Book Title: Agam 38B Panchkappabhasa Chheysutt 05B
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 104
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir मान1४८ ॥१५४८॥ ||१६४९॥ ॥१६५00 ॥१६५१||* ||१६५२||* ||१६५३॥ ||१६५४॥ ॥१६५५॥ ॥१६५६॥ (१५४८) सुहसीलदुइसीला तेर्सि अप्फासु गेण्हमाणाणं आयजे तहियं तवं च छेदं च तं पावे (१५४५) उक्कप्पो यइयाणिं उड्दं कप्पोऽवि होइ उक्कपो अहवावि छिनकप्पो उक्कप्पो अहवण अवेतो (१९५०) उग्गमउप्पायणएसणासु निक्लेक्खो कंदभूलफले गिहिवेयावडियासु य उक्कपंतं वियाणाहि (१९५१) नामणि मणि लेसणि वेयाली चेव अद्धवेयाली आदानपाडणेसुय अन्नेसुपएवमादी (१९५२) तसएगिदियमुच्छणसंसेइममच्छमरणममिओगे रोद्दाहव्वण तह बंमदंडं यंमेय अगणिस्स (१९५३) नामणि रुक्खफलाणं पडिमाणं देउलाणयूमादी यंभणि पदमविन चलति लेसणि लेसेति अंगाई (१६५४) विद्दिवाण य आणणि अहव निलुककावणम्मिवेयाली उनुविऊण नियाओ तक्खण एसऽद्धवेयाली (१९५५) गम्भाणं आदानं करेति तह साडणंच गव्यमाणं अभिजोग वसीकरणे विजाजोगादिहिं कुणइ (१६५६) विच्छिगमच्छिमममरे मंडुक्के मच्छए तहा पक्खी संमुच्छावेमादी जोजोणीपाहुडेणंच (१६५७) पसुउद्दवियं जागं आहव्दण मंत रोद्दकम्मे य ___ कोहादिबंभदंडो यंभणि अगणिस्स मंतेणं (१९५८) एमादि अकरणिशं निकारणे जो करेइ तूभिक्खू सन्चो सो उक्कप्पो एत्तोअकप्पंतु योच्छामि (१९५१) निकिक्रवणिरणुक्कंपो पुप्फफलाणं व साडणं कुणइ जंचऽन्नएवमादी सब्बतं जाणसु अकप्पं (१९६०) जो उ किवं न करेई दुक्खत्तेसुंतु सव्वसत्तेसु निरवेक्खोरीयादिसुपवत्तई निक्कियो सोउ (१५६) सहसाय पभाएणवपरितावणमादि बिंदियाईणं काऊण नाणुतपइनिरणुकंपो हवइ एसो (१९५२) सत्तहमठाणेसूसटाणासेवणाऐं सहाणं गच्छागादम्मिउ कारणम्पि बितियं मवे ठाणं (१५६३) सत्तहमठाणाइंउक्कप्पो चेव तह अकप्पोय तेनिक्कारणसेवी पावइ सहाणपछितं (१९६४) पत्तम्मि कारणे पुण राय द्वादियम्मि आगाटे जयणाएँ करेमाणोहोतिपकपोठितिहाणं (१५६५) दंसणनाणचरिते तवविणए नियकाल पासत्यो नियंचनिंदिओ पवयणपितं जाणसुदुकपं ||१६५७॥ ॥१६५८॥ ||१६५९॥★ ॥१६६०॥ ॥१६६१॥ ॥१६६२॥ ||१६६३॥ ॥१६॥ ॥१६६५|| For Private And Personal Use Only

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