Book Title: Agam 38B Panchkappabhasa Chheysutt 05B
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 112
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir गा-७९३ ||१७९२॥ 1१७९३ 11१७९४॥ ||१७९५॥ ॥१७९६||* ||१७९७॥ ॥१७९८० ॥१७९९॥ ||१८००|| (१७९२) एएहि कारणेहिं खेत्तागादमि एरिसे पत्ते अच्छंति असदमावा एगखेत्तेऽविजयणाए (१७९३) कालस्स दावि असई वासायासे वितरणा नत्यि एएहि कारणेहिं कालागाढं वियाणाहि (१७१४) याप्साजोगं खेत्तं पहिलेहेउं तु कालोन पहुत्तो पचंताण व अंतरं वासंतुनिवडियं पायं (१७९५) इहरंयउत्तरखेतं ताहे तं चैव पुदखेत्तंतु गंतं वसती यासंसमतीते वीतदसरातं (१७९६) अतिउक्कडं यदुक्खं अप्पा वा वेदणाझवे आउं एपहिं कारणेहि मायागाद वियाणाहि (१७९७) अधुक्कड सूलादी अहिडक्काई उ वेदणा अप्पा तत्यऽग्गितादणादी देहच्छेदो व गाढादी (१७९८) जम्मि विणडे गछस्स विनासो तह य नाणचरणाणं एएहि कारणेहिं पुरिसागादं बियाणाहि (१७११) तस्स उ सुद्धालंभे जावजीवंतु द्रि होतऽसुद्धेणं कायव्यं तू नियमा पुरिसागाढं भवे एतं (१८००) जेण कुलं आयत्तं तं पुरिसं आयरेण रक्खेज्जा नहुतुंबम्भिविणढे अरया साहारगाहोति । (१८०१) संजोगदिपाढी फासुगउवदेसणासुजो कुसलो एयारिसस्स असती नायब तिगिच्छमागादं (१८०२) मजणतूलिविभासा असणे पाउरणए य पाणे य केवडियाण पदाणे अण्णहचित्तो गिलाणो वा (१८०३) होज व सहायरहिओ अव्वतावादि अहव असमत्था एय सहायागाढं तम्हाउ मुणीन विहरिआ (१८०४) जावंति पवयणम्मीपडिसेवा मूलउत्तरगुणेसु तासत्तसु सुद्धेसूसुद्धमसुद्धायऽसुद्धेसु (१८०५) आगाढपणागादे एवं जंजत्य होइ करणिशं तंतह सइहमाणे दंसणकप्पो हवइ एसो (१८०५) एसो सणकपोहुणा सुतकप्पमोउयोच्छामि जेतत्य होति विहयो अहिलते जेणया दिहिणा (1८०७) दुविहम्पि आगामम्मी सुत्ते अत्ये यजे महिं मावा सुत्तमसुत्तकडाणं पवित्या ताण अत्येणं (१८०८) वित्थारो नाम सुत्तम्मि गहिए अत्यो ऊ दिखती सुत्ते अहिञ्जियव्वे तु मञ्जादाऊइमा भवे (१८०१) पडिलेहण काऊणं सज्झायं पट्टवेउवट्ठादी आयरियादिणिसेझं करेइ पच्छाय सन्झायं ||१८०१॥ ||१८०२॥ ।।१८०३10 ॥१८०४10 ॥१८०५॥ १८०६॥ ||१८०७॥ ||१८०८॥ 11१८०९॥ For Private And Personal Use Only

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