Book Title: Agam 38B Panchkappabhasa Chheysutt 05B
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 70
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir पा-१०३९ ॥१०४०॥ (१०१९) कदा-विद्धा चरियं लाघवोएतवस्सी तत्तो तयो देसितो सिद्धिमग्गो अहाविहं संजम पालइता दीहउणो वुड्ढवासस्स कालो ॥१०३९।।* (१०४०) विजातु बारसंगं करणं तस्स गहणं मुणेयव्यं सुत्तं बार समाओतत्तियमेत्ता य अत्येवि (१०४१) धित्तुं सुत्तत्याइंबार समादेसदसणं च कंतं चरिय भंतेगट्ठलाधविएणं तु तिविहेणं ॥१०४१॥ (१०४२) उपकरणसरीरिदिय एवं तिविहं तु लाघवं होति उवकरण रत्तदुद्दोधरेति नय गिण्हए अहियं १०४२||D (१०४३) संघयणधितीजुत्तो अकिसो न तुथूरदेहसारीरो __वसिदिओ तवस्सी धउत्यमादी तयो चित्तो त्रो १०४३॥ (१०४) कुव्वंतेणं अछित्तिं नाणादी देसिओ तु मोक्खपहो सुत्तत्युवदेसेणं संजमियं संजमेण च ||१०४४॥ (१०४५) काऊण अवोछित्ति वारस यासाइंनिसमुअत्तो दीहाउतोतुसूरी पडिवजेऽब्मुनयविहारं ||१०४५।। (Hor६) अब्जयमचयंतो अगीयमीसो वगच्छपडिबद्धो अच्छति जुष्णपहलो कारणतो चावि अत्रोवि ॥१०४६॥ (१०७) जंघाबले पखीणे गेलण्णे सायतो व दोबल्ले अहयावि उत्तमढे निष्फत्ती चेव तरुणाणं ||१०४७॥ (७०४८) खेताणं व अलंभेकयसलेहे व तरुणपरिकम्मे एतेहिं कारणेहि बुड्ढावासं वियाणाहि 119०४८॥ (१०४१) केवतियं तुवयंतो खेत्तं कालेण विहरितुं अरिहो केवतियं च अणरिहो बलहीणो वुडवासी तु (२०५०) दुनिविदाऊण दुवे सुतं दातूण सुत्तवलंघ एवंदिवड्टमेगं अनुकंपादीसुदी जतणा ॥१०५०|| (१०५१) दोष्णिवि सुतत्याई दुवेत्ति जो जाति गाउए दोणि जावतु मिक्खावेला एस तु सपरक्कमो थेरो ||१०५१॥ (१०५२) एमेव उदाऊणं अत्यं अहवा अदातु दोणिवितु दो गाउयाई दोणि पुनाए मिक्खयेलाए (२०५३) एवं दिवड्दमेगं च गाउयं तित्रि होति एक्केक्के गमया तु मुणेयव्या विहरणअरिहोस घेरोतु 11१०५३॥ (१०५४) एस सपरक्कमोतूजो पुण दाऊण उभय सुतं या गच्छेज अद्धगाउयसपरक्खमो होति एसोयि (२०५५) सब्येते विहरती एतेसुदुगाउयंदिवड्डेवा जे जति गाउयं विय तिण्हंपेतेसि वुड्ढाणं (१०५६) जेऽविय गाउयमद्धं उमयं सुतं च दातु गच्छति तेसनुकंपातुइमोकायच्या होति तिविहाउ ॥१०४९॥ १०५२।। ॥१०५४॥ 11१०५५॥ 1१०५६ For Private And Personal Use Only

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