Book Title: Kasaypahudam Part 12
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatvarshiya Digambar Jain Sangh
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गाथा ६३ ]
पढमगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा * लोभागरिसा विसेसाहिया । $ ७८. २७ । केत्तियमेत्तो विसेसो ? सगसंखे भागभूदकोह-माणागरिसमेत्तो ।
$ ७९. एवं भवणादि जाव सव्वट्ठसिद्धि त्ति वत्तव्वं, विसेसाभावादो । संपहि तिरिक्ख-मणुसगदीसु पयदप्पाबहुअविहासणट्ठमाह
* तिरिक्ख-मणुसगदीए असंखेजवस्सिगे भवग्गहणे माणागरिसा थोवा।
६८. एत्थासंखेज्जवस्सियभवग्गहणविसेसणं संखेञ्जवस्सियभवग्गहणे पयदप्पाबहुअसंभवो पत्थि त्ति जाणावणफलं ददुव्वं, तत्थ चदुण्हं कसायाणं परिवत्तणवाराणं सरिसत्तदंसणादो । एत्थ संदिट्ठीए माणागरिसाणं पमाणमेदं ३२ ।
* कोहागरिसा विसेसाहिया। परिवर्तनवारोंकी संख्या अंकसंदृष्टिमें ६ बतला आये हैं । इसे ३ से गुणा करने पर १८ प्राप्त होते हैं। इसे ध्यानमें रख कर वास्तविक अर्थ जान लेना चाहिए ।
* उनसे लोभकषायके परिवर्तनवार विशेष अधिक हैं। ६ ७८. शंका-विशेषका प्रमाण कितना है ?
समाधान-अपने संख्यातवें भागप्रमाण जो क्रोध और मानकषायके परिवर्तनवार हैं उतना विशेषका प्रमाण है।
विशेषार्थ—यहाँ टीकामें 'सगसंखे०भागभूद' पद आया है। उसका तात्पर्य है कि लोभकषायके जितने परिवर्तनवार हैं उनके संख्यातवें भागप्रमाण । वह संख्यातवाँ भाग कितना होगा ऐसा प्रश्न होने पर बतलाया है कि क्रोध और मानकषायके जितने परिवर्तनवार हैं उतना है। अंकसंदृष्टिमें यहाँ अपने संख्यातवें भागकी सहनानी ९ का अंक है। पूर्व सूत्रके प्रसंगसे अंक संदृष्टिमें मायाकषायके परिवर्तनवारोंकी संख्या १८ दे आये हैं। उसका ९ संख्या संख्यातवां भाग है। यह क्रोध और मानके परिवर्तनवारोंकी जितनी संख्या है उतनी है। इन दोनोंका योग २७ है। इसलिए यहाँ अंकसंदृष्टिमें लोभकषायके परिवर्तनवार २७ बतलाये हैं।
$ ७९. इसी प्रकार अर्थात् देवगतिको ओघप्ररूपणाके समान भवनवासियोंसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तकके देवोंमें कथन करना चाहिए, क्योंकि उक्त प्ररूपणासे इसके कथनमें कोई अन्तर नहीं है। अब तिर्यञ्चगति और मनुष्यगतिमें प्रकृत अल्पबहुत्वका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं
* तिर्यश्चगति और मनुष्यगतिमें असंख्यात वर्षवाले भवग्रहणके भीतर मानकषायके परिवर्तनवार सबसे थोड़े हैं ।
६८०. संख्यात वर्षवाले भवग्रहणके भीतर प्रकृत अल्पबहुत्व सम्भव नहीं है इस बातका ज्ञान करानेके इस लिए सूत्रमें 'असंखेज्जवस्सियभवग्गहणे' यह विशेषण जानना चाहिए, क्योंकि संख्यात वर्षकी आयुवाले भवमें चारों कषायोंके परिवर्तनवार समान देखे जाते हैं । यहाँ पर अंकसंदृष्टिमें मानकषायके परिवर्तनवारोंका प्रमाण यह ३२ है ।
* उनसे क्रोधकषायके परिवर्तनवार विशेष अधिक हैं ?