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आदिनाथ चरित्र
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श्रीमती का पाणिग्रहण ।
वज्रसेन का दीक्षा ग्रहणं ।
प्रथम पर्व
वज्रघ और श्रीमती की विदाई |
कुछ देर बाद, लोहार्गल पुर से आया हुआ, वज्रजंघ कुमार भी वहाँ आया । उसने चित्र - लिखा चरित्र देखा और बेहोश हो गया। पंखों से हवा की गई और जल के छींटे मारे गये, तब उसे होश हुआ । इसके बाद मानो स्वर्ग से ही आया हो, इस तरह उसे जाति-स्मरण हुआ । उसी समय पंण्डिता ने पूछाकुमार ! पट का लेख देखकर तुम बेहोश क्यों हो गये ? " बज्रजंघ ने कहा- “भद्र े ! इस पटमें मेरा और मेरी स्त्री का पूर्व जन्म का वृत्तान्त लिखा हुआ है, उसे देख मैं बेहोश हो गया । यह श्रीमान् ईशान कल्प है, उसमें यह श्रीप्रभ विमान है, यह मैं कलिताङ्ग देव हूँ और यह मेरी देवी स्वयंप्रभा है । धातकीखण्ड के नन्दीग्राम में, इस घर के अन्दर, महादरिद्री पुरुष की यह निर्नामिका नाम की पुत्री है। वह यहाँ अम्बर तिलक पहाड़ के ऊपर आरूढ़ हुई है और उसने इस युगन्धर मुनि से अनशन व्रत ग्रहण किया है । यहाँ मैं, मुझ पर आसक्त, उसी स्त्री को अपने दर्शन देने आया हूँ और फिर वह यहाँ पञ्चत्व को प्राप्त होकर यानी मरकर, स्वयंप्रभा नाम्नी मेरी देवी के रूप में पैदा हुई है । यहाँ, मैं, नन्दीश्वर द्वीप में, जिनेश्वर देव की अर्चना
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