Book Title: Kasaypahudam Part 12
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatvarshiya Digambar Jain Sangh

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Page 373
________________ ३२२ जयघवलासहिदे कसायपाहुडे [ सम्मत्ताणियोग द्दारं १० प्रतिपद्यते तदाप्रभृति स एव जीवो मिध्यादृष्टिपदवीमवगाहते, प्रवचनविरुद्धबुद्धित्वादित्येष समयनिश्चयः । तथा चेक्तं सुत्तादोतं सम्मं दरिसिज्जत्तं जदा ण सद्दहदि । सो चेब हवइ मिच्छाइट्ठि त्ति तदो पहुडि जीवो ॥ १ ॥ इति । ततः सूक्तमाज्ञाधिगमाभ्यां प्रवचनोपदिष्टार्थाऽवैपरीत्यश्रद्धानं सम्यग्दृष्टिलक्षणमिति । (५५) मिच्छाइट्ठी णियमा उवइट्ठ' पवयणं ण सदहदि । सहदि असम्भावं उवइट्ठ वा अणुवइट्ठ ॥ १०८ ॥ १ २११. एदस्स मिच्छाइट्ठिलक्खण परूवणट्टमागयस्स गाहासुत्तस्स अत्थो वुच्चदे । जहा - जो खलु मिच्छाइट्ठी जीवो सो णियमा णिच्छएण पवयणमुवइङ्कं ण सद्दहदि । रूपसे बतलावें फिर भी वह जीव असत् आग्रहवश उसे स्वीकार करता है तो उस समय से लेकर वह जीव मिथ्यादृष्टि पदका भागी हो जाता है, क्योंकि वह प्रवचन विरुद्ध बुद्धिवाला है यह परमागमका निश्चय है । कहा भी है— सूत्रसे समीचीनरूपसे दिखलाये गये उस अर्थका जब यह जीव श्रद्धान नहीं करता है उस समय से लेकर वही जीव मिथ्याष्टि हो जाता है ॥ १ ॥ इसलिये यह ठीक कहा है कि प्रवचनमें उपदिष्ट हुए अर्थका आज्ञा और अधिगमसे विपरीतताके विना श्रद्धान करना सम्यग्दृष्टिका लक्षण है । विशेषार्थ -- इस गाथासूत्रमें जो यह बतलाया है कि सम्यग्दृष्टि जीब सर्वज्ञ वीतराग देव द्वारा उपदिष्ट प्रवचनका तो नियमसे श्रद्धान करता है । किन्तु कदाचित् स्वयं न जानता हुआ गुरुके निमित्तसे असद्भूत अर्थका भी श्रद्धान करता है । सो उसका यह अर्थ नहीं है कि सम्यग्दृष्टि जीवको जीवादि नौ पदार्थोंके यथार्थ स्वरूपको छोड़कर गुरुके निमित्तसे विपरीतरूपसे भी उनकी श्रद्धा हो जाती है । किन्तु उक्त कथनका इतना ही तात्पर्य है कि जिनागम में जिन सूक्ष्म अर्थोंका विवेचन हुआ है, कदाचित् गुरुके निमित्तसे उनमें से किसी एकका विपरीत ज्ञान हो जाय और अविसंवादी शास्त्रान्तरसे जब तक सम्यक् अर्थकी प्रतिपत्तिका योग न मिले तब तक वह वैसी श्रद्धा करता हुआ भी सम्यग्दृष्टि ही है । हाँ यदि समयज्ञ कोई विशेष ज्ञानी अविसंवादी दूसरे शास्त्रसे उसे उक्त विषयका सम्यक् परिज्ञान करा दे, फिर भी वह असत् आग्रह वश अपनी हट न छोड़े तो उस समय से लेकर वह नियमसे मिथ्यादृष्टि हो जाता है ऐसा यहाँ स्पष्टरूप से समझना चाहिए । मिथ्यादृष्टि जीव नियमसे उपदिष्ट प्रवचनका 'श्रद्धान नहीं करता है तथा उपदिष्ट या अनुपदिष्ट असदुद्भत अर्थका श्रद्धान करता है ॥ १०८ ॥ $ २११. मिथ्यादृष्टिके लक्षणका कथन करनेके लिये आये हुए इस गाथासूत्रके अर्थका कथन करते हैं । यथा— जो नियमसे मिथ्यादृष्टि जीव है वह 'णियमा' निश्चयसे उपदिष्ट प्रवचनका श्रद्धान नहीं करता है ।

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