Book Title: Sucharitram
Author(s): Vijayraj Acharya, Shantichandra Mehta
Publisher: Akhil Bharatvarshiya Sadhumargi Shantkranti Jain Shravak Sangh
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सुचरित्रम्
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लाभ मुझे ठीक से समझ में नहीं आए हैं, कृपा करके स्पष्ट करें। तब वैद्य जी ने कहा- ठीक है, आप इन लाभों के विषय में साफ-साफ ही समझ - 1. नशीले पदार्थों की पूरी मात्रा से रात में लगातार खांसी चलती रहेगी तो आए हुए चोर भागेंगे ही, 2. सूजन और बादी से शरीर मोटा हो ही जाएगा, 3. पैरों में जरा सी भी चलने की ताकत न रह जाने से वाहन का उपयोग करना ही होगा और 4. जब जवानी में ही मौत हो जाएगी तो बुढ़ापा कहाँ से आएगा?
यह उत्तर सुनते ही राजकुमार इस तरह चौंका जैसे किसी ने बिजली का करंट छुआ दिया हो । वह चीख उठा नहीं आज और अभी से ही मैं सारे नशीले पदार्थों का त्याग करता हूँ। मुझे मरना नहीं है, जीना है और खुश रहना है।
कोई भी व्यसनी अपने सारे व्यसन छोड़कर जीवन को मोड़ सकता है, लेकिन साधारण रीति से ऐसा करना कठिन होता है। उसे एक झटके की जरूरत होती है कि उसका दिल-दिमाग हिल. उठे । व्यसनों को छुड़ाने के लिए झटके वाले मानसिक प्रयोग किए जाने चाहिए ।
कैसा होता है व्यसन ? व्यसन शब्द कैसे बना है? यह शब्द बना है दो शब्दों के मेल सेवि+असन अर्थात् बिगड़ा हुआ विकृत (वि) भाजन (असन)। बिगड़ी हुई वस्तुओं का सेवन करना, बिगड़ी हुई आदतें बनाना और बिगड़े हुए आचरण में लिप्त हो जाना - यह सब व्यसन में सम्मिलित होता है। इसे अंग्रेजी में 'एडीक्शन टू इविल हेबिट्स' कहा जाता है। ऐसी बुरी आदतें, जो व्यक्ति को शारीरिक रूप से अक्षम बनाती हैं, मानसिक कमजोरी लाती हैं, धन की हानि कराती हैं और सद्गुणों
नष्ट कर डालती हैं। एक पाश्चात्य काव्य का सारांश है- 'मृत्यु एवं व्यसन इन दोनों में से व्यसन अधिक कष्टदायक है, क्योंकि मृत्यु तो एक बार ही कष्ट देती है, किन्तु व्यसनी व्यक्ति जीवनभर बार-बार मृत्यु समान कष्ट भोगता रहता है।' यह तो है जीवन की बात, लेकिन मरने के बाद भी वह नारकीय यातनाओं को भोगता है। दूसरी ओर निर्व्यसनी व्यक्ति जीते जी भी सुख के सागर में तैरता है तो मृत्यु के पश्चात् भी स्वर्ग के दिव्य सुखों का उपभोग करता है ।
यह 'व्यसन' शब्द संस्कृत भाषा का है, जिसका अर्थ है - कष्ट । यहाँ हेतु में परिणाम का उपचार किया गया है। जिन प्रवृत्तियों का परिणाम कष्टदायक हो, उन प्रवृत्तियों को व्यसन माना गया है। व्यसन ऐसी आदत का नाम है जिसके बिना व्यक्ति रह नहीं सकता है। ऐसी आदत एकदम नहीं बन
मजा लेता है, रस पाता है तब उसका मन उस प्रवृत्ति को दोहराने से वह प्रवृत्ति आदत बन जाती है। ऐसी आदत भाषा में व्यसन की व्याख्या इस रूप में की गई है
है। ऐसी कोई प्रवृत्ति पहले तो व्यक्ति आकर्षण के आधार पर प्रारंभ करता है। जब उसमें वह बार-बार करने का हो जाता है। बार-बार ही व्यसन कहते हैं। एक संस्कृत कवि की
व्यसनस्य मृत्योश्च व्यसनं कष्टमुच्यतो । व्यसन्य धोऽधो व्रजति स्वयात्यिव्यसनी नतः ।
व्यसनों की तुलना उस कीचड़ वाले दलदली खड्डे से की जा सकती है, जिसमें ऊपर तो हरीहरी हरियाली होती है, फूल खिलखिलाते हैं, जिन पर मुग्ध होकर कोई आसानी से खड्डे में गिर जाता है। उस खड्डे से बाहर निकलना असाध्य नहीं तो दुःसाध्य अवश्य हो जाता है । व्यसनों का बाहरी रूप