Book Title: Kasaypahudam Part 12
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatvarshiya Digambar Jain Sangh
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गाथा ६४ ]
विदियगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा
सव्वत्थ मायोवजोगेहिं सह कोह - माणोवजोगाणं संखेजपमाणत्तुवलंभादो च । * लोभोवजोगा णियमा संखेज्जा ।
$ ९६. कुदो ? मायोवजोगेसु संखेजेंस संतेसु तत्तो संखेज्जगुणहीणाणमेदेसिं ताभावसिद्धी पिडिबंधमुवलंभादो ।
* जत्थ लोभोवजोगा संखेज्जा तत्थ कोहोवजोगा माणोवजोगा मायोवजोगा भजियव्वा ।
१ ९७. लोभस्स संखेज्जोवजोगेसु णिरुद्धेसु कोहादिकसायाणमुवजोगा संखेजा वा असंखेजा वा होंति त्ति भजियव्वा । किं कारणं ? आदीदो प्पहुडि सव्वेसिं संखेजोवजोगे गच्छमाणेसु पुव्वमेव कोधस्स असंखेजोवजोगा पारंभति, तदो माणस, तदो मायाए, सव्वपच्छा लोभस्स । एदेण कारणेण लोहोवजोगेसु संखेजेस संतेसु सेसकसायाणमुवजोगा संखेज्जासंखेज्जवियप्पेहिं भयणिज्जा त्ति णत्थि संदेहो । एवं ताव कोहादिकसायाणं संखेज्जोवजोगणिरुंभणं काढूण तत्थ सेसकसायोवजोगाणं संखेज्जासंखेज्जभागविचारं काढूण संपहि तेसिं चेवासंखेज्जोवजोगणिरुंभणमुहेण सण्यासविहाणमुरिमं पबंधमाह -
* जत्थ णिरयभवग्गहणे कोहोवजोगा असंखेज्जा तत्थ सेसा स्थान उतरकर नीचे सर्वत्र मायाकषायके उपयोगोंके साथ क्रोध और मानकषायके उपयोग संख्यातप्रमाण ही पाये जाते हैं ।
* लोभकषायके उपयोग नियमसे संख्यात होते हैं ।
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$ ९६. क्योंकि मायाकषायके उपयोगोंके संख्यात होने पर उनसे संख्यातगुणे हीन इनकी उक्त प्रकारसे सिद्धि विना किसी बाधा हो जाती है ।
* नारकियोंके जिस भवमें लोभकषायके उपयोग संख्यात होते हैं वहाँ क्रोधकषायके उपयोग, मानकषायके उपयोग और मायाकषायके उपयोग भजनीय होते हैं ।
$ ९७. लोभकषायके संख्यात उपयोगोंके होनेपर क्रोधादि कषायोंके उपयोग संख्यात या असंख्यात होते हैं, इसलिए ये भजनीय हैं, क्योंकि प्रारम्भसे लेकर सभी कषायोंके संख्यात उपयोग हो जानेपर सबसे पहले क्रोधकषायके असंख्यात उपयोग प्रारम्भ होते हैं, उसके बाद मानके और उसके बाद मायाके तथा सबके अन्तमें लोभके असंख्यात संख्याको लिये हुए उपयोग प्रारम्भ होते हैं । इस कारणसे लोभके उपयोगोंके संख्यात होने पर शेष कषायोंके उपयोग संख्यात और असंख्यातरूप विकल्पोंके द्वारा भजनीय होते हैं इसमें सन्देह नहीं है । इस प्रकार सर्वप्रथम क्रोधादिकषायोंके संख्यात उपयोगोंको विवक्षित कर वहाँ शेष कषायोंके उपयोग संख्यात या असंख्यात कहाँ कितने होते हैं इसका विचार कर अब उन्हीं कषायोंके असंख्यात उपयोगोंको विवक्षित कर सन्निकर्षका कथन करनेके लिए आगेके प्रबन्धको कहते हैं—
* नारकियोंके जिस भवमें क्रोधकषाय के उपयोग असंख्यात होते हैं वहाँ शेष