Book Title: Agam 38B Panchkappabhasa Chheysutt 05B
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan
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पक्कयो (१८४९)
।।१८४६||*
||१८४७॥
||१८८
||१८४९॥
॥१८५०॥
॥१८५१||
॥१८५२॥
1१८५३||
||१८५४॥
(Har) पडिसेहोऽणुण्णा दा पापछितेपओह निच्छाइए
ओहेण उ सट्ठाणं अत्यविरेगेण योगडियं (१७) हिंसादवराहपदा किण्हे अनुघाति सुक्किला लहुगा
निधरिसपरिच्छणा खलुजह कणगंतावनिहसेसु (१८४८) एवं परिच्छिऊणं आयवयं गच्छमावतीजतु
नित्यरयम्मि पत्तेजयणाऐं निसेव सचरिती (१८४९) दुट्ठाणा मूलुत्तरदप्पे अजएय होइ पडिसेहो
कप्पे जयणा नुत्ता जो पुण निक्कारणासेवे (१८५०) पायच्छितं पावति तंदुविहं ओहियं वनेच्छइयं
ओहंतु जमावणं तंजिअति तम्मि सहाणं (१८५१) निच्छइयं अत्येणं वीमंसित्ता उदिअतीजंतु
एयं अत्यविरेगंयोकडियं छविहं इणमो (१८५२) कस्स कहं कहिं तं वाकदिया नुकम्मि केधिर होइ
छट्ठाणपदविभत्तं अत्यपदं होड़ बोगडियं ।। १२३ (१८५३) कस्सति गीतागीतस्स वावि कह जयण अजयणाए वा
कहिं अद्धाण वसंते कतिया नुसुभिक्खुदुभिक्खे (१८५४) अहवा दित राओवा कम्मिहति कारणे व इतरे वा
कम्हि वपुरिसज्जाते आयरियादीण अण्णतरे। (१८५५) केन्चिर कतिवारे खलु केवइकालं व सेवियं होता
एवं छट्ठाण एवं सुद्धासुद्धे असुद्धियरे (१८९५) संघयणधितिजुयाणं सहूण अरहं तु दिगए तत्य
असहूअथिरादीणं दिनति चाएतिज यो, (१८५७) सोऊण कप्पियपदं करेति आलंबणं मइविहूणा
__रहसंच अणरहस्सं करेइमइसूयओ पुरिसो (१८५८) माइद्वाणविमुक्को अकप्पियंजो उसेवते भिक्खू
तंतस्स कप्पियपदंमायासहिते चरणभेदो (१८५१) एसो चरित्तकप्पो एतो वोच्छामि उवहिकप्पंतु
सो पुणपुव्याभिहितो ओहुग्गहवुजुत्तओ चेद (१८५०) जो उ विसेसो एत्यं तं नवरं इह अहं तुबक्खामि
__ सुटुगमादिएहिं धारेयव्योजहाकमसो (१८६१) फासुयमफासुए याविजाणए या अजाणए
ओहोवहुवग्गहिते धारणा कस्स केचिरं (१८९२) जइ फासुवही कारणेगहिओतूजाणएणतो धारे
जोजुण्णोऽजनोवि हू अह पकुव्वे तु छुमति हु (१८५३) फासुगे अजाणएणं कारणगहिओ धरेजते ताव
जावऽष्णो उप्पण्णो ताहे उ विगिंचएतंतु
||१८५५॥
11१८५६॥
॥१८५७॥
।।१८८५॥
॥१८५९॥
||१८६०||
॥१८६॥
||१८६२॥
||१८६३||
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