Book Title: Agam 38B Panchkappabhasa Chheysutt 05B
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 25
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra २२ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ( २३२) चारगपाला हु इमे जे बालाई तु एव रुंमंति लोगे जायति अजसो अहो इमे निरणुकंपत्ति (२३३) तेण य पडिबंधेणं पडिबद्धा नवि कर्हिचि विहरति जे दोस नीयवासे ते पावंते य अच्छंता (२३४) ऊणट्टे नत्थि चरणं पव्वार्वितोऽवि भस्सई चरणा मूलावराहिणी खलु नारभते वाणिओ चेट्ठ ( २३५) उग्घायमणुग्घायं नाऊणं छविहं तवोकम्पं एमेव छेद छव्विह जिणचोद्दस पुव्विए दिक्खा ( २३६) उग्घायमणुग्घातो मासो चउ छच्च प्रव्विह तवेसो एमेव छविहोच्चिय छेदो सेसाण एक्केकूकं (२३७) एयं पायच्छित्तं नाउ न पव्वावए तओ बाल नवरं पव्वाविंती जिनचोद्दसपुच्चि अतिसेसी (२१८) ते जाणिउं गुणागुण बहुगुण नाऊण तेण दिक्खंति के पुण जिणमादीहिं दिक्खिय बाला इमे सुणसु ( २३९) सत्याए अतिमुत्तो मणओ सिनंभवेण पुव्यविदा अतिसेसिणा य वतिरो छम्मासो सीहगिरिणावि (२४०) एते अव्यवहारी जह पव्वाविंतीह गच्छवासी तु एवं इच्छं नाउं भणति इणमो निसामेहि (२४१) उदसंते व महाकुले नातीवग्गे व सन्निसिजतरे अनाकारणजाते बाले पव्वज्जऽणुण्णाया (२४२) पव्वज्जाए परिणए दिउलकुले तत्य बाल होजाहि मासव्ये तेसि कते अच्छंतू तेण पव्वावे (२४३) नातीवग्गे य तहा छेव गमादी मयम्मि संतम्मि जणवादरक्खतो सारदेइ आसण्णबालाई (२४४) एवं सचितराणवि अज्ञायवि डिंडिबंध पडिणीए कजं करेमि सचिवो जदि मे पव्वावतह बालं (२४५) एतेर्हि कारणेहिं पव्वाविज्जाहि गच्छवासी तु पव्वावियाण तेर्सि इमेण विहिणा उ सारवणा (२४६) भत्ते पाणे धोवण सारणया वारणा निओजणया चरणकरणसज्झायं गाहेयव्यो पयत्तेणं (२४७) निद्धमहुरेहिं आउं पुस्तति देहम्मि पाडवं मेहा अच्छति जत्य न नञ्जति सड्ढादिसु पीहगादीया (२४८) ठावेति सालवाडा पडिलेहणमादिसारमभिक्खं वारिजए अभिक्खं हरियादी छिंदमाणी य (२४९) सामायारिं सव्वं सज्झायं चेद ऊ पयत्तेणं गाहिज्जति सो एवं जयणा एसी तु बालस्स For Private And Personal Use Only पंचको (२३२) ॥२३२॥ ॥२३३॥ ॥२३४॥ ॥२३५॥ ★ ॥२३६॥ ॥२३७॥ ॥२३॥ ॥२३९॥ ॥२४०॥ ॥२४१|१ ॥२४२॥ ॥२४३॥ ॥ २४४ ॥ ॥२४५॥ ।।२४६ ।। ★ ॥२४७॥ - || २४८ || ॥२४९॥

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