Book Title: Kasaypahudam Part 12
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatvarshiya Digambar Jain Sangh

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Page 349
________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [सम्मत्ताणियोगदारं १० (४३) सव्वणिरय-भवणेसु दीव-समुद्दे गह-जोदिसि-विमाणे। __ अभिजोग्गमणभिजोग्गे' उवसामो होइ बोद्धव्वो॥१६॥ 5 १९३. एसा विदियसुत्तगाहा पुव्वसुत्तुद्दिद्वत्थविसेसपरूवणाए पडिबद्धा । तं जहा-णिरयगदीए ताव सव्वासु णिरयपुढवीसु सव्वेसु णिरइंदएसु सव्वसेढीबद्धपइण्णएसु च वट्टमाणा णेरइया जहावुत्तसामग्गीए परिणदा वेयणाभिभवादीहिं कारणेहिं सम्मत्तमप्पाएंति त्ति जाणावणटुं सम्वणिरयग्गहणं । तहा सव्वभवणेसु त्ति वुत्ते जत्तिया नहीं होना चाहिए। किन्तु छहों पर्याप्तियोंकी पूर्णता होनेपर अन्तमुहूर्तके बाद ही वह प्रथम 'सम्यक्त्वके ग्रहणके योग्य होता है। यदि मनुष्यगतिका जीव है तो उसके भी संज्ञी पञ्चेन्द्रिय होनेपर भी वह लब्ध्यपर्याप्त और नित्यपर्याप्त नहीं होना चाहिए। वह पर्याप्त ही होना चाहिए । उसमें भी यदि कर्मभूमिज मनुष्य है तो पर्याप्त होनेके प्रथम समयसे लेकर आठ वर्षका होना चाहिए और यदि भोगभूमिज है तो उनचास दिनका होना चाहिए। ऐसा होनेपर ही वह प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहणके योग्य होता है। यदि तिर्यश्चगतिका जीव है तो वह एकेन्द्रिय, विकलत्रय और असंझी न होकर संज्ञी पञ्चेन्द्रिय ही होना चाहिए। उसमें भी ऐसा जीव यदि लब्ध्यपर्याप्त और निवृत्यपर्याप्त है तो वह प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहणके योग्य नहीं होता। वह छहों पर्याप्तियोंसे पर्याप्त होना चाहिए। उसमें तिर्यञ्च दो प्रकारके होते हैं-भोगभूमिज और कर्मभूमिज । कर्मभूमिज भी दो प्रकारके होते हैं -गर्भज और सम्मूर्छन । सो इनमेंसे गर्भज ही प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न कर सकते हैं सम्मूच्छन नहीं। उसमें भी दिवसपृथक्त्व अवस्थाके होनेपर ही वे प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहणके योग्य होते हैं। विशेष आगमसे जान लेना चाहिए। यहाँ पर प्रथम सम्यक्त्बके ग्रहणके योग्य जो अन्य विशेषताएँ बतलाई हैं, जैसे संसारमें रहनेका इस जीवका अधिकसे अधिक अर्धपुद्गलपरिर्तन नामवाला काल शेष रहे तब अनादि मिथ्यादृष्टि जीव प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहणके योग्य होता है। यदि सादि मिथ्यादृष्टि जीव है तो वेदक कालके समाप्त होनेपर ही वह प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहणके योग्य होता है । तथा वह क्षयोपशम आदि चार लब्धियोंसे सम्पन्न होना चाहिए इत्यादि सर्व साधारण विशेषताओंके साथ ही चारों गतियोंका संज्ञी पञ्चेन्द्रिय पर्याप्त जीव ही प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहणके योग्य होता है यह उक्त गाथासूत्रका तात्पर्य है। सब नरकोंमें रहनेवाले नारकियोंमें सब भवनोंमें रहनेवाले भवनवासी देवोंमें, सब द्वीपों और समुद्रोंमें विद्यमान संजी पश्शेन्द्रिय पर्याप्त तिर्यश्चोंमें, ढाई द्वीप-समुद्रोंमें रहनेवाले पर्याप्त मनुष्योंमें, सब व्यन्तरावासोंमें रहनेवाले व्यन्तर देवोंमें, सब ज्योतिष्क देवोंमें, विमानोंमें रहनेवाले नौ ग्रैवेयक तकके देवोंमें तथा अभियोग्य और अनभियोग्य देवोंमें दर्शनमोहनीयका उपशम होता है ऐसा जानना चाहिए । . • ६ १९३. यह दूसरी सूत्रगाथा पूर्व गाथा सूत्रमें कहे गये अर्थविशेषके कथनमें प्रतिबद्ध है। यथा-नरकगतिके सब नरक पृथिवी सम्बन्धी सब इन्द्रकबिलोंमें, सब श्रेणिबद्ध और प्रकीर्णक बिलोंमें विद्यमान नारकी जीव यथोक्त सामग्रीसे परिणत होकर वेदना अभिभव आदि कारणोंसे प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिये, गाथासूत्रमें 'सन्वणिरय' पदका ग्रहण किया है तथा 'सन्वभवणेसु' ऐसा कहनेपर .. १. ताप्रती -मणभिजोग्गो इति पाठः ।

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