Book Title: Kasaypahudam Part 12
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatvarshiya Digambar Jain Sangh
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गाथा ६८ ]
छट्ठगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा
मिस्सत्तसंभवे विरोहाभावादो। एवमेसो वट्टमाणसमयम्मि माणोवजुत्ताणं कोहावेक्खाए वितिविहो कालो वोलीणो त्ति सिद्धं । संपहि माया - लोमेसु वि एसो चेव कमोि पदुप्पायणमाह
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* मायाए तिविहो कालो ।
$ २०३. माय - णोमाय - मिस्सयभेदेण तत्थ वि तिविहकालसिद्धीए णिप्पडिबंधभादो ।
* लोभे तिविहो कालो ।
$ २०४. लोभ- णोलोभ-मिस्सया मेदेण तत्थ वि तिविहकालसिद्धीए पडिबंधाणुवलंभादो । एदेसिं च कालाणं कोहभंगेणेव जोजणा कायव्वा । एवमेसो कालविभागो वमाणसमयम्मि माणोवजुत्ताण मेक्केकम्मि कसाए पादेक्कं तिविहो होदूण बारसविहो होदित्ति घेत्तव्वं । एदस्सेवत्थस्सोव संहारवक्कमुत्तरं -
* एवमेसो कालो माणोवजुत्ताणं बारसविहो । $ २०५. सुगममेदं ।
मानकषायरूपसे परिणत हुए जीवके नोक्रोध और मिश्रपना सम्भव है, इसमें कोई विरोध नहीं है। इस प्रकार वर्तमान समय में मानमें उपयुक्त हुए जीवोंका क्रोधकी अपेक्षा भी यह तीन प्रकारका काल व्यतीत हुआ यह सिद्ध हुआ । अब माया और लोभमें भी यही क्रम है यह कथन करनेके लिए कहते हैं
* मायाकषायमें तीन प्रकारका काल होता है ।
$ २०३. क्योंकि माया, नोमाया और मिश्रके भेदसे मायाकषायमें भी तीन प्रकारके कालकी सिद्धि विना बाधाके उपलब्ध होती है ।
* लोभकषायमें तीन प्रकारका काल है ।
$ २०४. लोभ, नोलोभ और मिश्रके भेदसे लोभकषायमें भी तीन प्रकारके कालकी सिद्धि बिना बाधा उपलब्ध होती है। इन कालोंकी क्रोधकालके भंगके समान योजना करनी चाहिए। इस प्रकार यह कालविभाग वर्तमान समय में मानकषायमें उपयुक्त हुए जीवोंका एक-एक कषायमें प्रत्येकके तीन भेद होकर बारह प्रकारका होता है ऐसा यहाँपर ग्रहण करना चाहिए। अब इसी अर्थके उपसंहाररूप आगेके वाक्यको कहते हैं
* इस प्रकार मानकषाय में उपयुक्त हुए जीवोंका यह बारह प्रकारका काल है ।
$ २०५. यह सूत्र सुगम है ।
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विशेषार्थ – पहले वर्तमान में मानकषाय परिणत जीवोंके स्वस्थानकी अपेक्षा मानकाल, tarters और मिश्रकाल ऐसे तीन भेद बतला आये हैं । यहाँ परस्थानकी अपेक्षा भेदका निरूपण करते हुए नौ भेद बतलाये गये हैं। खुलासा इस प्रकार है