Book Title: Agam 38B Panchkappabhasa Chheysutt 05B
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 109
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir पंचकम्पो - (111) ॥१७३८॥ ||१७३९॥ ।।१७४०॥ ||१७४१॥ ||१७४२॥ ११७४३॥ ॥१७ ॥ १७४५॥ ॥१७४६॥ (१७५८) कडजोगिलत्रिकासे बहुतरगंजत्युवरणहं जाणे योवतरियंच हाणि तत्यऽनयरे दुबिहकाले (१७३१) एतेसामनयरे आलंबणविरहिओ वसे खेत्ते कालल्यावराहे संवदियमोऽवराहाणं (१७४०) संवड्डियावराहे तवोवछेदो तहेवमूलं वा आयारपकपेज पमाण नेमाण चरिमम्मि (१७४१) एसोउ खेत्तकप्पो अहुणा वोच्छामि कालकप्पंतु जावातुतं तुमीणं अनुपाले ताव सामन्त्रं (१७४२) गीयसहाओ विहरे संविग्गेहिं व जयणजुत्तोउ असतीवि मागमाणे खेत्तेकाले इस माणं (१७४३) पंच व छ सत्तसते अतिरेगं पाविजोयणाणंतु ___ गीयत्यपादमूलं परिमग्गिा अपरितंतो (१७४) एक्कं व दो व तिष्णि व उक्कोसं बारसेव वासाई गीयत्यपादमूलं परिमागेजा अपरितंतो (१७४५) पंच व छ सत्त सते अतिरेग वाविजोयणाणंतु संदिग्गपादमूल परिमग्गिजा अपरितंतो (१७) एककं वदो व तिष्णिव उककोसंबारसेव यासाई संविग्गपादमूलं परिमग्गिजा अपरितंतो (१७४७) संविग्गो गीयत्यो मंगचउक्के उ पदममुवसंपा असतीइ ततिय बितिए चउत्यगंनो उउवसंपे (१७४८) उक्कमओ खलु लहुगा चतुरो लहुगा घउत्यभंगम्मि जस्सऽट्ठा उयसंपदतं नत्यिधउत्यभंगम्भि (१७४५) एतेसिं तु अलंभे एगोथामावहारमकरेंतो विहरअ गुणसमिद्धो अनिदाणो आगमसहातो (१७५०) कालम्मि संकिलिडे छक्कायदयावरोवि संविग्गो जयजोगीण अलंभे पणगऽन्नतरेण संवासो (१७५१) पणगऽन्नतरं पासत्यमादिभंगे चउत्यए जयणा जत्य वसंती के ऊ ठाति तर्हि वीसुवसहीए (१७५२) तेसि निवेदेऊणं अह तत्यन होञ्ज अन्नवसहीउ नवडेन वा उदंतं वसेज तो एक्कवसहीए (१७५३) अपरीभोगेगासेतत्य ठितोतूपुणोविय जएजा आहारमादिएहि इमेण विहिणाजहाकमसो (१७५४) आहारे उवहिप्पिय गेलण्णागाढकारणे पावि यामावहारविजढो असती जुत्तो ततो गहण (१७५५) आहारउवहिमादी उप्पादे अप्पणा विसुखंतु असती सतलाभस्साजो तेर्सि साहुपक्खीओ ||१७४७| ||१७४८॥ ||१७reli ||१७५01 ॥१७५१॥ ॥१७५२॥ ॥१७५३॥ ॥१७५४॥ ॥१७५५॥ For Private And Personal Use Only

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