Book Title: Kasaypahudam Part 12
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatvarshiya Digambar Jain Sangh

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Page 345
________________ २९४ जयंधवलासाहदे कसायपाहुडे [ सम्मत्ताणियोगद्दारं १० * उक्कस्यं द्विदिखंडथं संखेज्जगुणं । $ १८७. किं कारणं १ सागरोवमपुधत्तपमाणत्तादो । २१ । * जहण्णगो द्विदिबंधो संखेज्जगुणो । $ १८८. किं कारणं ? मिच्छत्तस्स चरिमसमयमिच्छाइट्ठिजहण्णट्ठिदिबंधस्स अंतोकोडा कोडियमाणस्स सेसकम्माणं पि गुणसंकमचरिमसमयजहण्णट्ठिदिबंधस्स गहदो । २२ । * उक्कस्सगो द्विदिबंधो संखेज्जगुणो । $ १८९. किं कारणं ? सव्वकम्माणं पि अपुव्वकरणपढमसमयडिदिबंधस्स पुव्विल्लजहणट्ठिदिबंधादो संखेज्जगुणत्त सिद्धीए णिव्वाहमुवनंभादो | २३ | भागप्रमाण होनेसे पूर्व में कही गई उत्कृष्ट आबाधासे असंख्यातगुणा है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । २० । विशेषार्थ – पूर्व में जो उत्कृष्ट आबाधा बतला आये हैं वह संख्यात काल प्रमाण होती है और जघन्य स्थितिकाण्डक पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण होता है, इसलिये ही प्रकृतमें उत्कृष्ट आबाधासे जघन्य स्थितिकाण्डकको असंख्यातगुणा बतलाया है । * उससे उत्कृष्ट स्थितिकाण्डक संख्यातगुणा है । $ १८७. क्योंकि यह सागरोपमपृथक्त्वप्रमाण है । २१ । विशेषार्थ -- अपूर्वकरणके प्रथम समयमें किन्हीं जीवोंके सागरोपमपृथक्त्वप्रमाण स्थितिकाण्डक होता हैं यह पहले ही बतला आये हैं । उसीको यहाँ ग्रहण किया है। यह पूर्वके पल्योपमके संख्यातर्वे भागप्रमाण स्थितिकाण्डकसे संख्यातगुणा होता है यह स्पष्ट ही है । * उससे जघन्य स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है । $ १८८. क्योंकि अन्तिम समयवर्ती मिध्यादृष्टि के मिध्यात्वका जघन्य स्थितिबन्ध अन्तःकोड़ा कोडीप्रमाण और शेष कर्मोंका भी गुणसंक्रमके अन्तिम समयका जघन्य स्थितिबन्ध लिया है । २२ । विशेषार्थ -- पूर्व में उत्कृष्ट स्थितिकाण्डक सागरोपमपृथक्त्व प्रमाण बतला आये हैं और यहाँ जघन्य स्थितिबन्ध अन्तःकोड़ाकोडीप्रमाण बतलाया है, इसलिए यह उससे संख्यातगुणा ही होगा यह स्पष्ट है । * उससे उत्कृष्ट स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है । $ १८९. क्योंकि सभी कर्मोंका अपूर्वकरणके प्रथम समयमें जो स्थितिबन्ध होता है वह पूर्व में कहे गये जघन्य स्थितिबन्धसे संख्यातगुणा होता है इसकी सिद्धि निर्बाध पाई जाती है । २३ । विशेषार्थ – अपूर्वकरणके प्रथम समय में सब कमका जो स्थितिबन्ध होता है वहाँसे

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