Book Title: Agam 38B Panchkappabhasa Chheysutt 05B
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 103
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir १०० पंचकपो - (110) 11१६३०॥* ||१६३१॥ १६३२॥ ||१६३३॥ ||१६३४॥ ॥१६३५॥ ॥१६३६॥ ॥१६३७॥ ॥१६३८॥ (१९५०) दंसणनाणचरिते अनुपालण पत्यणा पसत्यो उ इंदियविसयकसाएसु अप्पसत्यो उ संकप्पो (१९३१) दंसणपभावगाइंसत्याईकहमाई अहिशेजा जोचिंतेयं एसो संकप्पोदंसणे होति (१५३२) नाणइयारंन करे कहंच नाणं अहं अहि जा इति नाणे चारिते सुद्धचरित्तो कहं होगा (१९१६) उत्तरउत्तरिएहि व चारितगुणेहि कह नु विहरेशा एसो तुचरित्तम्मी संकप्पो सत्यगो मणितो (१९३४) सहादिइंदियत्याग पत्यणा तह य रागगमणंतु कोहादिकसायाण य अग्झपं होति अपसत्यं (१९३५) एसो खलु संकप्पो एत्तो वोछामऽहंतु उयकप्पं उवकप्पती करेति उवणे व होति एगट्ठा (१९३६) पत्तेण व पाणेण य उपकरणेण व उवग्गरं कुणति उपकप्पइ गुणधारी उवकपंतं वियाणाहि (१९३७) खुहिओपिवासिओ वा सीतमिभूतो वनताती पदितुं तस्स करेइ उवगह पडतकास्स वाथणा (१९३८) जो उप्पाऍ समाहिं चउब्बि नाणदसणे चरणे तत्तोय तवसमाहि तस्स खमे निजरा होति (१५५१) पत्तेण व पाणेणं उयकरणेणं य उपगहितदेहो जो कुणइ सि समाहिं तस्सावरणं हणति दाता (१६४०) पत्तस्स व पाणस्स घ उवकरणस्स घ उवगडकरस्स जो कुणइ अंतरायंतस्सावरणं पवड्ढेति (१६४१) एसुवकप्पो मणिओ एतो वोळं अहं तु अनुकप्पं अनुसहोतूतहियं पच्छाभावे मुणेयव्यो (१६२) नाणचरणदयाणपुवायरियाण अनुकिर्ति कुणइ अनुगच्छइ गणधारीअनुकप्पंतं वियाणाहि (१६४३) गुणसयसहस्सकलियाण गुणुत्तरतरं व अभिलसंताणं जे खेत्तकालभावा आसाजोगहाणि भवे ' (१६) गुणसयकलिओजम्मो मोक्खोय गुणुत्तरो मुणेयव्वो ___ सामापारीहाणि तु जोगहाणी मुणेयव्या (१६४५) खेताणऽसती अखाण उच्चखित्तम्मि काल दुबिक्खे पावे गेलण्णादिसु सुद्धापावे तुजदसुद्धं (147) गेहेऽऽहारादी नाणादगीसूव उज्जमण कुमा अणसणमादी व तवं अकरेमाणस्स साहुस्स (५७) नेगंतनिजरासेजह मणिया सासणे जिनवराणं जोगनियत्तमईणं सुहसीलाणं तयो छेदो ।।१९३९॥ ।।१६४०। ॥१६४१॥ ||११४२॥ ॥१६४३॥ ॥१६॥ १६४५॥ ॥१६४६॥ ॥१६४७॥ For Private And Personal Use Only

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