Book Title: Agam 38B Panchkappabhasa Chheysutt 05B
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 22
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir गाहा-१७८ ॥१७८॥ ||१७९॥ ॥१८॥ १८१॥ ॥१८२॥ ॥१८३॥ ||१८४ा ॥१८५॥ १८६॥★0 (१७८) अहया जलंधकारो मेहोत्यइयंमि होति गगणप्मि अहवाजलंधकारोजत्यादिचो न दीसतितु (१७१) एवं तु अंधकारो कप्पपकपं पडुन तस्स भवे अहवा सो चैव जलो भवइ यसे अंधकारंतु (१८०) छब्बिहकप्पस्सिणमो निक्खेवो छव्विहो मुणेयव्यो नाम ठवणा दविए खेत्ते कालेयमावे य (१८१) जेण परिग्गहिएणं दब्वेणं कप्पो होति नाऽकप्पो ते दव्यमेव कपोकारणकजोक्यारातो (१८३) सोतिविहो बोद्धच्चो जीवमजीवेय मीसतोचेव एतेसिं तु विभागं वोच्छामि अहाणुपुव्वीए (१८३) तिविहो यजीवकप्पो दुपय चउप्पय तहेव अपदेहिं अहिगारो दुपदेहिं तत्यवि य मणुस्सदुपदेहिं (१८४) तत्यवि य कम्मभूमतुसंखिजगवासआउएहिं तु पव्वइतुकामएहिं तत्यवि तू होति अहिगारो (१८५) सोहोति छव्विहो तू बोद्धव्यो मणुयजीवकप्पोतु योच्छामि तस्स इणमो भेदविकप्पं समासेणं (१८६) पवावण मुंडावण सिक्खावणुवट्ठ मुंज संवतणा एसो त्यजीवकप्पोछब्मेदो होति नायब्वो (१८७) अब्भुवगमो पव्वावण मुंडावण होति लोयकरणं तु गहणासेवनसिक्खं सिक्खावितमि सिक्खवणा (१८८) धयठवणमुवढवणा संमुजण मंडलीए सह पोगो एगततो सह वासो संवसणा होति नायव्वा (१८१) नाऽपव्यायित मुंडायणातुन यऽमुंडिए तु सिक्खवणा एमादी तु विभासा पव्यायती तु केरिसगो (१९०) सुत्तत्यतदुभयविसारयस्स संगहउवायकुसलस्स कप्पति पवावेतुंसंवेगसुवहितमतिस्स (१९७) सुत्तत्येण विसारए चउभंगो एत्थ होति कायव्वो तं व तदुभयं खलु विसारतो जाणतो तस्स (११२) दब्बे भावे संगह दव्ये आहारमादिएहिं तु सिक्खवणं अगिलाए गेलण्णे याविकरणं तु (१९३) भावम्मि संगहो खलु नाणादीतं तु होति बोद्धव्यो जाणइ वट्टादेतुं गच्छंतु उवायकुसलोतु (१९४) संसारभउब्विग्गो संदिग्गो सो तु होइ नायव्यो एतेसिं तु पदाणं घउमंगो होति एक्केक्के (१९५) तदुभयविसारदो खलुनसंगहे कुसलो एत्य चउभंगो तदुभयउवायकुसलो एत्थंपितु होति घउमंगो ॥१८७|| ।।१८८॥ ॥१८॥ ॥१९०॥ ॥१९॥ ॥१९२॥ १९३॥ ||१९४॥ ।।१९५॥ For Private And Personal Use Only

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