Book Title: Kasaypahudam Part 12
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatvarshiya Digambar Jain Sangh

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Page 368
________________ गाथा १०५] दसणमोहोवसामणा ३१७ त्ति तत्थ भयणिज्जत्तदंसणादो। तत्थ सव्वोवसमो णाम तिण्हं कम्माणमुदयाभावो सम्मत्तदेसघादिफद्दयाणमुदओ देसोवसमो त्ति भण्णदे । (५२) सम्मत्तपढमलंभस्साणंतरं पच्छदो य मिच्छत्त। लंभस्स अपढमस्स दु भजियव्वो पच्छदो होदि ॥१०५॥ $२०६. एसा गाहा सम्मत्तं गेण्हमाणस्साणंतरं पच्छदो मिच्छत्तोदयणियमो किमत्थि आहो पत्थि त्ति पुच्छाए णिण्णयकरणट्ठमागया। एदिस्से अत्थो उच्चदे । तं जहा–सम्मत्तस्स जो पढमलंभो अणादियमिच्छाइडिविसओ तस्साणंतरं पच्छदो अणंतरपच्छिमावत्थाए मिच्छत्तमेव होइ, तत्थ जाव पढमहिदिचरिमसमओ त्ति ताव मिच्छत्तोदयं मोत्तूण पयारंतरासंभवादो। 'लभस्स अपढमस्स दु' जो खलु अपढमो सम्मत्तपडिलंभो तस्स पच्छदो मिच्छत्तोदयो भजियव्वो होह। सिया मिच्छाइट्ठी होदूण वेदयसम्मत्तमुवसमसम्मत्तं वा पडिवज्जइ, सिया सम्मामिच्छाइट्ठी होदण वेदयसम्मत्तं पडिवज्जइ त्ति भावत्थो। प्राप्त करता है इस प्रकार वहाँ भजनीयपना देखा जाता है। उनमेंसे तीनों कर्मोंके उदयाभावका नाम सर्वोपशम है और सम्यक्त्व देशघाति प्रकृतिके स्पर्धकोंका उदय देशोपशम कहलाता है । विशेषार्थ—इस गाथासूत्र में किसीके कौन सम्यक्त्व होता है इसका विधान किया गया है। अनादि मिथ्यादृष्टिके और जिसका वेदककाल व्यतीत हो गया है ऐसे किसी भी सादि मिथ्यादृष्टिके सर्वोपशमसे प्रथमोपशम सम्यक्त्वकी ही प्राप्ति होती है। किन्तु जो सादि मिथ्यादृष्टि जीव वेदक कालके भीतर अवस्थित है ऐसा सादि मिथ्यादृष्टि जीव देशोपशमसे वेदकसम्यक्त्वको ही प्राप्त करता है । शेष कथन सुगम है। सम्यक्त्वके प्रथम लाभके अनन्तर पूर्व पिछले समयमें मिथ्यात्व ही होता है । अप्रथम लाभके अनन्तर पूर्व पिछले समयमें मिथ्यात्व भजनीय है ॥ ११-१०५॥ 5२०६. यह गाथा सम्यक्त्वको प्रहण करनेवाले जीवके अनन्तर पूर्व पिछले समयमें क्या मिथ्यात्वका उदय है अथवा नहीं है ऐसी पृच्छा होने पर उसका निर्णय करनेके लिए आई है । अब इसका अर्थ कहते हैं । यथा-अनादि मिथ्यादृष्टि जीवके सम्यक्त्वका जो प्रथम लाभ होता है उसके 'अणंतरं पच्छदों' अर्थात् अनन्तरपूर्व पिछली अवस्था में मिथ्यात्व ही होता है, क्योंकि उसके प्रथम स्थितिका अन्तिम समय प्राप्त होने तक मिथ्यात्वके उदयको छोड़ कर प्रकारान्तर सम्भव नहीं है। 'लंभस्स अपढमस्स दु' अर्थात् जो नियमसे अप्रथम अर्थात् द्वितीयादि बार सम्यक्त्वका लाभ है उसके अनन्तरपूर्व पिछली अवस्थामें मिथ्यात्वका उदय भजनीय है। कदाचित् मिथ्यादृष्टि होकर वेदकसम्यक्त्व या उपशमसम्यक्त्वको प्राप्त करता है और कदाचित् सम्यग्मिथ्यादष्टि होकर वेदकसम्यक्त्वको प्राप्त करता है यह उक्त गाथासूत्रका भावार्थ है। विशेषार्थ-इस गाथासूत्रमें जो अनादि मिथ्यादृष्टि जीव पहली बार सम्यक्त्वको प्राप्त करता है उसके सम्यक्त्वको प्राप्त करनेके अनन्तरपूर्व पिछली अवस्थामें कौनसा भाव होता

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