Book Title: Kasaypahudam Part 12
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatvarshiya Digambar Jain Sangh
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जयधवलासहिदे कसायपाहुड़े [उवजोगो७ छेदणयमादि कादूण जाव तप्पाओग्गसंखेजरूवमेत्ताओ जवमज्झादो हेट्ठिमणाणागुणहाणिसलागाओ जिणदिट्ठभावेण घेत्तव्याओ त्ति परमगुरूवएसादो । जवमज्झादो हेडिमजीवा असंखेज्जगुणा । को गुणगारो ? आवलियाए असंखेज्जदिभागो, किंचूण दिवड्डगुणहाणिहाणंतरमिदि वुत्तं होइ । जवमज्झादो उवरिमजीवा विसेसाहिया । सुगममेत्थ कारणं । सव्वेसु द्वाणेसु जीवा विसेसाहिया, हेट्ठिमट्ठाणजीवाणमेत्थ पवेसदसणादो । एवमप्पाबहुए परूविदे कसायुदयट्ठाणेसु तसाणमोघेण विरहिदाविरहिदट्ठाणपरूवणाणुगया जवमज्झपरूवणा समत्ता भवदि । एत्तो णिरयादिगदीणं पादेक्कं णिरुभणं कादूण तसाणमादेसपरूवणा च जहागममणुगंतव्वा ।
* एसा सुत्तविहासा।
5 २९८. सत्तमीए गाहाए पुरिमद्धसुत्तस्स एसा अत्थविहासा कया त्ति वुत्तं होइ ।
* सत्तमीए गाहाए पढमस्स अद्धस्स अत्थविहासा समत्ता भवदि । ६२९९. सुगमं । * एत्तो विदियद्धस्स अत्थविहासा कायव्वा । ६३००. सुगममेदं पइण्णावक्कं ।
तत्प्रायोग्य संख्यात अंकप्रमाण यवमध्यसे अधस्तन नाना गणहानिशलाकाएँ जितनी जिनेन्द्रदेवने देखी हों उस रूपसे ग्रहण करनी चाहिए ऐसा परमगुरुका उपदेश है ।
उनसे यवमध्यके जीव असंख्यातगुणे हैं। गुणकार क्या है ? आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण गणकार है । कुछ कम डेढ़ गुणहानिस्थानान्तरप्रमाण गुणकार है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। उनसे यवमध्यसे उपरिम जीव विशेष अधिक हैं। यहाँपर कारणका कथन सुगम है। उनसे सब स्थानोंमें जीव विशेष अधिक हैं, क्योंकि इनमें अधस्तन स्थानोंके जीवोंका प्रवेश देखा जाता है। इस प्रकार अल्पबहुत्वका कथन करनेपर कषाय उदयस्थानों में
ओघसे त्रसजीवोंसे रहित और सहित स्थानोंकी प्ररूपणासे अनुगत यवमध्यप्ररूपणा समाप्त होती है । आगे नरकादि गतियोंमेंसे प्रत्येक गतिको विवक्षित कर त्रसजीवोंकी आदेशप्ररूपणा भी आगमानुसार जान लेनी चाहिए। . * यह गाथासूत्रकी अर्थविभाषा है ।
5 २९८. सातवीं गाथासूत्रके पूर्वार्धकी यह अर्थविभाषा की यह उक्त कथनका तात्पर्य है।
* इस प्रकार सातवीं गाथाके प्रथम अर्धभागकी अर्थविभाषा समाप्त होती है। $ २९९. यह सुगम है। * अब आगे दूसरे अर्धभागकी अर्थविभाषा करनी चाहिए । 5 ३००. यह प्रतिज्ञावाक्य सुगम है।