Book Title: Agam 38B Panchkappabhasa Chheysutt 05B
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 89
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir (१३८० ) ठावेऊण गणहरं आमंतऊण तो गणं सव्वं तिविहेण खमावेती सबालवुड्ढाउलं गच्छं (१३८१) संवेगजणियहासा सुत्तत्यविसारता पयणुकम्मा चिंतेति गणं धीरा णितावि हु ते जिणाणाए (१३८२) निद्धमहुराति सेसं परलोगहितं गुरूण अनुरूवं अनुसट्ठि देति तर्हि गणाहिवतिणो गणस्सेवं (१३८३ ) तवणियमसंपउत्ता आवस्सगझाणजोगमस्त्रीणा संजोगविप्पजोगे अभिग्गहा जे समत्याणं (१३८४) सुप्पत्ते निसिरतेहिं गणोवी चिंतिओ हवति सो उ निद्धाए दिट्ठीए आलोए तं गणं सर्व्व (१३८५) वायाए महुराए आसासे अपरिसेस निस्सेसं गुरु अनुरूवं जहरिहं सवालबुड्ढाति रातिणिए (१३८६) तयो होति बारसविडो दुह नियमो इंदिओ य नोइंदी आवाससमायारी बोद्धव्या चक्कवाला तु (१३८७) सुत्तत्यझाणजोगे अल्लीणा तेसु होइ जुत्ता उ सव्वेविय संजोगा नियमा ऊ विप्पओगंता (१३८८) तह उवहीउप्पायण दव्वादीया अभिग्गहा जे तु सति सामत्ये तेसुवि मा हु पमायं करेजाऽणु (१३८९) अथवा अभिग्गहा ऊ कुव्वंति जिणा व जे समत्या प एवं सासितु गणं ता गणहारि अप्पाहे (१३९०) गणसंगहुवग्महरक्खणे तुमं मा हु काहिसि पमादं ठितकप्पो हु जिणाणं गणधरपरिवारिया गच्छे (१३९१) मज्जाररसियसरिसोवमं तुमं मा हु काहिसि विहारं मा नासेहिसि दोण्णिवि अप्पाणं चैव गच्छं च (१३९२) वड्ढतओ विहारो जिनपन्नत्तो दुबालसंगष्मि जह जिनकप्पियपरिहारियाण सेसाणवि तहेव (१३९३) परिवड्ढमाणसड्ढो जह जिनकप्पो तहा करिज्जासी अकरिंतमप्पणा ऊ न ठवे अन्नं इमं नाउं ( १३९४) जो सगिहं तु पलित्तं अलसो तु न विज्झवे पमाएणं सो नवि सद्दहियव्वो परधरदाहप्पसमणम्मि (१३९५) नाणं अहिजिळणं जिनवयणं दंसणेण रोएता न चएति जो घरेतु अप्पाण गणं न गणहारी (१३९६) नाणं अहिजिऊणं जिनवयणं दंसणेण रोएता चापति जो धरेतुं अप्पाण गणं स गणहारी (१२९७) नापं अभिज्झिऊणं जिनवयणं दंसणेण रोएत्ता न चएति जो ठवेउं अप्पाण गणं न गणहारी For Private And Personal Use Only पंचकपो (१३८०) 11932011 ॥१३८१॥ ||१३८२॥ ॥१३८३॥ १।१३८४ ॥ ||१३८५|| ॥१३८६ ॥ 11932411 ।। १३८८|| ||१३८९ ॥ 11939011 ।। १३९१ ।। ॥१३९२ ॥ ॥१३९३॥ ||१३९४ ॥ ।।१३९५।। ॥१३९६ ।। 11938011

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