Book Title: Agam 38B Panchkappabhasa Chheysutt 05B
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan
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पाहा -२२२
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(३२२) पुच्छति सोऽवि पपुव्यो नपुंसगो नयिति अतिसुहं एवं आसप पोसे यता दुहावि सेवी अहं चेव (३२३) एवं पुच्छितु तओ अहवावि अपुच्छिऊण सह सेवे गेहेज्जा ही समणं तेण कहेयव्य तो गुरुणं (३२४) छंदिय कहिय गुरूणं जो न कहेति कहिएवि य उवेहि परपक्ख सपक्खे या जं काहिति सो तमावजे (३२५) सो समणसुविहिएहिं पवियारं कस्थती अलममाणो तो सेवितुं पवत्तो गिहिणो तह अण्णतित्थी य (३२६) अजसो य अकित्ती य तंपूलागं तहिं पवयणस्स तेसिंपि होति संका सच्वे एतारिसा मण्णे (३२७) एरिससेवी एतारिसावि एतारिलो चरति सद्दो सो एसो नवि अण्णो असंखड घोडमादीहिं (३२८) जम्हा एते दोसा तम्हा नवि दिक्खणिजो पंडो हु एसी पंडोऽभिहिओ एत्तो किलियं पवक्खामि (३२९) किलिवस्स गोण्णनामं तदभिप्पाओ कलिञ्जए जस्स सागरियं से गलती किलिवोत्ती भण्णती तम्हा ( ३३०) सो हू निरुम्भमाणो कम्मुदएणं तु जायए तइओ तम्मिवि सो चेव गमो पच्छितं वेव जह पंडो (३३१) उदएण वातियस्सा सविगारं जा न होति संपत्ती तच्चण्णिय असंवुडित दिट्टंतो तत्थिमो होति (३३२) नावारूढो तचण्णितो तु दङ्कं असंवुडमगारिं ओवतिओ पुरिसेहिं झडित्ति धारिजमाणोऽवि (१३३) एसो तु वातिगो हू अलभंतो सेवितुं अनायारं कालंतरेण सोऽवि हु नपुंसगत्तेण परिणमति (३३४) दुविहो य होति कुंभी जातीकुंभी य वेदकुंभी य जातीकुंभी वायव्हिओ हुसो भइऍ दिक्खाए (१२५) होइ पुण वेदकुंभी असेवओ सुज्झते सि सागरियं सोऽविय निरुद्धवत्थी नपुंसगताएँ परिणमति (३२६) वेदुकूकडता ईसालुगो हु सेविजमाण दवणं न चंएती धारेतुं निरुपमाणो भवे ततितो ( ३१७) सउणी उक्कडवेओ चडओव्व अभिक्ख सेवए जो तु सोऽविय निरुद्धवत्थी नपुसंगत्ताएँ परिणमति (२३८) तक्कम्मसेवि जो खलु सेविय तं चैव लिहति साणव्य सोऽविय अपडियरंतो नपुंसगत्ताऍ परिणमति (३३९) एगे पक्खे उदओ एगे पक्खम्मि जस्स अप्पो तु सो पक्खपक्खिओ हू सोवि निरुद्धो भवे अपुमं
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