरी टेव हो ॥ सु०॥२॥ वस्त्र अनेक अणावे, सवि नृत्य प्रत्ये तेमावे हो ॥ सु०॥ वस्त्र दिये तस त ताम, अति हरख्या नृत्य सुकाम हो । सु॥३॥ पळे वृक्ष प्रते तेमावे, अंबर नत्तम प हिरावे हो ॥ सु०॥ माता प्रते पटकूल, दिये हर्ष धरी बहु मूल्य हो ॥ सु०॥४॥ ब्रातृने । सम परिणामे, दिये सुंदर वस्त्र सुकामे हो ॥सु॥ ३त्रातृजाया पिण आवे, सामी तस शुन्न पहिरावे हो ॥ सु०॥५॥ एक चीर अमूलिक सार, आपे कांताने तिणिवार हो ॥सु० 31 ||सवि परिकरने संतोषी, धनसार प्रते कहे पोषी हो ॥ सु०॥६॥ सुणो तुमे गे वृक्ष सु १ चाकरमां. २ वस्न. ३ नोजाश्यो. SEGLUSTRISSISSASSISTES Jan Education international For Personal and Private Use Only Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जात, तुम गुण अम चित्त सुदात हो ॥सु०॥ किशी वाते फुःखी मत थाजो, जे जोए ते ४ मंगावजो हो । सु०॥७॥ए अम घर ने सवि तुमचा, तुमे तात स्थानक गे अमचा हो । ॥ सु॥ तुम 'तनुये गरमी दीसे, अमे जागीए विसवावीसे हो ॥ सु॥७॥ तिणे श्तक प्रमुख अम घरथी, लीयो गंमी त्रपानवि परथी हो ॥ सु॥ ए तुम विधुने तुमे कदेजो, - सुखे काल इहां निरवहेजो हो । सु०॥ ए॥ देश आसासना तिणे गमे, मंदिर ये रदेवा कामे हो ॥ सु॥श्म प्रति दिन खबर ते लेवे, जे जोइए ते तसु देवे हो ॥ सु॥१०॥ घेर आवी कहे धन्नशाह, प्रिये सांजल मन नचाह हो ॥ सु०॥ परदेशी उत्तम प्राणी, इहां आव्या ने अम जाणी हो ॥ सु० ॥ ११ ॥ तेहने के वधु चार, गुणवंती अति मनुहार हो। सु०॥ लेवा ते तक जो आवे, तुमे देजो तव नले नावे हो ॥ सु॥१२॥ पण तेदमां ल-* घु जेह, धरजो तुमे तेहशुं नेह हो ॥सु॥ तस देजो प्रादरमान, क्ली देजो फोफल पा, न हो । सु० ॥ १३ ॥ तिम शाक प्रमुख सुविचित्र, देजो तुमे पुण्य पवित्र हो ॥ सु०॥ अति गोरस सरस सवाद, देजो दिल धरी आल्हाद हो ॥ सु० ॥१५॥श्म शीख देई मन रंगे, धनपति पिण रहे सुखसंगे दो ॥ सु०॥ धारपाल प्रमुखने नाख्यो, सहु सेवकने १ शरीरे. २ गश. ३ बहुने. ४.दरवाजा नपर रहेना सीपाइ. Jain Education national For Personal and Private Use Only linelibrary.org Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ C धन्ना पिण दाख्यो हो ॥ सु॥१५॥ हो शेठ तिहां धनसार, कहे वहु प्रते सकल विचार हो। न०३ ६६ सु०॥ तुमे जान धनपति गेद, तक्रादिक लावो ये जेह हो । सु० ॥ १६ ॥ तव ते वहु नि. ६ सुणी वाणी, वारू कहे मनमां जाणी हो ।। सु०॥त्रीजे नल्हासे गवाणी, ढाल सातमी | जिन गुणखाणी हो ॥ सु ॥ १७॥ ॥दोहा. ॥ हवे ते त्रिण्ये वधु तिहां, लेवा आवे तक ॥ स्वछ दिये जल सारिखी, नयन वदन करी वक्र ॥१॥ चोने दिन ते लाजथ), आवे सुत्नश जाम ॥ सौन्नाग्यमंजरी 5ए तिहां, बेसामी शुन गम ॥२॥ आदर देश अति घणो, आपे गोरस सार ॥ कहे बाइ तूं ४ आवजे, नित प्रते मुज आमार ॥ ३॥ तकादिक पिण अति अवल, लेश्ने ततखेव ॥ श्रावी | ते निज स्थानके, सासूने ये हेव ॥ ॥ तव सुसरो सासू कहे, देखो पुण्य प्रकार ॥ धनप ति वधु प्रणिपति करे, नाग्य प्रबल मनोहार ॥ ५॥ निसुणी खोजी ते त्रिणे, कहे सुगो | सासू वात ॥ नित प्रते पुत्र वखाणते, हाथी गयो विख्यात ॥ ६ ॥ वली तेहनी वधुने तु-5 18/ मे, परसंसो परगट्ट ॥ ते पिण धनानी परे, जाशे कोश्क वह ॥ ७॥ दिवसे माटी शिर व हे, रात्रे पमेनूपीठ ॥ देखो देराणी.नाग्यबल, कंत विरह अति धीठ ॥७॥ सुगी सुनश ते वचन, दाजी दिलमें दीन ॥ नयश्री आंसू करे, विरह व्यथा लयलीन ॥ ए॥ ARRRRRRC 1250-55-% Jain Educatol ( mational For Personal and Private Use Only A lainelibrary.org Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ ढाल मी.॥ (रतनशी गुण मीठमा रे.-ए देशी.) एक दिवस सुन्नज्ञ सती रे, आवे ते लेवा गश ॥ सौन्नाग्यमंजरीए तिहां रे, बेसामी लेश पास ॥ बहिन कहो कुःख मुज प्रते रे ॥१॥ए प्रांकणी।। तुमे गे चतुर सुजाण ॥ प्रीति बंधाणी ने माहरे रे, तुमथी जीवनप्राण ॥ ब० ॥२॥ आंख अरूण दीते ताहरी रे, मुख बबी अति दिलगीर ॥ नीसासा पिण एवमा रे, नयणे करे बहु नीर ॥ ब० ॥ ३ ॥ सु सरो सासू ने ताहरे रे, जेणीने जेठः।। वर वारू हशे ताहरे रे, पीयर पिण हुशे नेठ ॥ A ब०॥४॥के पीयर दुःख सांजस्यो रे, के ऽहवी तुज कंत ॥ शी चिंता तुज एवमी रे, ४ कहे मुजने मतिवंत ॥ ब० ॥ ५॥ मुजश्री अंतर एवमो रे, तूं किम राखे मुझ॥ कहे अव दात तूं ताहरो रे, जिम हुं जाणुं शुरू ॥ ब० ॥६॥ आनन वस्त्रे श्यागदती रे, अधो. मुखत्री कहे ताम ॥ बहिन कहुं शी कर्मनी रे, गति विपरीत विराम ॥ बहिन सुणो उख माहरु रे ॥ ७॥ ए श्रांकणी ॥ यतः॥ शार्दूलविक्रिमीतवृत्तम्. ॥ ब्रह्मायेनकुलालवनियमि तो ब्रह्मांकनामोदरे, विश्नुर्येनदशावतारगहनेक्षिप्तोमहासंकटे ॥ रुशेयेनकपालपाणिपुटके 2 निकाटनंकारितः, सूर्योब्राम्यतिनित्यमेवगगने तस्मैनमःकर्मणे ॥१॥नावार्थः-जे कर्म १ .मुख. २.ढांकती. ३ नीचुं मुख राखी. 25% Jain Educatio n ational For Personal and Private Use Only 101 nelibrary.org Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० व ब्रह्मा कुन्नारना चाकनी पेठे ब्रह्मांम रूप घमाना पेटमा कबजे रखायो, विश्नु दश अ-5. मु०३ वतारथी नयंकर एवा महोटा संकटमां नंखायो, शिव हाश्रमां काचली लेश्ने निका मागे 8 व अने सूर्य हमेशां गगनने विषे जेनावमेनमे ते कर्मने नमस्कार थान. ॥ १ ॥ गोल शेठनी अंगजारे, नज्ञ नर अवतार ॥ बांधव शालिकुमार ने रे, इंश्तणे अनुहार ॥ ब०। २ ॥ तातजी पूत्रना स्नेहथी रे, पूरे वंगित नोग ॥ बत्रीश वधू अने पुत्रने रे, आपे वंटि त योग ॥ ब॥ए । तुज पति नामे माहरे रे, न र सुरंग ॥ दानी मानी ग्यानीन-5 लोरे, धरतो प्रीति अन्नंग ॥ ब० ॥१०॥श्री श्रेणिक नृप पुत्रिका रे, सोमश्री विख्यात || ॥कुसुमपाल तनया. तिसी रे, कुसुमश्री शुचि गात ॥ व ॥ ११॥ ते परण्यो तिहां प्रेमथी रे, नत्तम गुणनो पात्र ॥ कांता त्रिएयेथी क्रीमतो रे, सुगुण सुरूप सुगात्र ॥ ब० ॥१२॥ ॥ बंधव बयण विशेषश्री रे, बंझी सवि परिवार ॥ एकाकी को देशमे रे, पदोत्यो ठे निरधार ॥ ब० ॥१३॥ ते जाते लक्ष्मी गई रे, सतीय परे ते साथ ॥ सुसरादिक सवि नीस-51 । स्या रे, परदेशे विण आथ ॥ ब० ॥१५॥ नीर विना जिम कमलिनो रे, सरोवरमें सूकाय ॥तिम धन हीन मनुष्यने रे, मान नही किरा गय ॥ ब० ॥ १५ ॥ करवा नदर आजीविका रे, इहां आव्यां इशिवार ॥ सर खणीए गए तुम तणुं रे, तुमचो ने आधार ॥ ब०॥ Jain Education national For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ B १६ ।। यतः॥ किं किं न कियं किं किं न कायचं, कह कह न नामिये सीसं ।। उपर नअर-12 स्स नरणे, किं न कियं किं न काय ॥२॥नावार्थः-शं न करयु, शुं शं नहि करवा M योग्य ने अने कोने कोने शीश नथी नमाव्युं ? अपितु आ ःखे नरवायोग्य एवा पेटने मा टे न करयुं अने शुं न करवा योग्य अर्थात् सर्वे करयुं अने सर्वे करवा योग्य !॥॥ धनपतिशाद पटतरे रे, नोजन करते वात ।। सांजलीने चित्त चिंतवे रे, धन्य धन्य एह सु जात ॥ ब० ॥ १७ ।। सुचि थइ ताम सिंहासने रे, बेगे घर न जमाल ॥त्रीजे नव्हासे आ | उमी रे, कही जिनविजये ढाल ॥ ब० ॥ १७ ॥ ॥ दोहा. ॥ कहे धन्नो रे जामिनी, तुं पति हीणी दीन ॥ प्राण धरे प्राणेश विण, कि kण रीते दुःख लीन ॥१॥ फाटे कालीनूमिका, जल विरहे ततकाल ।। प्राण धरे पति वि रहथी, ए अचरिज इण काल ॥२॥ सा कहे तव लजा करी, आशाथी अहो शेठ ॥ आशा पासे बांधोया, जीव करे ने वेठ॥३॥ यतः॥ अनुष्टुववृत्तम्. ।। ईयमाशा महाराजन, 5 विपरीता हि शंखला ॥ येनबाः प्रधावंति, मुक्ता स्तिष्टंति पंगुवत् ॥१॥नावार्थ:-हे म8 हाराजा! आ आशारूपी सांकल बहु तरेहवार ; केमके, ते सांकलवमे बंधाएला पुरुषो दोमे अने तेनाथी बूटा थएला पांगलानी पेठे बेसी रहे ने. अर्थात् सामान्य सांकलयी बं ALASAHESI5515 Jain Education For Personal and Private Use Only nelibrary.org Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ६८ 'घाएला मालसो हाली चाली शकता गयी, पण तेथी बूटा हरी फसे शके बे; परंतु आ आ शारूपी सांकल तो एवी तरेहवार बे के, एना पासमा पमेला माणसो दोमदाम करे वे अने तेश्री मुक्त थरला पांगलानी पेठे निरांते बेसी रहे बे. ॥ १ ॥ तव धन्नो कहे सुंदरी, ते तु किहां लदेश || जोगव जोग जला इहां, वयण प्रमाण करेश ॥ ४ ॥ ए यौवन ए वसन सुख, ए जोजन ए वास ॥ पामीने जे हारवे, पसतावो परे तास ॥ ५ ॥ ॥ ढाल एमी. ॥ ( हो कोइ आणी मिलावे साजना . - ए. देश . ) . हो वया सुणी विष सारिखां, घन्नानां तिथिवार हो । दृढ मन करी धीरज धरी, बोले सुना बाल हो ॥ वयण विमासी बोलीए ॥ १ ॥ ए आंकली ॥ जिम रहे जगमां |माम हो । अपकीरति अलगी हुवे, परजव पिण सुख ठाम हो ॥ व० ॥ २ ॥ पश्चिम सूरज गमे, धरणी रसातल जाय हो । मेरू महिधर जो चले, अगनि ते शीतल थाय हो । ० ॥ ३ ॥ न तपे सशि सूर ज्यूं, जो रघुत्र चंचल होय हो । तो पिरा सती चूके नही,, हृदय विमासी जोय हो ॥ व ॥ ४ ॥ सतीनो सत्व मूकाववा, कीधा जेसे उपाय हो । ते दुःखीया या देखतां, पाम्या मरण सहाय हो । व० ॥ ५ ॥ सवण सीता मोहीयो, तो १ धुवनो तारो. Jain Educational international For Personal and Private Use Only उ० ३ ६८ . Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ खोयां दश शीश हो || लंका लूटावी तिहां, राम तली ते रीस हो ॥ व ॥ ६ ॥ परमोत्तर परनारथी, राज्यो शैपदी रूप हो ॥ केशव कोप करी तिदां, टाल्यो तिहांथी जूप हो । व० ॥ ७ ॥ परनारीनी संगते, जुन-ललितांग कुमार हो । विष्टा मंदिरमां वशो, शब शम थयो तिणिवार हो । व० ॥ ८ ॥ जुन मणिरथे अनरथ कियो, मयणरेहाने काज हो ॥ तो | ते नरके गयो तदा, रुंक दियो ? अहिराज हो । व० ॥ एए ॥ इत्यादिक अवदात ते, शुं नय जाणता स्वाम हो ॥ श्रावक कुल पामी करी, राखो निज मन गम हो || व० ॥ १० ॥ श्रग नि प्रवेश करूं प्रमे, वलि करूं पापात हो । विष नक्षण जल ग्रागमें, श्वसना वेदन घात हो ॥ ० ॥ ११ ॥ पि अघटता कामनो, वया न सांजलुं कान हो । इं चंद नागें थी, न चलुं शीयलनुं ध्यान हो ॥ व० ॥ १२ ॥ यतः ॥ केसरि केश नूयंग मणि, शरणाग य सुहाय ॥ सतीय पयोधर कृपण धन, चढसि दब मुश्राह ॥ १ ॥ नावार्थ:- केसरी सिं हा केश, सापने माथे रहेलो मणी, वीर पुरुषोने शरणे गएलो माणस, सती स्त्रीनां स्तन, एक कृपानुं धन; ए सर्वे तेमना जीवतां तो हाथ नज लागे, परंतु मृत्यु एज मले. ॥ १ ॥ वया सुली वनिता तणां दरख्यो धनपति ताम हो । ए सुकुलीन महासती, शियल १ सर्प. २ जीन. Jain Educationatational १० For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्नारयण गुणधाम हो॥॥१३॥ कहे धनो में ताहरो, मन जोयो अन्तिराम हो। शियलन ६४ सुरंगो हं धरूं, न गमे परस्त्री नाम हो ॥ ३०॥ १४॥ विण पूवं तुजने दवे, किम जाणीश निज नाह हो ॥ दीगयी शं जाणशो, के प्रत्यय निरवाह हो ॥ व ॥१५॥ तव बोली सा सुंदरी, जे कदेशे प्राचीन हो॥वारता जे जे नोगवी, सुख दुःखनी लयलीन हो ॥ व ॥१६॥ ते जरतार हुशे सही, श्तदनंतर आकार दो॥ ढाल ए त्रीजा नल्हासनी, नव मी जिन कहे सार हो ॥ व०॥ १७ ॥ ५ ॥दोहा.॥ धनपति कहे सुण रे सती, प्रतिष्टानपुर वास ॥ धनसारेच्य वखाणीए, शीलवती सती तास ॥१॥ चार पुत्रमा लघु तनुज, धन्नो बुद्धि निधान ॥ बंधव क्लेश श्री नीसस्यो, पिण तस पूण्य निदान ॥२॥ नऊयिनी आव्यो वही, पाम्यो नृपनो मान | माता पिता बांधव सवि, ते आव्या तिण गण ॥ ३ ॥ सन्मानी राख्या निकट, पिण, मन्चर तस देख ॥ धन्नोशाह वली नौसयों, सघली झहि नवेख ॥ ४ ॥ राजगृहीए रंगशुं, आव्यो धरी नव्हास ॥ कुसुमपालनो वन फल्यो, पुत्री दीधी खास ॥ ५॥ सेचानक गॐ ज रायनो, आण्यो पालानन ॥ पुत्री आपी श्रेणिके, देखी अतुल अचंन ॥६॥ काणा १ जुनी. २ सारपग. Jain Educational For Personal and Private Use Only Gainelibrary.org Page #141 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नो जगमो पड्यो, गौन शेठने जाम ॥तेदने फेड्यो ततक्षणे, तुजने परणी ताम ॥७॥ 5मात पिता जाता वली, आव्या विपद नपाय ॥ देखी आळंबर थकी, आएया आपणे गय 31 ॥७॥ पुनरपि कलह ते केलवे, बंधव राखी १ ॥ तव धनपति तुजने तजी, हां आव्यो । शुन्न देख ॥ ए॥ प्रत्यय ए तुजने कह्यो, वली मुज श्वदन निहाल ॥ ब्रांति म राखीश। नामिनी, चिंती चित्त विचाल ॥ १० ॥ ॥ ढाल १० मी. ॥ (मुजरो ल्योने जालिम जाटमा.-ए देशी.) वयण सुणी निज नाहनां, प्रत्यय पामी तिवार ।। नाम थकी रे निश्चय थयो, पेख्यो । प्रगट आकार ॥ तोरी बलिहारी प्रीतम माहरा रे ॥ १॥ ए आंकणी ॥ चूंघटमें रे आनहै न धरी, लाजि करी कहे वेण ॥ प्राणप्रिय पियु माहरा, तुमे वल्लन्न मुज सेण ॥ तो०॥ ॥ तुज विरहे में परिहस्यां, वस्त्रालरण विशेष ॥नोजन सरस सवे तज्यां, तांबूलादि अशे | ॥तो ॥ ३ ॥ स्नान श्रुशुधा शरीरनी, में गंमी पियु एह ॥ तुमे तो अमने रे अवगु-15 एयां, जाएयो पियु तुम स्नेह ॥ तो०॥४॥ एटला दिन लगे अमतणी, कंतन कीधी जी सार ॥ नृत्यपणे अमने गएयां, नाणी शरम लिगार ॥ तो०॥५॥ पुरुष सदा कपटी हु १ मुख. २ घूघटामां मुम्ब घाली. ३ चाकरपणे. Jain Education Eational For Personal and Private Use Only Alainelibrary.org Page #142 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० go वे, पूर्वप्रियाथी । वरक्त ॥ अवर प्रिया रसमें रहे, तेह सदीव प्रासक्त ॥ तो० ॥ ६ ॥ सांन ली सौभाग्य मंजरी, प्रियपत्रितलां वेरा || हर्ष धरीने देजे कहे, तूं तो दीसे बेरे ॥ तो ० ॥ ७ ॥ स्नान करावे रे स्नेहथी, पहिरावे शुचि वेष ॥ आभूषणथी भूषित करे, मान दिये सुविशेष || || || धन्नो कहे घण सांजलो, तुमे बे नयन समान ॥ तन मनयी मुज प्रिय घणी, विलसो सुख सुप्रमाण || तो ||| दवे धनसार चित्त चिंतवे, ए सुकुलीन सुरीत ॥ का एक मात्र रहे नदी, शुं प्रयुं ए विपरीत ॥ ते दजु नावी बहुअर माहरी रे ॥ १० ॥ ए कली ॥ घनपतिशाह तले घरे, गइ हती लेवा बाश || श्रावी नहीं हजी प्रांगणे, शुं का |रा हुझे तास ॥ ते० ॥ ११ ॥ कल्पद्रुम सम ए अबे, धनपतिशाह पवित्र ॥ तेहथी तो जय नवि हुवे, दीसे वात विचित्र ॥ ते० ॥ १२ ॥ वृ६ वधूने बोलाविने, मूकी तेरुण काज ॥ श्रावी धनपति गृहे, देखी पामी रे लाज ॥ ते० ॥ १३ ॥ ज्ञाजन तक्रनो लेइने, आवो स्यानक ताम ॥ वात कही सुसरा प्रते, जे गइ आपली माम || ते || १४|| सुणी घनसार - पार ते, रुदन करे ततकाल ॥ दा दा कुलने कलंकियो, खोयो शील विशाल ॥ ते ॥ १५ ॥ | देशाटन धन कय पणो, ए बे दुःख हतां मूत्र ॥ ए अपवाद ते ऊपरे, ए महोटो मुज शूल १ जूनी स्त्रीथी. २ स्वामीनी स्त्रीनां एटले शोक्यनां. | For Personal and Private Use Only Jain Education (mational नु० ३ So Page #143 -------------------------------------------------------------------------- ________________ * OSHOOT * * * % 4 ते ॥१६॥ किहां जाऊं कहने कहुं, शो करुं वलि प्रतिकार ॥ धन विण कोय न नत्रखें, कोय न माने जीकार ॥ ते॥१७॥ यतः ॥ सवैयो त्रैवीशो. ॥ चाह करे जिनकी जगमें सव आयके पाय नमे नलनैया, मातकुं तातकुं लागत वल्लन नामिनी व्हेन लेत बलैया ।। वात जुगे सब साचहि मानत लोक गुनी यश वास कहैया, केशवदास कहे सुरा सऊन सोही बमो जागो गांउ रुपैया ॥१॥ तो पिण नातिने पागले, कहुं सवि वात विचार है नाति थकी सवि नीपजे, कार्य अनोपम सार ॥ तेणारा आवी नातिने आगले, पोकायो धनसार ॥ त्रीजा नल्हासनी ढाल ए, जिन कहे दशमी नदार ॥ ते ॥१॥ ॥ दोहा. ॥ इन्य प्रमुख सवि श्म कहे, सांजल रे धनसार ॥ धनपति शेठ तणो सहु, यश जाणे संसार ॥१॥ परनारीने नविनजे, न लिये वली पर श्य ॥ जीवघात नवि आचरे, अन्नक तजे ए सर्व ॥२॥ तूं पिण जूगे नवि कहे, ते नवि करे अन्याय ॥इणि दि शि व्याघ्र इहां नदी, भावी बन्यो ए न्याय ॥ ३ ॥ तो पिण ताहरे कारणे, करशुं नद्यम श्रा 15 ज । वहु तुमारी तुत्तरमें, लावेशुं महाराज ॥४॥ श्म कहो सविनेला थर, ले नजरा ॐ सो सार ॥ धनपतिशाहने पागले, आवी करे जुहार ॥ ५॥ सन्माने सवि शेग्ने, देई फो है फल पान ॥ पूने शे कारण तुमे, श्राव्या पुरुष प्रधान ॥६॥ T Jain Educa ww.jainelibrary.org For Personal and Private Use Only t ional Page #144 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ७१ ॥ ढाल ११ मी. ॥ ( करजोमी वेश्या कहे हो लाल, जले रे पधारया प्राज. - ए देशी . ) करजी सवि इम कहे हो लाल, सुयो रे सोजागी ॥ वीनतमी महाराज हो धन्ना शाद, सुलोरे सोजागी ॥ ए कली ॥ धनपुर नगर ए धने जश्यो हो लाल, सु० ॥ श्रमर | पुरी समाज हो ॥ ६० ॥ सु ॥ १ ॥ सदृश तुमे नृपता हो लाल, सु० ॥ निरुपम रूप निधान हो ॥ घ०सु० || सामानिक सामंत के हो लाल, सु० ॥ दिन दिन चढते वान | दो ||६०||सु०||२|| देव सरीखा दीपता हो लाल, सु० ॥ इन्य अबे धनवंत हो ॥ ६० ॥ सु० ॥ सकल प्रजा परषद जली हो लाल, सु० ॥ तुमची ए मतिवंत हो ॥ घ० ॥ सु० ॥ ३ ॥ इंज्ञ एली सम शोजती हो लाल, सु० ॥ सोनाग्यमंजरी नार हो ||६|| सु ॥ दय गय रथ पा यक घया हो लाल, सु० ॥ वली कोठार जंकार हो ॥ ६० ॥ सु० ॥ ४ ॥ तुम यश जगमें वि स्तरयो दो लाल, सु०॥ परस्त्री बंधव नाम हो ॥ ६० ॥ सु० ॥ परदुःख जंजन परगमा हो लाल, सु० ॥ स्थित जन विश्राम हो ॥ ६० ॥ सु०॥ । ॥ पिस निसुलो एक श्रमतली हो लाल, सु० ॥ वात जे श्रइ विपरीत हो ॥ ६० ॥ सु०॥ परदेशी धनसारनी हो लाल, सु० ॥ बहुत विनीत हो ॥६०॥ सु०॥६॥ तक्र लेवा तुम मंदिरे हो लाल, सु० ॥ श्रावी हुती |, सुविवेक हो ॥६०॥ सु०॥ कोइक कार्य नद्देशिने हो लाल, ॥सु॥ बेटी हुशे घरी टेक दो ॥ For Personal and Private Use Only Jain Educationmational न० ३ ११ w.jainelibrary.org Page #145 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६०॥ सु०॥७॥ खबर करावी तेहनी हो लाल, सु॥ सोंपावो ते सदीश हो ॥ ६० ॥ ० ॥ पूरे सुसरो एहनो हो लाल, सु० ॥ श्रास्फाले निज शीश हो ॥६०॥ सु० || || इन्यादिकनां | हवा हो लाल, सु० ॥ वचन न धारयां कान हो ॥ ६० ॥ सु०॥ तव चमक्या ते वाशिया हो लाल, सु० ॥ अन्योन्ये करे- सान हो ||धासु०|||| करी प्रणाम कटी गया हो लाल, सु० ॥ सहु को निज प्रागार हो ॥६०॥ सु० ॥ धनपति मंदिर प्रागले हो लाल, सुणा पोकारे ध नसार हो || घणसु० ||१०|| रे घनशेठ तुं माहरी हो लाल, सु०॥ आपो वधु इसी वार हो ॥६०॥ ॥ न्याय तुम नवि घटे हो लाल, सु०॥ जुन्ने हृदय विचार हो | ध० ॥ ● ॥ ११ ॥ अ परदेशी पाहुणा हो लाल, सु०॥ डुस्थित जनमां लीइ हो ॥६०॥ सु॥ तूं पदुःख मंजक अबे हो लाल, सु० ॥ सा पुरिसामां सिंह हो ॥ ध ॥ सु० ॥ १२ ॥ यतः ॥ | आर्यावृतम् ॥ विरला जाणंति गुणा, विरला पालंति निहला नेहा ॥ विरला परकऊ परा, पररक डुश्किया विरला ॥ १ ॥ जावार्थ:- गुणना जानार, निर्धननो स्नेह पालनार अने परनां कार्य करवामां तत्पर, एवा पुरुषो विरला होय बे; परंतु ते करतां पण पारका दुःखे दुःखीघ्रा तो तेथी पण विरला होय बे ॥ १ ॥ तव धनसार तेमाविने हो लाल, सु० ॥ धनो प्रणमे पाय हो । ध० ॥ सु० ॥ श्रविनय खमज्यो तातजी हो लाल, सु० ॥ मुजश्री क Jain Educationaational For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #146 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० १२ ० | सुपलाय हो ॥ ६० ॥ सु • ॥१३॥ देखी पुत्रने नलख्यो हो लाल, सु० ॥ हरख्यो तन म न ताम हो ॥ ० ॥ ० ॥ पूनम चंड्थी नदधिनो हो लाल, सु० ॥ जिम किल्लोल नद्दाम | हो ॥ ६० ॥ सु० ॥ १४ ॥ स्नान प्रमुख सवि साचवी हो लाल, सु०॥ भूषण वस्त्र नदार | हो ॥ घ० ॥ सु० ॥ जोजन जगति करी जली हो लाल, सु० ॥ थाप्या गूप्तागार हो ॥ घ० ॥ सु० ॥ १५ ॥ एहवे शीलवती सती हो लाल, सु०॥ पति प्रेमे तिथिवार हो ॥ घ० ॥ सु० ॥ श्रावी धनपति मंदिरे दो लाल, सु०॥ करे प्राकंद पोकार हो ॥६०॥ सु०॥ १६ ॥ रे पापी मु ज वधु मणी हो लाल, सुगा राखी कीध अन्याय हो ॥ ६० ॥ सु० ॥ वली जट्ट पासे माद रो दो लाल, सु॥ कंत ग्रहाव्यो शे न्याय हो ॥ घ० ॥ सु० ॥ १७ ॥ न्याय न दीसे गाममां हो लाल, सुन एक घरे एह राज्य हो ॥ ६० ॥ सु० ॥ वसते गामे वाशियो हो लाल, सु० ॥ ए वो करे प्रकाज हो ॥६०॥ सु० ॥ १८ ॥ वर वधु ए बे मुज प्रते दो लाल, सु० ॥ द्यो कहुँ tear || || नहितर पिए मुज कंतने हो लाल, सु०॥ मूकंतां शुं जाय हो ॥ घ०सु०॥१॥ जीर्ण जराये जाजरो दो लाल, सु०॥ चिंताथी ? कृष गात्र हो ॥ ६० ॥ || वो पिए पति माहरो हो लाल, सु०॥ मूकने तूं गुएापात्र हो ॥ ६० ॥ सु० ॥ २० ॥ १ सुकाई गएला शरीरवालो. Jain Education national For Personal and Private Use Only उ० ३ ७२ w.jainelibrary.org Page #147 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | तव धन्नो माता जली हो लाल, सु० ॥ तेमावे ततकाल हो ॥६०॥०॥ प्रविनय खमज्यो मातजी हो लाल, सु० ॥ हूं तुमचो लघु बाल हो ॥ घ०सु०॥ २१ ॥ माता मनमें उसी हो लाल, सु० ॥ देखी पुत्र दीदार हो ॥६०॥ सु०॥ हरखे हैमे जीमियो हो लाल, सु० ॥ नि रखे वारंवार हो ॥ ६० ॥ सु० ॥ २२ ॥ वस्त्राजरणे ततक्षणे हो लाल, सु० ॥ संतोच्या सुविलास हो ॥ ६० ॥ सु० ॥ त्रीजे नव्हासे इग्यारमी हो लाल, सु० ॥ जिन कहे ढाल प्रकाश हो ॥ ६० ॥ सु ॥ २३ ॥ ॥ दोहा ॥ हवे ते धनदत्तादि त्रय, जाता करे विचार ॥ जश्ने धनपतिने गृहे, कीजे प्रबल पोकार ॥ १ ॥ मात पिता ने लघु वहू, एणे राख्यां एकांत ॥ ल बलथी जो लीजो ए, तो आपण मतिवंत ॥ २ ॥ इम चिंती त्रिएये तुरत, श्राव्या धनपति गेह ॥ उच्च स्वरश्री ईम कहे, देय देय रे देह ॥ ३ ॥ श्रम माता ने तातने, ग्रहो राख्या शे काज ॥ १ जातधू पिस जोलवी, ए वाते तुज लाज ॥ ४ ॥ सांजली धन्ने तुरतमें, तेमाव्या आवास ॥ व रण विशेषथी, आपे घरी उल्हास ॥ ५ ॥ मात पिता बांधव वधु, मलियां मंदिर मांह ॥ ध नतिन गुण वर्णना, करे ते अति चाह || ६ || हवे ते पाउल त्रिएय वधु चिंते चित्त म १ जोजाइन. Jain Educationaeational १७ For Personal and Private Use Only wainelibrary.org Page #148 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ७३ कार ॥ बलकरी धनपतिये सवि, लोधो अम परिवार ॥ ७ ॥ एक वधूने कारणे, ये बेस हुने दुःख || देखो ए ग्रामे इहां, अन्यायेथी सुख ॥ ८ ॥ जइए धनपति मंदिरे, कहिये गोद aare || पति म पकड्या शा जणी, मूक तुं करि सुपसाय ॥ ए ॥ ॥ ढाल १२ मी. ॥ (वीण म वाइस रे, विल वारुं तुजने. - ए देशी. ) aft विचारने त्रिmये अबला, आवी धन श्रावासे ॥ द्वाररक्षके हांकी काढी, विलखी श्य विमासे || देखो देवे रे, ए दिन अमने दीधा ॥ १ ॥ ए ग्रांकली. ॥ सांज पीने पति पिस न मिल्या, न मिल्या सुसरो सासू । देशली पण दूरे नावी, फेरो पनी यो फांसू ॥ दे० ॥ २ ॥ हा! हा! धन्ने अधम ए कीधो, वसते गामे वलीके || व्हार न पहोचे कोइन । एहने, चंगुप्त जिम चणिके ॥ दे० ॥ ३ ॥ इम विलवंती ते निज स्थानक, रात्रि समय | तिदां प्रावे ॥ विरह विलूधी व्याकूल यावे, पाली अन्न न जावे ॥ दे० ॥ ४ ॥ सुसरा सासु कंत विना ते, सूनो स्थानक लागे || रात्रि गले तेम रोवे अबला, विरह विशेषे जागे ॥ दे० ॥ ५ ॥ शुं मे वनमां कृषि संताप्या, माया मृगने मरमी ॥ के मां पंखीनां फोड्यां, के इंकालने नरमी ॥ दे० ॥ ६ ॥ कंतने वश करवाने कारण, कामसमां में कीधां ॥ के शोक१. चाणाय के. Jain Education emnational For Personal and Private Use Only उ० ३ ७३ jainelibrary.org Page #149 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सलमी गर्न गलाव्या, सातन पातन कीधां ॥ दे ॥ ७॥ के जलचारी जीवने मास्या, नां खी जाल ते जलमां ।। वृषन्न प्रमुखने सकटे जोमी, नार वहाव्या अलमां ॥३०॥॥ के संग्राम कस्यां शूरातन, मास्यां माणस होमे ॥ के बल करीने वाट पमावी, धन लीधां मन कोमे॥ दे०॥॥अगल पाणी पोधां अह निशि, पूरा प्रमुख न राख्या ॥ पालर वा कलना नगवंते, दोष अनंता दाख्या ॥ दे० ॥१०॥ यतः अनुष्टुवृत्तम्. ॥ संवरेणयत्पा पं, कैवर्त्तस्येह जायते ॥ एकाहनितदाप्नोति, अपुतजलसंग्रही॥१॥नावार्थ:-या लोकने 18| विषे निल्ल माणसने जेटलुं पाप एक वर्षमा लागे, तेटलु, पाप अपवित्र (अणगल) पाहणीना संग्रह करनारने मात्र एक दिवसमा लागे . ॥१॥ पंच थावरनी पग पग हिंसा, करतां महेर न आणी॥त्रसने पिण हणतां को वेला, अनुकंपा चित नाणी ॥दे॥११॥ Pोध लोन लय हांसीने वझा, कूमां आल जे दीधां ॥ फल लेहनांनोगवां निश्चे, धनवति नी परे सीधां ॥ दे० ॥१२ ।। चोरी कीधी परधन लेवा, चोरने संबल दोधो॥नेल संन्नेल पालर एटले आकाशथी पमेनुं पाणी अने वाकल एटले नूमिथी नीकलेलं पाणी; आ बन्न जात | ४ना पाणीना पूराने एक बीजामा जेलसेल करे, अर्थात् पालरना पाणीना पूराने याकलना पाणीमां नांख | अने वाकलना पाणीना पूराने पालरना पाणीमां नांखे या तेि करवाथी घगुन पाप नागे के. HEHOREOGRESER Jain Educational national For Personal and Private Use Only I Mw.jainelibrary.org Page #150 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० करीने आप्यां, विसवासी धन लीधो ॥ दे० ॥१३॥ रूपवंत परनारी देखी, लीधी मदयी | न०३ उ नलाली ॥ कामिनी कंत विगेहो कीधो, हृदय न जोयो नाली ॥ दे०॥१४॥ नंदराय परे 51 परिग्रह सबला, लेई कीधा नेला ॥ ममताने वश कांड न जाएयो, जे गंमवा मरणनी वेला ॥ दे० ॥ १५ ॥ निशिनोजन जिन्नाने स्वादे, नांति नांति निपजाव्यां ॥ तेहना दोष प्रगट शिवशास्त्रे, जिनमतमें पिण आव्या ॥ दे०॥ १६ ॥ यतः॥ चत्वारि नरकहारा, प्रथम रात्रिनोजने । परस्त्रीगमनं चैव, संघानानंतकायके ॥२॥नावार्थः-रात्रिनोजन, परस्त्री | गमन, बोलअयागुं अने अनंतकायनुं लक्षण; ए चार नरकनां वारणां . ॥२॥ इत्यादि क जे पाप करमने, कीधां हशे कोई वेला ॥ तेहनां फल नदये इहां आव्यां, नोगविये सहु नेलां ॥दे॥१७॥ कहो किहां जइए किणि विधि करीए, केहने शरणे रहीए॥को न नाथ | अमारे ईहां कणे, जेहने सुख दुःख कहीए ॥ दे ॥ १७ ॥श्म विलवंते रात्रि विहाणी, ते त्रिएयेनी तिवारे ॥त्रीजे नल्हासे ढाल ए वारमी, कहि जिन श्रुत अनुसारे ॥०॥१॥ 18 ॥ दोहा. ॥ अथ प्रांते ते कामिनी , त्रिण्ये मिली तेवार ॥ कोशंबीये ततकणे, पहो । है ती नृप दरबार ॥१॥पोकारी परगट पणे, नांखे नृपने नाम ॥ दैवयोग पुःखीयां अमे, करिये परनां काम ॥२॥ सर खणतां धन्नातणो, करतां अरपूर ॥ चूक्यो धन्नो चित्त श्र Jan Educati o nal For Personal and Private Use Only Venelibrary.org Page #151 -------------------------------------------------------------------------- ________________ IP की, देखी देराणी नूर ॥ ३ ॥ लालच दीधी लंपटे, सुसराने धरी स्नेह ॥ मूकजो तक्रादिक नणी, लघु वधुने घरी नेह ॥४॥श्म ललचावी प्रति दिने, ललनां लीधी आज ॥ वारस / पिण पकड्या वही,अम विणसाड्यो काज ॥ ५ ॥ सुसरा सासूने वहु, त्रिएये नगंदना वीर &॥धने सरवे संग्रह्यां, धरिये किण विधि धार ॥ ६॥ तुमे न्यायी नरपाल गे, पृथ्वीना प ति शाह ॥ वहार करो वेगे हवे, करी कृपा सोचाह ॥ ७॥ एक देराणी कारणे, पंचने ये पंचत्व ॥ एह अधम तुम राज्यमें, ते किम करे निसत्व ॥ ७॥ ते मदांध शामज अयो, करे । अत्युग्र नत्पात ॥ तुमे गे केसरी तस शिरे, अहो नृपति अम तात ॥ ए॥ यतः।। नपजा-2/ तिवृत्तम्. ॥ उष्टस्यदंगःस्वजनस्यपूजा, न्यायेनकोशस्य च संप्रवृदिः॥ अपक्षपातोनिजरा ट्रचिंता, पचापिधर्माःनृपपुंगवानां ॥१॥नावार्थः-उष्ट माणसनो दंग करवो, स्वजननो है। सत्कार करवो, नायवमे धन (तिजोरी) नी वृद्धि करवी, अपक्षपातपणुं राखQ अने पोताना देशनी चिंता राखवी; ए पांचे धर्म नत्तम राजानना . ॥ १ ॥ ॥ ढाल १३ मी.॥ (राग बंगालो. राजा नहि नमे.-ए देशी.) निसुणी अबला वयण विचार, राय चिंते चित्तमें तिणिवार ॥ राजा कोपथी ॥अम, | जामात ए (नपुण सुजाण, किम एहवो करे कार्य अजाण ॥ राजा कोपथी॥१॥ए प्रां ॐॐॐॐॐ Jain Education MAnational For Personal and Private Use Only N ainelibrary.org Page #152 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० कणी ॥ विकसित वदन ए बुद्धि निधान, एह तो निर्मल गंग समान ॥ रा० ॥न्यायमार्गे न०३ ७५ ए वर्ने धार, सहु एहनी नरे रूमी नीर ॥ रा॥॥ परनारीथी एहने त्याग, एता दिन । हुतो सवल सोनाग ॥ रा०॥ किम कीबूं दशे एह अकाज, शू खोशे ए मूलगी लाज ॥रा० ॥३॥ चिंतीने सामंत तिवार, मूके नृप धना आगार ॥ राते पाव्या धरी मनमें धार, प्रणमी बेग धन्नाने तीर ॥ रा०॥४॥ कहे सुणो शेठ सुगुण गुणवंत, तुमे गे चतुर वि. P चरण संत ॥ रा०॥ आश्रित जन आधार अनूप, तुमे बुझे रंज्या लवि नूप ॥ रा॥५॥ 3 कार्यवशे तुमे निज आवास, राख्या हुशे परदेशी दास ॥ रा०॥ मूको एहने स्वामी सधीर, ४ 8 तुमे गे परनारीना वीर ॥ रा०॥६॥ ए अबला अकुलाये प्राम, पति विण एहने न सूझे । काम ॥रा०॥ नत्तम नर अबलानी सार, करतां कां न लावे वार ॥ रा०॥७॥ तव बो । ले धन्नो थर धीर, सोनलोने तुमे साहस धार ॥ रा०॥ अमे अन्याय न राखु चित्त, चालु P न्याय थकी अमे नित ॥रा०॥ ॥ अम माणस डे अम आगार, नृपने एहनो शोले वि| चार ॥ रा०॥राखे जो बल मनमें राय, नामे संतानिक नाम कहाय । स०॥ए॥ लक्षा-18 निक जे ताहु समर्थ, ए शो धरे अन्तिमान निरर्थ ॥रा०॥ जो संग्राम करण धरे होश, जो नावे तो तुज सोंस ॥रा०॥१०॥ सांजली धन्ना केरां वेश, नृप पासे पहोत्या ते ASSISTANI Jain Educati( national For Personal and Private Use Only T w .jainelibrary.org Page #153 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 55 सेंण ॥ रा ॥ वात विचार सुणी ततकाल, नृप कोपे थयो काल कराल ॥ रा०॥११॥ वज मावी रणनेर तिवार, निसुणी सज थया सुन्नट कूफार ॥ रा०॥ हय गय रथ पायक न-2 हि पार, सैन्य थयो संग्राममें त्यार ॥रा ॥ १२॥ धन्ने पिण निज सैन्य नद्दाम, सऊ की ४ धो तिहां युध्ने काम ॥रा॥ बिरुद नणे तिहां चारण नाट, चिहुं दिशि सैन्य तणो बन्यो । थाट । रा॥१३॥जय पामे सवि पौरक लोक, सैन्योपश्व थकी धरे शोक ॥ रा०॥आ अजाण्यो किम यो काज, 'जामाताशं युः अकाज ॥ रा०॥ १४ ॥ परदेशी माटे कुPण आप, पेट चोलीने नपावे संताप ॥ रा०॥ परिजन कहे श्म जिन सुविलास, ढाल ए तेरमी त्रीजे नल्हास ॥ रा ॥ १५ ॥ ॥ दोहा. ॥ युद्ध मंमाणो जोरथी, अन्योन्ये असमान ॥ ते देखी कायर मरे, राखे । | प्रलयन ध्यान ॥१॥राय संतानिक सैन्यमें, सामंत सवि सौंमीर ॥ धन्नाशाहना कटकहूँ में, एक एह वमवीर ॥२॥ धनपुर कोसंबी विचे, रणनो करे मंमाण ॥ सयल लोक जोवा मिल्या, मूकी निज निज गण ॥३॥ १ जमाश्थी. २ नासी जवान. 52525 -5-ST Jain Education rational For Personal and Private Use Only I Alainelibrary.org Page #154 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ७६ Jain Education ॥ ढाल १४ मी. ॥ (देशी कमखानी.) सबल दल प्रबल र रंग वेगे चल्यो, नृप सतानिक तो मान धरतो ॥ गुहिर नि शाल सुप्रमाण रातूर तिम, घन घंटा सघन आवाज करतो ॥ स० ॥ १ ॥ ए प्रकली ॥ गज घणा मत नत्मत टूटा चले, शोश सिंदूरथी करीय शोजा || अमर गुंजारवे पूर्ण रो शेजा, दंत मूसल करीय दूर्ग खोया || स० ॥ २ ॥ कब कंबोज केकाण काश्मिरना, पाणिपंधा खुरासाणि कहीए ॥ नृप सतानिक तथा सैन्यमें दीसता, ते सवे जातिना तुरिय लदीए ||स०॥ ३ ॥ घणण घंटावली वृषन कंठे वली, प्रति घणा तूर रथमांदे गाजे ॥ रथ घणा एहवा सज कस्या समर में, शस्त्र बत्रीशी अधिक राजे ॥ स० ॥ ४ ॥ शिर घरी टोप कोपे करी चालता, मालता समर में प्रति नांदे ॥ वीर रसथी चढ्या शीश बोगा ध स्वा, सुजट एहवा सदा सैन्यमांहे ॥ स० ॥ ५ ॥ नृप सतानिक तणो लदिय प्रदेश वर, ग्रहिय शिरपाव सामंत शूरा | युद्ध करवा जणी प्रावीया क्रमही, जालीए जलधि कल्लो ल पूरा || स० ॥ ६ ॥ ताम धनशेठनो सैन्य पिए सनमुखे, चालीयो देइ निशाल का || अश्व रथ वीर गज घनघटा घणघणे, जालीए राम चढ्यो लेख लंका ॥ स० ॥ ७ ॥ नाल गोला घणा शब्द बहु तेह तथा, सांगली शेष पिएा दोन पावे ॥ तीर तरवार जालातला national For Personal and Private Use Only २०३ ७६ jainelibrary.org Page #155 -------------------------------------------------------------------------- ________________ S तेजथी, अंबरे तरणि ते सन्नय थावे ॥स० ॥७॥ चिंतवे शेठ ए युद्ध करते अके, रखे। 15 इहां माहरो मान गाले ॥ सैन्य दल प्रबल ने ए सतानिक तणो, ताम सुरमणि प्रते ते नि-18 हाले ॥ स॥ ए॥ निरखतां वेंत सैन्या वधी शेग्नी, जाणीए जलधिनो पूर आयो ॥ सै-5 न्य राजातणो सयल नासी गयो, यश थयो शेग्नो अति सवायो । स०॥१०॥ नृपतणा - सुन्नटने नासता देखिने, कामिनी तव कहे का लजावो ॥ शूर तजी तूर हथियारने नांखि ने, वणिक आगे तुमे कैम आवो ॥ स॥ ११॥ मरणना नेय की नागिया का मुधा, मातने तात जाया लजावी ॥ पंचमे बेसि किम मूड वल घालशो, एहवी कुबुद्धि तुज केम | प्रावी ॥ स० ॥१२॥ निसुणी नृप कोपियो सैन्य मुज लोपियो, नपियो दाव ए आप केरो । ॥ युद्ध कीधा विना माम खोई मुधा, ए सेन्यानी मुज अति अंधेरो ॥ स० ॥१३॥ म कही नृप चड्यो कवच तनुश्री जड्यो, शिर धस्यो मुगट अति तेज करतो॥ ग्रही करवाल विकराल निज नुजबले, पुनरपि सैन्यथी धैर्य धरतो ॥ स॥ १५ ॥ प्रावियो जाम निज धामपर 3 नरपति, ताम धनशेठ पिण शूर थावे॥आगमि मरण एक शरण अरिहंतनो, झवा काज तिहां शेठ जावे ॥ स०॥१५॥.चिंतवे ताम नृप सचिव सवि सामटा, एका एह सुसरो १ सूर्य. SSS-SE Jan Education ational For Personal and Private Use Only w.jainelibrary.org Page #156 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ジャン X धन्ना० - जमाई॥ करिय संग्राम आराम को नवि लहे, एक घरमें किसी ए कमाई॥ स०॥१६॥ वारिये तो नटुं पाय मुख कजलु, लाज रहे नृपतणी अति विलासे ॥ ढाल ए चौदमी जा दति कमसे कही, विबुध जिनविजय त्रीजे नल्हासे ॥ स ॥१७॥ ॥दोहा. ॥ इम चिंतीने सचिव सवि, प्राध्या नृपने पास ॥ कर जोमी पागल रही, एम करे अरदास ॥१॥स्वामीजी शो कोप ए, जामाताथी जोर ।। करवो घटशे किणिपरे, निज मन आयो गेर ॥२॥ हास्याथी अपजश हुवे, जीत्या पण जंजाल ॥ स्वन्वय जुन चित्तमें, ए सवि तुमचा बाल ॥३॥ ए बालक थई बूटशे, पिणं तुमे वमा नरिंद ॥ वावी दाथे वृक्षने, कुण दे' मतिमंद ॥ ४॥ए धन्ने निज बुझ्यिी, राखा हुशे निस्संक ॥ ते अमे जश्ने पूड़िये, ते माणसनो वंक ॥५॥श्म कही नृप समजाविने, तमावी ते नारी कहो बाई तुम कुल प्रमुख, मूल थकी अधिकार ॥६॥ तव ते लढाथी करी, साश्रुपात । वच ताम॥ स्वामीजी अमचो हतो, प्रतिष्ठानपुर गाम॥७॥ व्यवहारी धनसार वर, शी। लवंती घर नार ।। पुत्र चार तस शोन्नता, धनदत्तादि नदार ॥ ॥ इत्यादिक सघली क. था, निरविशेष कही जाम ॥ निसुणी मंत्री चमकीया, ए धन्नो अन्निराम ॥ ए॥ मात तातने नलखी, यतन कराव्यां खास ॥ वस्त्रान्तरण गोरस प्रमुख, दीधां मन नल्हास ॥ 155558 59 セシー ७७ Jain Education rational For Personal and Private Use Only wainelibraty.org Page #157 -------------------------------------------------------------------------- ________________ । १०॥ आकर्षी श्रावासमें, राखी स्त्री सुकुलीन ॥ मात तात नाता प्रते, कीधा निज श्रा-2 धीन ॥ ११ ॥ कहो बाश्ते धन प्रते, किम नलखशो ठीक । शे कारणभी एहनो, निश्चय हुशे नजीक ॥१२॥ ॥ढाल १५ मी.॥ (गढमामें फूले सहियां हाथणी.-ए देशी.) : सचिव कह्या ते सांजली बोलमा, कांक धैर्य धरी मनमांद ॥ अमचे देवरिये सही। तो कौतुक केलव्यु ॥ ए आंकणी ॥ कहे ईम मंत्रीने मनरंगशु, निसुणोने अमची वात नचांद ।। अं० ॥१॥ करतल लक्षण बत्रीशे जलां, वली पगे पदम अने सुविचित्र ॥ अ॥ ते सहिनाण की अमे नल, देवर अमचो पुण्य पवित्र ॥ अ॥२॥ ताम ते मंत्री त्रि एये नारिने, तेमीने पहोत्या धनपति पास ॥अ०॥करीय जूहारने बेग यत्नश्री, अन्योन्ये विरचे वात विलास ॥ अ॥३॥ए त्रिएये नामिनी धनपति देखीने, नलख्यो निश्चयश्री आकार ॥०॥ कहे धन देवर कां बोलो नही, अमचा तुमे जीवन प्राणाधार ॥ अ०॥ तव धन्नो बोले कहो तुमे कोण गे, जाश्ने साधो सरोवर काम ॥ अ०॥ धन्नाने नामे जगमें घणा, सघलाने गणशो देवर गम ॥०॥५॥ तव हसी नोजाइ कहे हेजशु, तुमें अम देवर गे निरधार ॥ १०॥ पप वली तुमचां चरण पखालशु, प्रत्यय धरशुं पदम Jan Education K onal For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #158 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धना दिदार ॥०॥६॥धनो कहे परस्त्रीने फरसुं नही, तो किम धोवरावीजे पाय ॥अ०॥ न०३ अमे तो श्रावक व्रतधारी सदा, शीयल पालुं मन वच काय ॥०॥७॥ तव तेह सचीवे 31 18 ह कीधो घणो, शुं तुमे गुप्त करो निज जाति ॥०॥ जाण्यो में कुल वंशादिक तुम त है। यो, ए तुम नोजाई सादात ॥१०॥ ॥ तव हसी कहे धन्नो नानी तुमे, खमज्यो स-है। वि अमचो अपराध ॥ अ॥ हुं तुम देवर तुम परसादयी, सुख ए पामु निराबाध ॥१० ॥ए॥ स्नान श्रुशुषा करवा कारणे, मूक्यां माताजी पासे ताम || अ०॥ हली मली कुटुंब सविनेलो थयो, सहुकोने उपन्यो तव आराम ॥ ॥१०॥ वात जणावी सचीवे नृपन्नणी, ए सवि धनानो परिवार ॥०॥ एहथी अणघटती वात न को हुवे, एहनो तो है उत्तम आचार ॥ अ०॥११॥ राजा मन राजी थयो ते सांतली, धनो पिण आवे तेणी वार ॥ अ॥ अर्ध सिंहासन बेसण आपियो, गोने कीघो राय जुहार ॥१०॥१॥ पूरी * सुखप्रश्न करे इक वीनती, कहो तुम मात पितादिक सर्व ॥ ॥ दलवे हलवे करिने मंदिर मेलीया, नोजाश्शुं एवमो शो तुम गर्व ॥ अ॥ १३ ॥ तव बोले धनपति नृप तुमे सांनलो, एहने हुतो कांक मन अहंकार ॥१०॥ स्त्रीथी अकार्य सदा बहु नीपजे, कलह लिनो मंदिर ए निरधार ॥१०॥ १५ ॥ यतः॥ अनुष्टुब्वृत्तम्. ॥ सुवंशे योप्यकृत्यानि, कुरुते । Jan Education Aktional For Personal and Private Use Only N w.jainelibrary.org Page #159 -------------------------------------------------------------------------- ________________ * CRE प्रेरितःस्त्रिया ॥ स्नेहलं दधि मनाति, पश्य मंधानको न किं ॥१॥नावार्थ:-जून के, सा 5/रा वांसमां रहेलो एवो जे मंथानक (रवैयो) ते पण स्त्रीनी पेरणाए करीने स्नेहवाला दधि ने शुं नथी वलोवी नांखतो? अपितु वलोवी नांखे डे! तेम सारा वंशमां नत्पन्न थएलो ए वो जे पुरुष, ते पण स्त्रीनी प्रेरणाथी शुं अकृत्यो न करे? अपितु करेज! ॥१॥ तेह नणी, एटलो नेद देखामियो, जे नणी न धरे मनमें मान ॥ अ०॥ लाखे वेचाणी तो पिण मो-R जमी, स्त्रीने ने तेह तणो नपमान ॥ अ॥ १५ ॥ यतः॥ माननितो मानज करे, जीत्यो । कंत सुहाय ॥ जश् साखीणी वाहिनी, तो पहिरीजे पाय ॥२॥ बंधव स्नेह तिहां लगें जा जीए, जिहां लगें कामिनी वात न कान ॥ १०॥ कोणिक राये हल्ल विहल्लशं, कीधो संग्राम ते स्त्री वच मान ॥१०॥१६ ॥ सुणी राजा धन्ना वयण सुहामणां, मनमांदी हरखे अतिही विशाल ॥ अ०॥त्रीजे नल्हासे प्रेम प्रकाशनी, नांखी जिनविजये पन्नरमी ढाल | ॥ ०॥१७॥ 1 ॥दोहा. ॥ नृप पहोत्यो निज मंदिरे, करि बहुलो सत्कार ॥ धन्नो (पण आव्यो घरे, परिवृत बहु परिवार ॥१॥ सहु को जन जयरव वदे, गम गम मिली थट्ट ॥ धन धन धनाशाहने, राख्यो वयण निपट्ट ॥२॥ मात तातने मोदी, सोपे सवि गृह सार ॥ कांता Jan Educational P ational For Personal and Private Use Only M w .jainelibrary.org Page #160 -------------------------------------------------------------------------- ________________ घन्ना० ეს ने कोमल पणे, संतोषे सुप्रकार || ३ || सन्मान्या बांधव प्रते, दीघां सदन विशाल ॥ अस न वसन प्राभूषणे, सुपरे करे संजाल ॥ ४ ॥ पिणं ते त्रिएये निर्गुणी, जीन न राखे गम ॥ एक दिवस तस वचनिका, निसुणी चिंते श्राम ॥ ५ ॥ मुज रहेतां एढने असुख, कारण थाए त्र । तेह जणी दयिता सहित, दूं जानं अन्यत्र ॥ ६ ॥ इम चिंती ते ग्रामने, वहेंची दीघां प्रात ॥ हय गय पिय वर्देची दीया, एह करी अखियात ॥ ७ ॥ मंदिर माल नंकार सवि, दीये तातने ताम ॥ राजगृहि जली रंगशुं, मन राखे गुलधाम ॥ ८ ॥ ॥ ढाल १६ मी. ॥ ( महारे प्रांगणे हो राज, सेला मारु वावमी. - ए देशी. ) हवे धन्न हो राज नृपति प्रते इम वीनवे जी, करी विनय विवेकथी सार || सुलो रा जा जी ॥ श्रम आशा हो राज विसराम तुमे अबो, घणी शी करीए मनुहार ॥ सु० ॥ श्र म दीजे हो राज, कृपा करी शीखमी जी ॥ १ ॥ ए प्रकरणी ॥ मुज तातज हो राज ब्राता सहु इहां अबे जी, तुम चरणे सुगुण निधान || सु० ॥ एहनी स्वामी हो राज ख़बर घ ी राखजो, घं शुं कहीए तुम निदान ॥ सु० ॥ अ० ॥ २ ॥ नृप श्रेणिक हो राज जोवे बे वाटमी जी, वली प्रतिदिन प्रेषे बे पत्र ॥ सु० ॥ तेहनी पण हो राज माया वे प्रति घ एली जी, ति जावुं पबे तत्र ॥ सु० ॥ अ० ॥ ३ ॥ शेव शालिन हो राज गौनइनो सुतः For Personal and Private Use Only Jain Educationational न० ३ TU w.jainelibrary.org. Page #161 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अ जी, वलि कुसुमपालादि अनेक ॥ सु॥ ते पिण प्रेमे हो राज लिखे ले प्रतिदिने, ते४ मावे बे धरिय विवेक ॥ सु० ॥ अ०॥मा तव पति हो राज आखे धन्नाशाह प्रते जी.शी ४ वात कही तुमे एह ।। गुणवंता जी॥अमे तुम शं हो राज करी खरी प्रीतमी जी, पिण तुम मनमें नही तेह ।। गुण ॥ किम दीजे हो राज कृपा करी शीखमी जी ॥ए आंकणी ॥॥ इहां बेग हो राज लोला सुख नोगवो जी, अमने जे तुमचो आधार ॥ गु०॥ तुमसरिखा हो राज मिले किहांथी सगा जी, सवि सुविहित जन शिणगार । गु०॥कि ॥६॥ तव धन्नो हो राजनूधव प्रतेश्मनणे जो, तुम साहिब शुं कहो एम ॥सु०॥ अम | ने जाणजो हो राज सेवक करी ढकमा जी, तुमचो केम विसरे प्रेम ॥॥अ॥७॥ धरणीधव हो राज धनाने तव दिये जी, अति सुंदर तरल तुखार ॥ गुण ॥ गज घोमा होले राज सुखासन रथ नला जी, वलि मणि माणिकमय हार ॥ गुण कि०॥ ७॥ शीख ले। ने हो राज चाल्या राजगृहि नणी जी, दयिता दोय लेई संग ॥ गु० ॥ शुन्न शुकने हो । राज बहुल परिवारथी जो, मन धरता अति नबरंग ॥ सु०॥०॥णा दीन केते हो राज है लक्ष्मीपुर आवीया जी, तिहां राय जितारी सुविशेष ॥ गु०॥ खाग त्यागे हो राज सब हाल सवि नृपथकी जी, अरि नासी गया परदेश। गु०॥ नवि सुणजो दो राज प्रबल फल Jain Educationalrational For Personal and Private Use Only X w.jainelibrary.org Page #162 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नु०३ धन्ना० पुण्यनो जी॥ए आंकणी ॥१०॥ तस कांता हो राज गुणावली गुणनीली जी, सतीस 13/ कल मांहे शिरदार ॥ गुण ॥ पुत्रि रूयमी हो राज कला गुण वेलमी जी, नाम गीतकला | तस सार ॥गु०॥न॥११॥ कला चोश हो सज अंगे आवी वसी जी, वली नाम तिसो परिणाम ॥ गु० ॥ एक दिवसे हो राज सखीथी परिवरी जी, कांश पदोती नद्यान सुगम P॥गु०॥न०॥१॥स्नान कीधो होराज पुष्करणीथी तिहां जी, देखे पुष्पादिक मनोहार गुण॥ लेई वीणा हो राज गावे शुज स्वरथकी जी, ग्राम रागमें विविध प्रकार ॥ गु०॥ न०॥१३॥ स्वर लीना हो राज कुरंग पाव्या वही जी, वलि नाग प्रमुख बहु जीव ॥ ४ गु०॥ स्वर रूमो हो राज अखुट ए निधि कह्यो जी, वली आणंद करण सदैव ॥गुवान. १४॥ यतः॥मालिनीवृत्तम्. ॥ सुखिनिसुख निधानो खितानां विनोदः, श्रवण हृदयP हारी मन्मथस्याग्रदूतः॥ अति चतुर सुगम्यो वल्लनः कामिनीनां, जयति जगति नादः पं. चमचोपवेदः॥१॥नावार्थः-सुखी पुरुषने सुखनो निधान, फुःखी पुरुषोने विनोद कार18क, कान तथा मनने हरण करनार, कामदेवनो अग्रदूत, चतुर पुरुषने सहेलाश्थी समजाय है तेवो, स्त्रीनने वजन्न अने चार वेद उपर जाणे पांचमो नपवेदज होय नहि! एवो जे सुस्वर, ते जगतूने विषे जयवंतो वों ॥१॥ एक आवी हो राज मृगी स्वरथी तिहां जी, लयली. Jain Education ditional For Personal and Private Use Only 4 w.jainelibrary.org Page #163 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐR | न थई रही ताम ॥ गुण ॥ तस कंठे हो राज ग्वे निज कंठथी, नृप पुत्री हार नद्दाम ॥गु० 18/॥०॥१५॥ करी क्रीमा हो राज आवी निज मंदिरे, तेह गीतकला गुणधाम ॥गु०॥५ निज तातने हो राज नमीने वीनवे जी, सुणो तातजी निज हित काम ॥ गुण ॥ न॥१६ ॥ स्वर नादे हो राज कुरंगी वश करी जी, कंग्थकी लावे हार ॥ गु० ॥ आ नवमें हो राज जे मिलशे एडवो, ते वरवो में जरतार ॥ गु०॥न ॥ १७ ॥ तेह वार्ता हो राज घई सवि थानके जी, जिम जलमें तैल प्रचार ॥ गु०॥ ढाल सोलमी हो राज त्रीजा नल्हास हानी जी, कही जिनविजये सुविचार ॥ गु० ॥ न ॥ १७ ॥ ॥दोहा. ॥ ते वार्ता धने तुरत, सांजली सेवक पास ॥ सुनग वेश पहेरी चल्यो, है राजसन्नाये खास ॥१॥ कहे धन्नो नूनाथ सुण, वनमें मृगनो मेल ॥ सुलन्न अ स्वरवं तने, पिण एक सांनल खेल ॥२॥ वनमेंथी स्वरथी खरी, लावू नगर मकार ॥ ते मृगिने 18 कहे तो वली, प्राणुं सन्नामें सार ॥६॥ ताल कंसाल मृदंग ध्वनि, तेहश्री न लहे बीक ॥2 नय नवि पामे कोयथी, रहे मुज पास नजीक ॥४॥ सुणि नृपति हरखीत थई, दीधो तस आदेश ॥ तव धन्नो वीणा ग्रही, आव्यो ते वन देश ॥ ५ ॥ वाई वीणा वेगथी, स्वरथी गीत सुग्यान ॥ सप्त स्वर त्रिण ग्रामश्री, गणपचास ते तान ॥६॥राग आलापे षट रली, 5455555 Jain Educato r national For Personal and Private Use Only w.jainelibrary.org Page #164 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० १ रागिणी वलि बत्रीश || मिश्रित पट पट तेहनी, उपरागिणी सुजगीश ॥ ७ ॥ ते नादे लीना तुरत, वे मृगना वृंद ॥ व्याघ्र व्याल सवि वश थया, निसुली गीत मंद ॥ ८ ॥ हारा लंकृत ते मृगी, आावी प्रति अभिराम ॥ घोषवतीना स्वर थकी, लय पामी तिथे गम ॥ ए ॥ धन्नो वीरा वजावतो, ते मृगी लेई संग ॥ चाल्यो लक्ष्मीपुर जणी करतो क्रीमा रंग ॥ | १० || नगर मांही ते संचस्यो, मृगीयुत नृप दरबार || पहोत्यो ते देखी नृपति, कौतुक ल| दे अपार || ११ || नगर लोक विस्मय लहे, देखी मृगिनो थट्ट | ए शूं दीसे देवता, नर रूपे परगट्ट ।। १२ ।। ॥ ढाल १७ मी. ॥ ( राजूल बेटी मालीए. - ए देशी. ) गीतकला गुण सांगली, मन हरखी हे प्रतिही आणंद के || पूर्ण प्रतिज्ञा माहरी, एले कीधी हे ए पूरण चंद के ॥ पुण्य संयोगे साजन मीले ॥ १ ॥ ए ग्रांकण ॥ श्रलगां टले हे वली कष्ट वियोग के ॥ मनवंबित सफलां फले, वली रूमा हे दिन पूरण जोग के ॥ ५० ॥२॥ राजा ऽमात्य सेनापति, शेठादिक हो सवि करे परसंस के || धन धन गीतक ला सती, पति पायो हे उत्तम अवतंस के ॥ ५० ॥ ३॥ हार लियो मृगी कंथी, तब कन्या | द्रे वरमाल नदार के || धन्नाने कंठे ग्वे, सहु जांखे हे मुख जय जयकार के ॥ पु० ॥ ६ ॥ For Personal and Private Use Only Jain Educationaational नु० ३ १ jainelibrary.org Page #165 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 1- 4 लम वेला साधी करी, परणावी हे नृपे कन्या तेह के । दीघो बहुलो दायजो, वली दीधां हे अति सुंदर गेह के । पु० ॥५॥ नृप आग्रहे धन्नशाह जी, रहे रंगे हे स्त्री त्रिण्ये साथ के 8 ॥ विलसे नोग नली परें, नृप पूरे हे तस बहुली आथ के ॥ पु०॥६॥ अथ नृप मंत्री सु . गुप्तनी, पुत्री रूमी हे सरस्वति अनिधान के ॥ विद्यागुणश्री सरस्वती, कला कोविद है २ वली रूप निधान के ॥ पुण्॥ ॥ बुद्धि परीक्षण कारणे, गूढार्था हे. प्रहेलिका कहे एक के ।। एहनो अर्थ कहे जिके, ते वरवो हे वर मननी टेक के ॥ पुण् ॥ ॥ प्रहेलिका यथा ॥ अनुष्टुब्वृत्तम्. ॥ गंगाय दीयते दानं, एक चित्तेन नाविना ॥ दातारो नरकं यांति, प्रति | ग्राही न जीवति ॥१॥ नावार्थः-एक चित्ते थइने गंगानदी नपर दान अपाय , परंतु ते । दान आपनारो मरीने नरकमां जाय अने दान लेनारो मरण पामे ! एवं शुं हो ? १॥ जण जण अर्थ करे जूा, नवि बेसे हे कोई अर्थ विशु के ॥ धन्ने पिण सुणो अन्य दा, तस अर्थनो हे लिखे श्लोक सुशुःइ के ॥ पु०॥ ॥ श्लोक यथा ॥ मीनोग्राही पलं दे। हाय, कन्ये दातात्र धीवरः ॥ फलं यजायते तत्र, स्तयोःतविदितं जिनैः ॥॥नावार्थः धनकुमरे पाबला श्लोकना नत्तरमां का के, हे कन्या! इहां दान लेनार माउलां, आपवा है। । योग्य दान ते गल (पल) अने दान आपनारो पारधी जाणवो. तेमां दान लेनारने. अने । 45-56256 551515- in Educational For Personal and Private Use Only IT ainelibrary.org Page #166 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० आपनारने जे फल थाय , ते फल जिनेश्वरे जाण्यु ले. अर्थात् दान आपनारो पारधी न०३ नरके जाय ले अने दान लेनारां माब्लां मरण पामे ! ॥२॥ श्लोक लिखी एक पत्रमें, 51 पाउल लिखे हे गुप्तार्षिक पद्य के ॥ अर्थ विचारी एहनो, तुमे लिखजो हे नामिनी मुज है। सद्य के ॥ पु०॥१०॥ न लगेनाग नारिंगे, निंबे तुंबे पुनर्खगेत् ॥ काकेत्युक्ते लगेन्नैवं, मा । मेत्युक्ते पुनर्खगेत् ॥ ३॥ नावार्थः-नाग अने नारंगीमां नेगा न थाय, पण निंब अने तुंPबमां नेगा पाय! तेमज वली काक बोले ते नेगा न थाय, परंतु मामा एम बोले उतेने गा थाय! हे कन्या! एवं शुं हशे? ॥ ३ ॥ न तस्यादौ न तस्यांते, मध्येयश्च व्यवस्थितः॥ तवाप्यस्ति ममाप्यस्ति, यदि जानासि तदः ॥ ४॥ नावार्थः-जे चीज आदिमां नथी । से रहेती, तेम अंतमां पण नथी रहेती; परंतु वचमांज रहे . वली ते चीज तारे पण अने। मारे पण ! तो, हे कन्या ते शी चीज? ते तुं जागती होय तो कहे ! ॥४॥ कन्या वांची पत्रमें, निज मननो हे ते पामी अर्थ के ॥ पिण धन्नोक्त सुश्लोकना, नाव न लहे दे न | यम थयो व्यर्थ के ॥ पुण् ॥११॥ तव बेसीने सुखासने, सखी साधे हे गई धन्ना गेह के। लाज थकी कहे श्लोकना, नवि पामी हे हुं अर्थ के जेह के ॥पु०॥१॥ तब धन्नो कहे 'नष्ठ १ होठ. Jain Education national For Personal and Private Use Only C ainelibrary.org Page #167 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ए, शब्द शास्त्रे हे अरे एह विचार के ॥ अष्ट स्थानक ले वर्णना, सोधी लेजो दे हवे अर्थ नदार के ॥ पु० ॥ १३ ॥ यतः॥ अष्टौ स्थानानि वर्णाना-रमुरः श्कंठः ३शिरस्तथा ।। जिह्वामूलं च पदंताच, नासिकोष्ठौ च प्रतालु च ॥१॥ नावार्थः-गती, कंठ, माधु, जिन्नामूल, दांत, नासिका, होउ अने तालवं. ए आठ वर्ण एटले अक्षरोनां स्थानक . अर्थात् ए पाठ स्थानको वमे अक्षरोना नच्चार पाय . ॥१॥ बीजे पद्ये नेत्र , तव सर. स्वती हे सुणी अर्थ सुजाण के ॥ एहना पद्यना अर्थने, नवि पामी हे तिणे नियति प्रमाण MS के ॥ पु० ॥१५॥ तव मंत्री पुत्री प्रते, कहे ताहरी हे थई पूर्ण प्रतिज्ञ के ॥ वर वरो ए 31 ६) मन होशथी, बुध्विंतो हे सुंदर अति सुज्ञ के ॥ पु० ॥१५॥ चित्त हरखे ते सरस्वती, न न तातनुं हे करे वचन प्रमाण के ॥ शुन्न दिवसे मंत्री तदा, परणावे हे ते अवसर जाण के ॥ पु० ॥१६॥ विनव दिये बहु नांतथी, सुख विलसे हे चारे स्त्री संग के॥ त्रीजे नल्हा से शोनती, ढाल सत्तरमी हे कही जिन मन रंग के॥पु०॥ १७ ॥ ॥दोहा. ॥ राजा माने अतिघj, देखो बुद्धि प्रकार ॥ मंत्री पिण कार्यादिके, पूरे वात विचार ॥१॥बुध्विंत देखी बहुल, पूढे नव नव नेद ॥ धनोशाह नत्तर तुरत, आपे धरी उमेद ॥२॥ चारे बुझ्थिी चतुर, चेतन लहे सुख सार॥ तिम चारे नारी थकी, सुख । Jain EducationaKational For Personal and Private Use Only Andainelibrary.org Page #168 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५ धन्ना विलसे श्रीकार ॥ ३ ॥ ७३ 8 ॥ ढाल १७ मी. ॥ (वीरे वखाणी राणी चेलणा जी.-ए देशी.) एहवे ते लक्ष्मीपुरे जी, पत्रामल नामे नदार ॥ कोमि बत्रीश सोवन तणो जी, अद धिपति ने शाहुकार ॥ देखो देखो बुब्बिल मोटको जी ॥१॥ ए प्रांकणी ॥ गेटको नहो । लवलेश ॥ सुख दिये जेह आपद पझे जी, यश करे देश परदेश ॥ देखो०॥॥ सुंदरी नामे |P तस गेहिनी जी, पुत्र शुन्न लक्षणा चार ॥ राम ने काम गुणधाम जी, श्याम चोथो सु-15 ४ खकार ॥ देखो० ॥३॥ अद्भूत रूपथी नपती जी, शोन्नती लक्ष्मी प्रतिरूप ॥ लक्ष्मी नामा तस ऊपरे जी, पुत्री उपनिषद स्वरूप ॥ देखो ॥धा दान यात्रादि शुन्न स्थानके जी, धन kt व्यय करे पत्रामल ॥ तप जप देवपूजा सदा जी, आचरे तेह अवध ॥ देखो० ॥ ५॥ अंत वय आवी तव ऊपन्यो जी, रोग ते विविध प्रकार ।। मरण जाणी तव आपणो जी, तेड्या |P तिहां पुत्र ते चार ॥ देखो०॥६॥ सोनलो पुत्र सुपुत्र बगे जी, माहरा जीवनप्राण ॥मानजो शीख एक अमतणी जी, तुमे गे अति चतुर सुजाण ॥ देखो० ॥७॥ बांधव को कारण की जी, ष मत धारजो धीर ।। बांधव सम को नही जी, प्रेमनो पात्र सधीर ॥ दे. खो०॥॥ कंचन कामिनी सुलन डे जी, सुलन बे मंदिर बात ॥ सुलन पुत्रादि सवि । ३ HREEK Jan Education N ational For Personal and Private Use Only wjainelibrary.org Page #169 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 15 - पामवा जी, उलन मातनो जात ॥ देखो०॥ ॥ यतः॥ कडुन होए लीवमो, पिण त स ताढी गंद ।। बंधव होए अबोलणा, तोहि पोतानी बांह ॥१॥ धनतणो ध्यान नवि धा3/ रिये जी, धन सदा अनरथ मूल ॥ अंगलो मेल ए जाणवो जी,धनथको सयण प्रतिकूल ।। देखो०॥१॥ सातखेत्रे धन वावस्यो जी, ते भयो आपणो सार ॥ शेष धन पाप कारण है। सही जी, जाणजो चित्त मकार ॥ देखो०॥११॥ पिण एह समय धनवंतने जी,मान आ | पे सहु लोक ॥ धनथकी लाज जगमें रहे जी, धन विण माणस फोक ॥ देखो० ॥१॥ 3 धनकी धर्म साधन हुवे जी, धनथकी दान देवाय ॥ धनथकी जीवरका हुवे जी, धनथकी सुजस सवाय ॥ देखो० ॥१३॥ निर्धन आदर नवि लदे जी, निर्धन शव सम होय ॥ धन | लाविण कोय धीर नही जी, प्रत्यय न धरे तस कोय ॥ देखो० ॥१४॥ तेह नगी धन तुमे । राखजो जी, पिण मत करजो क्लेश ॥ क्लेशथी उःख लहेशो घणो जी, इह परनव सुविशे। ॥ देखो ॥१५॥ यतः ॥ अनुष्टबूवृत्तम्.॥प्रतापो गौरवं पूजा, श्रीयशः सुखसंपदा ॥ ५ कुलेतावत्प्रवाईते, यावन्नोपद्यते कलि ॥२॥ नावार्थः-प्रताप, महोटाइ, पूजा, लक्ष्मी, ४ जश अने सुखसंपदा; ए सर्वे ज्यां सूधी कुलने विषे क्लेश न नत्पन्न थाय, त्यां सूधी वधे. ॥ ॥ कुटुंबमें क्लेश करते थके जी, लाज मर्याद सवि जाय ।। लघुता लहिये निज नातिमां 4%CE%EOPE Jain Education a tional For Personal and Private Use Only m ainelibrary.org Page #170 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० G४ जी, चिंतित कार्य विधाय || देखो ० ॥ १६ ॥ बांधव क्लेश बहु दुःख दीये जी, जरत बाहू बली जेम | कोशिके दल्ल विदल्लशुं जी, न गएयों एले बांधव प्रेम | देखो० ॥ १७ ॥ पांव कौरव मूळतां जी, कुल कय थयो सवि ताम ॥ ते जणी बांधवशुं तुमे जी, राखजो स्नेह सुप्रकास | देखो० ॥ १८ ॥ बांधव स्नेहथी तुम प्रते जी, को न गंजे इसे गम ॥ कं |टक वारुना बलयकी जी, जुन अगंजी हुए गाम | देखो || १७ || निर्धन बांधवे परिवयो जी, हुए बलवंत सदैव ॥ तंतुयोगे पट नीपन्यो जी, बल खमे अधिक तथैव ॥ देखो ॥ २० ॥ शीख श्रमची अबे ए घणी जी, कलह मत करजो तुमे पूत्र || ढाल अढारमी जि | ने कदी जी, राखजो अम घरसूत्र || देखो ॥ २१ ॥ ॥ दोहा ॥ नेला रहेजो जावशुं, चारे तुमे सुपात्र ॥ प्रीति जली परे पालजो, प्रन्योन्ये शुचि गात्र ॥ १ ॥ अनुक्रमे पौत्रादिक वधे, न रहेवाये एकत्र । तो तुमे याजो जजूया, द्वेष न धरशो तत्र ॥ २ ॥ तुम चारे नामे करी, कलश चार धन पूर्ण ॥ चारे दिशि यांच्या बे में समकाले तूर्ण ॥ ३ ॥ ते लेजो तुमे नलखी, धनश्री सरिखा चार ॥ खाजो पीजो खरचजो, वलि करजो व्यापार ॥ ४ ॥ शीख देई इम पुत्रने, पचखे चारे आहार ॥ चार शरण शुन जावथी, धारे चित्त मकार ॥ ५ ॥ चोराशी लख जोनिने, खमे खमावे Jain Educationational For Personal and Private Use Only न०३ ४ jainelibrary.org Page #171 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आप ॥ अणसण आराधन करी, गंमे पापनो व्याप ॥ ६॥ नवपद ध्यान संचारते, पहो-12 18त्यो ते परलोक ॥ प्रेतकार्य करी अनुक्रमे, पुत्रे गंड्यो शोक ॥ ७ ॥ । ॥ ढाल १५ मी ॥ (केसर वरणो हो, काढ कसुंबो महारा लाल.-ए देशी.) तेहवे नाता हो सुगुण विख्याता मारा लाल, नत्तम दाता दो कुलना त्राता मारा *लाल ॥ अनुक्रमे तेहने हो संतति थावे मा०, बहुलपणाथी हो कलह जगावे मा० ॥१॥ तव ते चिंत हो तातनी वाणी मा, कलहथी खिया हो श्रावे प्राणी मा ।। ते नणी नो-3 जन हो जूजू कीजे मा०, निज नामांकित हो कलश ग्रहोजे मा०॥॥ चित्त में चिंते होते समकाले मा०, नूमिश्री काढ़ी हो कुन निहाले मा०॥ प्रथम कलशमें दो लेखण खमियो मा०, वलि वलि मोटो हो कागल दमियो मा० ॥ ३॥ बीजे कलशे हो दृषदने माटी मा०, ते पिण देखी हो रह्या नेराटी मा॥त्रीजे कलशे हो हाम ते दीसे मा०, अ श्वादिकनां हो देखी खीसे मा० ॥४॥ लघु बंधवने हो कलश सोहावे मा०, आठ सोनानी ४ हो कोमी कमावे मा॥ते तो राजी हो यो निज मनमें मा०, ताते दीगे हो गुण मुज तनमें मा०॥५॥ ताम ते त्रिएये हो धनने देखी मा०, बोले बमबम दो लाज नवेखी मा० ॥ कलश धरतां हो तात वरांसो मा०, कुटिलपणाथी हो कीधो हासो मा०॥६॥ए धन SARSHARE २२ Jain Education national For Personal and Private Use Only Olainelibrary.org Page #172 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ՆԱ Jain Educati सघलो हो फिरी वहेंची जे मा० ॥ एहनी वाते हो विलंब न कीजे मा० ॥ तातनो पैशो हो सहुने सरिखो मा०, पुत्रमें अधिको हो कोय न परख्यो मा० ॥ ७ ॥ तव लघु बोले हो ता ते मुजने माण्, ए निधि प्रापी हो शुं वे तुजने मा० ॥ तुमचे जागे दो लेखा पाटी मा०, वलि अस्थ्यादिक हो नपलने माटी मा० ॥ ८ ॥ कलह ते जाग्यो हो धनश्री घरमें मा०, वात ते चाली दो वधती पुरमें मा० ॥ नाति जातिथी हो समजण नावे मा०, तव ते वढता हो नूपपें जावे मा०|||| नृपति सुलीने हो चित्त विचारे मा०, तात तनुजने हो किम इम धारे मा०, मंत्रिने मी हो मसलत कीधी मा०, पिया ते वार्त्ता हो कांइ न सीधी मा० ॥ | १० | तेहवे धनपति हो मुजरे यावे मा०, प्रादर देइने हो नृपति बोलावे मा० ॥ दाखे सघली हो वात ते वीती माण्, न्याय करतां हो श्रम मति बीती मा० ॥ ११ ॥ तव कहे धन्नो हो चित्त विचारी मा०, तात ते एहनो हो हुशे अधिकारी मा० ॥ स्वामी एदने हो इहां क तेको मा०, तुम देखतां हो करीश निवेको मा० ॥ १२ ॥ सुश्री नृप दरख्यो हो तेह बोलाया मा०, बंधव चारे हो ततक्षण आया मा० ॥ कहे तव धन्नो दो तुमने जाली मा०, ता ते दीधी हो सदृश कमाली मा० ॥ १३ ॥ जेहने दीगे हो नामे पोढो माप, देवे लेवे हो स हुश्री दोढो मा० ॥ तेहने दीघो हो लेहलो लेखो मा०, वांची वहिमें हो हृदय में देखो मा० ernational For Personal and Private Use Only ᄋᄅ ԵԱ v.jainelibrary.org Page #173 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥१५॥ व्यापारीने हो मनमें जाणी मा०, गृह क्षेत्रादिक हो नूमि कमाणी मा० ॥ धान्य ४. प्रमुख पिण हो तेहने दीधो मा०, मृत्पाषामे हो निश्चय कीधो मा० ॥१५॥ पशु व्यापारी हो जाण्यो जहने माण, गज अश्वादिक हो दीधा तेहने मा०॥ वली गो गोकुल हो ते पिण कहिये माण, अस्थी देखी हो ते सहहिये मा॥१६॥ लघु सुत जाणी हो तात प्रमाण है माण, मन हित आणी हो सकल कमाणी मा०॥ मंद अन्यासी हो ए न कमासी मा०, ते नणी दीधो हो धन सुविलासी मा ॥ १७ ॥ एकेकाने हो धन सुविशेषे मा०, अम अम | 18 माने हो कोमि ते लेखे मा० ॥ जोशो लेखो हो करिने जेहमें मा०, नो अधिको हो कांश ५ न एहमें मा० ॥ १०॥ तव ते बेग हो करवा लेखो मा०, दफतर काढी हो सघलो पेख्यो । & मा॥ व्याजने मेले हो धन सरवालो मा०, आठ कोमीनो हो अयो हवालो मा० ॥१५॥ घर आपणने दो क्षेत्रने वामी माण, धान्यना कोग हो वहेलने गामी मा॥ लेखो तेहनो हो कीघो जाणी मा, अठ कोमी धननी हो वहिये लिखाणी मा० ॥ २०॥ एक शत हाथी ४ हो अयुत डे घोमा मा०, एक शत गोकुल हो सबल सजोमा मा० ॥ नष्टादिक तिमज हो | मेल ते कीधो मा०, अम कोमी धन हो ते श्रयो सीधो मा०॥ १ ॥ हरख्या तव चारे हो | बंधव मनमें मा, नूख्यो नोजन हो जिम लहे वनमें मा० ॥ नृपने प्रणमी हो मंदिर जावे 5** SGRRESS Jain Educa t ional For Personal and Private Use Only Imrtainelibrary.org Page #174 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ०३ धन्ना० मा, धनाना गुण हो मनमें ध्यावे मा० ॥२॥ गुणना रागी हो सहु का जगमें मा०, रूमा गुणिने हो ग्रहिये वगमें मा०॥त्रीजे नल्हासे हो ढाल रसीली मा०, ए नगणीशमी हो जिनने रंगीली मा० ॥२३॥ ॥दोहा. ॥ चारे बांधव चिंतवे, एहनो गुण असमान ॥ करण थए किणि विधे, एह नाग्य निधान ॥१॥ लक्ष्मी सम लक्ष्मी अने, बहिन आपणे एक ॥ दीजे एहने है दिल धरी, ए आपणो विवेक ॥२॥ चिंतीने धनशाहने, शुन्न वेला शुन्न योग ॥ परणावे | नगिनी प्रते, जाणी सदृश संयोग ॥ ३॥ तेहशुं विविध संसार सुख, नोगवे धरि बहु प्रेम 18 ॥ पाचथी लीनो रहे, पंच सुमति मुनि जेम ॥४॥ ॥ ढाल २० मी.॥ (प्रणमुं गिरजानंदना.-ए देशी.) एहवे ते लक्ष्मीपुरे, कृषिक तणो ने शेठ ॥धनपालानिध नामथी, धननी करे नित वे ॥१॥ खावे न पीवे नवि देवे, लेवणनी करे वात ॥ सुबमांही शिरदार ते, अहनिशि 15/ करे पर तात ॥२॥ एहवे एक को याचक, याचवा आव्यो तास॥ मीठे वचने बोलावि ने, बेसास्यो लेश पास ॥३॥ कहे याचक सुणो शेठजी, कीजे न दान विलंब ॥ आयुतणी गति अथिर , तेह नणी अविलंव ॥४॥तव बोल्यो याचक प्रते, देशुं प्रनाते दान ॥जो LASSSS Jain Educator national For Personal and Private Use Only I lainelibrary.org Page #175 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जन व्यंजन लावतां, तांबूलादि प्रधान ॥ ५॥ कठी गयो तव याचक, श्राव्यो प्रनाते गेद ॥ कवित गूढार्थ गाहा तस, गुण वर्णन करे तेह ॥६॥ कहे तव सुंब शिरोमणी, तूं आवे परन्नात ॥ देशं नोजन नावतां, तांबूल युत विख्यात ॥ ७॥ तिम त्रीजे दिन आविन, बो ले याचक एम ॥ शुं रे कृपण नश्री आपतो, नोजन व्यंजन तेम ॥ ७॥ जगमें यश रहेशे । पिण, नहि रहे तन धन मान ॥ रावण सरिखा राजवी, ते पिण चाल्या निदान ॥ ए॥ नंदराय धन मेलिने, नेल्यो समुश्मकार ॥ मम्मणशेठने सागर, पहोत्या नरकागार ॥ १०॥ दीधुं रहे अविचल थर, खाधुं खूटी जाय ॥ सापुरिसानुं जीवित, दानश्री सफल ग-12 गाय ॥११॥ देता देतां पात्रने, धननी थाये वृहि ॥ मूलदेव परे ततकणे, पामे सकल स-1 महि॥१२॥ यतः शार्दूलविक्रीमितवृत्तम्. ॥ श्री नात्यजिनेश्वरो धनन्नवे श्रेयाश्रयामा है। श्रयः, श्रेयांसश्च स मूलदेवनृपतिः सा चंदनानंदना ॥ धन्योसोकृत पुण्यकोगतनवः श्री शालिनशान्निधः, सर्वेप्युत्तमदानमानविधिना जाताजगश्रुिताः ॥१॥ नावार्थः-प्रश्रम | 18 तीर्थकर श्रीषनदेवस्वामी, ते धनसार्थवाहना नवमां (घुतनुं दान देवाथी) कल्याण 5 रूप लक्ष्मीना घर हता ते, श्रेयांसकुमर, मूलदेव राजा, चंदनबाला, तथा पूर्वनवने विषे । करघु ने पुण्य जेमले एवा आ धनकुभर अने शालिनकुमर; ते सर्वे पण नत्तम दान असे Jan Educato ational For Personal and Private Use Only Selainelibrary.org Page #176 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० GS ने सन्माने करी जगत्ने विषे विख्यात थया बे ॥ १ ॥ तव बोल्यो प्रदातृको, धीरो था तूं धीर ॥ आज रसोई न नीपनी, कार्य विशेषथी वीर ॥ १३ ॥ इम करते करते तसु, मास | थयो इक जाम ॥ ताम ते याचक चिंतवे, सुंबनी पाहूं माम ॥ १४ ॥ इम चिंतीने भैरवी, | देहरे बेठो तेह || धूर्त्त विद्यानो साधन, साधे शुचि करी देह ॥ १५ ॥ कुंम करी पट कोणनो, हवन करे तिहां खास ॥ जप जपतां इकवीश ते, तास थया नृपवास ।। १६ ।। चंमिका ताम प्रगट थई, कहे तुं च वर माग ॥ दूं तूवी तुज ध्यानथी, ताहरो महोटो भाग्य | १७ ॥ तव बोल्यो ते याचक, पय प्रणमी सुविचार || रूप परावर्तक मुज, ये विद्या सुखकार ॥ १८ ॥ देवीये बीधी ततक्षणे, विद्या तेह प्रधान ॥ ते लेईने याचक, नख्यो यई साव धान ॥ १९ ॥ हवे ते धनकामिक, ग्रामांतर गयो ठीक ॥ जालीने धनपालनो, रूप कस्यो निरजीक ॥ २० ॥ श्राव्यो कृपणतणे घरे, ते याचक धरी रूप । पूढे पाढा किम वल्या, तुरत तुमे घरि चंप ॥ २१ ॥ तव कहे शुकन थया प्रति, मुज मध्यम जिलि वार ॥ तिले तिहांथी पाठो वढ्यो, विच में मिल्या अणगार || २२ || देशना देता देखिने, हुं बेटो मुनि पास ॥ अमृत वाणी अति जली, सांजली थयो उल्हास ॥ २३ ॥ श्रायु थिर अंजली ज ल, रूपम एहने थाय ॥ धन पिएस नदीय प्रवाह बे, कोयथी राख्यो न जाय ॥ २४ ॥ योव For Personal and Private Use Only TKI Jain Educatio mational नु० ३ GG jainelibrary.org Page #177 -------------------------------------------------------------------------- ________________ न संध्या रंग ने, सुपन सदृश संयोग ॥ रमणी रंग पतंग ते, विष सम विषय संजोग ।। २५॥ रोगे करिने पूरित, काया अशुचि नमार ॥ तेहमें दानादिक करे, तेहनो धन्य अवतार ॥ २६ ॥ यतः॥ शार्दूलविक्रीमितवृत्तम्. ॥ आयुर्वारितरंग नंगुरतरं श्रीस्तूलतुख्यस्थिति, स्तारुण्यं करिकर्ण चंचलतरं स्वप्नोपमाः संगमाः॥ यच्यान्यमणीमणी प्रन्नृतिकं वस्तुंचतञ्चास्थिर, विज्ञायेति विधीयतामसुमता धर्मस्सदा शाश्वतः॥॥नावार्थः-प्रानखं पाणीना तरंगनी पेठे अतिशे नाशवंत; लक्ष्मी वणकरना कांग्लानी पेठे चपल स्थितिवाली; तरुणपणुं हाथीना काननी पेठे अतिशे चंचल; कुटुंबीनो मिलाप स्वप्न तुल्य; || तेमज स्त्री, मणि अने माणेक विगेरे जे कांई पदार्थ, ते सर्वे पण अस्थिर , एम जाणीने ४ प्राणीए शाश्वत एवो धर्म करवो जोइए.॥२॥सांनलिने मुज चित्तमें, नपन्यो सबल सं वेग ॥ कृपणपणो हवे गंमवो, मांझवो दानशुं नेग ॥ २७ ॥ ते नणी पाजश्री कोयने, म त कहेजो नाकार ॥ जे मागे ते तेहने, देजो दान नदार ॥ ७ ॥ तुमे गे सुपुत्र सोहाम गा, तात वचन प्रतिपाल ॥ देतां धन खूटे नही, जागजो चित्त विचाल || | आप को | मि धन आपणे, ने नूमिगत जेद ॥ ते पिण काढी दीजीए, लीजीए लान अह ॥ ३० ॥ । यतः।। अनुष्टुवृत्तम. ॥ मा मंस्था दीयते वित्तं, दीयमानं कदाचनः॥ कूपाराम गवादी AN-SCCCCCASCAR SC-SC-C Jain Educationale ronal For Personal and Private Use Only 1 nelibrary.org Page #178 -------------------------------------------------------------------------- ________________ EBE धन्ना० G Jain Education नां ददतामेव संपदः ॥ ३ ॥ जावार्थ :- हे पुत्र ! पातुं धन कदि पण कीरा थाय वे एम तुं न मान. कारण के कूवामांश्री जेम जेम पाणी काढीए बीए, तेम तेम पाणी वृद्धि पामे बे, बगीचामांथी जेम जेम फूलो लेइए बीए, तेम तेम नवां फूलो यावे वे अने गायने जेम जेम दोदिये बीए, तेम तेम नवुं दूध उत्पन्न थाय बे; ते कारण माटे जेम जेम दान आपीए, तेम | तेम धननी वृद्धि थाय बे. ए तात्पर्यः ॥ ३ ॥ तव ते कपट प्रजाणता, वचन करे सुप्रमाण || दान दिये यह निशि मुदा, राखता चित्त शुभ ध्यान ॥ ३१ ॥ असन वसन आभूषण, प्रापे विविध प्रकार || नाकारो मूली गया, मांड्यो ये ये कार ॥ ३२ ॥ केलवे कपट जे जालिने, ते बले सुर नर धीर ॥ पिस कोई तेहने नवि लहे, जिम नेल्यो जल खीर ॥ ३३ ॥ कपट न कीजे कोयथी, इम कहे जिन सुविलास ॥ ढाल थइ ए वीशमी, शुन त्रीजेनव्हास ॥ ३४ ॥ ॥ दोहा ॥ इम दिन आठ लगें तिथे, दीघो ग्रह निशि दान ॥ नाति जाति पोखी नली, लीधो यश असमान ॥ १ ॥ ते वार्त्ता वधती थई, नगर देश पुर गाम ॥ सुंबे ते पिसांजली, थयो विमतिले गम ॥ २ ॥ आव्यो अति कतावलो, निज गृदांगल जाम || दीगे प्रतिरूपी तिहां, बेगे ये बहु दाम ॥ ३ ॥ बोल्यो सुंब रोशे करी, तुं कुल बे चंकाल national For Personal and Private Use Only न०३ G jainelibrary.org Page #179 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ मुज मंदिरनो पति थर, बेगे इहां चोसाल ॥४॥ धन संघलो तें माहरो, विणसाड्यो 13/शे माट ॥ कठ कल जा ईहां थकी, पकमी कोश्क वाट ॥ ५॥ ॥ ढाल १ मी.॥ (धन धन जननी बे लाल.-ए देशी.) तव ते बोले बे लाल, धूर्त कला करी ॥माहरे नुवने बे लाल, हुं रहुं दिल धरी ॥१ ॥ तुटका दिल धरी हुं रहुं दान देतो, नथी लेतो केहy ॥धन माल मिलकत माहरी जे, मनोगतुं सुख तेहगें ॥ तूं कवण कपटी इहां आयो, धायो स्वानपरे थई । कुल जाति ही-3 यो अ दाणो, अकल बुहिदीसे गई ॥२॥ चाल-सुंबने कपटी बे लाल, बिहुं नेला लमे ॥ पुत्रादिकने बे लाल, शुहिन को पॐ॥ ३ ॥ तु न पसे शुहिते सयण सहुने, तव ते बि | हुंने काढिया ॥ ते कलह करता मान धरता, वचन बोले गांढिया ॥ तिहां पांच नेला मिल्या समेला, पिण ठराव न को पमे॥ बहु ग्राम लोको परिवस्या ते, राज दरवारे चमे॥ ॥ चाल-राजा देखी बे लाल, मूफाई रह्यो । सचिवने एहनो बे लाल, न्याय करवो क-15 यो॥५॥ तु०कह्यो एहनो न्याय करिये, तो तुम बुद्धिसोहामणी ॥ तव सचिव कहे प्र. नु कपटनी मुज, खबर न पमे अति घणी ॥ महादेवने बलिराय सरिखा, राम पिण ग्लमें हैपड्या ।। जून कपट करीने इंश ते पिण, अहिल्याशुं आयड्या ॥ ६ ॥ चाल-एहवे धन्नो बे Jain Education a tional For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #180 -------------------------------------------------------------------------- ________________ घन्ना० ‍ लाल, परिजने परिवस्यो । नृपने देखी बे लाल, आदर प्रति कस्यो ॥ ७ ॥ तु० प्रति कयो श्रादर लही बेगे, सना में सुर सारिखो ॥ ऊघमंता देखी ते बहुने, कियो तता पा रिखो ॥ तव राय बोले अति अमूलिक, कन्या के धनपालनी । जे न्याय करिने सत्य दाखे, | ते वरे गुणमालिनी ॥ ८ ॥ चाल - तव कहे धन्नो बे लाल, एहमांशुं घडे ॥ एहने निवेमी बे लाल, जिमशुं जइ पढे ॥ ए ॥ तु पठे जिमशुं ए निवेमी, कही कमल अणावीयो ॥ ते सुरनिगंधे प्रतिदी सुंदर, देखी सहु मन जावियो || ए कमल मुखथी पेसिने जे, नीस |रे नाले थई । धनपाल ते सही जाणजो इम, वात घन्ने मुख कही || १० || चाल - तव ते | कपटी बे लाल, विद्या बल की || पेसी मुखथी बे लाल, नीसस्यो बल थकी ॥ ११ ॥ तु० बलथकी नीसरतो ग्रह्यो तस, बांधीयो बंधन करी ॥ कहे कपट एतो केम कीधो, विद्या ता हरी वे खरी ॥ तव कहे याचक सुंब मुजने, कदे नोजन नापतो ॥ परजाते जोजन आप शुं मुज, उत्तर एवो आपतो ॥ १२ ॥ यतः ॥ अनुष्टुववृत्तम. ॥ प्रगेदास्ये प्रगेदास्ये, जोज न जोस्तवेत्यहं ॥ मासं प्रतारितोऽनेन, कृपणेन महीपते ॥ १ ॥ जावार्थ :- हे राजन् ! का ल सवारे जोजन प्रापीश, काल सवारे जोजन प्रापीश, एम कही कही एक महिना सूघी धक्का खवरावी ए कृपणे मने ठग्यो, तेथी मारे श्रावुं करवुं परुयुं ॥ १ ॥ चाल - तव Jain Educationa irional For Personal and Private Use Only ८० ३ G jainelibrary.org Page #181 -------------------------------------------------------------------------- ________________ में कोपे बे लाल, साधी भैरवी ॥ तिले मुज दीधी वे लाल, विद्या अजिनवी ॥ १३ ॥ तु० अभिनवी विद्या ताम साधी, रूप कीधो एहनो ॥ में दान दीधो लान लीधो, काज सीधो | देहनो || सुणी लोक सघलो कहे सारो, काम कीधो इह नवे || साबाश तुजने हो बांध व, सुख लहीश वली परभवे ॥ १४ ॥ चाल - निसुली धन्ने बे लाल, बंधन बोमियो ॥ कहे नृपतेहने बे लाल, काम जलो कीयो ॥ १५ ॥ तु कियो जलो तें काम नाई, इम कही सनमानीयो ॥ नमि नूपने धन्ना प्रते तव, प्रयाणो तेणे कीयो । धनपाल तव संतोष पा म्यो, वाम्यो दुःख दिलय सवे || घर दि सारी सबली वधारीश, जीवतो बुं जो हवे ॥ १६ || चाल - परिजन साथे वे लाल, परिवृत आवियो ॥ स्त्री सुत सहुने बे लाल, मनमें नावियो ॥ १७ ॥ तु० जावीयो ते कहे सुखो सजनो, धन्ने नपकृति मुज करी ॥ माहरी ए सयल लीला, एहथी में अनुसरी । ते जणी एहने दिनं पुत्री, राये पिस जांख्यो । नवि दीजीये तो बल करीने, राय देवरावे पढे ॥ १८ ॥ चाल-इम चिंती बे लाल, धन्नाने तदा ॥ दीधी कन्या बे लाल, घरी मनमें मुदा ॥ १७ ॥ तु० घरी मनमां हर्ष अधिके, परगावी गुणमालिका | लक्षणे रूमी नही कूमी, सासती कुलबालिका || बच्चाहरूमा तेस जोमा, हुआ अधिका हेजश्री ॥ शामा सुरंगी दृगकुरंगी, शोजती पियु तेजथी ॥ २० ॥ चा Jain Educationa International For Personal and Private Use Only Page #182 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धना० ल-पूरव पुण्ये बे लाल, धन्नो सुख वरे ॥ राजा मंत्री बे लाल, हित अधिको धरे॥१॥ तु न०३ ए हित धरे अधिको स्नेह साचो, काचो नही को वातश्री ॥ एक कनकने वलि सुरनिवासे, ते लहे यश जातिथी ॥ तिम बुद्धि पाश् वलो जमाई, गुणे गौरवता लहे॥ त्रीजे नल्हासे वीशने श्क, ढाल ते जिन श्म कहे ॥१२॥ # ॥दोहा. ॥ हवे धन्नो सुख नोगवे, षट कामिनीथी खांति ॥ धरणेज्ञादिकने जिसी, IA षट इंज्ञणी पांति ॥१॥ चिंते चित्तमें तव चतुर, जश्ए मगध मझार ॥ मिलिये श्रेणिक रायने, रहिये निज आगार ॥२॥ ग्राम सकल संन्नालिये, गज अश्वादिक तेम ॥ सरवे || सीदाता हुशे, कंत विना स्त्री जेम ॥ ३ ॥ कुसुमपालादि सयण सवि, जोता हुशे बहु वाट | ॥ दयिता बे दिलगीर ते, करती हुशे नचाट ॥ ॥ श्म चिंतीने नृपतणी, मागे धन्नो शील ख ॥ नृप सचिवादिक ताम ते, बोले सवि सरीख ॥ ५॥ ॥ढाल २२ मी.॥ (नरत नृप नावणुं ए.-ए देशी. करजोमा धनपति प्रते ए, राजादिक कहे एम ॥ सुणो तुमे शुन्न मतिये ॥ अमने अवहेली करी ए, प्रीत नतारो गे केम ॥सु०॥१॥ ए आंकणी.॥प्रीति बंधाणी तुम अकी ए, बाजेहवी जलने मीन ॥ सु०॥ तुम गुण अम मनमे वश्या ए, पंकज जिम जल लीन ॥ सु० ए. Jan Educationa a tional For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #183 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education ॥२॥ अम जाग्ये यावी मिल्या ए, तुमे बुद्धिपात्र सुजाण ॥ सु || शीख श्रमे किम आपीए ए, तुम अम जीवन प्राण || सु० || ३ || धन्नो कहे स्वामी सुलो ए, अमे व्यापारी लोक ॥ सु० ॥ काम घलो श्रम मंदिरे ए, लेहलां देहणां रोक ॥ सु० ॥ ४ ॥ ते कीधा विकिम चले ए, जोवो हृदय विचार || सु० || वलि मिलवाने आवशुं ए, जो बे तुमचो प्यार ॥ सु० ॥ ५ ॥ तव नृप प्रमुख धन्नाप्रते ए, आप बहुली श्रथ ॥ सु० ॥ वहेल सुखासन पालखी ए, गजरथ घोका साथ || सु० ॥ ६ ॥ चाल्या धन्नोशादजी ए, सहुझं करीने शीख ॥ सु० ॥ वालावी साजन वढया ए, साश्रुत लोचन सरीख || सु० ॥ ७ ॥ सबल सेनाशुं परवस्त्रो ए, कामिनी षट संयुक्त ॥ सु० ॥ अनुक्रमे राजगृही प्रते ए, सुख विलसंतां पहुत || राजा श्रेणिक हरखिया ए, करे नव प्रति चंग ॥ सु० ॥ सेना शिणगारी करी ए, नेजा | नव नव रंग || सु ॥ ए ॥ श्रामंबरथी प्राणीया ए, धन्नाने श्रावास ॥ सु० ॥ सुसरा सासु विमल्याए, सहुनी पूगी आश || सु० ॥ १०॥ सोमश्री नृप पुत्रिका ए, कुसुमश्री तेली वार ॥ सु० ॥ प्राणेश्वर प्रीतम प्रते ए, आवी करे मनोहार ॥ सु० ॥ ११ ॥ सुकुलीली सोहाम ए, सतीयो में शिरदार ॥ सु०॥ श्रापद आवे सासरो ए, बांड्यो नहीय लिगार ॥ सु||१२|| पारखे होती पद मिली ए, ते गुण चित्तमें धारि ॥ सु० ॥ श्रठेमां अधिकारिलोए, थापी सुन नारि ॥ सु० ॥ १३ ॥ आठे कामिनी नृपति ए, कमला सम गुणखारा ॥ सु० ॥ को For Personal and Private Use Only w.jainelibrary.org Page #184 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० U मल मुखी कोमल वदे ए, पामी पुण्य प्रमाण ॥ सु ॥ १४ ॥ जित कासी धन्नो थयो ए, बुद्धि का || सु ॥ देव तणां सुख जोगवे ए, मानवने अवतार ॥ सु० ॥ १५ ॥ दान दिये दोलत करी ए, परिघल परमानंद || सु० ॥ शील यथाशक्तें करी ए, पाले ते सुखकंद || सु० || १६ || देवार्चन करे दिल घरी ए, राखे रूयको जाव ॥ सु० ॥ द्वेष न राखे कोय ए, सही सरल स्वभाव ॥ सु० ॥ १७ ॥ यतः ॥ आर्यावृत्तम् ॥ जिनपूजनं विवेकः, सत्यं | शौचं सुपात्रदानं च ॥ महिमाक्री मागारं शृंगारः श्रावकत्वस्यः ॥ १ ॥ जावार्थः - जिनपूजन, विवेक, सत्य, पवित्राइप, सुपात्रने दान श्रापवुं अने महिमा एटले प्रतिष्ठा एज जेने क्रिमानुं घर बे, तेज श्रावकपणानो शागार बे. ॥ १ ॥ दान कल्पद्रुम रासनो ए, ए त्रीजो नव्हास || सु० ॥ बावीशे ढाले करी ए, विरच्यो ए सुप्रकास ॥ सु० ॥ १८ ॥ श्री विजयसिंहसूरीशना ए, सकल विबुध शिरदार ॥ सु० ॥ गजविजयानििध गुण निलो ए, आगम जं ॥ ० ॥ १९ ॥ तस सेवक पंकित मला ए तार्किकशास्त्र प्रवीण ॥ सु० ॥ हि तविजय गुरु गुण वश्या ए, समता रस लयलीन || सु० ॥ ५० ॥ तास चरण प्रसादथी ए, ए को प्रयास ||सु०॥ जिनविजय कहे युगतिशुं ए, पुण्ये लील विलास ॥ सु० ॥ २१ ॥ इति श्री धन्नशा लिचरित्रेपाकृतप्रबंधे दान कल्पद्रुमाख्ये तृतीयशाखारूप धन्नशाहसकलार्थ सिद्धिसाधनवर्णनोनामतृतीयोल्दासः समाप्तम् ॥ श्रस्मिनोल्हासे ढाल ||२२|| For Personal and Private Use Only Jain Education national न० ३ TU? Page #185 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ नल्लास ४ यो॥ ॥दोहा. ॥ श्री संखेश्वर समरते, लहिये लखमीनोग ॥ कामित सवि आवी मि-51 ले, सयल सिहि संयोग ॥१॥शारद श्री गुरु संघने, प्रेमे करुं प्रणाम ॥ वचनामृतनी वां बना, पूरो मुज हित काम ॥२॥ चोयो चतुरपणे करी, रचुं नल्हास रसाल ॥ एक चित्त । अश् सनिलो, श्रोता सवि नजमाल ॥३॥ धनोशाह राजगृहे, रहे ते आणंद पूर ॥ हवे ते अनयकुमारनो, कहुं संबंध सनूर ॥४॥ वेश्या कपट प्रयोगधी, चंप्रद्योतन पास ॥ रहे | | अन्नय निर्नय थको, मासीने आवास ॥ ५ ॥ ॥ ढाल १ ली.॥ (देशी रसियानी.) चंप्रद्योतन मालव महिपती, शहि समृझे रे पूर्ण ॥ विराजे ॥ खागे त्यागे नोगे आहे गलो, दीसे दूजो रे कर्ण ॥ दिवाजे॥ सुणजो साजन, कौतुकनी कथा ॥१॥ ए आंकणी ॥ सांन्नलतां सुख थाय ॥ सवाई ॥ समकित पिण निर्मल वधतो हुवे, उरित तिमिर मिट जा 18| य॥जलाई सु०॥ ॥चार रतन तेहने स्वाधीन , पुण्यबले परधान ॥ सदाई ॥रा Kणी शिवादेवी चेटक पुत्रिका, शियलनी परम निधान ॥सखाई।सु०॥३॥ लोदजंघा नामेट्र तस इक प्रेष्य , गमन करे शत कोषामही तेणाअमिनिरू रथ अग्निये नवि बले, चाले ते Jan Educatona t ional For Personal and Private Use Only N a inelibrary.org Page #186 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चन्ना० १ निर्दोष ॥ सही ते सु०॥४॥ अनलगिरी नामांगज नृपतो, ए चारे तस रत्न ॥सनूरां० ॥ राज्य मंमाण ए चारे जालीने, करे तस सुपरें रे यत्न ॥ ते पूरां० ॥ सु०॥ ॥ एक दिन लोहजंघो दू ताग्रणी, पहोत्यो जरुश्रच गम ॥ सवाई ॥ तव तिहांना भूपादिक चिंतवे, एह बिगा | काम || सदाई || सु० || ६ || एहने विष देईने मारीए, तो हुवे शांति संयोग ते ॥ श्रमने ॥ इम चिंती विषमिश्रित लाडूया, चार दिया करी योग ते ॥ तेइनो || सु० ॥ ७ ॥ लेख लेई लोह जंघो चालीयो, प्रहरमें कोष पचास । प्रयाले ॥ खावा बेगे लाडू जेहवे, शुकन करे तस | रीस ॥ ते जाऐ || सु० || 5 || विण खाधे वलि कोष पचास ते, चालीने कोई गम ॥ तिवारे ॥ खावे लाडू तव शुक्रने वली, वज्र्यो चाल्यो तें ताम ॥ विचारे ॥ सु ॥ ॥ इम चारे लाडू खाते थके, शुकन थया नही तास ॥ किवारे ॥ संध्या समये नऊयिनी प्रते, पहोन्यो तेह वास ॥ तिवारे ॥ सु ॥ १० ॥ प्रत्यूषे भूपतिने भेटीने, जांष्यां कार्य प्रशेष ॥ ते पूरां ॥ मोदक देखाड्या मन मोदशुं प्रति सुंदर सुविशेष ॥ सनूरां ॥ सु० ॥ ११ ॥ स्वामी मुजने मोदक नक्षते, शुकन थया प्रति हीन ॥ तिवारे ॥ तेहनो कारण शो हुझे ते कहो, बुद्धि बले सुप्रवीन ॥ इवारे ॥ सु० ॥ १२ ॥ चंमप्रद्योत ते मोदक लेयने, पूग्यो अजयकुमार ॥ सोहे ॥ निरखी कहे एहमें थयो, हगविष सर्प प्रचार ॥ मांदे ॥ ० ॥ १३ ॥ तेह परी Jain Educationa International For Personal and Private Use Only न०४ २ jainelibrary.org Page #187 -------------------------------------------------------------------------- ________________ का करवा कारणे, मूको वनमें रे एह || ते लेई ॥ प्रातप योगे रे नाग प्रगट हुशे, दृष्टे द| हशे रे तेह || सई ॥ ० ॥ १४ ॥ जिम कह्यो तिम करते सहि तिम थयो, हरख्यो चंमप्रद्योत ॥ तिवारे ॥ कहे तूं श्मोचन वि श्वर जे रुचे, माग तूं मनमें नद्योत ॥ इवारे ॥ सु० | ॥ १५ ॥ जय कहे वर ए जंमार में, राखो संप्रति काल ॥ राजेसर || ढाल ए पहिली चोथा नब्दासनी, कही जिनविजये रसाल ॥ वालेसर || सु० ॥ १७ ॥ ॥ दोहा ॥ हवे ते चंगप्रद्योतनी, कुमरी रूप निधान ॥ वासवदत्ता नामश्री, नृपति तो बहु मान ॥ १ ॥ कलान्यास कीधो घणो, श्रध्यापकने पास ।। गोत नृत्य शीखाचवा, श्रवरनी करे तलास ॥ २ ॥ पूग्यां मंत्रीने तदा, कोइ न जांखे जाम || अजयकुमर कहे रा यने, जो तुम विद्या काम ॥ ३ ॥ उदयन कुमर कला निलो, राय सतानिक नंद || गीत नृत्य वाजिंत्र में, कोविद जिभ नम चंद ॥ ४ ॥ घोषवतीना घोषथी, वश कीधा वन ना ग । ते यावे जो इहां कणे, तो सही पाठक लाग ॥ ५ ॥ सांजली चंमप्रद्योत तव, लोहजंघने देव ॥ लेख लिखीने पाठवे, कोशंबी ततखेव ॥ ६ ॥ नदयनने कागल दियो, वांची ग्र १ वनमा जई मोदक उपर पाणी रेमयुं एटले थोमी बारमां समूर्च्छिम नाग मगट थयो. २ मूक्या विना. ३ वचन. ४ हालमा ५ वसलीना. ६ स्वरथी. २४ Jain Educatiomational For Personal and Private Use Only v.jainelibrary.org Page #188 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ३ ह्यो नत ॥ पुत्रीने पाठण जली, तेमावे मुज तंत ॥ ७ ॥ सचिव कहे स्वामी सुलो, तुम ने जावो तत्र ॥ न घटे ते जणि कन्यका, तेमावो तुमे त्र ॥ ८ ॥ धवने पर मंदिरे, रहे तां लघुता होय ॥ तेज हीन जिम शशि हुवे, रवि मंगल में जोय ॥ ए ॥ यतः ॥ मालिनी वृत्तम्. ॥ नडुगल परिवारो नायकोप्योषधीनां, अमृतमय शरीरः काति नाव्योपचं ॥ न वति विकलमूर्त्तिर्ममलं प्राप्यज्ञानोः, परसदन निविष्टः को न धत्ते लघुत्वं ॥ १ ॥ जावार्थ:ताराननो समूह बे परिवार जेनो; औषधियोनो नायक; अमृतमय वे शरीर जेनुं अनेकां|तिवमे नरेलो एवो य चं पण, सूर्य मंगलने पामीने विकलमति एटले तेजहीन थाय बे. ते कारण माटे, हे कुमर ! पर घरने विषे रहेला कोण कोण लघुताने नथी पामता ? अर्था तू सर्वे पाबे ॥ १ ॥ ॥ ढाल १ जी ॥ (देशी मोतीमानी. ) नदयन कहे ते दूतने वाली, चंमप्रद्योतनी वात में जाली ॥ सांजलो गुण रागी हमा रा, सोहना सुखसंगी ॥ ए श्रांकली ॥ वासवदत्ता पुत्री तमारी, जणवा मूकजो श्रम घर | सारी || सां० ॥ १ ॥ नीशाले जणवा सहु यावे, विल पाठक पर घर नवि जावे ॥ सां० ॥ चाल्यो ते दूत ततकाल, पदोत्यो तुरत नऊयिनी विचाल || सां॥२॥ चंरुप्रद्योतन आगल Jain Education national For Personal and Private Use Only नु०४ ३ jainelibrary.org Page #189 -------------------------------------------------------------------------- ________________ * * * * * नासे, नदयन कुमरनी वात प्रकासे ॥ सां॥ निसुणी खीज्यो मालव राय, अन्नयकुमरने । पूछे नपाय ॥सां०॥३॥ नदयन किणि रीते शहां आवे, अन्नयकुमार उपाय बतावे ॥ सां॥ * वस्त्रतणो श्क हाथी कीजे, पट्टादिक तस बांधी लीजे ॥ सां ॥४॥ अन्यंतर तस पुरुष ले रखावो, वात सकल तेहने समजावो ॥ सां०॥ वनमांहे गज रूपे फिरशे, तव ते गज ग्रहि वा चित्त धरशे ॥सां०॥५॥ वीण वजामतो आवे जिवारे, आणजो ग्रहीने तेह तिवारे ॥ सां॥ सांजली चंप्रद्योतन हरख्यो, अन्नयकुमरने कोविद परख्यो॥ सां०॥६॥ विषद | ६ पुरुषने काज नलायो, जिम कह्यो तिम गज रूप बनायो। सांग ॥ वनमांही फिरे क्रीमा | करतो, देखी वनचर मन सुख धरतो ॥सां॥ ७॥ नदयनने गज वात जणावे, ते पण ग्रहिवा वनमां आवे ॥ सां०॥ वाई वीण विशेष करीने, तव गज चाले कपट धरीने ॥सां०॥ ॥ एकलो नदयन वांसे आवे, गजरूपथी नट नीसरी धावे ॥ सां॥ग्रही नदयनने असे वंती आएयो, चंम्प्रद्योते अन्नय वखाण्यो ॥ सां०॥ ए॥तेमी नदयनने कहे राय, में तुजने ग्रह्यो करिय नपाय ॥ सां०॥ माहरे वैर विरोध न तुजशं, ष म धारे मनथी मुजशं | | ॥ सांण॥१०॥ माहरे तो तूं पुत्रने तोले, मृगावतीए सोंप्यो ने खोले ॥सां०॥ पिण तं तेमा १मुना. * * * * Jain Education national For Personal and Private Use Only M ainelibrary.org Page #190 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धना० व्यो नवि आव्यो, तव में एडवो दाव उपायो॥सां०॥१॥ वासवदत्ता ने मुज बेटी, सकन०४ एव ल कला ते गुणनी पेटी॥ सां०॥ तेहने गीत कला देखावो, सुपरे घोषवती शीखावो ॥ 18 सां० ॥१२॥ मासी तुमारी शिवादेवी राणी, रहेजो तिहां निर्जय सुख जाणी ॥ सां॥ इम प्रालिंगन देई नांखे, नदयनशुं हित नृप बहु राखे ॥ सांग ॥१३॥ बल मांही कहे नदयन सुणजे, एक वचन मुज साचो गणजे ॥ सांग ॥ कन्या काणी ले ते माटे, वदन वि लोकन करतां न खाटे ॥सां०॥ १३ ॥ परिचय अंतर राखी नणावो, वीणा नाद सुपरें ज3 गावो । सां०॥ बेटीने कहे पाठक कोढी, तूं नराजे मुखे अंबर नढी ॥ सां० ॥१५॥ जो 5| तेह- मुख देखीश बाई, तो तुजने रोग विलगशे धाई ॥ सांग ॥ श्म अन्योन्ये शीखवे नू प, बंधावे परियच धरी चूंप ॥ सां०॥१६॥ उदयन नद्यमथी शीखावे, वीणा प्रमुख कला है * वझदावे ॥सां०॥ बीजी ढाल ए चोथे नब्हासे, कहे जिन दान कल्पद्रुम रासे ॥सां०॥१७॥ ॥दोहा. ॥ वासवदत्ता विनयथी, पग्न करे नितमेव ॥ शीखे वीणानी कला, होश धरीने हेव ॥ १॥ एक दिवस पठते थके, चूकी वार बे चार ॥ तव रोषे नदयन कहे, काणी फिरी संजाल ॥२॥सांनलिने मन चिंतवे, काणी मुज कहे केम ॥ फिरी जव काणी ते | कहे, तव बोली सा एम ॥ ३ ॥ रे रे कुष्टी मुज नणी, कूमो आल म नांख ॥ हूं बुं नयन , एच Jain Education n ational For Personal and Private Use Only 10 nelibrary.org Page #191 -------------------------------------------------------------------------- ________________ IP सुलोचना, कग्नि वचन मत दाख ॥ ४॥ नदयन कहे ते शा वती, कुष्टी नांख्यो मूज ॥ | पिण एतो ताहरे पिता, कपट देखाड्यो गूज ॥ ५ ॥ 8 ॥ ढाल ३ जी. ॥ (पीगेला। पाल, आंबा दोइ रानला मारा लाल.-ए देशी.) वासवदत्ता वस्त्र करे तव वेगलो मारा लाल, दीगे रूप अनूप कुमरनो अति नलो ॥ मारा लाल ॥ अन्योन्ये श्रइ प्रीति नयनथी निरखतां मा०, जाणोए दंपति दोय सदा आगे महतां मा०॥१॥ यतः॥ नयन पदारथ नयन रस, नयने नयन मिलंत ॥ अराजाण्या शुं प्रीतमी, पहिली नयन करत ॥१॥आपणने अन्योन्य रखे अंतर पझे मा०, करीये गुप्त वि चार रखे को मुख चमे मा० ॥ वासवदत्ता वेगे कहे तव कुमरने माण, माहरे तूं जरतार ४ वलं नही अवरने मा०॥॥ चार कलश धरी चंग वस्यां ते दपती माण, ते बे सुखमय हे * काल गमावे शुन्न मती मा०॥ गुप्तपणे सुख लोग संयोग सेवे रली मा०, पूरव पुण्य सं योग वंबित आशा फली मा॥ ३ ॥ एहवे अनलगिरी तोमो पालान मदे कर मा०, विफ। ४ स्यो करे विनाश हणे नरने तुरी मा०॥ सागरमें जिम पोत नमे पवने चड्यो माण, तिम Kगेमी निज गम जई वनमें पड्यो मा०॥४॥ चंम्प्रद्योतन वात वेगे जव सांजली मा०, बूट्यो अनलगिरी आज ग्रहे कहो कुण वली मा० ॥ माहरा राज्यनो सार जीवन सम ए। Jain Educational relational For Personal and Private Use Only Kamlainelibrary.org Page #192 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० अ मा०, गज अश्वादि अनेक सवे इणथी पठे मा॥५॥ पूजे अन्नयने ताम प्रद्योत पा-न० Ա लव धरी मा०, कहो कोई अवल नपाय ज्युं वश आवेकरी मा०॥ अन्नय कहे श्वरा-8 |ज वीणाना नादथी मा०, वासवदत्ता संग धरी शुन्न सादथी मा०॥६॥ए वश्य आणशे नाग ते गगपरे ग्रही मा०, दीधो नृप आदेश कुमरने तव वही मा० ॥ धनवंतीए वेग चढ्यां दोय दीपतां मा०, तटनी तीरे ताम गयां ते जीपतां मा०॥७॥वाई वीण विशेष अशेष कला करी माण, गावे सरले साद आलापे फिरी फिरी मा॥ नादे मोह्या कुरंग सु 13/ रंग सानले माण, नोगी पिण स्वर विश्अनेक आवी मिले मा०॥॥ तेह अनल गजरा ज सुणी स्वर वीणनो माण, मृगपरे आव्यो तत्र सुणे थ क मनो मा॥ वश्य करी वन है राज ग्रह्यो मृगनी परे मा०, ५वेगवतीने के फिरावे यूं फिरे मा०॥॥ गातो गीत सुरंग Pवजामतो वीणने मा०, ले आव्यो गजराज ते प्रद्योतन कने मा० ॥ बांध्यो आलानधन अचंन ते ऊपन्यो माण, अन्नय थकी गुण राग वध्यो तव नूपनो मा०॥ १० ॥ मूक्या वि5 ४ाण वर माग मालवपति कहे हसी मा०, देखी बुदिअनूप थयो हुं अति खुशी मा०॥ अ-81 १ हाथी. २ बचदेशना राजा संतानिकनो पुत्र नदयन कुमर. ३ हाथी. । हायणी पर. __ ५ वेगवती हाथणीनी पूं. YOGRESSESAR Jain Education international For Personal and Private Use Only www.ainelibrary.org Page #193 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नय कहे नंमार ए वर बीजो श्रयो मा०, नदयन पिण प्रस्ताव लही स्त्री ले गयो मा०॥ 18|११॥ एडवे अवंतीमांही अनलन्नय कपन्यो मा०. प्रतिदिन बाले गेड ए अनरथ नीपन्यो । मा०॥ पूग्यो अन्नयकुमार नपाय कहे वही माण, अग्निनो औषध अग्नि कह्यो ते सही मा०॥१२॥ साहमी करवी अग्निये अग्नि हवे यदा मा०, अन्नयनो वचन प्रमाण करी कीधी तदा मा०॥ नलागी ते आग लागी नही तेहथी माण, बुहि वखाणी राय दियो व र नेहथी मा ॥१३॥ मूक्या विण ते जाणीनंमार ते तव धरयो माछ, त्रीजो वर तिणे गय अन्नयकुमरे वरयो मा०॥ देवप्रकोपे रोग अवंतीमें थयो मा०, पूब्यो अन्नयकुमार तिवारे नुत्तर लह्यो मा०॥१४॥ जे स्त्रीथी तुम नेत्र गले अवलोकतां माण, तेहने हाथे पिंक ॐ देवारो वलि उतां मा०॥राजाये स्त्री सातसे सवि नेली की मा०, मांझी जोवे दृष्टि सहु थी फिरी फिरी मा ॥१५॥ अनमिष नयन विकार रह्यो नही केहनो मा०, चेमा पुत्री ताम शिवा नाम जेहनो मा०॥ सतीयोमें शिरदार वीरे जे मुखे कही मा०, अनमिष न8 यनथी तेह आगल कन्नी रही मा०॥१६॥ राजानी गली दृष्टि ते रामा आगले मा०, तव । कहे ए बलिपिम दियो जश नागले मा० ॥ दीधो बलि ततकाल नपश्च सवि गयो मा, १ चकमकनी अग्नि करी ते शुद्ध तंत्रना योगी थएली अग्नि शांति पामी. SHRESS Jain Education P ational For Personal and Private Use Only C linelibrary.org Page #194 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ६ | सतीयना शीयल प्रभावथी सहुने सुख थयो मा० ॥ १७ ॥ माग माग वर मुज मूक्या वि. ए तूं हवे मा०, तव ते अजयकुमार विचार ते संभवे मा० ॥ त्रीजी ढाल रसाल ए चोथा उल्हासनी मा०, कही जिनविजये जोय कल्पद्रुम रासनी मा० ॥ १८ ॥ ॥ दोहा ॥ कहे अजय बुद्धि केलवी, मेलवी चित्त विचाल ॥ चारे वरनुं सार ए, कहुं ते सुखो भूपाल ॥ १ ॥ चय खमकावो चोकमें, अग्निनीरू रथ नांजि ॥ अनल गजें हुं चढूं, शिवा नांगे आज ॥ २ ॥ तं बेसे वांसे थइ, अम नपर धरि बत्र ॥ चयमें जश्ने लीजीए, अग्निदाघ एकत्र ॥ ३ ॥ नूधव शिर धूली रह्यो, वयण न वाल्यो जाय ॥ करजो मी कुमर प्रते, हास्यो हूं कहे राय ॥ ४ ॥ तव बोल्यो धीरज घरी, अजय कहे सुण नूप ॥ धर्म गाई तें करी, पकड्यो मुज धरी चंप ॥ ५ ॥ जिनशासन मेलो कस्यो, लोपीने कुल लाज || आज पी दवे एहवो, करवो नही अकाज ॥ ६ ॥ (पण मुज देख पढंतरी, त्रस व्यो बे इक वार ॥ पिएा वली जोजे पारखुं, पकडूं वीजी वार ॥ ७ ॥ बांधी मुसके तुज प्रतें, देतो दंग प्रहार ॥ लेई जाऊं सहु देखतां, तो हुं अजयकुमार ॥ ८ ॥ शीख करो मासी प्रते, नृपशुं करी जुहार ॥ शुभ वेला साधी करी, चाल्यो निज श्रागार ॥ ए ॥ ॥ ढाल ४ थी ॥ (बेको नांजी. - ए देशी . ) Jain Education national For Personal and Private Use Only og ६ jainelibrary.org Page #195 -------------------------------------------------------------------------- ________________ EASEASONESS अन्नयकुमर परिवार परिवृत, मगधदेशमें आवे ॥ पुत्रागमन सुणीने श्रेणिक, हरखे । ४ साहमो जावे ।। अचरिज देखो देखो, देखो रे अचरिज देखो ॥ एहने पुण्यतणो नही ले || खो, अचरिज देखो रे ॥ लह्यो जश जगमें सुविशेषो ॥०॥ तुमे ज्ञान नयनथी पेखो। अ०॥१॥ ए आंकणी॥अन्नयकुमर निज तात लहीने, हर्षोल्लसित तव थावे ॥ प्रणमी प्रेमे तात चरणने, विनय वचन संन्नलावे ॥अ॥२॥ ताते हृदय संगाथे नीमी, नवगे बेसास्यो॥ एता दिननो विरह तणो दुःख, क्षण एक मांही विसायो । अ०॥३॥ आऊ बरश्री अन्नयकुमरने, नगर प्रवेश करावे ॥श्रेणिक राजा अति मन हरखे, नंदा तिम सुख 31 पावे ॥ अ०॥४॥ नंदिषेण मेघादिक बांधव, भावी मिलिया वेगे ॥ शेठ सेनापति सचिव सकल पिण, मिलवा आवे नेगे॥०॥५॥ दिन केताश्क विचमें गाली, पूरव वात संनाले ॥ अन्नयकुमर वणमारा वेषे; पोठ लेश्ने चाले ॥१०॥६ पांच सात घोमा अति । ताता, नंट बे चार अटालो ॥ विमल नाम वणकारो प्रश्ने, आव्यो अति नजमालो॥ अ॥॥आहे आहे करतो पोठे, गुण संजाली लेवे॥ नऊयिनीने चोके आवी, मेरा तंबु ५ देवे । अ०॥७॥ नृपने नेट देईने मिलीयो, विनय थकी मन व्यापे ॥ राय प्रसन्न प्रश १ बालावबोधवाला महोटा चरित्रमा आ ठेकाणे अनयचंच वणकारो नाम . २५ Jain Education I ational For Personal and Private Use Only Hijainelibrary.org Page #196 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० निज मंदिर, पासे स्थानक आपे ॥ श्र० ॥ ए ॥ मेरा तंबू तिहां प्रारोप्या, मालना गंज ते कीधा | व्यापारीने देई क्रियाणां दाम रोक तस लीधा ॥ श्र० ॥ १० ॥ विकलें एक नर निपजाव्यो, पाठ जणावी गमे ॥ ते कहें हूं मालवनो महिपति, चंमप्रद्योतन नामे ॥ ० ॥ ११ ॥ ए सघला बे श्रमचा सेवक, राणी सर्व श्रमारी ॥ दय गय रथ पायक सवि श्रमचा, प्रजा प्रमुख निधि सारी ॥ अ० ॥ १२ ॥ तव ते बांधी मारे तेहने, रे मूरख शं वो | ले ॥ ते राजा मालवनों महिपति, तूं गहिलो तृण तोले ॥ ८० ॥ १३ ॥ इम प्रतिदिन करतो ते नगरे, सघले ग्रथिल ते जाएयो । एक दिवस संध्या समये तव, नेद करण चित्त आयो ॥ ० ॥ १४ ॥ गणिका बेने गुप्त जे प्राणी, इंझणी सम पोते ॥ ते पासे तव नृत्य करावे, चंरुप्रद्योतन जोते ॥ ० ॥ १५ ॥ देखी रूप ते गणिका केरो, चंमप्रद्योतन चूक्यो । दूती मेली वात करावी, लादो ब्यो प्रजूको ॥ ८० ॥ १६ ॥ तव ते बोली मे तो नावूं, खप होय तो इहां श्रावे ॥ पिण श्रम स्वामी कार्य विशेषे, जव ते बाहिर जावे ॥ श्र० ॥ १७ ॥ दूतीए जइ वात जणावी, चंमप्रद्योतन दरख्यो । समय जोइने मेरे पेठो, अन्न| यकुमारे निरख्यो ॥ ० ॥ १८ ॥ रात्रि प्रहर जाते तस बांधी, ऊपर मार ते देते ॥ रथ में घाली खेमा चाल्या, मुखश्री शब्द कहे ते ॥ अ० ॥ १९॥ चंरुप्रद्योत कहे दूं राजा, मुजने For Personal and Private Use Only Jain Educationa International उ० ४ U w.jainelibrary.org Page #197 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ए ले जावे ॥ शेठ सामंत सवि सऊ प्रश्ने, मूकावो वझदावे ॥अ॥०॥ सहु को सानली चिंते मनमें, एह तो गहिलो बोले ॥ कपट तणो तो कोय न जाणे, कपटे सघला नूले | ॥०॥१॥ ग्राम ग्रामथी अश्व पालटी, आव्या तुरत निज देशे ॥श्रेणिकने वधामणी है। पहोती, अाव्या अनय सुवेषे ॥०॥॥ अन्नयकुमर प्रद्योतनने तव, तातने पाय ल-81 गामे॥ वचन कह्या माटे में तुजने, पाण्योरणे आखामे ॥०॥२३॥ आज पठी को | राजा साथे, वैर म करशोनाई ॥श्म कही मालवपतिने वेगे, पहोचायो चित लाई॥5 18अ ॥ २५ ॥ वैर विरोध सहूथी लांज्या, अन्नये बुद्धि प्रकारे ॥ चोथी ढाल चोथे उल्हासे, कही जिन मति अनुसारे ॥ १०॥ २५॥ ॥दोहा. ॥ अन्नयकुमर वंगित फल्यो, बुध्यिकी सुप्रमाण ॥ श्रेणिकनी चिंता ! टली, दिन दिन कोमी कल्याण ॥१॥ कहे नृप सनिल अन्नय तुं, तुज विण सहु मूफाय | ॥ न्याय नीति करवी पमे, पिण ते किणही न थाय ॥२॥ सेचन गज बूट्यो इतो, पाड्यां 18 घरने हाट ॥ वाट बिगामी नगरनी, अमने यो नचाट ॥३॥ पिण धन्नोशाह तेहवे, आ| 1 व्या आपणे काम ।। हाथी पकमी बांधियो, मोटी राखी माम ॥४॥ काणाश्री घमो पद ड्यो, गौनशेठने देव ॥ न्याय कियो नरपति परे, उग चाल्यो ततखेव ॥ ५॥ बीजांप- * Jain Educational rational For Personal and Private Use Only * ainelibrary.org Page #198 -------------------------------------------------------------------------- ________________ न। Mण बुझेकर, काम समास्यां क्रोम ॥ अवर को आवे नह।, जाता एहना जोम ॥६॥ साहसिक सुकुलीन ए, नाग्यवंत भरपूर ॥ तुजाबले सुख नोगवे, दिन दिन चमते नूर ॥5 ॥ तात क्यण सुगी अन्नय तव, प्रीति धरे प्रति पूर्ण ।। एक रंग तांबूलमें, जिम काथा द्विक चूर्ण ॥ ॥ अह निशि तव रहे एकग, धन्नने अन्नयकुमार ॥ प्रीति वधो प्रेमे करी, । सुख विलसे श्रीकार ॥ ए॥ ॥ ढाल ५ मी.॥ (शीतल जिन सुरंगा.-ए देशी.).. एहवे धन्नाना नाई, करे ग्रामतणी ठकुराई रे ॥ सुगुणा ॥ न्याय धरम चित्त धारो ॥ जिम जगमें सुजश वधारो रे । सुगुणा ॥ न्याय धरम चित्त धारो ॥ लोक नणी संता तापे. लोले करी अकरने यापेरे॥सणान्या॥१॥ए आंकणी॥जिम शानिनी दो वर्षा K नवि थाये अति नत्कर्षा रे'। सु०॥ तिम ते ग्रामाधिप पाते, उड़द श्रयो सवि वाते रे ॥ * सु०॥॥ लोक गया सवि लांजी, हाथे न रही कां बाजी रे ॥ ॥ तृण धान्यादिकने अन्नावे, गज अश्वादिक मर जावे रे॥ सु०॥ ३ ॥ एहवे अगनि प्रयोग ते दीगे, थयो ते 18 हने अतिहि अनीगे रे॥ सु०॥ नृपे पिण दंमी लीधा, अन्याय जिवारे कीधारे ।। सु०॥ ४॥चोरे पिण तिम संताप्या, सुःख पाम्या देव सराप्या रे ॥ सु०॥ ताततणो धन लेवे, एG Jain Education Rifernational For Personal and Private Use Only I ww.jainelibrary.org Page #199 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पिण पागे कदिय न देवे रे ॥ सु०॥५॥इम करते तेह घाग, वचदेश थकी तव नागरे । 13/॥ सु०॥ त्रिण्ये मालवमें आवे, कृषिकर्म करे वदावे रे ॥ सु०॥६॥ बोजनात बलद हल 81 लेवे, अनुचरने पिण धन देवे रे ॥ सु० ॥ कर्मवशे तस श्रावे, वृषन्नादिक पशु मरी जावे रे । सु०॥७॥ तीम गयां करा खाई, न थई तस पेट नराई रे ।। सु०॥ तव ते पोठी वाहे, जई मगधे चित्त नमाहे रे ॥ सु०॥॥अन्य दिवस घनं लीधा, नरी पोठ्यो चाल्या धरी सीधा रे ॥ सु०॥ राजगृही में आवे, पोठ्यो सवि चहुटे गवे रे ॥ सु०॥॥ पाम जिवारे । जोवे, तव मूलगी श्नोमी खोवे रे ।। सु०॥ नाग्य ते आगल चाले, तेहनो ःख कहो कु दल टाले रे ।। सुण॥ ॥१०॥ यतः॥पमिवन्नो गिरवातणो, पालीजे निरवाण ॥ तुमे देशांतर ६ है चालिया, अम्मे आगेवान॥१॥ नावार्थ:-जेम महोटा माणसने हाथ जे चढे, तेने ते IP नक्की पालेज. तेम इहां नाग्य कहे ,के, (अमने तमे मल्या गे, तो अमे पण तमने । बोमीशुं नही.) जो तमे देशांतर जशो, तो त्यां पण अमे आगेवान थइ साधे आवीशं. 5॥१॥सीत तापादिक सेवे, नलंना देवने देवे रे ॥.सु०॥ धान्यना ढगला कीधा, ते त्रि १ नाव. २ अर्धी मूमी अर्थात् राजगृहीमां आवीने जूए तो घनो जाव अ| दीगे; एटने अर्धी | ki मूमी तो नावमांज जती रही! Jain Educational onal For Personal and Private Use Only P anelibrary.org Page #200 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धना० एये तिहां रह्या सीधा रे ॥ सु० ॥११॥ एहवे धनोशाह, मन धरतो अतिहि नमाह रे ॥ सु न ए राजसन्नाश्री कडे, घणो परिकर चाले पूंछे रे ॥ सु०॥१५॥ नट तिहां पागल चाले, 5 श्कबाथी लोकने पाले रे ॥ सु०॥ धनदत्तादिक जेह, चहुटा विचे बेग तेह रे ॥ सु०॥ १३॥ कंबा दे तस कगमे, पग पाटुए करीने पामे रे ॥ सु । गुण्यो पिण वली उपमा, व, राजमार्ग विधे समरावे रे ॥ सु॥१४॥ प्रायास करता दीग, धने निज बांधव धी। गरे ॥सु०॥चिंते शहां ए किम आव्या, वणजारा नाम धराव्या रे ॥ सु०॥१५ ॥ गाम | ने हय गय दीधा, ते किण नृपे पामो लीधा रे ॥ सु०॥ देखो ए किम फुःख पावे, मुज बां। धव निगुण स्वन्नावे रे ।। सु०॥ १६॥ श्म चिंतीने तेमाव्या, तव ते पिण दोमी आव्या रे । ॥ सु? ॥ निज मंदिर तेकी जावे, वस्त्रादिक शुन्न पहिरावे रे ॥ सु०॥१७॥ स्वस्थ करीने । पू, निर्धन- कारण शुं ले रे ॥ सु॥ तव तेणे हृदय विमासी, तस सघली वात प्रकासी रे॥ सु०॥१॥ तुमे दीधो अम धन जेह, पिण पासे न रह्यो तेह रे ॥ सु॥ दरिश्पणो । ॐ रह्यो साथे, अमे पादस्यो हाथो हाथे रे ॥ सु०॥ १५ ॥ कोई तुमने दोष न देवो, पोतानो । लेहणो लेवो रे । सु०॥ मात पिताने दारा, कोशंबी मांहे नदारा रे ॥ सु॥२०॥ अमे है २ उडीवमे लोकोने खशेमे ॐॐॐ 449244 UU Jain Educational For Personal and Private Use Only T rainelibrary.org Page #201 -------------------------------------------------------------------------- ________________ RANASONS: हां पोग्यो खेडु, दाणे सवि काज निवेडं रे ॥ सु०॥ इह चोथे नव्हासे दाखी, ढाल पाच मी जिन श्म नाखी रे ।। सु०॥१॥ ॥दोहा. तव धन्नो कहे जातने, रहो ते माहरे पास ॥ खावो पीवो खांतिज्ञ, विल सो लील विलास ॥१॥ते कहे तुम हेठे अमे, रहेतां लहोये लाज ॥ सूर्य शुक्र गृहमांग है ये, नीच कहे कविराज ॥२॥ तव धन्ने बांधव प्रते, चौद चौद धन कोहि ॥ दीधी मन दो लत करी. का करे एहनी तोकि॥३॥देखोतसर्जनपणो, घनानोतिम नेह॥ अण" | तोख्यां आवी मिल्यां, सहज सुनावे एह ॥४॥ यतः॥ अनुष्टुब्वृत्तम्. ॥ सऊनाः सङना एव, उर्जना एव उऊंनाः ॥ नोभाः सुधांशुचिकिर्णा, न शीतास्तिग्मरोषि च ॥१॥ नावा र्थः-सऊन ते सऊनज रहे अने उऊन ते उर्जनज रहे. जेम चंमानां किरणो कदि पण गरम थतां नश्री, तेम सूर्यनां किरणो शीतल थतां नयी. ॥१॥ चाल्या कोशंबीनणी, धन लेने जाम || धनरक्षक तव देवता. मारे मुझर ताम॥५॥ बोले प्रगट थई मुखे, हा जीय न लागी लाज । जन्मथकी जोवो नही, करतां काज अकाज ॥६॥धन सवि धन्ना लाग्यथी, आवी मिल्यो ने अत्र ॥ तटन नीर सवे सदा, जलनिधिमें एकत्र ॥७॥ ॥ ढाल ६ ही.॥ (नटीयाणीना गीतनी देशी.) HARSH*ॐॐॐॐ Jain Educational lonal For Personal and Private Use Only 1- ainelibrary.org Page #202 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० १०० Jain Educationa तव ते वचन सुने हो धनदत्तादिक त्रिएये तिहां, आलोचे मनमांहि ॥ आपने वलं । जाग्ये हो धन अर्जन इहां भावो नथी, खोटी होंश शी त्यांहि ॥ तव ॥ १ ॥ ए कणी || एटला दिन प्रायासें हो सुप्रकासे धन श्रागम नही, न रह्यो मूलगो गेह ॥ बांध वथी पिस पाम्यो हो धन वाम्यो एद विलोकतां, पुण्य विना नर देह ॥ तव० ॥ २ ॥ इम चिंती मन खंते हो निःते पोटी वालीया, धनश्री जया हुता जेह ॥ धन्नाने सवि सोंपे हो नवि कोपे मन वच कायथी, वात कहे सवि तेह ॥ तव || ३ || एटला दिन हठ राख्यो हो नवि जांख्यो गुण कोइ ताइरो, ते अमचो अपराध | तूं श्रम सहुथी 'लहुको हो गुण दोढो दीठो हेजश्री, गुण निधि जलवी अगाध ॥ तव० ॥ ४ ॥ - श्रम कुल अंबर दीवो हो चिरंजीवो तेज प्रतापथी, अमे हुं खजूया सरूप ॥ तूं श्रम प्रीते पालक हो दुःखटालक सकल कुटुंबनो, श्रमे तो द्रुमक सरूप ॥ तव० ॥ ५ ॥ घणुं घं शुं कहिये हो निरवहिये अमने श्राजश्री, जाली बांधव प्रेम ॥ ए धन जे तुमे दीधो हो नवि लीधो जाए श्रम थ की, जिम कायरथी नेम ॥ तव ॥ ६ ॥ एहना जे अधिष्ठाता हो मद माता ते ताहरे वशे, अम वश कहो किम थाय ॥ जिम निज हाये परली हो वर तरुणी बांगी कंतने, अन्य १ नहानो. २ जीखारी. tional For Personal and Private Use Only नु०४ १०० v.jainelibrary.org Page #203 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | गृहे नवि जाय ॥ तव ॥ ७ ॥ तव धन्ने सनमानी हो बहुमाने बांधव राखीया, आप समा करी त्यांहि ॥ मात पिता जोजाई हो तेकाव्यां प्रति आदर करी, मूकी सेवक त्यांहि ॥ त व० ॥ ८ ॥ यतः ॥ अनुष्टुवृत्तम् ॥ माता तीर्थं पिता तीर्थ, तिर्थे च ज्येष्ठबांधवाः ॥ वाक्ये वाक्ये गुरु स्तिर्थ, सर्व तीर्थ जनार्दनः ॥ १ ॥ जावार्थ:- माता पिता अने महोटो नाई, ए सर्वे तीर्थरूप वे, तेमज दरेक वचन बोलवामां गुरु तीर्थ वे अने परमेश्वर ए सर्व तीर्थ बे ॥ ११ ॥ सुंदर मंदिर प्राप्यां हो दुःख काप्यां मात पितातणां, नाईनी करी नीर ॥ खावे पी वे खेले हो प्रति गेले नव नव नेहथी, जिम १ सहकारे श्कीर ॥ तव० ॥ ए ॥ प्रहसमे नित प्रणमे हो घणुं विनये मात पिता प्रते, युगते जिनवर सेव ॥ पात्र संयोगे रंगे हो प्रतिलाने नाव घरी घलो, धर्म करानी देव ॥ तव० ॥ १० ॥ एहवे तिहां कणे ग्राव्या हो मन जाव्या चौविह संघने, विचरता भूपीठ ॥ धर्मघोष इशे नामे हो पुण्यकामे सुरतरु सारिखा, सयल गुणे सुविसिध ॥ एहवे ॥ ११ ॥ ए प्रकली || वंदाने तिहां घाया हो मिलि प्राया नवियण जावशुं, बेग जोई गम ॥ धनसारे पिए जाली हो गुरु वाणी सांजलवा प्रते, घरे द्यम हित काम || एहवे० ॥ १२ ॥ चारे पुत्र संघाते हो जली जांते दयिताने तहां, १ यांवो २ पोपट. २६ Jain Educational rational For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #204 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० १०१ बहुर सघली साथ || आमंबरथी यावे हो जले जावे गुरु चरणांबुजे, वंदे जोमी हाथ || हवे || १३ || रिचित सहुनो जाली हो गुणखाणी, गुरु दिये देशना, कहे तजो पंच प्रमाद ॥ बकायने चित धारो हो तुमे वारो हिंसा तेहनी, ढंको जीन सवाद || एहवे ॥ १४ ॥ चार कषायने जीपो हो जिम दीपो श्री जिनधर्ममें, पालो प्रवचन मात ॥ पंचाश्रव तुमे वारो दो वलि धारो दशविध धर्मने, तिम टालो जय सात ॥ एहवे० ॥ १५ ॥ बलीया जो प्रति थान हो तो धान शिवमंदिर जली, पंच महाव्रत लेय ॥ तप जप संयम करणी हो प्रति सुखनी वरली एह बे, त्रिकरण शुद्ध करेय ॥ एहवे० ॥ १६ ॥ श्रावक धर्म संज्ञालो हो जुप्रालो दादश जेदश्री, आणी मन नजमाल ॥ चोथे नव्हासे गावे दो मन ना| वे बडी ढालमें, जिन इम वचन रसाल ॥ एवे ॥ १७ ॥ ॥ दोहा ॥ देशना सांजली दिल उस्यो, धन धन कहे धनसार || मानव जवनो श्रा ज में, लाज कह्यो सुप्रकार ॥ १ ॥ प्रमुदित थई पूढे तदा, बिहुं करजोमी शेठ ॥ कृपा क री प्रभुजी कहो, पूर्व जवांतर ठेव ॥ २ ॥ धन्ने शी करणी करी, जिणे करी पाम्यो श६ि ॥ दुःख नवि दीगे देहथी, पद पद सकल समृद्धि ॥ ३ ॥ त्रिएय मोटा सुत साहसी, धनदत्ता दिक जेह || पामी पामी हारवे, शे करमे दुःख तेह || ४ || शालिन भगिनी जली, स Jain Educationaeational For Personal and Private Use Only न० ४ १०१ Page #205 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ती सुन्नज्ञ सार ॥ शे करमे माटी वही, कुःख सह्यां विविध प्रकार ॥ ५॥ एह संदेह तणो | इहां, ज्ञानतणे आधार ॥ विवरीने कहो वेगथी, सयल संबंध विचार ॥ ६ ॥ ॥ ढाल ७ मी. ॥ (शांति जिणेसर केसर अर्चित जगधणी रे.-ए देशी.) कहे मुनिवर सुणो शेठ पूरव नव वारता रे पूरवण, पुरपश्गण सुगण जिहां वासे हता रे जि०॥ तिणे नगरे एक नारी कात्यायन पुर्बली रे का, करें पर घरनां काज पी-1 सण खंमण वली रे पी०॥१॥ दत्तनामे तस पुत्र सुपुत्र वखाणीयो रे सु०, तात विना जे 31 | जात दुःखी महा जाणीयो रे ॥ चारे गायना वचनेला करी चोकमां रे ने० ॥ पेट ६ नराई मात्र हुवे ते लोकमां रे हु०॥२॥ एक दिन परव विशेष अशेषथी देखीयो रे अ०, घर घर खीरने खांझ घृतादिक पेखीयो रे घृ० ॥आवी ततकण गेह माता पालव ग्रह रे । मा०. ये मुज परिघल खीर इशं मुखथी कहे रे ३०॥३॥ मात कहेनरपूर न ककस सं" | पजे रे न, तो ते खीरने खांम कहो केम नीपजे रे क०॥ हठ नवि मे बाल रमे तव मा | 18 वमी रे रण, देवे अवस्था एम दीधी किम आवझी रे दी०॥४॥ यतः ॥ अनुष्टुब्वृत्तम् ॥ बालको १ऽर्जन २ श्चौरो ३, वैद्यो । विप्राश्च ५ पुत्रिकाः६॥ अर्थी ७ नृपो 5 ऽतिथी ए १ वृक्ष मोशी. Jaan Education a tional For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #206 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० १०२ | वेश्या १०, न विदुः सदृशदिशां ॥ १ ॥ जावार्थ:- बालक, दुर्जन, चोर, वैद्य, ब्राह्मण, पुत्री, अर्थी, राजा, तिथि (प्राणा) ने वेश्या, ए सर्वे सरखी हालतने समजता नथी. अर्थात् ए सर्वे पोताना दुःखनी पेठे पारका दुःखने जाणता नथी. ॥ १ ॥ माता पुत्रने साथ देखी रोती थकी रे दे०, चार पाकोशल ताम यावी कहे इम बकी रे प्राण ॥ तूं रोवे शा माटे रोवे किम दीकरो रे रो०, दुःखनी जे होय वात ते श्रम आागल करो रे ते ॥ ५ ॥ तव ति | पुत्रनी वात सवी मांमी कही रे स० ॥ सांजली कहे परमान्न मांहे शंबे सही रे मां० ॥ चार पाकोशण तत्र सामग्री ततक्षणे रे सा०, प्राणी आपी तास घरी ऊलट घणें |रें ध० || ६ || माताये तव खीर नीपाई वेगथी रे नी०, बेसामी नीज पुत्र पिरसे प्रति वेग थी रे पि० ॥ कोईक कार्य विशेष माता घर में गई रे मा०, पुण्योदयश्री दान तली मति तस थई रे त० ॥ ७ ॥ एहवे तपसी एक सुपरे संजालतो रे सुप, फिरतो आहारने काज मर परे मालतो रे ० ॥ मासखमणने पारले बारले प्रावीयो रे बा०, देखीने तव दत्त तो मन जावीयो रे त० ॥ ८ ॥ याल जरी हती खीर सवे आपे मुदा रे स०, साधुना वंदी पाय बेठो स्थानक तदा रे बे० ॥ श्रावी देखे मात ते थाली चाटतो रे ते‍, पिरसे सघली खीर चिंते रखे फाटतो रे चिं० ॥ ए ॥ वचन बलेश्री तास नदर रोग उपन्यो रे न‍, मर Jain Educationaterational For Personal and Private Use Only २०४ १०२ jainelibrary.org Page #207 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Nण समय मध्यरात्रि सुध्याने नीपन्यो रे सु०॥ ते चवि दान प्रत्नाव ए धन्नो सुख लदे रे | ४ ए०, तुज कुलनो शिणगार सकलने निरवहे रे स० ॥ १०॥ चारे कीधो योग कीरान तणो | तदा रे की०, चारे वली परसंश करी तेहनी मुदा रे क० ॥श्म ते आठे नारि दीगे मुनि है वदोरतो रे दो०, चिंते धन धन एह दिये मुनिने उतोरे दि० ॥११॥ साधु प्रसंशा योगे नट नम कुल ऊपनी रे न०, ते ए आ नारि धन्नानी नोपनी रे ध०॥जेह सुन्नज्ञःख लही ते सानलो रे ल०, सरल करो निज चित्त तजो मन आमलो रे त०॥१२॥ पूर्व नवे णे रो । पाप वशे सखीने कटोरे व०, वहे माटी रे दास पोते धनमद वह्यो रे पो॥ ते कर्म इणे | शीश थकी माटी वही रे थ, हसतां बांधे कर्म रोतां बूटे नही रे रो०॥ १३ ॥ यतः॥ । रजाति श्लान्न ३कुलैधश्वर्य, एबलं रूपं उतपः श्रुति ॥ कुर्वन्नष्टौ मदान्पुसां, हीनानि ? लन्नते जनः ॥२॥नावार्थः-जाति, लान कुल, ठकुराई, बल, रूप, तप अने विद्या. ए आफ्नो मद करनारो माणस; ए आठ हीणां पामे ॥॥ए संसारमें जीव मिथ्यात्व 12 गुणे करी रे मि०, जन्म जराने मृत्यु लहे ते फिरी फिरी रे ल०॥ पामी सदगुरु योग दा नादिक आचरे रे दा०, धनानी परे तेह वंछित लीला वरे रेवं ॥१४॥ परसंशा पिण पुएय पदारथ कही खरी रे पण, देखो ते परतह आठे एह सुंदरी रे आ॥ चोथे नल्हासे SSSSSSS Jain Education ainelibrary.org R For Personal and Private Use Only ational Page #208 -------------------------------------------------------------------------- ________________ घन्ना० २०३ 1023 ढाल कही ए सातमी रे क०, जिन विजये मन रंग श्रोता मनमें गमी रे श्रो० ॥ १५ ॥ ॥ दोहा ॥ हवे धनदत्तादिक तो, पूरव जव अधिकार || सदगुरु कहे शुभ चित्त श्री, सांजल रे धनसार ॥ १ ॥ ॥ ढाल मो. ॥ ( नमो नमो मनक महामुनि . - ए देशी . ) मुनिपति कहे तुमे सांजलो, पूरव जव विरतंतो रे | ग्राम सुग्राम नामे जलो, रु समृद्धि कंतो रे ॥ मुनिपति० ॥ १ ॥ ए यांकणी | तिहां कठियारा त्रिएय रहे, धन हीला प्रति धीठा रे || १सदने ग्रासन बे तेहनां, मित्राइ गुणे ते मीग रे ॥ मु० ॥ २ ॥ एक दिन काष्ट लेवा प्रते, ग्रहीने संबल साधे रे ॥ पोहत्या वनमें परुवमा, लेइ कुठार ते हाये रे ॥ मु० ॥ ३ ॥ मध्याने जोजन समे, बेठा जोजन कामे रे ॥ मासखमण पारण य ति, क्षमासागर इशे नामे रे ॥ मु० ॥ ४ ॥ दीठा दूरथी श्रावता, सन्मुख जश्ने वंदे रे ॥ संबल सघलो शुभमने, आपे मन आणंदे रे ॥ मु० ॥ ५ ॥ सुलनबोधी श्रावक कुले, कपजवो तिहां बांध्यो रे । काष्ट ग्रही संध्या समे, याव्या असन न लाघ्यो रे ॥ मु० ॥ ६ ॥ एटले रोषे इम कहे, दानतणां फल दीगं रे ॥ भूखे दुःख पाम्या इहां, आागल शां हुशे मी १. घेर. २ जातु. Jain Educationa International For Personal and Private Use Only नु० ४ १०३ jainelibrary.org Page #209 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | गं रे ॥ मु० ॥ ७ ॥ एम निंदा ते दाननी, चार वेला तिथे कीधी रे || पश्चात्ताप संयोगथी, स्वल्पपणे थइ सीधी रे ॥ मु० ॥ ८ ॥ ते चवि अनुक्रमे ताहरा, पुत्र थया त्रिएय एहो रे । | चार वेला दुःख अनुभव्यो, पूरवकुत गुण तेहो रे ॥ मु० ॥ ए ॥ सांजली धनदत्त प्रमुखना, पूरव जव अधिकारो रे ॥ वैरागे मन वाधीयो, बज्यो तव धनसारो रे ॥ मु० ॥ १० ॥ चिंते एह संसारमां, धरमने कोय न तोले रे | संसारिक सुख कारमा, विष सम केवली बोले रे ॥ मु० ॥ ११ ॥ संयम लेवो माहरे, इम मनमां श्रालोचे रे | आयु अथिर ए आपलो, जाली के कुण खोचे रे ॥ मु० ॥ १२ ॥ मुनि वांदी मंदिर गयो, परिकर युत धनसा ररे ॥ दीक्षा लेवाने तदा, पूग्यो सवि परिवार रे ॥ मु० ॥ १३ ॥ शीलवती पिए स श्रई, धन्नदत्तादिक म रे || त्रिएये पुत्र संयम जली, घरता धर्मशुं प्रेम रे ॥ मु० ॥ १४ ॥ व कर धन्ने तदा, संयम सुपरे देवाड्यो रे । सहु कहे धन्य धनसारने, सुपरे प्रातम तारयो | रे ॥ मु० ॥ १५ ॥ धन्ने श्रावक व्रत धरयां, घाट प्रिया युत प्रीते रे ॥ विरम्यो विषय विशेष श्री, रूमी आतम रीते रे ॥ मु० ||१६|| धन्नोशाद घेर प्रावीया, परिवृत सवि परिवारो रे । सुख विलसे संसारनां, अभिनव सुर अवतारो रे ॥ मु० ॥ १७ ॥ दीक्षा देई तेहने, शीखवे साधु याचारो रे ॥ धनसारादिक साथ लेइ, मुनिवर करे विहारो रे ॥ मु० ॥ १८ ॥ चारि - Jain Educationa national For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #210 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० १०४ पाली शुभमने, त्रिये सुत युत तेहो रे । देवलोके जइ रूपन्या, देवपले गुण गेहोरे ॥ मु० ॥ १५ ॥ एक नवे शिव सुख सवे, लदेशे ते निरधारो रे । चोये उल्हासे ग्रामी, ढाल कही जिन सारो रे ॥ मु० ॥ २० ॥ ॥ दोहा ॥ श्रथ श्रोता जन सांजलो, शालिन सुचरित्र || देवलोक सुख नरनवे, जोगवे पुण्य पवित्र ॥ १ ॥ इसे अवसर नेपालश्री, सोदागर सुविवेक ॥ रत्नकंबल लेई क री, श्राव्या मगध सुबेक ॥ २ ॥ ग्रामागर फिरतां थकां राजगृही में रंग ॥ देखामे चहुटे डुरस, रत्नकंबलनां नंग || ३ || जोवे सहु को यतनशुं, रत्नकंबलनां रूप ॥ पूवे मूल तस प रगको, चित्तमें राखी चूंप ॥ ४ ॥ व्यापारी कहे वयाथी, सवालाख सुवर्ण ॥ एकतलो ए मूल बे, सांजलजो घरि कर्ण || ६ || मूल सुलीने शेरिया, सहुको स्थानक जाय ॥ व्यापा री कंबर ग्रही, जेव्या श्रेणिक राय ॥ ५ ॥ ॥ ढाल ५ मी. ॥ ( धारा महोलां ऊपर मेह, करूखे वीजली हो लाल. - ए देशी.) तव श्रेणिक नर राय बोलावे तेहने हो लाल बो०, किहांश्री श्राव्या शेत े सुख तुम देहने हो लाल बे ॥ तव बोल्या ते शाह अमे नेपालथी हो लाल घ०, आव्या इहां | व्यापार कारण भूपालथी हो लाल क० ॥ १ ॥ लाव्या कंबल सोल श्रमूल्य संजालता हो For Personal and Private Use Only OL १०४ w.jainelibrary.org Page #211 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लाल प्र०, श्राव्या तुम परसाद मगध में मालता हो लाल म० ॥ देखो स्वामी वस्तु सुव स्तु सुनावथी हो लाल सु०, अगनिमें नांखे मेल तजे एह दावथी हो लाल त० ॥ २ ॥ मूल सवालख दाम एकेका वस्त्रना हो लाल ए०, नृप कहे श्रमे प्रासक्त प्रमूलिक शस्त्र ना हो लाल प्र० ॥ गज अश्वादिक काज श्रमे धन वावरूं हो लाल अ० लाख गमे धन | देय कंबलने शुं करूं हो लाल कं० ॥ ३ ॥ तव ते मूकी निसास कठीने चालीया हो लाल ॐ०, शालिकुमर श्रावास समीपे मालीया हो लाल स० ॥ कहे अन्योन्ये एम आपण सवि पांतरया हो लाल प्रा०, देई दाम के लक्ष कंबल पासे धयां दो लाल क० ॥ ४॥ राजगृही में एक खप्यो नही कंबलो हो लाल ख०, कहो कुल नगरने गाम होशे एहथी मलो हो लाल हो० ॥ नये ते वात गवादे सांजली हो लाल ग०, बोलाव्या ते ताम व्यापारी कहे वली हो लाल व्या० ॥ ५ ॥ नृप सरिखे कस्यो लोन पोनालो देखिने हो लाल थोर, तुमे पिस विफल प्रयास करावशो पेखिने हो लाल क० ॥ न कहे हो चात ! कंबल बेकेटला हो लाल कं०, ते कहे सोल प्रमाण अमे लाव्या जवां हो बाल अ० || ६ || माहरे वहु बत्रीश सवे गुण शोजती हो लाल स०, आएं केहने वस्त्र टालुं केदने बती हो लाल टा० ॥ लावो जो बत्रीश तो सघलां राखीए हो लाल स०, लान २७ Jain Educatione national For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #212 -------------------------------------------------------------------------- ________________ घन्ना० |साहत तस मूख्य विचारी नांखीए दो लाल वि०॥ ७॥ तव बोल्या कहे मात कंबल अ-न०१ १०॥ धिको नथी हो लाल कं, जिम जाणो तिम कार्य करो एह मांहथी हो लाल क०॥वीश 5 18 लाख धन पूर्ण देवारो अम प्रते हो लाल दे०, सोलतणां बत्रीश करी द्यो वधु प्रते हो लाल क॥ ॥ सुणि नाये वेग नंकारी बोलाविया हो लाल नं०, ते पिण धनद सरूप नशा आवीया हो लाल न०॥ कदे वीशलाख दीनार दीयो धन एहने हो लाल दी, तव ते ।। लही आदेश गया ले तेहने हो लाल ग०॥ ए॥ नघामे नंमार देखे तव वाणिया हो ला-2 ल दे०, रूप्य सुवर्णना पाट दृषद परे जाणीया हो लाल दृ०॥ मोतीना के माट लसणि या कुण लिये हो लाल ल०, पानानो नहि पार हीरा न गुणे हीये हो लाल ही० ॥१०॥ मणि माणेकनो मेल कस्यो न हुवे कदा हो लाल कण, विद्रुम विविध प्रकार अपार देखे त । * दा हो लाल अ॥ थंनाणा तव तेह विचारे चित्त में हो लाल वि०, ए प्रत्यक्ष देवें धनद । सम वित्तमां हो लाल ध० ॥११॥ गणि प्रापे धन सर्व लेखो करिने मुदा हो लाल ले, 15 व्यापारी लेश् दाम आव्या थानके तदा हो लाल आ०॥ करे अन्योन्ये वात विनय देखो बता हो लाल वि०, नृपने इन्यमें शहि अंतर घणो पेखतां दो लाल अं ॥ १२ ॥ अंवरश्री धनराशि ऊतरती जेहने दो लाल क०, मणि मुक्ताफल एम न दीठां तेहने हो लाल न०॥ है| १०५ LASS Jain Educator A mational For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #213 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चोथे नव्हासे ढाल नौमी मन लावती हो लाल नौए, जिनविजये कही एह आणंद नपाव ती हो लाल आ०॥ १३ ॥ ॐ ॥ दोहा. ॥ एहवे राणी चेलणा, सुणि केवल विरतंत ॥ होश थकी बेठी दरे, श्रा णी द्यो मुज कंत ॥१॥राजा कहे राणी सुणो, कंबलनो शो काज ॥ धनश्री सेना बल करी, राखीजे निज राज ॥ ॥ राजाने वल्लन तुरी, के गज के वलि शस्त्र ॥ कंबलथी संग 5 बल नही, निष्कारण ए वस्त्र ॥ ३ ॥ कहे राणी कंबल विना, न लिनं अनने पान ॥ होश न पहोंचे एटली, तो शो तुमचो मान ॥ ४ ॥ तव राजाये तेमिया, ते व्यापारी ताम ।।श्रा * दरथी ते आविया, बेग करी प्रणाम ॥ ५॥ कंबल द्यो राजा कहे, एक प्रियाने काज ॥ स वालाख धन सामटो, देवरावीशुं आज ॥६॥ बोल्या बे करजोझिने, सुणो नृप सगुण स है मृ॥ सोले कंबल सामटां, नज्ञ नामिनी लोध ॥ ७॥ वीशलाख धन विविध परे, एक ४. मूठ गणि दीध ॥ अंगज इंसमो अने, शालिन सुप्रसिह ॥ ७॥ सोले कंबलनो वली, खप ने अहो महाराज ॥ ते कारण अमे चालशं, नेपालय नगी आज ॥ ए॥ ॥ढाल १० मी.॥ (एमी किहां राखी.-ए देशी.) सांजली श्रेणिक नूपति चिंते, मुज सम अवर न कोई ॥ माहरी उत्र याये Jain Education Interational For Personal and Private Use Only nelibrary.org Page #214 -------------------------------------------------------------------------- ________________ gog धना० मानव, सुखोया ने सहु कोई रे॥ नविका, पुण्यतणां फल पेखो ॥ पुण्ये वंगित सफल फ १०६ ले सवि, हृदय विमासी देखो रे ॥०॥१॥ए आंकणी.॥ सामंतने मूक्यो नज्ञ घर, र रत्नकंबल इक आपो॥ सवालाख धन तेहनो पूर्वे, लेई घरमें श्रापो रे ॥०॥श॥ सामंते ! & सवि वात प्रकाशी, तव कहे नश एम ॥ कंबलनो व्यापार करेवा, अमने तो नेम रे ॥ न०॥ ३॥ रत्नकंबल में अचरिज शो , अमने नृपथी आम ॥ नृपने नाम नवारी नां, २ Pए धनने ए धाम रे ॥१०॥४॥ पिण एक माहरी वीनति नृपने, वीनवजो करजोगी। रत्नकंबल में सोलना कीधा, खंम बत्री सवि त्रोमी रे ॥न ॥ ५॥ वहु बत्रीशने वहेंची दीघा, पिण तेहने मन नाव्या ॥शं कंबल करीए ए पहेरी, इम कही नूमि विगव्या रे ॥ न॥६॥ स्नान करी तेणे पग लूही, नांख्या जलने खाले ॥ जो मुज वयणनो प्रत्यय है * नावे, तो जोवो परनाले रे॥न ॥ ॥ अवर काज फरमावशो जे कोइ, ते करशुं शिर नामी ॥ वस्त्रान्तरण की संतोषी, मूक्यो देश सलामी रे ॥न०॥ ॥ वात सर्व नृपने तेणे आवी, विगतेशं समजावे ॥ सांजली नृप मन विस्मय पाम्यो, अन्नय प्रते तेमावे रे ॥3 न०॥ ॥नशने मंदिरे तुमे जश्ने, शालिकुमर बोलावो ॥ गौनझोठ तणो ए अंगज, अम लगें तेमी आयो रे ॥ ॥१०॥ अन्नयकुमर ततहण लक्ष घरे, तात वयगयो आ १०६ Jain Education Intonal For Personal and Private Use Only 17 nelibrary.org Page #215 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॐ ॥ देखी नज्ञ हर्ष धरोने, मोतीय पाल वधावे रे ॥ ॥११॥ धन्य वेला धन्य दिवस अमारे, प्रांगणमे तुमे आया । कार्योद्देश हुवे ते दाखो, स्वामी करी सुपसाया रे ॥न०॥ १२ ॥ तातजी शालिकुमरने मिलवा, अन्नय कहे तिहां तेमे ॥ ते नणी शालिकुमरने सांप्रति, मूको माहरी के रे ॥न ॥ १३ ॥ तव नक्ष बहु नेटणो लेई, अन्नयकुमरनी साथे । ॥ श्रावी नृपने नमीने इणिपरे, अरज करे बिहुं हाये रे ॥ न ॥१५॥चं सूर्य कग्यो न वि जाणे, नवि जाणे दिन रात । गमनागमन व्यापारादिक तिम, नवि जाणे मुज जात रे । ॥न ॥ १५ ॥ बालपणाथी लामकवायो, निश्चिंत सघली वाते ॥ पूर्व स्नेहथी देव अईने, 18 सुखीयो कीधो ताते रे ॥न०॥ १६ ॥ ते माटे करुणा करी साहिब, मंदिर आवो आज ॥ ॐ शालिकुमर तुम चरणे नमशे, अमची वधारो लाज रे॥न ॥१७॥ राजा सांजली मनमें हरख्यो, नज्ञ वचनश्री ताम ॥ शालिनड्ने मिलवा सत्पर, उच्छक थयो गुणधाम रे॥ न०॥ १७ ॥ नृप आदेश लेईने नश, निज मंदिर तव आवे ॥ चोथे नब्हासे ढाल ए दश 5 मी, जिन मन रंगे गावे रे ॥ न || १७ ॥ ॥ दोहा. ॥ आगम जाणी नृपतणो, गौन शेग्नो जीव ॥ देव पुत्र नेहे कर), रचहै ना करे अतीव ॥१॥शालिन्नना घर थकी, नृप मंदिर लगें खास ॥ मणि माणिक मंग For Personal and Private Use Only Page #216 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० २०७ Jain Educatio परच्या, चिंहुं दिशि तोरण तास ॥ २ ॥ मणिमय माला जालियां, मुक्ताफलनां कीध ॥ अमरभुवन अवनी तले, देव शक्तिश्री सिद्ध || ३ || धरली तल बांध्यो धवल, स्फटिक रत्न सुविचित्र ॥ क्षीरसमुइ परे सुभग, विच विच कमल पवित्र ॥ ४ ॥ आवासे आना अधि क, सूर्यपरे सुप्रकास ॥ पंचवर्ण मणि तेजश्री, सुंदर शोने खास ॥ ५ ॥ ॥ ढाल ११ मी. ॥ ( लंकानो राजा. - ए देशी.) हवे श्रेणिक राजा तिहां रे, मेरी सुदर्शना नाम ॥ वजमावे मन रंगशुं, जस नाम थकी आराम रे || श्रेणिक महाराजा ॥ प्रति रूपको रे, करे अधिक दिवाजा ॥ न्याय धर मोरे, नूपति प्रति घरमी ॥ १ ॥ ए यांकली ॥ अलबेला तव आविया रे । कोशिक प्रमु ख कुमारे ॥ निज निज परिवारे करी, परिवृत एक शत नदार रे || श्रे० ॥ २ ॥ पंच शत सचिव सोहामला रे, शेठ सामंत अनेक ॥ गणक चिकिक सामटा, पंमित वली धरता टेकरे || श्रेण ॥ ३ ॥ चतुरंगी सेना सजी रे, सुपरे करीने सार || सेचनक गयवर करे, नृप श्रेणिक यो सवार रे ॥ ० ॥ ४ ॥ श्रजयकुमर आगे चले रे, कदमी पुरुष प्रधा न || सकल कलाये श्रागलो, चारे बुद्धितो निधानरे ॥ श्रे० ॥ ५ ॥ एहवे ग्रामंबर की रे, आवे शालि आगार ॥ मंरुप तोरा देखिने, प्रचरिच लहे सहु परिवाररे ॥ श्रे० ॥ ६ ॥ tomational For Personal and Private Use Only o १०१ v.jainelibrary.org Page #217 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education राजगृही रलियामणी रे, किम शणगारी एस ॥ एता दिन लगें एहवी, नवि दीव हुती नेरे ॥ ० ॥ ७ ॥ न तव भूपति प्रते रे, वधावी कहे वेल || राज पधारो ऊपरे, जुन मंदिर मचो सेल रे ॥ श्रे० ॥ ८ ॥ प्रथम भूमि जोते थके रे, विस्मय मनमें होय ॥ सुह गो के साचो अबे, म न टले चित्त कोय रे ॥ ० ॥ ए ॥ तिम वली बोजी भूमिका | रे, निरखी दरखित श्राय ॥ जश कहे ऊपर तुमे, पान धारोने महाराज रे ॥ श्रे० ॥ १० ॥ त्रीजी भूमि जोते थयो रे, राजा विक्रम चित्त ॥ शुं देवलोके यावियो, कोई देव थकी व री प्रीत रे ॥ ० ॥ ११ ॥ तव जज्ञ कहे इहां रहे रे, अमचा दासी दास ॥ स्वामी पधारो ऊपरे, जिहां शालिकुमर प्रवास रे || श्रे० ॥ १२ ॥ चोथी भूमिना चोकमां रे, आवे नू धव जाम ॥ नजरे जल सम निरखीयो रे, कर पामी ऊनो रह्यो ताम रे ॥ श्रे० ॥ १३ ॥ ये ततक्षण मुकिा रे, नांखी प्रत्यय काज ॥ राज्य पधारो रंगमें, मलिपीठ राज रे ॥ श्रे० ॥ १४ ॥ राजा कहे प्रमथी हवे रे, आगें तो न श्रवाय ॥ शालिकुमरने क्रम कने, तेमी लावोने इसे ठाय रे ॥ ० ॥ १५ ॥ सिंहासन तिहां मांगियो रे, बेग श्रेणि क राय ॥ तव जानककी, शालिकुमरने तेल जाय रे ॥ श्रे० ॥ १६ ॥ जड़ने क को नानमा रे, सुपरे करी व्यवहार | श्रेणिक अंगण आविया रे, इहां करवो कवण वि महा national For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #218 -------------------------------------------------------------------------- ________________ घन्ना० INTERAKSTU चार रे॥श्रे०॥१७॥पूर्वे कदिय न सानल्यो रे, कार्यतणो लवलेश ॥ते निसुणी चित | चिंतवे रे, ए शू कहे मात विशेष रे ॥ श्रे॥१॥ रे माता! तुमे शू कह्यु रे, में नवि लाध्यो नेद ॥ चोथे नल्हासे ग्यारमी ढाल, जिन कहे धरी नमेद रे ॥ श्रे०॥ १० ॥ ॥ दोहा. ॥ अ॒ पूगे गे मातजी, व्यवसायादि विचार ॥श्रेणिक लेई सामटो, नरो मंजूष मकार ॥१॥नज्ञ कहे रे पुत्र सुण, नहि किरियाणो एह ॥ त्रिन्नुवन मांहे अमू ल्य , रूप कला गुण गेह ॥२॥ तव त्रटकी कहे मातजी, एवमो शो आलोच ॥ मुह ४ माग्यो धन देयने, राखो थानक टोच ॥ ३ ॥ नज्ञ कहे रे नूल मां, वचन विचारी बोल ॥ लादेश मगधनोले धणी.इंडसमान अतोल॥४॥दय गय रथ पायक तणो.कोय न लाने पार ॥ आपण सरिखा एहने, व्यापारीलख सार ॥५॥आपण ऊपर एडनो, हितले त हां लगें सर्व ॥ आपणने आधीन , बंमो ते जणी गर्व ॥६॥ यतः॥ सासा१ पासाश् अ गनि३ जलभ, ठगए गकुर६ सोनार॥ एता न हुए आपणा, मंकम बडुअए बिलामर० ४॥१०॥नावार्थः-श्वासोश्वास, पासा, अग्नि, पाणी, ठग, राजा, सोनी, मांकम, बडुन अ५ ने बिलामी, ए सर्वे आपणा न होय. ॥१॥ भावी प्रणमो एहने, मनश्री मूकी मान ॥र्व १ राजा कानना सूना होय , माटे तेपनो विनय अवश्य करवो जोइए. Jain Education national For Personal and Private Use Only lainelibrary.org Page #219 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ल कन्ना राजवी, एहथी विनय निदान ॥ ७ ॥ 18 ॥ ढाल १२ ॥ मी. ॥ (सरसति माता रे, दियो मति निरमली.-ए देशी.) वरण सगी विष सरिखां मातनां. चिंते शालिकमार ॥ मुज ऊपर वलि स्वामान पणो अडे, धिग धिग ए अवतार ॥ शालिकुमर आलोचे चित्तमें ॥१॥ए आंकणी ॥में है नवि कीधो रे धर्म ॥ धर्म विना परवश बंधन हुवे, करे तव मागं रे कर्म । शा०॥२॥ जे परवश ते रे सुख शो नोगवे, परवश खनो रे मूल ।। स्ववशपणानां रे सुख जोते अके, परवश सुख अक तूल्य ॥ शा ॥ ३ ॥ यतः ॥ अनुष्टुब्वृतम्.॥ सर्व परवशं फुःखं, सर्व मात्मवशं सुखं ॥ एतउक्तं समासेन, लक्षणं सुख खयो ॥१॥ नावार्थः-परवशपणे । 8 वधुं दुःख ने अने पोताने वश पणे बधुं सुख . ढूंकामां जे कां, ते सुख दुःख, लक्षण ॥१॥ एटला दिन लगे स्वामी सेवक तणी, में नवि जागी रे वात ॥ आज सुणाव्यो रे। | माताये ईहां, एह कटुक अवदात ॥ शा॥४॥तो हवे माता रे वयण न लोपवू, नवमो 5 | वसुधा रे नाथ ॥ तेह पठी करशुं सवि जोयने, साधशुं अविचल साथ ॥ शा०॥५॥श्म निश्चय करी शय्याथी तदा, पान धरेनूपीठ ॥ सातमीनूमिथी ऊतरवो पड्यो, ते थयो * अतिही अनीठ ॥शा॥६॥ अनुक्रमे श्रेणिकने आवी नम्यो, विनय श्रकी सुप्रकार ॥ दे Jain Education For Personal and Private Use Only anelibrary.org Page #220 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्नारखी श्रेणिक रूप कला नीलो, अमर सदृश अनुकार ॥ शा०॥७॥ हर्ष धरी नगेापणे, न०४ १०015/ बेसास्यो ततकाल ॥ आतपथी जिम माखण परघले, तिम प्रश्वेद विशाल ॥ शा० ॥ ७॥ | देखी माता रेनूप प्रते नणे, ए पीतलियो रे देव ॥ पर कर फरस न ए साहसी शके, शू जाणे एह सेव ॥ शा०॥णा शोखं द्यो एदने रे राज्य मया करी, एह तुमचो रे बाल ॥ तुमची कृपाथी रे ए लीला करे, तुमे एदना प्रतिपाल ॥शाण॥१०॥ मधुर वचनथी रे बो लावी मुदा, दीधी शीख तिवार ॥ विषधर कंचुकी मे तिणि परे, गेमि चल्यो सुविचार॥ 13 शा० ॥ ११ ॥ बेगे जश्ने रे निज वातायने, सोचे चित्त मकार ॥पंच विषय सुख विष स४ रिखां थयां, न गमे वात विचार ॥ शा॥१॥ आलोचे मन अति नदवेगयो, कुःखगनि त वश्राग ।। एहवी करणी रे आजयी आदरूं, जिणे करी लहु नव ताग ॥ शा०॥ १३ ॥ नाथ न राखू रे माथे आजथी, रही गृहवासे रे रंग ॥ नाथ करूं एक त्रिन्नुवननो धणी, जे । हनो स्नेह अन्नंग ॥ शा० ॥१५॥ जिम योगीश्वर ध्यान धरी रहे, तिम रहे शालिकुमार॥ चोथे नल्हासे रे ढाल ए बारमी, जिन कहे वचन नदार ॥शा ॥ १५ ॥ ॥दोहा. ॥ हवे नज्ञ नृप आगले, आवो करे अरदास ॥नोजन अवधारी नलां, पडे पहोचो आवास ॥१॥नशनो मन राखवा, रह्या तिहां मन रंग ॥ लक्षपाक तैलादि तव, २०० Jan Education rational For Personal and Private Use Only W a nelibrary.org Page #221 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नश लावे चंग ॥२॥ मईनिया मर्दन करे, कटवणे धनसार ॥ स्नान करण आवे तुरत, 5 13/ स्नानतणे प्रागार ॥३॥ जलक्रीमा करते अके, पमी मुझी तत्र ॥ जोवे पिण साधे नही, श्रेणिक लहे ते चित्र ॥४॥मुख विलखो करी चिंतवे, माहरा घरनो सार ॥ एहवी मुर मी माहरे, अवर नहि इणि वार ॥ ५॥ नीचे आनन निरखते, देखे कूपक एक ॥ मणि आनूषणधीनस्यो, चिंते तव सुविवेक ॥ ६॥ पूछे दासीने प्रगट, एह कीशो एकत्र ॥ ते कहे शालिकुमारनां, नुक्तान्तरण ते तत्र ॥ ७॥ नृप चिंते नवि सांजल्यो, जे आन्तरण नबिष्ट ॥ते में नजरे निरखियो, अहो अहो पुण्य प्रकृष्ट ॥ ७ ॥ एहवे नज्ञ नृप तणी, अ-5 मवी अंगुली देख ॥ तुरत कढावे मुझी, कल करिने सुविशेष ॥ ए॥ ॥ढाल १३ मी.॥ (देशी मधकरनी.) . नश मुडी अवरथी, नरीने बाल सुचंग हे ॥ सादिव ॥ मध्ये नृप मुडी धरी, श्रा |गल करे नहरंग हे ॥ सा० ॥ देखी नृप मन चिंतवे ॥१॥ ए आंकणी ॥ जुन जुन ६ पुण्य प्रमाण हे ॥सा ॥ एहनी मुडी आगले, मुज मुही शे मान हे ॥ सा | देखी08 | ॥२॥हीणी देखी नलखी, ते लेवे ततखेव हे ॥ सा०॥ नज्ञ कहे नोजन नणी, बेसो १ जोगवीने काढी नांखेलां घराणां. Jain Educationa International For Personal and Private Use Only Page #222 -------------------------------------------------------------------------- ________________ घना० स्वामी हेव हे ॥ सा ॥ दे ॥३॥ आसन बेसण अति जलां, सहुकोने सुप्रकार हे ॥२०॥ ११० सा॥ नृपने मणिरयणे जड्यो, नशसन सुखकार हे ॥ सा०॥ दे॥४॥ बाल कचोलां नारयणनां के कंचनमय कांत हे ॥सा०॥कारी प्रमख विविध सवे. नचित दिये तिणि पांति हे ॥ सा ॥ दे०॥॥ ततक्षण देव प्रयोगश्री, नोजन विविध प्रकार हे ॥ सा०11 ॥षटरस सरस सवादथी, निपन्या ते मनुहार हे ॥ सा०॥ दे॥६॥ पक्वान्नादिक अति नला, बत्रीश नातिनां शाक हे ॥ सा ॥ मेवा मीठगई घणी, नव नव नातिना पाक हे ॥ सा०॥ दे०॥ ७ ॥ नंदन वननां नृप प्रते, कल्पद्रुम फल खास हे ॥ सा० ॥ पिरसे नज्ञ प्रेमशं, अति सुस्वाद सुवास हे ॥ सा०॥ दे०॥७॥ पिरसणिया पिरसे तिहां, देव सरूपी है सुरंग हे ॥ सा०॥ देखी नृप विस्मय लहे, नोजन स्वाद सुचंग हे ॥ सा० ॥ दे॥॥ 2. शालि अनोपम नपती, विविध प्रकारनी दाल हे ॥ सा०॥धृत गोरसथी शोन्नती, जमते || हर्ष विशाल हे ॥ सा ॥ दे ॥ १० ॥ सैन्य सकल सुपरे तिहां, नोजन करे नली नांत है | |४॥सा०॥ जिम फूके पर सैन्यथी, तिम फू धरी खांत हे ॥सा ॥ दे ॥११॥ अथ |3 नोजनवर्णनम् ॥ सवैया एकत्रीशा. ॥ मोतीचूर चूर कर जलेबी खाजेप कर दोट दिये दो छ ठे पर लाडुशुं लरीजीए, घेवरको घेर कर मासेंती पेट नर पतासेको पास धर लापसीकुं । ११० Jain Education a tional For Personal and Private Use Only Kolainelibrary.org Page #223 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लीजीए ॥ आंबा केलां केरी शाख राश्तेकी तीखी शख बाट कुंवमा देय पायसान पीजीए, कूरसेंती दालि मेलि घमकेशं घृत नेलि शाककी सरायशं सराइ एसी कीजीए॥१॥ ॥ ऊपर गंगाजल दीया, वासित सुरन्ति सुवास हे ।। सा ॥ तांबूलादिक तुरतमें, देवे न- दश तास हे ॥ सा ॥ दे०॥१२॥ यथायोग्य पहिरामणी, लेई नृप आवास हे ॥ सा०॥ आव्या अति आणंदशं, पहोती सवि मन आश हे ॥ सा०॥ दे०॥ १३ ॥ पुण्य प्रसंशा परगमी, नांखे प्रेमे नूप हे ॥ सा० ॥ चोथे नल्हासे तेरमी, कही जिनविजये अनूप हे | ॥ सा०॥ दे०॥ १४ ॥ ॥दोहा. ॥ एहवे बत्रीशे मिली, कामिनी करे विचार ॥ कंत कहो शे कारणे, नवि बोले इणिवार ॥१॥ आपणे तो नथी दूहव्या, नवि लोपी कुलवह ॥रीश चढावीने रह्या, आज तो एह निपट्ट ॥२॥ बोलावीजे बहु परे, नेह धरीने नाह ॥ प्रेम धरीने पूरीए, जे अमचो अपराह ॥ ३ ॥ दयिता ईम दीलमें धरी, आवी प्रोतम पास ॥ विविध विनय वचने करी, अधिक करे अरदास ॥४॥ पिण नवि बोले तेदश्री, शालिकुमर लवलेश ॥ तव ४ ते सासूने कहे, विनय श्रकी सुविशेष ॥ ५ ॥ ॥ ढाल १५ मी. ॥ (बारे माथे पंचरंगी पाघ सोवनरो गेगलो मारूजी.-ए देशी.) Jain EducationalnanMational For Personal and Private Use Only dainelibrary.org Page #224 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ___ सुणो बाईजी अरदास अनोपम अमतणी सासू जी, करूं वीनति गोद बिबाय लली १११ । लली तुम नणी सासू जी ॥ तुम नंदन सुगुण निधान सोनागी सेहरो सा०, एह इस 5 रिस अवतार सुसार ते देहरो सा० ॥१॥ करतो क्रीमा मन कोम सुजोमश्री सर्वदा । | सा०, धरतो मनमें विसवास आवास मांही तदा सा०॥इंशणीने अनुकार मुदार ते जाPणतो सा०, नित पंच विषयसुख लोग अमर परे माणतो सा०॥२॥ नृप पाव्याश्री मन- IP मांही विषाद को ऊपन्यो सा०, नवि जाणीजे अम कोय जे श्याश्री नीपन्यो सा०॥ न । 8 सुणे गुण गीत विनोद सुबुध्थिी मेलवी सा०, हवे न करे वात विचार कामिनीशू केलवी 8 सा०॥३॥ अमे सुकुलीणी मिली सर्व करूं घणी वीनती सा, तो पिण बोले नही एह है। जिशो हुए मुनिपती सा० ॥ नवि पूरे नोजन वात न ताति वसन तणी सा०, आनूषणशू । अनुराग सुराग न धन नणी सा०॥४॥ अमे देखी पति दिलगीर फूलं सवि नामिनी | सा, न करूं सुपरें शिणगार न सूq यामिनी सा०॥ अमचो ए प्राण आधार विचार धरे । दकिशो सा, जो लहिये तेढनो नेद नद्यम करिये तिसो सा० ॥५॥ अमे दाम्यां पियु उःख देख। विशेष लडूं नंही सा०, जिम कूपककेरी बांय समावे तिहां सही सा० ॥ अमचो को होये दोष तो दाखो तेहने सा०, अमे तुम विन ए पोकार कहीजे केहने सा० १११ For Personal and Private Use Only N ainelibrary.org Page #225 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education ॥ ६ ॥ इहने कोई धारतध्यान के ग्यान हीये वशो सा०, तिले करी श्रम नपर राग हतो ते सवि खशो सा० ॥ जालानां मन परिणाम नदासी एहनो साथ, इसे मया नोग सं| योग मगन नही केहनो सा० ॥ ७ ॥ एहनो श्रम ऊपर स्नेह कहो किम आवशे सा०, ए आखर ढंकी धाम आराम वसावशे सा० ॥ श्रमने मनमें नदवेग जाएयो ए ऊपन्यो सा०, कोइ पूरव कर्म विशेष थकी इहां नीपन्यो सा० ॥ ८ ॥ ते माटे कर ए प्रयास पूो तुमे जातने सा०, ते पिए मन केरी वात कदेशे मातने सा० ॥ पढे जोई कारण | कार्य विचारी चित्तश्री सांप, कदेवो घटे तेहने नलंन देज्यो शुभ रीतथी सा० ॥ ए॥ तब जश बहुअर वात सुणी विक्रम थई कुमरजी, जिहां बेो शालिकुमार तिहां तत कल गई || कु० ॥ देखे मुख नूर ते सूर जिझो वादल की कु०, वली गीतने श्राकार विलोकने की कु० ॥ १० ॥ बोलावी घरी बहु नेह सुस्नेह वाक्ये करी कु०, कहो पुत्र जी माणाधार एशी चिंता घरी कुण व्यापार वणिज घर हाट नचाट न ताहरे कुण्, लेहला देहलानी वात ते सघली मादरे कु० ॥ ११ ॥ तुज देखी अगम आलोच ते सोच प्रिया घरे कु०, तुज मुख देखी दिलगीर जोजन पिएा नवि करे कु० ॥ न करे वली सकल शृंगार दारादिक नवि गमे कुए, करे रुदन घरी मन दुःख दिवस इम निर्गमे कु० ॥ १२ ॥ For Personal and Private Use Only national vjainelibrary.org Page #226 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ११२ |शा माटे एवको दुःख आपे वे एहने कु०, कोई दीठो होय अपराध कहीजे तेहने कु० ॥ | पि सघलीने समकाल कहो किम खीजीए कु०, खीर नीर परे एक तार प्रियाशुं कीजी एकु ॥ १३ ॥ ए प्रत्तावंत महेयतली वे बालिका कु०, सुकुलीलीमां शिरदार वचन प्रतिपालिका || कु० ॥ परली जे पंचनी साख ते पालवधी जमी कु०, तेहने वि श्रवगुएा | देखी खीजीजे किम ची कु० ॥ १४ ॥ सुली मातनां वयल विशेष न रेष बोल्यो फरीरी कु०, योगें परे घरी ध्यान बेगे मन दृढ करी कु० ॥ कही चौदमी ढाल रसाल ए चोथा उल्हासनी कु०, इम जिनविजये मन रंग कल्पद्रुम रासनी कु० ॥ १५ ॥ ॥ दोहा ॥ एहवे ते राजगृहे, धर्मघोष मुनिराज ॥ समवसस्या सुपरे तिहां, ?पण सय साधु समाज ॥ १ ॥ वनपालक आपे तिहां, वर्धापनका वेग || शालिकुमर ते सांग ली, अधिक लहे संवेग ॥ २ ॥ जिम रसवति सवि नीपने, घृत मिले रस होय जेम ॥ ति म शालिन वैराग्य में, साधु संयोगशुं प्रेम ॥ ३ ॥ देई तास वधामली, इय रथ बेसी देव ॥ परिवृत बहु परिवारथी, गुरु वंदन ततखेव ॥ ४ ॥ पांचे अभिगम साचवी, वंदे समतानीप || देशना अमृत अधिक, निसु सुगुरु समीप ॥ ५ ॥ १. पांचशे. २वधामणी. Jain Education national For Personal and Private Use Only नु०४ ११२ jainelibrary.org Page #227 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ ढाल १५ मी.॥ (हस्तिनागपुर वर नहुँ-ए देशी.) ___ मानव नव प्रति दोहिलो, नव मतां सयल संसार रे ॥ आर्यकेत्र ऊत्तम कुले, पंचेंक्ष्यि पूर्ण नदार रे ॥ न०-पंचेंश्यि पूर्ण नदार, सुणो नवि प्राणिया ससनेह रे ॥ सस नेह सुगुण सुविलास, कहे मन रंगशुं मुनि एह रे ॥१॥ ए आंकणी ॥ धर्म श्रवणं अति है 1 दोहिलो, दोहिलो सदहवो चित्त रे ॥ सूक्ष्म विचार सुणी करी, हठ जे करे ते विपरीत रे B॥हा॥ सु॥२॥वचन विरोध करे जिके, जिन प्रवचनना जे गूढ रे । बहुल संसारी ते । हुवे, नव ब्रमण करे मतिमूढ रे । न०॥सु० ॥३॥ सावद्याचार्य तणी परे, वली जिम ज ४ माली निर्गय रे ॥ एकेक वचन नबापते, पाम्या संसारनो पंथ रे ॥ पा०॥ सु०॥४॥ सद्द दीने धर्म आदरे, ते विरला श्णे जग जीव रे ॥ श्रादरी पिण अवलूं करे, ते सुख लहे प्रा. मणी सदैव रे ॥७॥ सु॥५॥श्रादरवां व्रत दोहिलां, मुनिवरनां पंच प्रमाण रे ॥धैर्य Bधरी जे आदरे, ते पामे पद निरवाणरे ॥ ते ॥ सुणाजन्म जरा नय रहित ते, स्था नक शिवमंदिर रूप रे ॥ केवलज्ञानमयी सदा, तिहां अजर अमर विद्रुपरे ॥ ति०॥सु. ॥॥ कर्म विटंबन गेमने, हुए नाम त्रिजगनो ताम रे ॥ फिरी संसारमें आववा, न रह्यो तेहने का काम रे ॥न०॥॥॥पंच महाव्रतनो हवे, सुणो लेशयकी सुविचार रे ॥ RAISIK**13*KARACH For Personal and Private Use Only Page #228 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना जीवदया जिनधर्मनो, कह्यो मूल सयल संसार र ॥ क॥ सु॥णा त्रस पावर सवि जी ०४ ११३ 18 वनी. रक्का करवी ते नित्य रे॥ मन वच कायाधीकरी. दया वीडा विश्वाथी पवित्र रे ॥ द॥ सु० ॥१७॥ हिंसा करे ते दु:ख लहे, न लहे सुख कदिय लिगार रे ॥ सुनूम ब्रह्मदत्त न द सारिखा, हिंसाश्री नरक महार रे ॥ हिं०॥सु॥११॥ए पहिलो व्रत साधुनो, बीजे मृषा वादनो त्याग रे ॥ क्रोध लोन नय हास्यश्री, जूगे न कहे महानाग रे ॥जू ०॥सु०॥१२॥ 5 जूठे वसुराजा जून, नरके गयो देव प्रकोप रे ॥ ते नणी सत्यज बोलवो, जिम थाए पुरि 18/ तनो लोप रे ॥ जि०॥ सु॥१३॥ अगदीधो लेवो नही, तृणमात्र ते साधुने कोय रे ॥ चोरीथी दुःख नीपजे, हुंमक परे शास्त्रमें जोय रे ॥ हुं०॥ सु०॥१४॥ चोथु व्रत चोरके चिर ते, पालवू मननी शुहिरे ॥ नारी रूप न देखQ, लेखवयु नपलनी बुहिरे ॥ ले ॥सु है २॥ १५ ॥ कुंमरिक नंदिषेण जे, अर्हनक आकुमार रे ॥ विजयमुनीश्वर तिम वली, रहने मि प्रमुख अणगार रे ॥२०॥सुण॥१६॥ नारी देखीने चल्या, पाग वल्या पुण्य प्रयोग रे ४॥ते नणी नववामे करी, व्रत पालवो धरी नपयोग रे ॥ ७० ॥सु ॥१॥ तृण तूसमात्र न / है राखवो, परिग्रह ममताथी धीरे॥परिग्रहथी नरके गया, नवनंदन सागरशेठ रे ॥ न०६ ॥ सु० ॥१॥ रात्रिनोजन गंवो, त्रिविधे त्रिविधे थर धीर रे ॥ ए मुनिव्रत विवरी कयां, ११ Jain Educationa international For Personal and Private Use Only Page #229 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आदरो नावे अश् वीर रे ॥प्रा० ॥ सु०॥ १५॥ साधुतणी सुणी देशना, समज्यो चित्त || शालि महंत रे ॥ अलिक पदारथ ए सद, कहे साधु ते सघलो तंत रे ॥क॥सु०॥२०॥ | गुरु वांदी घरे आविया, रथे बेसी शालिकुमार रे ।। चोथे नल्हासे जिन कहे, पन्नरमी ढाल नदार रे ॥ ५० ॥ सु०॥१॥ । ॥दोहा. ।। नशने प्रणमी कहे, सांजल मोरी मात ॥ साधु वचन सुणते लही, वी २ ती सघलो वात ॥१॥ स्वारथियो संसार सवि, परस्वार्थि नहि कोय ॥ विविध विटंबन || वेदना, जीव सयलने जाय ॥२॥ यतः॥ शार्दूलविक्रीमितवृत्तम् ॥ वृदंकीणफलं त्यजति । विहगा शुष्क तरः सारसाः, निर्गधंकुसुमं त्यजति मधुपा दग्धंवनांत मृगाः ॥ निव्यंपुरु है। पं त्यजति गणिका दृष्टंनृपं सेवकाः, सर्वः स्वार्थवशाजनोनिरमते नो कस्य को वल्लनः ॥१॥नावार्थः-पदीन फल विनना वृदनो, सारस पक्षी सूकाइ गएला सरोवरनो, न मरान निर्गंध फूलनो, मृगो बलता वननो, गणिका निर्धन पुरुषनो अने सेवको राज्य द ब्रष्ट राजानो त्याग करे . ए प्रकारे सर्वे स्वार्थने वश्य . जो के, तेन एककनी नपर देत * राखे , तथापि वास्तविक रीते जोतां को कोर्नु वहालुं नथी. ॥१॥ ते माटे अनुमति दिन यो, मया करीने आप ॥ संयम लेई सिंह परे, टायूँ नव संताप ॥३॥ सुणी वयण संश JanEducationallational For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #230 -------------------------------------------------------------------------- ________________ न०४ ११४ धन्ना०य पमी, नज्ञ करे विचार ॥ व्रतनी वात किशी करे, बालक शालिकुमार ॥ ४ ॥ ॥ ढाल १६ मी.॥ (निझी वेरण हुइ रही.-ए देशी.) नज्ञ कहे नली नातिशु, शीख सांनल हो तुं सुगुण सुपूत्र के ॥ आलालंबन सम | सही, तुजश्री ले हो मुज घरनो सूत्र के ॥ ॥१॥ए आंकणी ॥ वय लघु ताहरी विचार तुं, तुज दयिता हो ते पिण सवि बाल के ॥ संतानादिक पिण नही, ते माटे हो जून हृदय निहाल के॥न०॥॥नीतिमें पिण श्म सनिल्यो, वय पहिलीये हो विद्या अन्यास के ॥ बीजी वय सुख विलसवां, त्रीजी वय हो व्रत ग्रहण आयास के ॥०॥३४ ॥ यतः ॥ अनुष्टुब्वृत्तम्. ॥ प्रथमे नाढिता विद्या, हीतिये नार्जितं धनं ॥ तृतीये नाढितो धर्मः, चतुर्थे किं करिष्यसि ॥१॥नावार्थः-जो ते पहेली वयमा विद्या संपादन न करी, बीजी वयमां धन संपादन न करयुं अने त्रीजी वयमां धर्मसाधन न कस्यो; तो चोथी वय - मां तुं शुं करीश ? अर्थात् धर्मसाधन करवानो अवसर तो त्रीजी वयमा ने. तो ते नीति व चन नखंघीने हाल करवा केम तैयार थयो बुं ?॥१॥ते नगी घमपणमें तुमे, श्रावकत्र-18 त हो धरज्यो थई धीर के ॥ निरतिचारे पालतां, सुख लहीए हो अति दिव्य शरीर के ॥ न॥४॥ वालपणे व्रत ते ग्रह, जस होवे हो दुःख सबल संसार के ॥ खावा पीवा पिण११५ Jain Educational Lonal For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #231 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education नही, वली न हुवे हो कोइनो आधार के ॥ ज० ॥ ए ॥ यौवनमें जेहने नही, कांता दिक | हो ते लिये वली दीख के || मान तजी मधुकर परें, मध्याने हो जमे लेवा नीख के ॥ ० ॥ ६ ॥ तूं तो सुख में ऊबस्यो, नवि जाणे हो सेवकने स्वाम के || वंबित सघलो ताह रे, पूरे देवता हो सुत स्नेह सुकाम के ॥ ज० ॥ ७ ॥ संयम लेइने शूं तुमे, पुत्र साधशो | हो मुजने को प्रत्र के ॥ देवजोग तुम पास बे, अधिको किशो हो सुख पामवो तत्र के ॥ ० ॥ ८ ॥ तव कहे शालिकुमर शुं, संयमथी दो लहिये सुखवास के ॥ माथे नाथ न | संपजे, वली कोइनी हो करवी नही आश के ॥ ज० ॥ एए ॥ सुनिश चित्त चिंतवे, वात कुंकी हो कहे कवण प्रकार के । तात परें ए पि सही, ढंकी जाशे हो ए सवि घरबार के ॥ ० ॥ १० ॥ कहे सुल पुत्र तूं चित्तथी, व्रत दोहिलां हो मुनिवरनां तंत के ॥ मेल | दांत लोहमय चणा, चावंतां दो अति तेह दूरंत के ॥ ज० ॥ ११ ॥ गंगा सनमुख चालवो, रत्नाकर हो तरवो निज बांह के || वायथी जरवा कोयला, जिम दुर्भर हो तिम संयम चा इ के ॥ ज० ॥ १२ ॥ पंच महाव्रत पालवां, वली टालवा हो बेतालीश दोष के || पंचाचारने यत्नश्री, निरदोषे हो करवो तस पोष के ॥ ज० ॥ १३ ॥ क्रोध कषाय न राखवा, नवि नाखवा हो असमंजस बाल के || शत्रु मित्र सम धारवा, वली वारवा हो मद आठ अतो national For Personal and Private Use Only Viw.jainelibrary.org Page #232 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्नाल के॥नः॥१४॥ सिंहपरे व्रत आदरी, सिंहनी परे हो पाले ते प्रमाण के ॥ संयम लेई ११५ 3 लमयमे, तस जीवित हो संयम अप्रमाण के ॥०॥१५ ॥ व्रत पालंतां दोहिलां, नवि सोहिलां हो सुखीयाने नेठ के ॥ नृप नलंगे बेसते, ते जाणी दो ते देवनी वेठ के॥ ॥ है १६ ॥ ते नणी यौवन वय लगें, श्रावक व्रत हो धरो सुपरें चित्त के॥चढते चढते अनुक्रमे, पहोची जे हो महोले जिम नित्य के ॥०॥ १७॥ मात वचन ते मानीये, माता तीरथ ।। हो कही शास्त्रमें सार के ॥ सेवा कीजे शुन्न मने, लहीये सुख हो स्वर्गादि नदार के न 18॥१०॥ यतः॥ नपाध्याये दशाचार्यो, अचार्याणां शतं पिता ॥ सहस्रंतु पितुर्माता, गौरवे ।। ॐणा तिरिच्यते ॥२॥नावार्थः-दश नपाध्याये एक आचार्य, सो प्राचार्ये एक पिता अने, ४ हजार पिताये एक माता; ते कारण माटे माता सर्वथी मोटी ॥॥ मात वयण सुरगीली P ने तदा, मौन करिने हो रह्यो शालिकुमार के ॥ ढाल ए चोथा नव्हासनी, कही सोलमी 18 हो जिनविजये विचार के ॥ न०॥ १७ ॥ ६ ॥दोहा. ॥ शालिकुमर मन चिंतवे, हठनो काम न देव ।। समय ग्रहीने साधीये, चिंतित निज स्वमेव ॥ १॥ श्म आलोची चित्तमें, चढ्यो चतुर चोबार ॥ माता मन ह IP रखित श्रश्, तिम बत्रीशे नार ॥ ॥ विलसे कांताथ। विषय, पिण मनयी वैराग ॥ जिम 155ॐॐॐRSA ला ११५ Jain Educationa d ional For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #233 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पंखी पंजर पड्यो, जोवे बूटण लाग ॥३॥ चित्तमें चिंतवते अके, नपनी बुदि अनूप ॥ प्र मदा बंडु प्रति दिवस, एकेकी धरि चूंप ॥४॥ हलवे हलवे विषय सुख, उमणनी धरूं टेव । ४॥ अनुक्रमे अनुमति लेयने, वरशुं संयम हेव ॥ ५॥ जिम जिम परणीती मुदा, तिम ति || म तनुं निदान । नियति धरी ते दिन भकी, मे धरी सुज्ञान ॥६॥ प्रथम दिवस मोनिPण तजी, तिणे तव लाध्यो दाव ॥ वांक सकल ते में कियो, ते दाख्यो प्रस्ताव ॥ ७॥ दिन 2 बीजे बीजी प्रते, गेमण कीध प्रपंच ॥ ते पिण विलखित वदनथी, चिंते ए शो संच ॥॥ पत्रीजे दिन त्रीजी तिमज, मी तरुणी जाम ॥ तव सघली चित्त चिंतवे, अहो रॉ ए करे आम ॥ ए ॥ अनुक्रमथी ए मशे, अमने सहि जरतार ॥ नावीश्री बल कोयनो, चाले । नहि लिगार ॥१०॥ ॥ ढाल १७ मी.॥ (हरियां मन लाग्यो.-ए देशी.) एहवे ते धना गृहे, सतीय सुन्नश विख्यात रे ॥ स्नेही सुण मोरा ॥पतिने स्नान करावते, चित्त सांतरियो जात रे ॥ स्नेही सुरण मोरा ॥ एहवे०॥१॥ ए आंकणी ॥ मस * मसती रूदन करे, नयनश्री नीर प्रवाह रे ॥ स्ने०॥ गती मांहे जागीयो, विरह दावानल दाह रे ॥ स्ने०॥ ए॥२॥ देखी दयिता दूबली, दीन वदन विवाय रे ॥स्ने०॥ पूछे धनो । Jain Education national For Personal and Private Use Only 1 w .jainelibrary.org Page #234 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० धण प्रते, कहे चिंता तुज काय रे ॥ स्नेही सण कांता |ए०॥३॥ाठे माहे अग्रणी, मानव ११६४ हरा घरनो मंगरे॥स्ने०॥ शालिकमर सरिखो असे. बांधव डिप्रचंमरे॥स्ने॥एक ॥५॥ तव बोली सा सुंदरी, कंत प्रते करजो रे ॥ स्नेही सुण स्वामी ॥ तुम परसादे ल माहरे, कदिय न कोय ले खोम रे ॥स्ने०ए०॥५॥शालिकुमर बांधव अडे, अग्रज अति हि विख्यात रे ॥ स्ने ॥ स्नेहथकी पासे रहे, देव स्वरूपी तात रे ॥ स्ने०ए०॥६॥ नृप मंदिर आव्या पली, कोई थयो विज्ञान रे । स्ने॥ मौनपणे बेसी रहे, जिम योगीसर ध्यान रे ॥ स्ने ए०॥७॥नोगतणी तृष्णा नही, योग ग्रहण मन टेव रे ॥स्ने०॥ (दिन 8 1 दिन एकेकी प्रते, बंझे ने सुविवेक रे ॥)नोजन पाणी नवि रूचे, न रुचे नृत्य कणमेव रे । स्ने०ए०॥॥ रमणी शहि सवि तजी, विषयादिक सुख नोग रे॥ स्ने०॥मासानंतर २ तेहवे, लेशे संयम योग रे ॥स्नेणाए॥ए॥ते फुःख चित्तमें सांजरे, साले साल समान रे ॥ स्ने०॥ मामीना जाया पखे, पीयरमां शो मान रे ॥स्ने०ए०॥१०॥ नित नित आनू पण नवां, नव नवां वस्त्र नदार रे ॥स्ने०॥हेज धरी कुण आण्शे, आवे शुन्न तिथि वार रे ॥स्नेलगाए०॥११॥ कुण कहेशे मुज बहिनमी, सायतमें सो वार रे ॥स्ने०॥ केहने बांध शुं राखमी, घणि घणि करी मनुहार रे ॥स्ने०॥ए०॥१॥ हवे किहांथो अमे देखशु, शुन्न ११६ * * * Jain Educational atonal For Personal and Private Use Only I ainelibrary.org Page #235 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लक्षण नत्रीज रे ॥ स्ने०॥ केहने नोजन पिरसीने, लेखवशं नावबीज रे ॥स्ने० ॥ ए॥ ॥ १३ ॥ स्त्री पीयरने ऊपरे, सासरे मुहथी पाय रे ॥स्ने॥ बंधव विण पीयर कीशो, जेह ४ वी विसुकी गाय रे ॥ स्ने०॥ए॥१॥ ए फुःख मुजने इण नवे, कहो किम विसरे कंत रे । ॥ स्ने० ॥ तिण उःखथी मुज नयणथी, नीर करे जे एकांत रे ॥स्नेलाए०॥१५॥ तव धन्नो के || कहे गोरमी, बांधव कुःख ते साच रे ॥ स्नेही सुण कांता ॥ पिण कायर शिर सेहरो, तुज अग्रज सुण वाच रे ॥ स्ने० ॥१६॥ जे त्यागी जगमें थया, ते किम करेय विचार रे॥ 18 स्ने०॥ जेह विचार कर। रह्या, ते कायर शिरदार रे ॥स्ने०ए०॥१७ ॥ दाम्या ऊपर जे हवो, खार दिये जिम कोय रे ॥ स्नेही सुण स्वामी ॥ बांधव पुःख नपर तिसो, कंत व-4 चन तिम होय रे॥ स्ने०॥ ए०१७॥ तव कहे प्रीतम सान्नलो, मुज बांधवनी वात रे ॥ स्ने०॥ यौवन वय युवती नणी, बंमे ते अखियात रे ॥ स्ने ॥ए०॥१॥ कवझी एकने म कते, करे विमासण वीश रे ॥कोमिंगमे धन परिहरे, मुज बांधव सुजगीश रे ॥ स्ने ॥ 18 ए०॥ ३० ॥ रत्नजमीत वर मालीयां, जालियां मणिमय जोय रे ॥ स्ने०॥ए अहिनाणे ४ धनतणो, लेखो किणि विधि होय रे ॥ स्ने० ॥ ए०॥१॥ रात दिवस नवि जाणतो, रवि शशि उदय विचार रे ॥ स्ने०॥ ते दीक्षा व्रत पालवा, राखे मन श्क तार रे ॥ स्ने०॥ ३० Jain Education s tational For Personal and Private Use Only 10 ainelibrary.org Page #236 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ए०॥॥ वय चोथीम वीसम्या, दंपति जे तनु खीणरे ॥ स्ने॥ते पिण व्रत लेवा न न०४ ११७ । णी, मन न धरे मति हीण रे ॥स्नेणाएण॥२३॥ यतः ॥ अंगं गलितं पलितं मुंझ, दश नवि ६ हीनं जातं तु ॥ वृशेयाति गृहित्वा दम, तदपि न मुंचत्याशा पिंॐ ॥१॥ नावार्थः-अंग ग | द ली गयुं, माथु पलियावालुं थयु, मुख दांत विनानुं थयु अने वृक्ष यो उतो लाकमो लेश कमक करीने चाले , तेम उतां पण आशामिने मूकतो नश्री. ॥१॥मुज बांधव अवहेलते, शू नावे तम लाज रे ॥स्ने०॥गुण लीजे तेहना सदा, जे करे उत्तम काज रे॥स्ने॥एणाश्च 18/॥ कहेवो जगमें सोहलो, पिण करतां जंजाल रे ॥स्ने०॥ कायर नरना बोलमा, थाये आला पंपाल रे॥ स्ने०ए०॥५॥ यतः॥ कहेता दीसे कोम, करता दीसे को नहि ॥ एहज मो हाटी खोम, एक लंपट बीजा लालच ॥शा मुज बांधव सम जगतमें, जो कोय न दीपरे है। ॥स्ने। सुख मी संयम आहे. करी संसार अनीठ रे ॥स्नेणाए॥६॥ दिन.बत्रीशे म-२ शे, बांधव नारी बत्रिश रे॥ स्ने० ॥ पिण एक वातज माहरी, सनिलो विसवा वीश रे ॥ स्नेलगाए०॥श्णा जो बलिया तुमे तेहथी, वचनतणा प्रतिपाल रे ॥ स्ने० ॥ तो आठे अंतेन | री, बंमोने समकाल रे ॥स्नेणाए०॥ ॥ वचन सुणी वनितातणां, धन्नो समज्यो धीर रे ॥ स्ने०॥ चोथे नल्हासे सत्तरमी, जिन कहे गुण गंन्नीर रे ॥ स्ने ॥ ए० ॥ ६॥ ११७ Jain Education national For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #237 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | ॥दोहा. ॥ तव धन्नो कहे धन्य तुं, नलो दियो नपदेश ॥ आठे मी आजथी, लि 12 संयम सुविशेष ॥१॥में कोधो ताहरो कह्यो, सुपरे धरी सनेह ॥ तूं नगिनी माहरे म || ने, अविचल तगपण एह ॥२॥श्म कही ततहण कठीयो, लेवा संयम नार॥नामिनी आठे आविने, पालव ग्रहे तिवार ॥ ३॥ कहे सुत्नश स्वामि मुज, खमज्यो अविनय एह है ॥ःख दाम्याश्री वयण जे, कह्यु अघटतुं तेह ॥४॥प्रासंगे अविनय हुवे, धीर न धारे। चित्त ॥ हांसो करतां तुम तणो, कार्य थयो विपरीत ॥ ५ ॥ ॥ ढाल १७ मो. ॥ (देशी हमीरियानी.) है कहे करजोमी कंतने, सतीय सुत्नश एम ॥ प्रीतमजी ॥ हांसीथी हठ किम करो, । राखो पूरण प्रेम ॥ प्री०॥कहे०॥१॥ए आंकणी ॥ मात पिताये मोदथी, सोप्यां तुमने है स्वाम ॥प्री॥ तुमे श्म गेमी चालशो, तो अमने कुण गम ॥प्री० ॥क०||॥ स्त्रीने सु ४ख संसारमें, कंतने कहे सहु कोय ॥ प्री०॥ सुकुलीणीने कंतश्री, अधिको कोय न होय ॥ प्री०॥क०॥३॥ आठेने अवहेलते, पामशो शोना केम ॥प्री०॥ कां अमने नूंमां करो, नाथ थईने एम ॥प्री०॥कणा॥ रुदन करे पालव ग्रही, पय प्रणमे करजोम ॥प्री०॥ तव धनो धीरज धरी, कहे तुं मुजने गेम ॥सलूणी॥ धन्नो धण प्रते बूझवे ॥५॥ ए आंकणी॥ Jain Education a tional For Personal and Private Use Only Harjainelibrary.org Page #238 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० तुज सरिखी हितवांजिका, अवर न नारी होय ॥ स०॥ जे तारे नवजल थकी, सबल स-10 ११० खाई सोय ॥स०॥०॥६॥ में ताहरो वच मानीयो, सुपरे धरी संवेग ।। स०॥ हित देखा-2 ४ ड्यो हेजश्री, टाल्यो मन नदवेग ॥स०॥ध॥७॥ वय वली जाशे वेगथी, बलथी इंक्ष्यि | लहीन ॥ स०॥ व्याधि जरा जव लागशे, तव सवि वाते दीन ।।साध०॥5॥ अथिर संसा रमां ए सहु, मिलियो के संबंध ॥ स ॥ संध्या राग तणी परे, अधिरशं शो प्रतिबंध ॥स ध०॥ए॥ यतः॥ शिखरिणीवृत्तम्. ॥ श्रियो विद्युल्लोला कतिपयदिन यौवनमिदं, सुखं खाक्रांतं वपुर नियतं व्याधिविधुरं । गृहावासःपासः प्रणयतिसुखं स्थैर्यविमुखं, असारः | संसारः स्तदिहनियतं जागृत जनाः ॥ १॥ नावार्थः-लक्ष्मी वीजलीना चमत्कार जेवी चं, चल , आ जुवानी केटला दिवस रहेवानी? सुख ले ते पुःखथी व्याप्त , निश्चे आ शरीर व्याधिग्रस्त , गृहस्थाश्रम पास जेवो ने, स्त्रीनुं सुख अस्थिर अने आ संसार असार ! ते कारण माटे हे लोको! निश्चे तमे इहां जागृत थान.॥१॥ धननो पिण मद कारमो, ते तो दीगे परतत ॥ स०॥ तेणे नवे माटी वही, जोय विचारी दद । स०॥ ध०॥१०॥ नर जव पामी चेतीये, तो सीके सवि काज ॥ स०॥ तप संयम संयोगथी, | ल सहिये अविचल राज ॥ स०॥ध०॥ ११॥ वार अनंती नीपन्यो, ए सगपण संयोग ११७ Jain Education ational For Personal and Private Use Only (M ainelibrary.org Page #239 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educatio ॥ स ० ॥ विषयारस वाहे थके, जोगविया बहु जोग || स० ॥ ६० ॥ १२ ॥ तृपतो जीव थयो नही, अविरतिथी कोइ काल || स० ॥ तेहनणी तुं सुंदरी, सुपरे हृदय निहाल ॥ स० ॥ ६० ॥ १३ ॥ वचन सुखी पियुनां तदा, कहे ते सुना नाम ॥ प्री० ॥ तुम साथे माहरे स दी, करवो उत्तम काम || प्री० ॥ कहे करजोमी कंतने ||१४|| ए प्रांकली ॥ पंचनी साखे पालव ग्रह्मो, ते किम मूक्यो जाय ॥ प्री० ॥ ते जली संयम माहरे, लेवो तुमचे सहाय ॥ प्री० ॥ १५ ॥ तव बोली साते सती, अनोपम करी प्रालोच ॥ प्री० ॥ सतीय सुन नी परे, श्रमचो पिण आलोच ॥ प्री० ॥ क० ॥ १६ ॥ अवर न को आधार बे, श्रमचे इणे सं सार || तुम साये तेह कारणे, लेश्शुं संयम जार || प्री०||||१७|| धन्नो कहे साची तुमे, पतिवृता व्रत परिपाल | स० ॥ संगतिथी सरवे थयां, व्रत लेवा नजमाल ॥ स० ॥ क० ||१८|| त्याग कियो तिथे तुरतमें, परिग्रहनो नहीं पार | स० ॥ चोथे नब्दासे प्रार मी, जिन कहे धन्य परिवार || सप | क० ॥ १७ ॥ ॥ दोहा ॥ अथ ते धन्नाशाहने, रुदितणो परिमाण ॥ हय गय रथ गृह हट्ट तिम, पंच पंच शत मान ॥१॥ पांचशे प्रवहण परगमां, पन्नरशे वर ग्राम ॥ वालोतर एक सहस तिम, गोकुल आठ सुकाम ॥२॥ सप्तभूमि आवास श्रम, आठे प्रिया उदार ॥ कोमि एकेकी mmational For Personal and Private Use Only ww.jainelibrary.org. Page #240 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० ११ तेइने, कंचन को सुप्रकार ||३|| उप्पन क्रोम निधिमें रहे, बप्पन क्रोम व्यवसाय ॥ बप्पन क्रोम व्याजे वधे, कर्ष संख्या इम थाय ||४|| लक्षगमे कोठार तिम, धान्यता परिपूर्ण ॥ इत्यादिक सविशदिने, की धन्ने तूर्ण ||५|| सुरमणि आदे अवर पिस, रत्नराशि रमणीक || नवनिधि परिग्रह सकलने, तृएापरे तजे ते ठीक ||६|| सपरिवार धन्नो तदा, संयम लेवा काज ॥ चिंते जो मुज नाग्यश्री, समवसरे जिनराज ॥ ४ ॥ ॥ ढाल १५ मी. ॥ ( बे बे मुनिवर वहोरण पांगस्या जी. - ए देशी. ) sa तिहां पुण्यप्रयोगे आविया जी, जिनपति वीर जिणंद विख्यात रे ॥ समवस रा देवे सुपरे रच्यो जी, तेजे करी दिव्य साक्षात रे || एहवे० ॥ १ ॥ ए प्रकली ॥ चोत्रीश अतिशय सुंदर शोजता जी, अष्ट महाप्रातिहार्य नद्दाम रे ॥ सहस जोयानो इंध्वज तिदां जो, श्रागें तिम धर्मचक्र अभिराम रे ॥ ९० ॥ २ ॥ त्रिगको विराजे मणि कल्याणथी जी, कोशीशा रत्नविचित्र सुतेज रे ॥ मणिमय सिंहासन शोने घणुं जी, छत्र त्रय अमर धरे घरी दे रे ॥ ए ॥ ३ ॥ चौवीश चामर वीजे देवता जी, नामंगल तरणि सहस सम नूर रे ॥ वाव्य विराजे चिहुं दिशि बारणे जी, देव विनिर्मित जलथी पूर रे ॥ ए० ॥ ४ ॥ चौविह संघ संगाथे परिवरया जी, समवसरण में श्री जिनराज रे ॥ बेसी सिंहास For Personal and Private Use Only Jain Educationa International न०४ ११‍ Arjainelibrary.org Page #241 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॐॐ ने मेघ तणी परे जी, वरसे वचनामृत नवि हित काज रे ॥ ए॥ ५॥ परषद वारे आवे प्रेमशुं जी, वांदीने बेसे विनयश्री ताम रे ॥ सांजले सुपरे शिवसाधन नणी जी, देशना । | अद्भूत गुण अन्तिराम रे ॥ ए.॥६॥आरामिके दीधी जाइ वधामणी जी, नूपति श्रेणि कने अति नल्हास रे॥ सांजली नृप हर्षित प्रश् तेहने जी, कनकरसनादिक दिये सुविला है सरे ॥एणा॥ धनोशाह सांजली आव्या जन प्रते जी, धणने कहे सीधां वंगित काज रे । जेहनी अन्निलाषा मन इती घणी जी, ते प्रन्नु पान धस्या जिनराज रे ॥ ए॥॥5 संयम लेतां विलंब न कीजीए जी, एहवो फिरी मिलवो जोग ते दूर रे ॥ साहिब थापी 12 वीर जिणंदने जी, कर्मने हणवा थान शूर रे॥ ए०॥ ए॥कंत वयण सुणी संयम साधवा । जी, प्रमदा पिण अंश अतिहि नजमाल रे॥ सातत्रे धन सघलो वावरी जी, दान प्रमुख है। पिण अतिहि विशाल रे ॥ ए० ॥१॥ पमघा तिम नघा कुत्री दाटथी जी, देई धन लद । प्रमित तेणिवार रे ॥ तिम वली काश्यपने तेमाविने जी, केशाग्र समरावे स्त्री जरतार रे || ॥ ए॥११॥ सहस पुरुष निर्वाहक शिबिका जी, मंमावे तिहां सिंहासन सुप्रमाण रे ॥ | साजन सघला ततहण आविया जी, कहे मुख होज्यो तुम कल्याण रे ॥ए॥१॥ अ १ सुवर्णनी जीन विगेरे. २ सर्व वस्तुना वेचनार कुत्रिकापणनी उकानेथी. १.२१- Jain Education C ational For Personal and Private Use Only T ainelibrary.org Page #242 -------------------------------------------------------------------------- ________________ घन्ना० नयकुमर पिण भावी इम कहे जी, धन्य धन्य धन्नोशाह सुजाण रे ॥ धन्य धन्य ए परि-न १२० कर रामातणो जी, पतिवृता बिरुद ते एह प्रमाण रे ॥ ए.॥१३॥ ए वय ए धन एहवी अंगना जी, तजीने जे लेवे संयम नार रे॥ते तो न्यायेथी शिवरमणी वरे जी, इम सहु जंपेनरने नार रे ॥ ए०॥ १४ ॥ वाजां तिहां वाजे विविध प्रकारनां जी, जय जय बोले || चारण नाट रे ॥ दान धराये वरसे तेदने जी, मिलिया तिहां नर नारीना श्राट रे ॥ए । १५॥ धन्नोशाह संयम लेवा संचरे जी, प्रमदाथी सोहे जेहवो इंदरे ॥ ढाल नगणीशमी चोथा नल्हासनी जी, कही म बुध जिनविजये अमंद रे ॥ ए०॥ १६ ॥ ॥ दोहा. ॥ वात सुगी धनातणी, जे ए लेवे दीख ॥ आवे स्त्री साथे अधिक, सुणी है सुन्नज्ञ शीख ॥१॥परिग्रह सघलो परिहरी, मी माया मोह ॥ संयम लेवा संचरे, जि। म रण तृमि जोह ॥२॥शालिन्न चित चिंतवे, जून धन्नानी वात ॥ वचन थकी वामी करी, चाल्यो करि अखियात ॥ ३ ॥ हुं एकेकी दिनप्रते, बंमू रमणी जेह ।। कायर ध-18 ने जे कह्यो, तेहमां नही संदेह ॥४॥ जो गेमणनो मन थयो, तो तिहां किशो विलंब ॥ म चिंतीनज्ञ कने, आवे अति अविलंब ॥५॥पय प्रणमीने वीनवे, में तुम वयण प्रमा १ जोहो. 55545 &१३० ॐ Jain Education nal For Personal and Private Use Only Wjainelibrary.org Page #243 -------------------------------------------------------------------------- ________________ AY-०१२ पण ॥ तो ते हवे तुमे माहरो, वंगित करो सुजाण ॥ ६ ॥ धने पिण धरा वयगयी, गे ड्यो सयल संसार || ते माटे हं पण हवे, मोश विषय विकार ॥ ७ ॥ माता मोटम मन | करी. दियो संयम आदेश | वीर समीपे व्रत ग्रही, टालं सयल किलेश ॥॥ना चिं 8 ते एहने, किणि विध राखं गेह ॥ बहिन बनेवी बिहुँ मिल्यां, सहचारी ससनेह ॥ ७ ॥ तो पिण वचन कह्या तणी, किम राखीजे हाम ॥ रोईने घर राखीये, कीजे स्वार्थिक का म॥१०॥ यतः ॥ अनुष्टबत्तम. ॥ अपमानं पुरस्कृत्य, मानं कृत्वा च प्रष्ठतः ॥ स्व-3 18 कार्य साधयेहिमान, कार्यबंशो हि मूर्खता ॥१॥ नावार्थ:-अपमानने पागल करीने अने मानने पागल करने बुद्धिमान पुरुष पोतार्नु कार्य साधे, परंतु कार्यनो नाश करवो, दए तो मूर्खपणुंचे. ॥१॥ ॥ ढाल २० मी॥ (अरणिक मुनिवर चाल्या गौचरी.-ए देशी.) 1 नज्ञ वलती रे शालिकुमर नगी, गद गद स्वरश्री वाणी रे ॥ रमती बोले रे पुत्र में ताहरी, वात हृदयनी जाणी रे ॥ नज्ञ॥१॥ ए प्रांकसी ॥ तूं जाणे ने रे संयम आद-8 रु, पिण को खबर न राखे रे ॥ माताने आधार ते तुज विना, अवर किशो तूं दाखे रे ॥ है। न० ॥२॥ बालपणामां रे मनमां जागती, पुत्र होशे जब मोटो रे ॥ वृक्षापण मुजने SEXR JainEducationlienational For Personal and Private Use Only Winelibrary.org Page #244 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पन्ना० तव पालशे, माहरे को न त्रोटोरे॥न ॥ ३ ॥ बत्रीश वहुने रे बालक आवशे, ते आलं १२१ | बन श्राशे रे॥ दैवे वात न को पूरी करी, शू जाणे ईम जाशे रे ॥न० ॥४॥ यतः । ॥आर्यावृत्तम्.॥ अघटितघटितानि घटयति, सघटितघटितानि जर्जरीकरुते ॥ विधिरे है वतानि घटयति, यानि पुमान्नैव चिंतयति ॥१॥ नावाश्रः-दैव जे , ते जेमतेम घमेली चीजोने सारी बनावे ने अने सारी रीते गगरी मगरेली चीजोने खोखरी करी नांखे ! है। माटे दैव चीजोने तेवीज बतावे ले के, जेनो पुरुष पण विचार न करी शके! अर्यात् दैव४नी अकल शक्ति ने ॥१॥ माहरो दैवे रे प्रायु अधिक कस्यो, जे दुःख देखण बेबी रे । । नाग कंचकी परे तं बंमे ईहां. तज विरहानले पेठी रे॥न॥॥ को न बालक पाउल ताहरे, जे आलंबन कीजे रे॥ पूरवकृत फल सवि भावी मीडयां, दोष ते केहने दीजे रे । ॥न ॥६॥ नव मसवामा रे नदरे ऊधस्यो, बालपणाश्री पोष्यो रे ॥ ते कोश्क दिन करे। कारणे, नवि जाणुं ईम दोशो रे ॥न०॥॥ ए बत्रीशे रे सुंदर गोरमी, शे दोषे तुं के रे॥ सुकुलीणीने रे खीजववा नणी, एवमो शो हठ ममेरे ॥नः॥॥ ए कगेर नंमार धने 81 नस्या, तेहने कहो शू कीजे रे ॥तेह थकी अमे विविधे वीन, पिण तूं तिल नवि नीजे रे ४ ॥न ॥ ए॥ तुम विरहे एक कण ते मुज प्रते, वरस समाणी श्राशे रे॥ तो कहे कुमर 45 Jan Education Leational For Personal and Private Use Only Linelibrary.org Page #245 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ESEA-2 R मुजने तुज विना, जनम सयल किम जाशे रे ॥न०॥१०॥ ताहरे ताते जे दीका ग्रही, ते तुजने गृहे थापी रे ॥ तुं केहने सोपी दीक्षा ग्रहे, ते कहे मुज मति आपी रे ॥०॥ । ११ ।। माता गेमी रे संयम आदरो, निज सुख साधन हेते रे ॥ पिण माता तीरथ मोटो कह्यो, जिन शिवमत संकेते रे ॥ ज० ॥१॥ यतः ॥ अनुष्टुब्वृत्तम्. ॥ प्रस्तरः प्रतिमां मूढ, वृथा धर्मार्थमर्चति ॥ धर्मेणकार्य यदिचेत् , त्रीसंध्यं जनन्यो नमः ॥२॥ नावार्थ:-हे म. खं ! तुं धर्मने माटे पाषाणनी प्रतिमाने फोगट पूजे ठे! जो तहारे धर्मवमे कार्य होय, ताजा त्रण संध्याए (सवारे, बपोरे अने सांजे) पोतानी माताने नमस्कार कर. ॥॥ बाल पणो जो रे तुजने सानरे, ज्ञानयकी एणी वेला रे ॥ तो मुजने तूं गेमण वारता, न करे । मुखथी स्हेला रे ॥ ॥१३॥ तुज विरहे घर पिंजर पंखीयां, प्राण प्रादूणा श्राशे रे॥ ए धन प्रमुख सवे स्वामी विना, राजन्नुवनमां जाशे रे॥न०॥१४॥ गोद बिगई रे तु-15 जने वीनवु, जननी मूकी म जायो रे ॥ वीशमी ढाल रे जिन कहे नेहश्री, कहो शं न क ४ हे मायो रे ॥१०॥१५॥ ॥दोहा, ॥ शालि कहे रे मातजी, साच कही सवि वात ॥ मरण समय आवे । अके, कुण करशे सुखशात ॥१॥ वनमाहे जिम मृगप्रते, तीये सिंह नलाल ॥ तिम जम # CTER-CHH Jain Education rational For Personal and Private Use Only nelibrary.org Page #246 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ब । 4 धन्ना आवे जन प्रते, ले चाले ततकाल ॥२॥ जरा आवशे वेगथी, तनु नपजशे रोग॥ पंचेंदिन १२२ य बल हारशे, तव नही धर्म संयोग ॥३॥ यतः॥ शार्दूलविक्रिमीतवृत्तम्. ॥ यावत् स्व- 21 19 स्थ मिदं शरीरमरुजं यावऊरा दूरतो, यावचेश्यि शक्तिरप्रतिहता यावञ्चिरोवायुषः॥यात्म श्रेयसि तावदेवहिजनैः कर्त्तव्यधर्मोद्यमः, संदिप्ते नुवने हि कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः ॥ १॥नावार्थः-ज्यां सूधी, आ शरीर स्वस्थ अने रोग विनानु , वृक्षवस्या वेगली, इंदि योनी शक्ति कायम अने आयुष्य लांबुने; त्यांसूधी माणसोए पोताना आत्म कल्याण ने अर्थे धर्मोद्यम करवो जोइए; परंतु घर लाग्या पली कूवो खोदवानो नद्यम करवो, ए| * केवो? नकामो! ॥१॥ ते नणी अनुमति द्यो दवे, जिम संन्ना आप ॥ वीर वचन दिल । & में धरी, अजुवालूं मा बाप ॥ ४ ॥ एहवे वत्रीशे मिली, कामिनी करे विचार ।। कंते हठ मांड्यो अ, लेवा संयम नार ॥५॥ सासूजी सुपरें कह्यो, घरवट वात विचार ॥पिण नवि माने वचन तस, आपमती जरतार ॥६॥ नीति रीतथी नांखीयो, स्वामीशू धरी स्नेह ॥ कंत विना शां कामनां, ए धन नूषण गेह ॥ ७॥ & ॥ ढाल १ मी॥ (जिनजी चंझनू अवधारो के नाथ निहालजो रे लो.-ए देशी.) साहिबा तव बत्रोशे नार मिली कहे नाहने रे लो, सा० अति आकूलथी ताम के पा-१ Jain Education National For Personal and Private Use Only nelibrary.org Page #247 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लव साहिने रे लो ॥ सा० किम जावो वो बौमि के मोहन माहरा रे लो, सा० श्रमे किम | बोडुं एम के पालव ताहरो रे लो || माहरा वालमा रे लो ॥ १ ॥ ए आंकी ॥ सा० तुम शुं अमचो नेह के पूरव प्रीतथी रे लो, सा० लाग्यो अविहरू नेह के जिम गेह जींतश्री रे लो ॥ सा० धोयो ते न धोवाय के प्रति घणा नीरश्री रे लो, सा० प्रीत बनी एक रंक के जिम जल खीरथी रे लो || मा० ॥ २ ॥ सा० शुं अम बोमा काज के परणी प्रेमश्री रे लो, सा० के मे श्रावी अत्र के अलवे एमथी रे लो ॥ सा० श्रमचा पिस माबाप के बे घरमा सुखी रे लो, सा० श्रमने सौंप्यां जेह के शुं करवा दुःखी रे लो || मा० ॥ ३ ॥ सा० तुम अम मस्तक मोम के श्रमे तुम वाणही रे लो, (सा० तुमची थाणा जेद के कदि लो पी नही रे लो) सा० सुपरे पालो स्नेह के निरवाही सदी रे लो ॥ सा० सापुरिसानी रीति के राखो जी रे लो, सा० अंगीकृत निरधार न मूके खीजथी रे लो ॥ मा० ॥ ४ ॥ सा० जुन इश्वर अर्धांग नमादेवी घरी रे लो, सा० कण एक मात्र विचाल न मूके ते परी रे लो ॥ सा० मस्तक में तिम गंग धरे बहु यत्नश्री रे लो, सा० अंगी कुतने काज न मूके प्र| यत्नश्री रे लो || मा० ॥ ५ ॥ यतः ॥ वसंततिलकावृत्तम् ॥ अद्यापि नोझतिहरः कलिकालकूटं. कूर्मो बिधिरणिं किल पृष्ठकेन || अँजोनिधिस्तदति दुस्सह वामवाग्निं, अंगीकृ Jain Educationa International For Personal and Private Use Only Page #248 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० १२३ तं सुकृतिनः परिपालयति ॥ १ ॥ जावार्थ:- शिव दजु सुधी कालकूट फेरने बोमी देतो न थी, काचबो (कपावतारमां ) जे बे, ते पृथ्वीने पोतानी पीछे घरी राखे बे ने समु दुस्सद एवी वमवानल अभिने सहन करे बे! माटे जला पंमित पुरुषो, अंगीकार करेलाने त्याग करता नथी. ॥ १ ॥ सा० प्राश्रित माटे सर्प कंठे भूषण कीयों रे लो, सा० कालकूट विष ष्ट ग्रही जण कियो रे सो ॥ सा० लक्ष्मीने जुन कृष्ण नरंगे जालवेरे वो, सा० मोरली मधुरे नाद सुसादे श्रालवे रे लो || मा० ॥ ६ ॥ सा० कहो वियुजी तुमे पुष्ट या बोशा जली रे लो, सा० श्रमचा मनमें होंश हती वल्लन घणी रे लो ॥ सा० कोई क दाखो दोष सुघोष करी मुखे रे लो, सा० के कोइ देइ आधार पढे जाज्यो सुखे रे लो ॥ मा० ॥ ७ ॥ सा० दैवप्रयोगे एम जो मति तुमची फरी रे लो, सा० नवि दीधी वली तेम ज केहने दीकर रे लो ॥ सा० पुत्रतणी तो दौश पूरी किहांथी पमे रे जो, सा० दैव संगाये जोर किसी परे निवमे रे लो || मा० ॥ ८ ॥ सा० ते जणी वाल वे चार हुवे श्रमचे यदा रे लो, साप ते आधार उदार होशे अमने तदा रे लो || सा० पवे सुखे लेजो दीख कहुँ बुं आजथी रे लो, सा० यदवा तदवा बोल न बोलूं लाजश्री रे लो || मा० ॥ ए ॥ सा० वय श्रमची लघु देखि दया नथी श्रावती रे लो, सा० जे जिनधरममें सार कही बेते वती रे For Personal and Private Use Only Jain Educationa International उ०४ १२३ w.jainelibrary.org. Page #249 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लो ॥ सा० बलि तजवो अभिमान सिद्धांते एवकी रे लो, सा० ते तुमे राख्यो चित्त के नृप श्राव्या थकी रे लो || मा० ॥ १० ॥ सा० विनयमल जिनधर्म मे पियु सांगल्यो रे लो, सा० माताने दिलगीर करंतां ते गल्यो रे लो ॥ सा० जोवो हृदय विमास ए साची वातमी रे लो, सा० रमलिने कुरा करे देत कंता वि इम नमी रे लो || मा० ॥ ११ ॥ सा पंचनी सारखे हाथ ह्यो ते निरवहो रे लो, सा० जाशुं जाशुं एम के मुखश्री शूं कहो रे लो ॥ सा० शुं तुम लाग्यं भूत के व्यंतर श्राश्रम्यो रे लो, सा० के शुं जमकी सान के कथन न को गम्यो रे लो || मा० ॥ १२ ॥ सा० इम बत्रीशे नारि विविध वचने करी रे लो, सा० समजावे निज नाह के सुपरे सुंदरी रे लो ॥ सा० नवि नेदालो नाह के नेह न राखीयो रे लो, सा० पाठो पिस तस नंतर एक न नांखीयो रे लो ॥ मा० ॥ १३ ॥ सा० तव थाकी ते नार गई सासू कने रे लो, सा० पाय नमीने वात कहे सविशुन मने रे लो ॥ सा० नित्य एकेकी त्याग करतो कामिन रे लो, सा० आज तो सघली तेम तजे कां जामिनी रे लो || मा० ॥ १४ ॥ सा० जे वली कोय उपाय होवे ते दाजवो रे लो, सा० न लले गाने गणेश हवे शो जाखवो रे लो ॥ सा०ए एकवीशमी ढाल चोथा नल्हासनी रे | लो, सा० कही जिनविजये एह के वचन विलासनी रे लो || मा० ॥ १५ ॥ Jain Educatina temnational For Personal and Private Use Only w.jainelibrary.org Page #250 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना ॥दोहा.॥ माताये सुत स्नेहथी, विविध कस्या विलाप ॥ तिम स्त्री पण सघली 10 १२४ ४ मली, दाख्या कला कलाप ॥ १ ॥ शालिन्नइ नवि नेदियो, मन वचश्री महिराण ॥ शील सन्नाहने शं करे, मनमथ नृपना बाण ॥॥ तव माता कहे ताहरे, शो मन आलोच ॥ शालि कहे संयम नणी, हुं करूं सयल संकोच ॥३॥ माता चिंते मुज थकी, अनुमति | किम देवाय ॥ए पिण घरमा नवि रहे, अहो बुंदरी न्याय ॥४॥ एहवे गौनश् देव तव, कदे नज्ञने आम ॥ अनुमति द्यो दीक्षा तणी, शालिनणी सुखकाम ॥५॥ तव नज्ञ मन | 8 दृढ कररी, कहे वह तुम सुख जेम ॥ तिम करो अति अविलंबधी, सदा रहो तुज खेम ॥ ६॥नज्ञ लेई नेटणो, पहोती श्रेणिक पास ॥ करजोमी कोमल स्वरे, एम करे अरदास H॥७॥ शालिकुमर संयम आहे, मी सयल संसार ॥ ते नणी त्रादिक सवे, आपोजी इशिवार ॥ ॥ सुणि श्रेणिक विस्मित थयो, कहे नज्ञने वाण ॥ नव दीक्षानो अधिक, अमे करशुं श्री गण ॥ए ॥ रजोहरण पमघो तिहां, देई लक दीनार । कुतियावणयी। आणीया, नाये तिणिवार ॥ १०॥ ॥ ढाल २२ मी.॥ (देशी पूंबखानी.) श्रेणिक सवि परिवारशुं रे, आवे शालि आगार ॥ सनेहा साजना ॥ नक्षी आणंद Jan Education national For Personal and Private Use Only anelibrary.org Page #251 -------------------------------------------------------------------------- ________________ SAHASRAESS शं रे, बेसारे तेणिवार ॥ सनेही साजना ॥१॥ए आंकणी ॥ शा माटे संयम ग्रहो रे, 2 आ यावन वय मांह ॥ स०॥नोगविये लक्ष्मी नली रे, रहो मुज बांदनी गंद ॥स०॥॥ शालि कहे तव रायने रे, तुमे कह्यो ते सवि साच ॥स०॥ जन्म मरण नयथी सदा रे, राखी सको कहो वाच ॥ स० ॥३॥ श्रेणिक कहे एहश्री सवे रे, नय पामे सवि जीव ।। है स ॥ अरिहंत विण नवि एहनो रे, नय वारण ते सदैव ॥ स०॥॥ शालि कहे ते नयन। णी रे, टालवा लि चारित्र ॥ स ॥ तव श्रेणिक शालिनइने रे, नमण करावे पवित्र ॥ स०॥५॥ पूजा श्री जिनराजनी रे, विरचे सत्तर प्रकार ॥स० ॥ अष्टायिक नबव करे रे, खरचे दाम अपार ॥स॥३॥अनुकंपादिक अतिघणारे, देवरावे तिशिवार ॥स०॥का श्यपने तेमे तदा रे, ये तस लक्ष दीनार ॥ स०॥७॥ चार अंगूल वरजी सवे रे, समरावे 8 शिर केश ॥ स०॥ तव नज्ञ रोती थकी रे, पालव ग्रहे सुविशेष ॥स०॥॥धोई सुवासित नीरथी रे, धूपे धूपे तास । स०॥ तिथि परवे ए देखशुं रे, पुत्रना केश प्रकास॥सणाए॥ रत्नकरम थापिने रे, राख्या यतने तेह ॥ स०॥ नव दीवानो तिहां रे, श्रेणिक करे सस नेह ॥ स०॥१॥ पुनरपि स्नान कराविने रे, वस्त्रान्तरण विशेष ॥सण। पहिरावे प्रेमे करी Jain Educatio I national For Personal and Private Use Only Onlinelibrary.org Page #252 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० १२५ • पुप्फदाम सुविशेष ॥ ११ ॥ शालिकुमरने सिंहासने रे, शिबिकामांदि बेसार ॥ ० | बत्रीशे नारी तिहां रे, बेटी करी शिसगार ॥ स ० ॥ १२ ॥ सहस पुरुष वहे शिबिका रे, शो जित शुचि करि गात्र ॥ स० || आगल दय गय रथ जला रे, तिम वली नावे पात्र ॥ सप ॥ १३ ॥ बंदीजन जय जय करे रे, बोले बिरुद सुचित ||स०॥ वाजिंत्र वाजे प्रति घणां रे, | सोहव गावे गीत ॥ स० ॥ १४॥ दान देवे याचक प्रते रे, जे मागे ते तास ॥ स० ॥ एहवे गौ देवता रे, बकरे नव्हास ॥ स० ॥ १५ ॥ राजगृही रलियामणी रे, शिणगारी सवि | तेह || स० ॥ श्राकाशे देवडुंडुनी रे, वाजे ध्वनीथी अवेह || स० ॥ १६ ॥ बत्र घरे शिर क परेरे, मेघामंबर देव ॥ स० ॥ चामर अति सोहामलां रे, वींजे विधिश्री देव || स०॥ १७ ॥ श्रेणिक सेचन गज चढी रे, चाले परिकरजुत्त ॥ स० ॥ अवर दिशे गौनइजी रे, देव स्व रूप प्रयुक्तं ||स० || १८ || मणिमय शिबिका में तिहां रे, पावल जज्ञ मात ॥ ॥ मेघतली परे वरसती रे, वसुकी अधिक विख्यात ॥ स० ॥ १९ ॥ इत्यादिक प्रबरे रे, चाल्या शालिकुमार ॥ स० ॥ धन्नोज्ञाह पिलरुदिश्री रे, प्रावी मिल्या तिथिवार ॥ स० ॥ २० ॥ दूधमें जिम मिसरी मिल्ये रे, होवे अधिक सतेज ॥ स० ॥ तिम शालिनने तिले समे रे, धन्नाथ वध्यो हेज ॥ स० ॥ २१ ॥ समवसरण आव्या वही रे, महोटो करीय मंगाल || स Jain Education Externational For Personal and Private Use Only नु०४ १२५ inelibrary.org Page #253 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ त्रादिक देखी करी रे, कतरिया तिणे गण ॥ स०॥ २२॥ पंचानिगम ते साधवी रे, 18 वंदे सवि नर नार ॥ स०॥ रोमांचित हरषित तदा रे, धन्नो शालिकुमार ॥ स०॥ २३ ॥ बेग प्रजुने वांदिने रे, लेवा संयम नार ॥ स०॥ ढाल बावीशमी जिन कहे रे, चोथे | * नल्दासे नदार ॥ स० ॥२४॥ ॥दोहा. ॥ तव श्री वीर जिनेसरू, देशना ये सुप्रकार ॥ श्रेणिक प्रमुख सकल तिहां, सुणे विनयथी सार ॥१॥ शालिन्नइ धन्नो तदा, मागे संयम शीख ॥ अहासुहं श्म ६ नच्चरे, वीर वचन रस ईख ॥२॥कुण ईशाने आविने, ऊतारे आनर्ण ॥ ते सघलांना ग्रहे, नचितपणाथी तूर्ण ॥ ३ ॥ पंचमुष्टि करे लोच जव, शालिकुमर थ धीर ॥ सजल • नयनथी तव कहे, नज्ञ वयण गंजीर ॥ ४॥ यतना करजे जात तुं, आलस तजजे दूर ॥ पूर्ण पराक्रमथी घरे, संयम मार्ग सनूर ॥ ५ ॥ चारित्र चिंतामणितणां, करजे कोमि यत न ॥ फिरि फिरिने नथी पामवो, एह अमुल्य रतन ॥६॥ जो बंड्या उन्नोगने, विष स म जाणी अत्र ॥ तो रखे लालच राखतो, सुंदर लही अन्यत्र ॥७॥ तिम धनाने पिण में कहे, शीख वचन सुविलास ॥ पुत्री सुत्नश प्रमुखने, नज्ञ द्ये साबाश ॥ ॥ प्रतिवृता तुमे पदमिणी, धन धन तुम अवतार ॥ पति संयोग संयम ग्रह्यो, पालजो निरतीचार ॥ *-MSASARASWALIRS -CA Jain Education a tional For Personal and Private Use Only Kaainelibrary.org Page #254 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० १२६ ॥ वेष घरी विधिशुं सवे, धावे वीर नजीक ॥ वांदी कहे दीक्षा दियो, श्रहो समतारस | नीक ॥ १ ॥ वीर वास ग्वीसरे, दीक्षा शिक्षा रूप || आपीने दवे नृपदिसे, देशना प्रतिहे अनूप ॥ ११ ॥ ॥ ढाल १३ मी. ॥ ( तुंगी या गिरि शिखर सोदे. - ए देशी. ) वीर मधुरी वाली जंपे, सुणे परषद बार रे ॥ हृदय विकसित करी निसुये, धन्न शालिगार रे || वीर० ॥ १ ॥ ए आंकणी ॥ चारित्र नपर सुलो उपनय, राजगृहिमें रंग रे । धन्नोसार्थप सुगुण निवसे, जश स्त्री तस चंग रे ॥ वी० ॥ २ ॥ पूत्र चार सुरूप रूमा, धनपालने धनदेव रे ॥ घनगोपने वली धनरक्षित, करे तातनी सेव रे ॥ वी० ॥ ३ ॥ परणा विया ते पुत्रने तव, शेठे घरी मन राग रे || एक दिवसे रात्रि समये, चिंतवे महाभाग रे ॥ वी० ॥ ४ ॥ सकल नगर में मुजने पूढे, कार्य कामे लोक रे || नातिमें पिए सहु माने, वच | न न करे फोक रे || वी० ॥ ५ ॥ दवे मुजने कालधरमे, अथवा कोइक काज रे ॥ ऊपने मुज घरतो सवि, राखशे कुण राज्य रे ॥ वी० ॥ ६ ॥ योग्य जाणी जार घरनो, सोंपवो निरधार रे || विचारया विरा जार सोंपे, करी नांखे ख्वार रे || वी० ॥ ७ ॥ यतः ॥ मालि नीवृत्तम् ॥ यदि शुभमशुनंवा कूर्वतां कार्यजातं परिणतिरवधार्या यत्नतः पंमितेन ॥ - Jain Education national For Personal and Private Use Only उ० ४ १२६ jainelibrary.org Page #255 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नया अवघr SAHISHASHRASEHORE ति रन्नसकृतानां कर्मणामाविपत्ते,नवति हृदयदाही शल्यतुल्यो विपाकः ॥१॥ नावार्थः काम करनारा माणसने काम करतां, जो कदि सारं अश्रवा नरसुं जे थाय, तो तेनी परिण जातीपंक्ति परुषे यवधी अवधारवी जोडा.कारण के नतावलथी करेला कामोनो विपाकात ज्यां सूधी ते संबंधी विपत्ति रहे थे, त्यां सूधी हृदयने बाले ले अने एक शब्य सरखो साले । M.॥१॥प्रनाते सविसयण पोषी, तेमि वहअर चार रे॥पांच पांच कण शालि केरा. दिये करी मनोहार रे ॥ वी०॥७॥मागीए जव अमे तुमथी, देजो ए कण पंच रे॥ चाक र वहुने शीख सुपरे, दिये जोई संच रे ॥ वी०॥ए॥ चारे वहु कण लेश चाली, पहोती निज निज गम रे॥वमी चिंते एह कणथी, सीमशे शो काम रे ॥वी०॥१०॥ मागशे तव अन्य देशू, नांखी ये श्म जाणी रे ॥ बीजीए कण नक कीधा, स्वसुर हस्त प्रमा रे॥ वी० ॥११॥त्रीजी चिंते तातजीए, दीधा कारण कोय रे ॥ यतन करीने गुप्त । स्थानक, राख्या युगते सोय रे ॥वी॥१२॥ लघु वधु मनमें विमासे, वधारूं एह बीज शरे॥पीयरे जर कृष्यकरने, दोये करी घणी रीऊ रे॥ वी॥ १३ ॥ ए पांचे कण सुपरे ४ करीने, वावज्यो शुन्न गम रे ॥ कण हुवे तव सर्व लेई, राखज्यो कोश धाम रे ॥ वी०॥ १ खेती करनारने. Jain Education national For Personal and Private Use Only Melainelibrary.org Page #256 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० १२७ १४ ॥ जिम को मितिले कीधो, बोजनी थइ वृद्धि रे ॥ वली बीजे वरस आवे, खेत्र | खेमी समृद्धिरे ॥ वी० ॥ १५ ॥ बीज सघलो तिहां वाव्यो, थर बहुली शालि रे ॥ वरस | पांचल एम करतां, का यया असराल रे | वी० ॥ १६ ॥ जरी कोठा करी मुझ, लघु व धु मन रंग रे || पांच वरषे फिरी तेड्यो, कुटुंब सवि नवरंग रे || वी० ॥ १७ ॥ वमी वहु बोलावी वेगे, मागे का ते पंच रे ॥ तव तुरतमें प्राणी दीधा, करी नहीं खलखंच रे ॥ वी० ॥ १८ ॥ सुसरो कहे ए करा न माहरा, करो सपथ सुसंग रे ॥ तब कहे में नांखि दीघा, एह अवर प्रमंग रे ॥ वी० ॥ १५ ॥ वयण निसुली स्वसुर कोप्यो, कहे राखी रीश रे ॥ are area कारज, करे तुं निश दीश रे | वी० ॥ २० ॥ नझिता तस नाम देई, राखी गृहने द्वाररे ॥ हवे बीजी वधु बोलावी, मागे करा तिशिवार रे ॥ वी ॥ २१ ॥ ते क दे में नक्ष कीधा, सुणी कोप प्रकास रे । क्षिका तस नाम थापी, करी रांधण तास रे ॥ वी० ॥ २२ ॥ त्रीजी प्रते तेमी तिवारे, श्रावी प्रणमे पाय रे ॥ तेह का यतने करीने, दीप्रति चाह रे || वी० ॥ २३ ॥ स्वसुर पूढे कहो बहुजी, कण श्रवर के तेह रे ॥ ताम कहे वधु तेह निश्चय, इहां नही संदेह रे || वी० ॥ २४ ॥ रक्षिका तस नाम थापी, सोंया सयल जंकार रे ॥ लघु वहुपें लामग्री तव, मागे करा सुप्रकार रे || वी० ॥ २५ ॥ ह Jain Educatione national For Personal and Private Use Only न० ४ १२७ ainelibrary.org Page #257 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सी कहे तव तेह बाला, शकट द्यो दश वीश रे ॥ जिम तुमारा कण ग्रहीने, लावीए सुंज 2 गीश रे ॥ वी० ॥ २६ ॥ सुगी ससरो चित्त हरख्यो, देख। बुद्धि विलास रे ॥ रोहिणाचल 5 ४ परें रूमी, नाम रोहिणी खास रे ॥ वी०॥॥ घर नार संघलो दियो तेहने, योग्य जा | tणी ताम रे ॥ पंचमें पिण वधी शोना, यो इच्छित काम रे ॥ वी० ॥॥श्म जेह दी है २ का ले नझित, करे ते मति मूढ रे ॥ दीलणा इह लोक पावे, नरके जावे गूढ रे ॥ वी० ॥ ए॥लेश संयम नदरवृत्ते, व्रततणो करे नद रे ॥ नक्षिकापरे पेट नरतां, कह्यो नही ते ददरे ॥ वी० ॥ ३०॥ व्रत धरीने नंग न करे, पाले निरतिचार रे ॥ रक्षिका परे मान || पामे, परनवे शिव सार रे ॥ वी ॥३१॥ रोहिणी परे जे वधारे, व्रततणा गुण रंगरे ॥ * उपदेशथी पिण बूझवे वली, तरे तेह सुचंग रे॥ वी०॥ ३२॥शेठ जिनवर शिष्य ते वधु, पंच कण व्रत पंच रे ॥ ते वधारे तेह पामे, विपुल शिव सुख संच रे । वी० ॥ ३३ ॥ ते नणी व्रत लेश पालो, रोहिणी सम धीर रे ॥ एह उपनय कह्यो तुमने, श्म कहे श्री वीर हारे॥वी०॥ ३४ ॥ सुणी परषद सवे हरखी, शालि धन्नो तेम रे ॥त्रेवीशमी ढाल जिन 8 || कहे ए, चोथे नब्दासे एम रे ॥ वी० ॥ ३५ ॥ ॥ दोहा. ॥ नज्ञ कहे करजोझिने, सुणो एक अरदास ॥ ए सुत पापणनी परे, Jain Education hational For Personal and Private Use Only L ainelibrary.org Page #258 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२८ धन्ना सोपुं बुं तुम पास || १ || दुःख दीगे नथी सुपनमें, सुखोपवित बे एद ॥ तप जप करतो एहने, जालवज्यो घरि नेह ॥ २ ॥ तुमने ए बालकतणी, घणी जलामण प्राज ॥ शी दी - जे सुपरें करी देतां लागे लाज ॥ ३ ॥ पुत्र जमाई पुत्रिका, प्रति वल्लन जग मांह ॥ ते त्रिये तुमने श्रमे, वदोराव्या सोबाद || ४ || इम कदी वांदी वीरने, पुत्रादिकने तेम ॥ वां दी वहु तेमी घरे, जश श्रावी एम ॥ ५ ॥ सुत विरहे झूरे घणुं, तिम पति विरहे नारि ॥ वीर धीर पण तिदां थकी, करे अन्यत्र विहार || ६ || शालिन धन्नो हवे, नणे ते अंग इ ग्यार ॥ तप पुस्तप करे तिम वली, चारित्र निरतीचार ॥ ७ ॥ बारे वरषे विचरतां, तारण | नवजल तीर ॥ राजगृही में रंगशुं, समवसस्या श्री वीर ॥ ८ ॥ शालिन धन्नातली, आ. व्यानी सुख। वात ॥ देवे लाख वधामणी, ताम ते जमात ॥ ए ॥ ॥ ढाल २४ मी. ॥ ( मुखने मरकले. - ए देशी. ) तव माजणे जावे जी, मुखथी इम जांखे ॥ वहु सघलीने समजावे जी, सुपरें करी दाखे ॥ फल्यां जाग्य अनूप तुमारां जी, मुं० ॥ धाव्या पुत्र जमाई श्रमारा जी ॥ सु ॥ १ ॥ वली श्राव्यां सुना बाईजी, मु० ॥ एहनी पूरण पुण्य कमाई जी ॥ सु० ॥ आज प्रांगणे अमीरस वूट्या जी, मु० ॥ इष्टदेव आावीने तूठ्या जी ॥ सु० ॥ २ ॥ जेहनी Jain Education national For Personal and Private Use Only OS १२८ ainelibrary.org Page #259 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जोतां घणी वाट जी, मु॥ अह निशि करता ऊच्चाट जी ॥सु०॥तेद आव्या पुण्य पसा ये जी, मु०॥ नाम लेतां आएणंद पाये जी॥सु०॥३॥ वंदन सामग्री कीजे जी, मु०॥ धनके रो लादो लीजे जी॥सु॥ तुमे सोल सजो शिणगार जी, मु॥पहिरो वली वेश सफार जी॥ सु॥४॥ घणे दिवसे नूषण काढो जी, मु॥ आज हृदय थयो मुज ताढो जी॥ ॥ सामग्री वंदणकेरी जी, मु॥ करे सुतने स्नेहे नलेरी जी ॥सु०॥५॥ एटले धन्नो शालि ससाध जी.म०॥ वंदे वीरने निरबाध जी॥स०॥मागे शीख गौचरीने काज जी. मु॥ मासखमणनो पारणो आज जी॥सु॥६॥ कहे वीर सुणो वन वात जी, मु०॥४ मात हाणे आदार सुख्यात जी ॥ सु०॥ सुणि शालि मुनीश्वर हरखी जी, मु॥धना साथे इरजा निरखी जी॥स०॥॥तेह गौचरिये तिहां जावे जी. मु नज माताने घl रे आवे जी॥सु०॥ स्त्री बेठी तनु शिणगारे जी, मु०॥ पिण पति नवि नलख्यो त्यारे जी। 15/॥सुणाना आदर तव किणही न दीधो जी, मु०॥ वलि आहार न मिल्यो तिहां सीधोजी ॥सु०॥धन्नो शालिन विचारे जी, मु०॥ वीर वचन हृदय संन्नारे जी॥सुणाए॥ तव ति है हांथी पाग वलिया जी, मु०॥ पिण किणही तेह न कलिया जी ॥ सु॥ मारगमें मिली है। महियारी जी, मु०॥ विनयानत थ सुपियारी जी ॥ सु०॥१०॥ देखि शालिने नलसित BASSISTAN Jain Educationa l atonal For Personal and Private Use Only Chelibrary.org Page #260 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्नाथाये जी, मु०॥ तस हृदयमें हरख न माये जी॥सु०॥ विकसीत वदने श्म बोले जी, न०॥ १२ए।मु०॥ वोहरो दहीं एम अतोले जी ॥ सु०॥ ११॥ बे साधुना पम्घा पूस्या जी, मु०॥न 1 वि राख्या कां अधूरा जी ॥ सु०॥ वदोरीने स्थानक आवे जी, मु०॥ वीर वांदी अधिके ४ नावे जी ॥ सु॥१२॥ तिहां गमनागमन आलोवे जी, मु०॥ करजोमा वीरने पूरे जी ॥ सु० ॥ तुमे मात कही हती स्वामी जी, मु०॥ दधि दाता ए अन्य पामी जी ॥ सु॥ १३ ॥ तव वीर कहे तुम माता जी, मु०॥ पूरव नवनी सुविख्याता जी ॥ सु०॥ सवि पूरी 18 रव नव परकाशो जी, मु०॥शालि मुनिवरे जेह अन्याशो जी। सु०॥१४॥ सुणि शा लि तहति विचारे जी, मु०॥ निज पूरव नव चित्त धारे जी ॥ सु॥ जुन पूरव नवे हुं ६ * गोवाल जी, मु०॥णे नवे न गयो नूपाल जी ॥ सु०॥ १५ ॥ वस्त्र खंगन मिलतो सा | जो जी, मु०॥ (गत नवे) मुज अन्न न मिलतो ताजो जी॥ सु०॥श्रा जव रत्नकंबल लो। धां जी, मु०॥ स्त्रीये पग लूही नांखी दीघां जी ॥ सु०॥ १६ ॥ पायसान ते उल्लहो पायो । 8 जी, मु॥ पूरव नवे परिश्रमे आयो जी॥ सु०॥ इह नवे दिव्य नोजन कीयां जी, मु०७ मनवंडित दिन सवि सीधा जी ॥ सु॥ १७ ॥ गत नवे एक कवमी न पाई जी, मु०॥ ह नवे वलि लक्ष्मी आई जी॥सु०॥ एक साधुना दान प्रनावे जी, मु॥ए पाम्यो सुख व १५॥ Jain Education national For Personal and Private Use Only nelibrary.org Page #261 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मदावे जी ॥ सु०॥१८॥ धन धन जिनधर्म आधार जी, मु०॥ जेहथी सुख लहीए सार जी || सु० ॥ चोवीशमी चोथे नल्हासे जी, मु० ॥ ढाल सुंदर जिन इम जासे जी || सु०॥१॥ ॥ दोहा ॥ वीर नमिने विनययी, ते बहुं मुनि शिर ताज ॥ मासखमणनो पारगो, करे तनु नाटक काज ॥ १ ॥ शालिन धन्नो मिली, करे वैराग्य विचार | काया ब ल काचां ग्रयां, करिये असा सार ॥ २ ॥ नाडु देता जे जली, तेह तो काज न थाय ॥ | ते माटे वो शिरावीए, साधीये शिवसुख थाय ॥ ३ ॥ प्रत्यूषे श्री वीरने, प्रणमी मागे शीख ॥ स तुम आणा की, प्रादरिये जिम ईष ॥ ४ ॥ वीर कहे जिम सुख होवे, तिम आराधो हेव || विलंब न करवो एहमें, हे सुरप्रिय स्वयमेव ॥ ५ ॥ ॥ ढाल २५ मी. ॥ ( निंदा न कीजे कोइनी पारकी रे. - ए देशी.) प्रज्ञालही श्री वीर जिणंदनी रे, हरख्या मनमें साधुजी ताम रे ॥ त्रिएय प्रद| हिला देयने रे, वांदे विधिश्री जिन अभिराम रे ॥ श्रज्ञा ॥ १ ॥ ए आंकली ॥ पुनरपि पंच महाव्रत ऊचरे रे, थालोइ सयल प्रतिचार रे || गौतमादिक अणगारने रे, विधिशुं खमावे वारंवार रे ॥ घ्रा० ॥ २ ॥ चंदनबाला प्रमुख महासती रे, तेहशुं पिए खामे टाली १ जाऊं. अर्थात् शरीरने जाऊं आपका माटे आहार करे. २ देवानुनिय For Personal and Private Use Only Jain Educationmational Mainelibrary.org Page #262 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पत्रा शल्य रे ॥ गौतमस्वामाने साथे लेयने रे, चढ्या वैनारे यश निर्मब्य रे॥०॥३॥शान ह १३०/म शिलाने पमिलेही तिहारे, कीधा संथारा अगसरा काज रे ॥ चार आहारने पचख्या 5 9 प्रमशुर, चारे शरणां करे शषिराज रे ॥ आप लाख चोराशी जीवायोनिने रे, खमेने है खमावे शुन्न नाव रे ॥ शत्रु मित्र सवे सरिखा गणे रे, त्रिकरण राखीने इक नाव रे ॥ रा०॥५॥ पादोपगमन अणसण पादस्यो रे, जावळीवलगें करि जोर रे ॥काया वोशरावी ? काच। जाणिने रे, इंस्नेि वश कीधां देखी चोर रे ॥आणा॥ मदने मदिरा सम जाणी गे किया रे, राग शेषने राख्या ते कर। दर रे ॥नयनो लय टालीने निर्नय थया रे, खेले ते ४ | समता गंगने पूर रे ॥ आ०॥॥ सुमति गुपतिने चित्तमांहे धरी रे, नावे नावे नावना* है बार रे ।। आत्म स्वरूप प्रते अवगाहता रे, मन धरे ध्यान तिहां अविकार रे ॥०॥८॥ एहवे नये सामग्री सजी रे, वहु बत्रीशेने लेई साथ रे॥श्रेणिक नृपने साये तेलीया रे, २ नेटवा नावे श्री जगनाथ रे ॥ आ०॥ए॥ वाजिंत्र वाजे विविध प्रकारनां रे, गाजते घन ४ सम अंबर नाद रे ॥ अधिक चवथी आवी वांदवा रे, मनमांही धरती अति आल्हाद रे ।। 18 आ०॥१०॥ आवीने वांदे जिनवर वीरने रे, विधिशं चित्तथी धरिय नव्हास रे ॥ साधु है। सर्वेने निरखे खातिशुरे, शालिन्नइ तिहां नवि देखे पास रे ॥०॥११॥ धन्न मुनिवरने १३० Jain Education national For Personal and Private Use Only nelibrary.org Page #263 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पि दीठा नही रे, उपन्यो मनमें जाने विश्लेष रे || शुं किहां ध्यानादिकने लेयने रे, बेबाहुशे ते शुभ स्थल देख रे ॥ ० ॥ १२ ॥ पूढे करजोमी जिनपति वीरने रे, शालिन‍ धन्नो बे किस गम रे ॥ वीर वृत्तांत सवि विवरी कह्यो रे, जिहां लगें पहोत्या असल काम रे ॥ ० ॥ १३ ॥ ततल नझ सुणि विलखी थई रे, रुदन करे तिहां प्रसराल रे ॥ दुःखथी दाजी करणीए पमी रे, तिम वली तिहां बत्रीशे बाल रे ॥ ० ॥ १४ ॥ ददमांही दायां पंख फरुफमे रे, तिम तरफ मे विरहे नार रे || चोथे नब्दासे ढाल पचवीशमी रे, कहे जिन स्नेह बंधन ते प्रसार रे ॥ श्रा ॥ १५ ॥ ॥ दोहा ॥ ना बहुअर तेमिने, चाली चतुरां वेग ॥ रुदन करती रानमें, पुत्र विरह नग || १ || पगमें खूचे कांकरा, कांटा वेस अपार ॥ कष्ट घणो खमती थकी, पहो - ती ते वैर ॥ २ ॥ गिरि उपर चढी लगथमी, देखी पोढ्या दोय ॥ घ्रतक देश धरणी ढली, मूगत इ सोय ॥ ३ ॥ पवने पामी चेतना, देखे पुत्रनुं रूप ॥ मांस रुधिर शोषीत पणे, प्रति कृश्य अस्थि सरूप ॥ ४ ॥ हाहाकार करे तिहां, पुत्र विरदथी तेह ॥ श्र शो कष्ट तें आदरयो, श्रहो पुत्र गुलगेह ॥ ५ ॥ ॥ ढाल २६ मी. ॥ ( घर आवो रे मन मोहन घोटा. - ए देशी. ) Jain Educatioaemational For Personal and Private Use Only vjainelibrary.org Page #264 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना ENC E5% जीव जीवन तु वजन बेटा, तुं आधार अतीव बेटा ॥ तुं कुलमंझण माहरे बेटा, न०५ १३१४ तुं हितकरण सदैव बेटा ॥ हसि बोलोने मन मोहन बेटा ॥१॥ ए आंकणी ॥ तुं मुज आपद वारक बेटा, गरक चित्त सु गम बे॥ तुज सम अवर न माहरे बे०, आशानो वि | सराम बे०॥ह० ॥२॥तुं कुल अंबर दिनमणी बे०, तुं सुकुलीन सुजात दे ॥ तुं कोम सचित्त कारक बे०. सणसण मातनवात बे०॥०॥३॥ मनमांही जागती बे० मलशे वार बे चार बे०॥ होश धरी पमिलानशं बे, करशुं सफल अवतार बै० ॥ ह०॥ 18॥ तुं तो आंगणे आवीयो बे०, करवा मातनी सार बे ॥ पिण में तुजने न जाणीयो बे० हुनूल। तिणिवार बे० ॥०॥५॥ ए फुःख मुजने घणो यो बे०. दाम्या ऊपर लण बे॥ तुं इणि रीते शहां रह्यो बे०, ते दुःख टालशे कूण बेणाह०॥६॥ तें तपकरी काया दही भने, फिरी गयो तुज श्राकार बे० ॥ आंगणे अाव्यो न नलख्यो बेग, नवि पहिलान्यो स3 गार वे०॥१०॥७॥ हुं पुण्यहीन अन्यागणी बे, मुजने पमो धिक्कार बे॥ कल्पद्रुम परे । आंगणे बे०, आव्यो न जाण्यो तिवार बे॥ह०॥७॥ धन धन ते तुज मावझी बे०, महि | यारी गुणगेह बे० ॥ पुत्र नवांतरे नलख्यो वे०, साचो तेह सनेह बे०॥०॥ए। पूर्वे पिण । पायसानश्री बे०, संतोष्यो हतो संत वे ॥ आ नये पिण तुम वांवित बे०, हित धर दधि १३१ SHOSHIKSER SA STAROSTI R- Jain Educati emational For Personal and Private Use Only Vijainelibrary.org Page #265 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 1-% ECE दियो तंत बे० ॥ ६ ॥१०॥ जो हुँ जाणुं तेहने बे०, तो था घरमांहि बे० ॥ बहिन करी 13 ने लेखवू बे०, सेवू तस नच्चांहि बे०॥०॥११॥ तुज विरहानल दाहथी बेप, 5:खणी डं fण काल वे०॥ वचनामृत जलथी करी बे०, गरो करिय संन्नाल बे०॥ ह ॥१श। एकण || लवार बोलाविने बे, पूरो अम मन कोम बे०॥ गोद बिगइने वीनवु बे, पाय नमुं करजोम बे०॥5॥१३॥ प्राण हुशे हवे प्राहुणा बे०, तुं अगवाले इणिवार बे० ॥ वचन बे चार जे. बोलशो बेण, ते अम थाशे आधार बे०॥ ह ॥ १५ ॥ इगिपरे विविध विलापश्री बे०, रुदन 18 कस्यो असराल बे०॥ चोरे नव्हासे बबीशमी बेग, कही जिनविजये ढाल बे०॥०॥१५॥ । ॥दोहा.॥ इणिपरे नाये घणा, कस्या विशेष विलाप ॥ निरखी निरखी शालि ने, अति पामे संताप ॥१॥तेद काया तेह चातुरी, ते तनु तेज सुवास ॥ तपश्री दाम्या देखिने, नज्ञ धनदास ॥॥नश विलविलते अके, तब बत्रीशे नारि ।। प्रीतमने देखी। करी, करे विलाप अपार ॥३॥ शिर कूटे कर मुष्टिश्री, हृदय पगमे देव ॥ हाहारव मु खश्री कहे, ए शुं की, देव ॥४॥ ॥ ढाल ७ मी. ॥ (चांदलियोने ऊग्यो रे हरिणी प्राथमी रे.-ए देशी.) नाहलिया निदेजा रे केम बोलो नही रे, अमश्री तुमे इणिवार ॥ बार वरसग्री आ AGES-EPECTA JainEducation For Personal and Private Use Only AJanelibrary.org Page #266 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० १३२ Jain Education ज तुमे मिल्या रे, किम न करो पियु सार ॥ ना ॥ १ ॥ ए आंकली ॥ श्रमे तो निगुणी बुं सुरा कंतजी रे, तुमे वो सुगुण निघान ॥ अमे तो तुमचो पालव जे ग्रह्यो रे, तेहनो | राख्यो रे मान ॥ ना० ॥ २ ॥ तुमे श्रम मस्तक मुगट शिरोमणी रे, श्रमे तुम चरणानी खे ह ॥ तुमे तो मेघ सघन रुतुना सही रे, श्रमे तो पश्चिम निशि त्रेह ॥ ना० ॥ ३ ॥ तुमे तो मानसरोवर हंस बोरे, श्रमे तो मंरुक तुल्य ॥ तुमे तो वैडूर्य चिंतामणी सारिखा रे, अमे बुं कवीने मूख्य ॥ ना० ॥ ४ ॥ तुमे गज सरिखा गुणथी गाजता रे, स्वानोपम श्रमे ए ह | सिंह परे दुर्धर तुमे साहिबा रे, अमे शृगाल सरेह ॥ ना० ॥ ५ ॥ ते जणी श्रमने म | देर करी हवे रे, निरखी नयण निहाल । श्रमे दुःखीयांने देखी दया करो रे, जीवदया प्रतिपाल ॥ ना० ॥ ६ ॥ श्रमे मूल्यां ते वेला प्रति घणुं रे, नवि जाएया तुम कंत ॥ तेह गुनह श्रम पड्यो वे प्रीतमा रे, खमज्यो तुमे मतिमंत ॥ ना० ॥ ७ ॥ माताजीने श्रमने श्रव गुणी रे, नवि बोलो इणि वार ॥ ते विरदानल दाऊया कार रे, कंतजी कां दीयो खार ॥ ना० ॥ ८ ॥ हवे श्रमनें तुम दरिशण दोहिलो रे, देखवो आजथी कंत ॥ बेहलो मेलो करवा आवियां रे, अवधारो गुणवंत ॥ ना० ॥ एए ॥ पहिला यानी होंश दती घणी रे, करवा | हाथ पवीत्र ॥ ते तो श्रमन्त्री पूरी नवि पमी रे, ए ए कर्म विचीत्र ॥ ना० ॥ १० ॥ लागे ational For Personal and Private Use Only ८० ४ १३२ nelibrary.org Page #267 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अमने वीसरशे नही रे, जीवंतां लगे जोर ॥ अंगण आव्या पिण नवि नलख्या रे, ते अम 18 कर्म कगेर ॥ ना०॥ ११॥ तुमे तो बालपणाथी प्रीतमी रे, पाली पूरण प्रेम ॥ वचन वि रोध न कीधो कोयथी रे, सहुगू चिंतव्यो खेम ॥ ना ॥१॥ हवे इण वेला बोलावो मु खे रे, एटले लाख पसाय ॥ अमचो जीवित सफल हुवे सहो रे, कहु बुं गोद बिगय ॥ना० २॥१३॥ इणि वेलाये अणबोल्या रहो रे, ते अम जीवित शल्य ॥ अंत समय अवगुणवो जे करे रे, ते तो मरणने तुल्य ॥ ना०॥१५॥ कर दोय जोमी खोला पारे रे, कामिनी तेह बत्रीश ॥ पिण नवि नेदे साधु शिरोमणी रे, शालिन मुनि सुजगीश ॥ ना०॥१५॥ • नयन नघामी पिण जोई नही रे, माता नामिनी कोय ॥ चोथे उल्हासे ढाल सत्तावीशमी रे, जिन कहे धन धन सोय ।। ना०॥ १६ ॥ ॥ दोहा. ॥ एहवे अन्नयकुमार तिम, श्री श्रेणिक नूपाल ॥ रुदन करतां देखिने, स 4 मजावे तिण ताल ॥१॥शो दुःख करवो एहनो, एणे अजुवाल्यो वंश ॥ जिनशासन शो || लावियो, ए उत्तम अवतंस ॥२॥धन धन ताहरी कूखने, प्रसव्यो पुत्र रतन्न ॥नोगी | | योगी जागतो, सकल कला संपन्न ॥३॥ वीरतणी तूं नारजा, वीर प्रसव सादात ॥धील रज धर चित्तमें चतुर, तूं अश् जगत विख्यात ॥ ४॥ पुत्र जमाई बिहुँ जणे, सास्यां आत ३४ JainEducation a tional For Personal and Private Use Only hinelibrary.org Page #268 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पन्ना० १३३. | म काज || तेही दुःख बोकि द्ये, घरी आनंद समाज ॥ ५ ॥ तव जा धन्ना प्रते, वांदे विविध प्रकार ॥ धन धन तुम अवतारने, इम कहे वारंवार ॥ ६ ॥ ररुती पमती रोवती, पाठी वली प्रवीण ' ॥ वहु बत्रीशे लेयने, श्रावी दुःखजरी दीन ॥ ७ ॥ वीर पासे व्रत याद स्वां, श्रावकनां सुविवेक ॥ वधु सहित पाले विधे, श्रातमश्री अतिरेक ॥ ८ ॥ पोखे पात्र प्र सन्न मन, सेवे श्री जिनधर्म ॥ तप जप शक्ति सम करे, आराधे शिवधर्म ॥ ५ ॥ अं अ एसए दरी, पहोती ते सुरलोग || महाविदेहे सीको, पामी केवल योग ॥ १० ॥ । ढाल २० मी. ॥ ( वर्त्तमान शासननो स्वामी - ए देशी. ) हवे ते धन्नो धर्म धुरंधर, शालिन मुनिराया जी ॥ कररी संलेषण काया गाली, धध्यान मनध्याया जी ॥ हवे० ॥ १ ॥ ए ग्रांकली ॥ एक मासनो असल पाली, दोष सवे पर जाली जी ॥ ॥ व्रत पचखाण सुपरे संभाली, उत्तम सदगति जाली जी ॥ ६० ॥२ ॥ काम क्रोध मद मन्चर बंड्यो, सयणशुं स्नेह न मंड्यो जी ॥ मन मंत्रीने पकी दंड्यो, श्री जिनविजय न खंड्यो जी ॥ ० ॥ ३ ॥ पुन्योदय अधिके करी पहोत्या, सर्वारथ सिह विमाने जी || शाजिन‍ धन्नो दोइ मुनिवर, देव थया शुभ याने जी ॥ ६० ॥ ४ ॥ तेत्रीश सागर या अनोपम, जोगवशे नली रीते जी ॥ अन्योन्ये श्रहमिंडपणे ते, रहे वे पूर Jain Education national For Personal and Private Use Only न०४ १३३ nelibrary.org Page #269 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रीते जी ॥ इ० ॥ ५ ॥ तिहांथी चवी नरजव ते लदेशे, क्षेत्र विदेह मकार जी ॥ इन्यकु ले धनवंत थईने, जोगवशे सुख सार जी || ह० || ६ || गुरु देशन सुणी संयम लेई, पालशे निरतीचार जी ॥ अंते केवलज्ञान लहीने, पहोचशे मुगति मकार जी ॥ ० ॥ ७ ॥ तीय सुनादिक आवे जे, चारित्र सु मने पाली जी || असा करि सुरलोके पहोत्यां, निज प्रातम अजुप्राली जी ॥ ६० ॥ ८ ॥ एकावतारी ते सुविचारी, लही मानव अवतार जी ॥ संयम संगे निर्मल रंगे, लदेशे शिव श्रीकार जी ॥ ६० ॥ ए ॥ देखो दानतणां फल प्राणी, धन्नाशाहे पाम्या जी ॥ संपद लह्यो सवि गमे गमे, कीधां सघलां कामो जी ॥ To || १० || १बांधव अधिको बुद्धिमें अधिको, ३व्यापारे बहु दाम जी ॥ कलाकुशल अतिशूरपणो तिम, ६ प्रदेशे घन धाम जी । द० ॥ ११ ॥ नृप पुत्री परयो निज नय श्री, बूज्य अबला हास्ये जी ॥ ए आठे अचरिज धन्नाने, कवियण सयल प्रकासे जी ॥ ह० ॥ १२ ॥ यदुक्तं चरित्रेः ॥ वंशस्थवृत्तम्. ॥ सोजातमयं विविधाश्च बुद्धयः क्रयेमृदादेरपि देमसिइयः ॥ कला सुकौशल्यमतीव शूरता, श्रियोविदेशेपि सुखैकसंगता ॥ १ ॥ - पि प्रियानर्म गिरावृताव्रति, वलिगजनत्वेपि नृपत्वसंपदः । इमानि धन्ये नितरामनुत्तरा, न्य |ष्टाव विस्यष्टतराणिविष्टपे ॥ २ ॥ नावार्थ:- १ सर्वोत्तम बांधवोनुं हित चिंतवन, २ विविध For Personal and Private Use Only Jain Educationa International Page #270 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० १३४ प्रकारनी बुद्धियो, ३ माटी खरिदवामां पण (तेजमतूरी नीकलवाथी ) सुवर्णसिद्धियों, ४ कलाने विषे कुशलप, ५ घणुंज शूरातन, ६ परदेशने विषे पण सुखे सुखे लक्ष्मी यो मे लवी, ७ स्त्रीनी मश्करी रूप वालीथी व्रत लेवां ने वणिक जन बतां पण, राजानी दो लत; ए प्राठे हम्मेशां धन्न कुमरने विषे सर्वोत्तम हतां ॥ १ ॥ २ ॥ १देवजोग नरजवे जोग विया, कनक निर्माल्य ते कीधो जी ॥ ३राजा श्रेणिकने किरियालो, लेवा आदेश दीघो जी ॥ ० ॥ १३ ॥ ४राजमान अपमान ते जाएयो, ए आश्चर्य प्रतोले जी ॥ चारे अनूत शालिकुमरने, सहु को पंमित बोलेंजी ॥ ह० ॥ १४ ॥ यदुक्तं चरित्रेः ॥ स्वर्गोपजोगी नृपतिक्रयाक, सुवर्णनिर्माल्यमभूत्स्रगादिवत् ॥ नरेंइमा नेप्यपमानचिंतनं, शालेर्महाश्चर्यमिदचतुष्टयं ॥ ३ ॥ जावार्थ:-१ स्वर्गनो उपभोग करवो, २ राजाने करियाणुं गावुं ३ फू| लनी मालादिकनी पेठे सुवराने निर्माल्य गणवुं अने ४ राजाना मानने अपमान गावं; ए चार वानां शालिनने विषे महोटां आश्चर्यकारक हतां ॥ ३ ॥ अनुत्तरं दानमनुत्तरं तपो, ह्यनुत्तरं मानमनुत्तरो यशः ॥ धन्यस्यशालेश्चगुणाअनुतराः, अनुत्तरं धैर्यमनुत्तरं पदं ॥ ४ ॥ | नावार्थ:- सर्वोत्कृष्ट दान, सर्वोत्कृष्ट तप, सर्वोत्कृष्ट मान, सर्वोत्कृष्ट यश, सर्वोत्कृष्ट धैर्य प्रने सर्वोत्कृष्ट पद एटले सर्वार्थसिद्ध विमान; ए सर्वे धन्नकुमरना अने शालिन कुमरना Jain Educationmational For Personal and Private Use Only ८० ४ १३४ inelibrary.org Page #271 -------------------------------------------------------------------------- ________________ * सर्वोत्कृष्ट गुणो हता.॥ ४ ॥ एह धन्ना शालिनश्तणा गुण, स्वल्प बुड़ियी गाया जी॥ रसना पावन निर्मल गुणथी, लान अनंता पाया जी॥ ह० ॥ १५ ॥ श्री जिनकीर्तिसूरीश्वर विरचित, संस्कृत चरित्र निहाली जी॥ए अधिकार रच्यो में सुंदर, निज गुरु वयण है। संजाली जी ॥ ह० ॥ १६ ॥ अधिको नगे रनस पणाश्री, कुटिलबुदि संकेते जी ॥ते हैं। मुज मिलाक्का होज्यो, कहुं निज प्रातम देते जी ॥ ह ॥१७॥ श्री तपगबपति तेज दिवाकर, श्री विजयक्षमासूरि राया जी ॥ तस पट्टांबर दिनमणि सांप्रति, श्री विजयदया ॐ सूरि पाया जी॥ ह० ॥ १० ॥ तेह तणो आदेश लहीने, रास रच्यो ए रूमो जी ॥ चोरा-30 दशी ढाले संपूरण, चार नल्हासशु जोड्यो जी ॥ ६ ॥ १५ ॥ संवत सत्तरशे नवाणुं, वरषे श्रावण मासे जी ॥ शित दशमी गुरुवार अनोपम, सिक्ष्यिोग सुविलासे जी ॥ ह ॥२० ॥ दानतणां फल नत्तम जागी, देजो दान विलासे जो ॥ ढाल असावीशमी जिनविजये, 2 कही चोथे नल्हासे जी ॥ ह० ॥१॥ ॥ दोहा. ॥ दान पंच जिन दाखियां, अन्नय सुपात्र नत्तंग ॥ अनुकंपा नचितादि। तिम, कीर्तिदान मन रंग ॥१॥ अन्नय सुपात्रे मोक्षफल, शेष त्रिएय सुख नोग ॥ लहिये द दानतणे गुणे, इप्सित सयल संयोग ॥२॥ यतः ॥ आर्यावृत्तम्. ॥ अन्नय सुपत्नंदाणं, ॐॐॐॐॐ Jain Educat emational For Personal and Private Use Only Lalainelibrary.org Page #272 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना० अणुकंपा नचिय किनिदाणाई ॥ निवि मोरको नपिन, तिन्निवि सुस्काश्यं दिति ॥ १॥ न० १३५ नावार्थः-अन्नयदान, सुपात्रदान, अनुकंपादान, नचितदान अने कीर्तिदान; ए पांच प्रकार ४ ना दानमा प्रथमनां वे दान पण मोक्षने आपे अने बाकीनां त्रण दान पण सुख नोगा& दिकने आपे .॥१॥ अन्नयदानथी सयल सुख, पाम्या शांतिजिणंद ।। पात्रदानश्री परम & पद, श्री श्रेयांस कुमरे ॥ ३ ॥ अनुकंपाथी पिण अधिक, जशपाम्या जगमांह ॥ मुंज, मनोज विक्रम करण, प्रमुख नृपति सोन्बाद ॥४॥ते माटे नवि जन तुमे, 'देज्यो दान सु६ पात्र । नरनवनो ए लान , शुचि करण निज गात्र ॥ ५ ॥ ॥ ढाल ए मी. ॥ (दीगे दीगे रे वामाको नंदन दीगे.-ए देशी.) श्री गुरु देव प्रसादे पूरण, वंरित चित पाया ॥ दान कल्पद्रुम रास रचंते, आणंद है। अधिक नपाया रे ॥ में दानतणा गुण गाया ॥१॥ए आंकणी ॥ जिम कल्पद्रुम वंरित पूरी रे, तिम ए शुन्नफल दाता ॥ दानादिक अधिकार अनोपम, गयाथी सुखशाता रे ॥ में॥ ६ ॥ मंगलाचरण ते मूल मनोहर, सुनय ते पीठ प्रकास ॥ वचन युक्ति ते स्कंध विराजे, चार शाखा नल्हास रे ॥में॥॥ नव नव रूपे ढालनी रचना, प्रतिशाखा प्रतिन्नासे ल ॥ दोकध पत्र सदा नवपल्लव, सूक्त पुष्प सुवासे रे ॥में०॥४॥ शुन्न फल ते तस अर्थ 4ॐॐॐॐॐ स्वः Jan Educatie For Personal and Private Use Only inelibrary.org Page #273 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नो कहेवो, रीऊववो ते स्वाद ॥ श्रोता पंखी विविध जातिना, स्वाद ग्रहे प्रथमाद रे ॥ ० ॥ ५ ॥ रक्षक ते गुरु वक्ता समजुं, कल्पद्रुमनो स्वामी ॥ ते पाथी फल मागीजे, श्रातमने हित कामी रे ॥ में० ॥ ६ ॥ ए फल स्वादनश्री दुःख जावे, लहिये मंगल मावो ॥ | देशी विविध प्रकारे विधिशुं, स्व स्वरथी करी गावो रे ॥ ० ॥ ७ ॥ श्री तपगच्छ सूरेश अ नोपम, श्री विजयदेवसूरिंदा || गौतम जंबू वयर समोवम, गुएाथी तेह मुलिंदा रे ॥ में० ॥८॥ तस पट्टे श्री विजयसिंह गुरु, मुनिजन कैरव चंदा || गुणमली रोहण नूधर ऊपम, संघ सकल सुखकंदा रे ॥ में० ॥ ए ॥ मेदपाट पति राणा जगतसिंह, प्रतिबोधी जश ली धो ॥ पल आखेटक नियम करावी, श्रावक सम ते की धो रे ॥ में० ॥ १० ॥ तास शिष्य सुविहित मुनि पुंगव, बुध गजविजय सवाया ॥ शांति सुधारस परम महोदधि, उत्तम सुयस नपाया रे || ० ||११|| तस सेवक कोविद शिर शेखर, दितविजय गुरु राया ॥ पट | दर्शन आगम जलनिधिमें, बुद्धि जिहाज तराया रे ॥ में० ॥ १२ ॥ तास शिष्य पंकित जिन सिंधूर, जाए विजय मन जाया ॥ तास सतीर्थ विबुध जिनविजये, गिराना गुण गया रे || ॥ १३ ॥ श्री महावीरने वारे मनोहर, पंच पुरुष सु कहाया ॥ लब्धिपात्र श्री गौतम गणधर, बुड़े अनय सुहाया रे || ० ||१४|| माने दशारान महाबलि, कयवन्नो Jain Educationa International For Personal and Private Use Only Page #274 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धन्ना सौनाग्ये ॥ झदि वृश्रिी शालिन तिम, नाम लीय नय नागे रे ॥ में ॥ १५ ॥ शालिनन 8 १३६४/६धनो शषिराया, जेहना सुजश गवाया ।। नाम लियंतां पातिक नासे, निर्मल थाये काया हरे॥ में ॥१६॥ तपगढमें पंमित वैरागी, दीपविजय बुझ राया ॥ तेहना शिष्य संवेगी । * सुंदर, कवि दयाविजय सवाया रे ॥ में ॥१७ ॥ तस पद सेवक कृष्ण विजय वर, धर्मग्र की धरे माया ॥ तस आग्रहश्री रासनी रचना, कीधी गुरु सुपसाया रे ॥ में०॥१७॥ न तम एह चरित्रज जाणी, नाव अनोपम लाया ॥ सुविहितना गुण नगते सुगते, श्रोता अति सुख पाया रे ॥ में ॥१५॥ वृदोपरि ए ढाल पताका, रूप कही मनरंगे ॥ सूरतिमं ४ मण पास पसाये, सूरतमें सुख संगे रे ॥ में ॥२०॥ चार नल्हासे अधिक विलासे, दान * कल्पद्रुम गायो । बुध जिनविजय कहे विस्तरज्यो, शत शाखाये सुबायो रे ॥ में॥१॥ इति श्री धनशालिचरित्रेप्राकृतप्रबंधेदानकल्पद्रुमाख्येचतुर्थशाखारूपधन्नशालिसंयम __ ग्रहणवर्णनानिधोचतुर्थोल्हासः समाप्तम्. ॥ अस्मिन्नोल्हासे ढाल ।। श्ए॥ प्रथमोल्हासे ढाल १७, हीतियोल्हासे ढाल १७, तृतीयोल्हासे ढाल २२, चतुर्थोल्हासे ढाल श्ए ॥ सर्व ढालो नए ॥ है। १३६ Jain Education international For Personal and Private Use Only Page #275 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa International For Personal and Private Use Only Page #276 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Sapana 996 // अथ पंमित श्री जिनविजयमहाराज विरचित // " ॥श्री धनाशालिभद्रनो रास॥ ॥समाप्त॥ . GANDGADG 685088888888 .. . 9841900 Jain Educationa international For Personal and Private Use Only