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वि० सं० १९९८
देवकुमार - प्रन्थमाला का चतुर्थ पुष्प
वैद्यसार
अनुवादक तथा सम्पादक : आयुर्वेदाचार्य पं० सत्यंधर जैन, काव्यतीर्थ
प्रकाशक :
निर्मलकुमार जैन, मंत्री जैन - सिद्धान्त-भवन
धारा
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मूल्य : बारह आना
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प्रथम संस्करण, १०००
मुद्रका
श्रोसरस्वती-प्रिंटिंग-वर्क्स लि०, आर।
फरवरो, १९४२
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श्रीवीतरागाय नमः ।
भूमिका अनादि काल से संसार-भ्रमण करता हुआ यह जीव महान् पुण्योदय से मनुष्य-जन्म प्राप्त करता है। यद्यपि प्रायः सभी मत मतांतरवालों ने इस मनुष्य जन्म को सर्व योनियों में श्रेष्ठ, माना है, तथापि जैनधर्म में तो इसका और भी गौरव बताया गया है। प्राणिमात्र का अंतिम उद्देश्य और सर्वोपरि अनुपम सौख्य-स्थान, मोक्ष की प्राप्ति इसी जन्म से होती है। जीव को देव, तिर्यंच, नरक गतियों से मोक्ष नहीं प्राप्त होता। यद्यपि देव-योनि उत्तम और सुख की भूमि है, फिर भी अन्तिम ध्येय, जो कि संयम-प्राप्ति और केवलज्ञान की अनुपम विभूति प्राप्त होने के बाद प्राप्त होता है, और जहाँ पहुँच जाने के बाद यह जीव अनंतानंत काल तक अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतसौख्य अनंतवीर्य-इन अनुपमेय लब्धियों का सुख भोगता है, इस मनुष्ययोनि से ही प्राप्त होता है। सारांश, सांसारिक अवस्था में इस जीव की उन्नति के लिए मनुष्य-जन्म-प्राप्ति ही उत्तम साधन है। वैद्यक शास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथ, सुश्रुतसंहिता, में प्रारंभ के अध्याय में ही लिखा है कि "तत्र पुरुषः प्रधानम, तस्योपकरणमन्यत्" अर्थात् सांसारिक योनियों में पुरुष प्रधान है, अन्य पदार्थ सब उसकी उन्नति के साधन हैं। ___ मनुष्य की उन्नति को रोकने के लिए जिस प्रकार जरा, चिंता, जन्म-मरण, निर्धनता आदि विन्न स्वरूप हैं, उसी प्रकार रोग भी इस जीव का इतना प्रबल शत्रु है कि अनेक प्रकार के उपाय करते हुए भी जब यह अपना अधिकार इस शरीर पर जमा बैठता है, तब मनुष्य के ज्ञान, बुद्धि, बल-वीर्य आदि सभी गुण परास्त हो जाते हैं, और कुछ काल के लिए तो वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। वैद्यक के प्रसिद्ध ग्रन्थों में लिखा है कि
रोगाः कार्यकराः बलक्षयकराः देहस्य दाापहाः। दृष्टा इंद्रियशक्तिसंक्षयकराः सर्वा गपीडाकराः॥ धर्मार्थाखिलकाममुक्तिषु महाविघ्नस्वरूपाः बलात् ।
प्राणानाशु हरन्ति सन्ति यदि ते क्षेमं कुतः प्राणिनाम् ॥ अर्थात् रोग दुर्बल बना देते हैं, बल नष्ट करते हैं, शरीर की दृढ़ता का अपहरण करते' हैं, इन्द्रियों की शक्ति के नाशक हैं और सभी अङ्गों में पीड़ा पहुंचाते हैं। धर्म, अर्थ, सम्पूर्ण काम और मुक्ति में हठात् महान् विघ्न के रूप में उपस्थित हो जाते और प्राणों का हरण कर लेते हैं। यदि किसी प्राणी को वे रोग हुए हों, तो उसको कुशल कहाँ।।
जैन-शास्त्रों में भी इसके अनेक दृष्टांत मौजूद हैं; जैसे स्वामी समन्तभद्र को भस्मक व्याधि ने कुछ काल के लिये क्रियाहीन कर दिया था। श्री मुनि वादिराज को कुष्ठ रोग के कारण परेशानी उठानी पड़ी थी। रोग प्राणिमात्र का महान् वैरी है और जबतक जीव उसके
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( ख ) . चंगुल में फंसा रहता है, अर्धमृतक के समान रहता है। व्यापार, धर्मसाधन, विद्यासाधन आदि कोई भी सांसारिक या धार्मिक उन्नति करनेवाला कार्य वह नहीं कर सकता है।
वैद्यक शास्त्र में रोगों के प्रादुर्भाव के कारण पूर्वजन्मकृत पाप तथा इस जन्म में कुपथ्यादि सेवन बतलाये गये है, यथा :
पूर्वजन्मकृतं पापं व्याधिरूपेण बाधते ।
तच्छातिरौषधैर्दानैः जपहोमवतार्चनैः ॥ अर्थात् पूर्वजन्म के पाप (असातावेदनीय के द्वारा) इस जन्म में रोगरूप में प्रकट होकर कष्ट देते हैं। उनकी शान्ति के लिये औषध, दान, पूजन आदि हैं। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि रोग इस जीव के पापकों का फलस्वरूप है और उससे बचने के लिये मनुष्य को सदैव संयम से रहना चाहिये। जिस प्रकार पूर्वजन्म का संयम, रोग-प्राप्ति से बचाता है, उसी प्रकार इस जन्म का संयम (पथ्यादि) मनुष्यों का रोग नष्ट करने में सहायक होता है। ___ इस जीव के जन्म-मरण की परंपरा अनादि से है। तब यह बात निविवाद कही जा सकती है कि इस जन्म-परंपरा के साथ चलने वाले रोग भी अनादिकाल से हैं और उनको नष्ट करने के उपायों का ज्ञान भी, जो कि आयुर्वेद के नाम से प्रसिद्ध है, जीव को अनादि काल से है। इसी कारण शास्त्रकारों ने आयुर्वेद का लक्षण, जो कि अतिव्याप्ति, अव्याप्ति और असंभव-इन तीन दोषों से रहित है, इस प्रकार बतलाया है :
आयुर्हिताहितं व्याधिनिदानं शमनं तथा विद्यते यत्र विद्वद्भिः स आयुर्वेद उच्यते अनेन पुरुषो यस्मादायुविन्दति वेत्ति च तस्मान्मुनिवरैरेष आयुर्वेद इति स्मृतः ।
अर्थात् जिसमें आयु, उसके हित, अहित, व्याधि तथा उसके कारण तथा उसके शांत करने के उपाय बताये गये हों, उसको आयुर्वेद कहते हैं। जिसके द्वारा मनुष्य आयु को प्राप्त करता है, जिसके द्वारा आयु को कायम रखने के उपायों को जानता है, उसको मुनियों ने आयुर्वेद कहा है। ___ जरा ध्यान दीजिए, कैसा स्पष्ट और व्यापक लक्षण है। संसार की सब चिकित्साप्रणालियों को छान डालिये, सबका तत्त्व निकालिये, ऐसा उत्तम सिद्धांत कहीं पर भी नहीं मिलेगा । सब पद्धतियों में दोष मौजूद हैं। कहीं पर पथ्यापथ्य का विवेचन नहीं, तो कहीं पर उम्र बढ़ानेवाले उपाय नहीं लिखे हैं; कहीं पर रोगों की परीक्षा का तरीका दोषपूर्ण है, तो कहीं पर चिकित्सा ऐसी सुलभ नहीं है, जो अमीर-गरीब, बाल-वृद्ध, स्त्री-पुरुष-सबों के लिए उपयोगी हो। सारांश में हमारा प्राचीन आयुर्वेद ही सर्वोपरि और सर्वाङ्गपूण है। बहुतसे व्यक्ति इसको अवैज्ञानिक कहते हैं, और इसकी हँसी उड़ाया करते हैं। लेकिन ज्यों-ज्यों आयुर्वेद का अध्ययन और प्रचार बढ़ता जा रहा है, इसके विरोधी भी इसके हिमायती बनते
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( ग ) जा रहे हैं। आयुर्वेद का आठ अंगों में विभक्तीकरण ही उसकी वैज्ञानिकता को सिद्ध करता है। ये आठों अङ्ग इस प्रकार हैं:
१ शल्य-चीर-फाड़ (ऑपरेशन) का इलाज । २ शालाक्य-गर्दन से ऊपर की बीमारी, जैसे कान, नाक, गला, आँख, दाँत और
सिर के रोगों का इलाज। ३ कायचिकित्सा-सम्पूर्ण शरीर में होनेवाले बुखार, दस्त, कास, श्वास, प्रमेह एवं .
जलोदर आदि रोगों का इलाज । ४ भूतविद्या-गृहदोष, भूत-प्रेत, पिशाच आदि का उपाय । ५ कौमारभृत्य-बच्चों के रोगों का इलाज, उनका लालन-पालन, माता के रोग तथा
उसके दुग्ध के शोधन-बर्द्धन आदि का उपाय । ६ अगदतंत्र-सर्प, बिच्छू, बर्र, गृहगोधिका आदि जंगम विषों का तथा संखिया,
धतूरा, अफीम आदि स्थावर विषों के लक्षण और उनसे प्रसित
रोगियों के विष दूर करने का उपाय | ७ रसायनतंत्र-वृद्ध, बाल, निर्बल, इन्द्रियहीन, बुद्धिहीन व्यक्तियों का बल तथा
आयु बढ़ाने के उपाय। ८ वाजीकरणतंत्र-वीर्यहीन या दुष्टवीर्य, नपुंसक और बलहीन पुरुषों के वीर्य
___ शोधन, वीर्यवर्द्धन, संतानोत्पत्ति आदि के उपाय । अब पाठक स्वयं सोच सकते हैं कि इन आठ अङ्गों के बाहर कौन सी चीज बाकी रह जाती है ?
आयुर्वेद में शरीर-रचना मुख्यतया वात, पित्त और कफ से मानी गई है और इन तीन दोषों की (कार्य के अनुसार इनकी गणना-मल और धातु में भी की गई है) रचना पंचतत्त्वों (पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश) से हुई है, जो शरीर की बनावट के कारण हैं और उसके पोषण और वर्द्धन में सहायक है। इन पंचतत्त्वों से ही मीठा, खट्टा, लवण, कड़वा (मिरच
आदि) तिक्त (नीम, चिरायता आदि), कसैला (हड़ आदि) इन छः रसों का जन्म होता है। संसार में जितने भी पदार्थ हैं, वे सब इन छः रसों के अन्तर्गत आ जाते हैं। इनका भी पंचतत्त्वों से ही पोषण होता है। सारांश, पंचतत्त्वों से ही शरीर बना है और इन्हीं से उसका पालनपोषण, और वर्द्धन भी होता है। उनमें न्यूनाधिकता होने से शरीर में रोगोत्पत्ति होती है।
और उसकी न्यूनाधिकता ठीक करने के लिए षट् रस ही उपयोगी होते हैं। जिस तत्त्व की शरीर में न्यूनाधिकता होती है उसको ठीक करने के लिये उसी रस का उपयोग तथा त्याग किया जाता है। संक्षेप में यही व्याधियाँ हैं, और यही चिकित्सा का मूल मंत्र है। जैनमत के अनुसार ये सब पदार्थ पुद्गल के अन्तर्गत आ जाते हैं और बहुत अच्छी तरह घटित होते हैं। इस विषय को लेकर एक स्वतंत्र पुस्तक बनाई जा सकती है।
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(घ)
इन ऊपर की पंक्तियों का आयुर्वेद में दो श्लोकों में कितना अच्छा विवेचन किया गया । है, वह ध्यान देने योग्य है :
विसर्गादानविक्षेपैः सोमसूर्यानिलाः यथा धारयन्ति जगद्द हं कफपित्तानिलास्तथा ॥
अर्थात् — जैसे छोड़ना, ग्रहण करना, विक्षेप इन क्रियाओं से चन्द्रमा, सूर्य, और वायु संसार को धारण किए हुए हैं। इसीप्रकार वात, पित्त, कफ शरीर को धारण किये हुए हैं। इसी विषय को चरक के विमानस्थान में - 'पुरुषोऽयं लोकसम्मित इत्युवाच भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः ॥ यावन्तो हि मूर्त्तिमन्तो लोके भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके' । इत्यादि पंक्तियों में पुरुष और लोक का सादृश्य सिद्ध किया है। जैनमत के अनुसार तो यदि मनुष्य अपनी कमर पर दोनों हाथ टेककर खड़ा हो जाय, बस वही स्वरूप लोक का है। देखिये, यहाँ जैनमत और आयुर्वेद का कितना सामंजस्य है, जो कि पदार्थों के सामंजस्य से ही नहीं, आकार के सामंजस्य से भी वैसा ही है।
- पूज्य उमास्वातिकृत दशाध्याय सूत्र के पाँचवें अध्याय के “शरीरखाङ्मनः प्राणापानाः पुद्गलानां, सुखदुःखजीवितमरणोपमहाश्च” – इन दो सूत्रों में रोगों के और जीवों के संबंध को भले प्रकार से दर्शा दिया है।
जैसा कि मैंने पहले लिखा है कि पंचतत्वों से ही रस बनते है इस बात का चरक के एक ही श्लोक में कैसा अच्छा वर्णन किया गया है :
क्ष्मभोऽग्निक्ष्मां तेजःखः वाय्वग्न्यनिलगोनिलैः इयोल्वणैः क्रमाद्भूतैः मधुरादिरसोद्भवः ॥
और वायुतत्त्व से कसैला (हड़ आदि) रस बनते हैं। जाय, तो प्रत्येक रस में प्रत्येक तत्त्व के अंश हैं
पृथ्वी जलतत्व से मधुर, अनि पृथ्वी तत्त्व से अम्ल, जल और अमित से लवण, आकाश-वायु तत्त्व से कटु (मिरच आदि), अग्नि और वायुतत्त्व से तिक्त (नीम आदि), पृथ्वी यह ठीक है कि यदि सूक्ष्म विवेचन किया उक्त वर्णन में केवल प्रधानता बताई गई है। जैनधर्म में आयुर्वेद का स्थान
जैनधर्म में तो आयुर्वेद का खास स्थान है। इसके द्वादशांग शास्त्र में जो दृष्टिवाद नाम का बारहवाँ अंग है (जिसके पाँच भेद किये हैं और जिसका एक भेद पूर्वगत है ) उसको चौदह प्रकार का बतलाया है। इनमें जो प्राणवाद नाम का पूर्वशास्त्र है, उसमें विस्तार• पूर्वक वैद्यक शास्त्र का वर्णन किया गया है, जो त्रिकालाबाधित है। यह बात निर्विवाद सिद्ध है कि जैन तीर्थंकर केवल - ज्ञान - विभूति सहित होते थे, उनका ज्ञान पूर्णज्ञान होता था, उसमें किसी भी प्रकार की भूल होने की संभावना नहीं। इस अंग के लाखों श्लोकों में
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(
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अष्टांग आयुर्वेद का विस्तार से वर्णन है, जिसमें निदान, रोगों के लक्षण, पथ्यापथ्य, अरिष्ट लक्षण (रोगी के मरण के पहले उत्पन्न होने वाले चिह्न) आदि का वर्णन है । सारांश, सब प्रकार के वैद्यकोपयोगी विषयों का वर्णन है । जिस प्रकार ये अंग, छिन्न-भिन्न हो गये हैं ★ और काल-दोष से दुर्लम और अप्राप्य भी हैं, उसी प्रकार वैद्यक प्रन्थों का मी परम्परानुसार मिलना कठिन हो रहा है
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इस बार श्रीगोम्मटेश्वर महामस्तकाभिषेक के उत्सव से लौटते समय मूडबिद्री के 'सिद्धांत - भवन' में वहाँ के अध्यक्ष ने मुझ को कई ग्रन्थ कन्नड लिपि के दिखलाये थे तथा पढ़कर भी सुनाये थे । खेद के साथ लिखना पड़ता है कि हम जैनों की साहित्यिक रुचि के कारण अभी वे ग्रन्थ जिह्वा पर कहने लायक ही बने हुए हैं । वे ग्रन्थ दस-पन्द्रह हजार श्लोक संख्या तक के हैं । समन्तभद्रस्वामी एवं पूज्यपादस्वामी जैसे महान् आचार्यों के बनाये हुए वैद्यक - प्रन्थ इनमें हैं । ये महानुभाव जैन - साहित्य में उच्चतम कोटि के आचार्य गिने जाते हैं ।
अभी सोलापुर से श्रीवद्धमान पार्श्वनाथ शास्त्री ने 'कल्याणकारक' ग्रन्थ का अनुवाद कराके छपाया है । यह ग्रन्थ भी अत्युत्तम है । इस के प्रकाशित होने से जैनेतर विद्वानों का ध्यान भी जैन - आयुर्वेद की तरफ आकृष्ट हुआ है। इसकी भूमिका तथा सम्पादकीय वक्तव्य मनन करने योग्य है, तथा जैन वैद्यककार आचार्यों की कृतियों पर अच्छा प्रकाश डालता है ।
जैन वैद्यक की खास विशेषता यह है कि इसमें स्वार्थ को ही मुख्य स्थान नहीं दिया गया है, अर्थात् अपने क्षणभंगुर शरीर की रक्षा के लिए अन्य जीवों के शरीरावयवों को उदरस्थ कर लेने का उपदेश या विधान इसमें नहीं है । जहाँ अन्य वैद्यक - प्रन्थों में मल-मूत्र, अस्थि- चर्म, रक्त-मांस आदि का स्पष्ट विधान है, यहाँ तक कि एकाध स्थानों पर गो-रक्त, गोमांस, मनुष्यावयव तक के योग वैद्यकप्रन्थों में आये हैं-वहाँ शहद तक का त्याग जैन आचायों बतलाया है। आसव, अरिष्ट, जिनमें एकेंद्रिय तो क्या, दो इन्द्रिय, जीव तक आँखों से दिखाई पड़ते हैं, त्याज्य बतलाये गये हैं । अवलेह आदि की मर्यादा बतलाई गई है, जिनमें कभी कभी आधुनिक यंत्रों (खुर्दबीन आदि) से साक्षात् दो इन्द्रिय वाले जीव दिखाई पड़ते हैं । इसी कारण से जैन आचार्यों ने तरल पदार्थों द्वारा चिकित्सा के स्थान पर रसादि चिकित्सा बौद्धकाल तथा जैनकाल में इस रस - चिकित्सा का प्रचार प्राचीन ग्रन्थ इसके साक्षी हैं कि रस-चिकित्सा विशेष लाभ
पर अधिक जोर दिया है और और उन्नति भी विशेष हुई है । दायक है :
अल्पमात्नोपयोगित्वादरुचेरप्रसंगतः ।
क्षिप्रमारोग्यदायित्वादद्यैषधेभ्योऽधिको रसः ॥
ऐसा अनेक आचार्यों ने लिखा है । सारांश में वैद्यक-साहित्य में जैनाचार्यों का खास स्थान है। योगरत्नाकर में मृतसंजीवनी वटिका के संबंध में "पूज्यपादैरुदाहृता” ऐसा पाठ आता है,
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तथा 'भाषितं पूज्यपादैः' इत्यादि अनेक योगों के अन्त में मिलता है, जिससे सिद्ध होता है कि जैन आचार्यों ने इस समस्या को मले प्रकार हल किया है।
लेख बहुत बढ़ गया है। अन्त में सारांश यह है कि मनुष्यमात्र को रोगमुक्ति के लिए चिकित्सा की आवश्यकता है और उसकी अच्छी विधि के लिये आयुर्वेद ज्ञान की आवश्यकता है। जिन अचार्यों ने ऐसे प्रन्थ संग्रह किये हैं, उन्होंने संसार का बड़ा उपकार किया है, खासकर रस-प्रन्थ रचनेवालों ने तो और भी कमाल का काम किया है। - ऐसे ही एक आचार्य का बनाया हुआ 'वैद्यसार' नामक ग्रन्थ हमारे सामने है, जो जैनसमाज के प्रसिद्ध दानवीर, परोपकारी बाबू निर्मल कुमारजी तथा बाबू चक्र श्वर कुमारजी बी० एस-सी, एल-एल-बी०, एम० एल० ए० द्वारा संचालित 'जैन-सिद्धान्त-भवन' आरा से प्रकाशित हुआ है। इसकी खोज और प्राप्ति के लिए 'भवन' के अध्यक्ष श्रीमान् विद्याभूषण पं० के० भुजबलीजी शास्त्री ने बड़ा परिश्रम किया है। आपकी बहुत दिनों से इच्छा थी कि कोई जैन वैद्यक-ग्रन्थ प्रकाश में आवे। इसके लिये आप सदैव से हम लोगों को प्रेरणा किया करते थे।
इसकी टीका श्रीमान् पण्डित सत्यंधरजी जैन 'वत्सल' आयुर्वेदाचार्य ने, जो कानपुर के आयुर्वेद-विद्यालय में ही कई वर्ष रह कर वैद्यक की उच्चकोटि की शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं, आज कल छपारा, जिला छिंदवाड़ा में रहते हैं, बड़े परिश्रम से की है। इसके लिए उनको अनेक धन्यवाद है। ___ यद्यपि प्रन्थ छोटा है, किन्तु बड़ा उपयोगी है। इसके संग्रहकर्ता का नाम तथा स्थान
और समय का पता न लगा सका। कई बार मेरे और पं० के० भुजबलीजी शास्त्री के बीच पत्र-व्यवहार भी हुआ, एक दो जगह और भी तलाश की गई, लेकिन शोक है कि हम लोग इस कार्य में सफल न हो सके। ग्रन्थ छपे भी लगभग दो वर्ष हो गये। कुछ इस कारण से कुछ अन्य विघ्न-बाधाओं के आ जाने के कारण इसकी भूमिका भी नहीं लिखी जा सकी थी। __ अब कुछ इस ग्रन्थ में आये हुए योगों पर पाठकों का ध्यान आकर्षित करके इसको समाप्त करता हूँ और आशा करता हूँ कि जैनसमाज में तथा वैद्यक-संसार में यदि इसका कुछ प्रचार हुआ और जनता को लाभ पहुँचा तो आगे वैद्यक ग्रन्थों के प्रकाशन में सहायता पहुँचेगी।
इस ग्रन्थ की रचना कविता के ख्याल से. तो बहुत ऊँची नहीं मालूम होती है, लेकिन लेखक विद्वान् और विशेष अनुभवी मालूम होता है। प्रायः प्रत्येक रोग पर ऐसी योग्यता
और अनुभव के नुस्खे लिखे हैं, जो बहुत लाभकारी हैं। बहुत-से योग तो ऐसे मालूम होते हैं कि वैद्यकशास्त्र-भर का मंथन करके लिखे गये हैं। कुछ दृष्टान्त देखियेः ।
कन्दपरस-यह रस अपनी श्रेणी का नवीन प्रकार का है। ऐसा रस किसी भी ग्रन्थ
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में नहीं देखा गया है; क्योंकि प्रायः उपदंश के औषध केवल व्रणों को ही ठीक करते हैं, किन्तु कंदर्परस शारीरिक शुद्धि के साथ-साथ धातुबद्धक और पौष्टिक भी है। इसके प्रयोग से निकृष्ट रक्त वाले और अशुद्ध वीर्य वाले व्यक्ति भी कामदेव-सदृश सुन्दर शरीर को प्राप्त कर तेजस्वी सन्तान पैदा कर सकते हैं।
विबन्ध के लिए-विरेचकतिक्तकोषातकी योग–यह योग कड़वी तोरइ से बनाया गया है। इसके द्वारा बनाये गये तैल को सिर्फ पैर के तलवों पर लगाने और नामि पर मलने से अन्तरङ्ग आमदोष का वहिःनिःसरण होने लगता है। कैसा चमत्कार है कि औषध सेवन किये विना भी, स्पर्शमात्र से, भीतर की व्याधियाँ शान्त हो जाती हैं। ___ इसी विषय का जयपाल योग है। भैषज्यरत्नावली, रसेन्द्रसार-संग्रह आदि ग्रन्थों में इच्छाभेदीरस नाराचरस आदि औषध विबन्ध अवस्था में रेचन कराने के लिये दिये जाते हैं, क्योंकि वहाँ पर जयपाल को विरेचक ही माना गया है किन्तु इस ग्रन्थ में ठंढे पानी के अनुपान से विरेचन गुण जतलाते हुए गरम पानी के साथ देने से वमन गुण भी प्रकट किया गया है। इस प्रकार एक ही योग से दो विरुद्ध कार्य किये जा सकते हैं। ___उदयादित्यवर्ण रस-यह तो वास्तविक में यथा नाम तथा गुण वाला है। इसको मोतो मूंगा,सोना और तांबा आदि रत्नों और भस्मों के सम्बन्ध से अद्भुत चमत्कारपूर्ण कर दिया गया है । इसका प्रयोग तपेदिक, श्वास, कुष्ठ, सन्निपात आदि कष्टसाध्य रोगों के लिये सदुपयोगी है। जो व्यक्ति जीर्णज्वर, राजयक्ष्मा आदि बीमारियों से हताश हो चुके हैं, वे लोग इस रस का अवश्य सेवन करें। ऐसी बीमारियों को दूर करने के लिये यह रामबाण निर्णीत हो चुका है। ___ लोकचिन्तामणि रस-तूतिया, वत्सनाभ विष और लागली आदि विषैले पदार्थों से बनाया गया यह रस कठिन से कठिन व्रण और विषैली गाँठों को बैठाने के साथ-साथ भयानक ज्वरों को भी शान्त कर देता है। प्लग-जैसी महामारी के लिए इस औषध का प्रयोग बहुत उत्तम है। वर्तमान समय में ऐसा अच्छा योग किसी भी प्रन्थ में देखने में नहीं आया है, जो कि खाने और लगाने-इन दोनों प्रयोगों के द्वारा प्लेग, कण्ठमाला, कारबकल श्रादि दुःसाध्य बीमारियों को ठीक कर सके। आशा है कि हमारे चिकित्सकगण इस उत्तम योग को प्रयोग में लाकर इसका प्रचार करेंगे।
वातरोग में रसादि योग-कुछ समय पहले सुना करते थे कि अमुक महात्मा ने चुटकी से जरा सी खाक या सरसों-सी गोलो दे दी थी, उसने बड़ा लाम किया इत्यादि । आज वैसा ही आश्चर्यजनक रस आपके सामने प्रस्तुत है। इस योग की सषप-सदृश वटी चौरासी प्रकार के वातरोग, कफरोग, प्रमेह, उदररोग और विषूचिका आदि उग्र व्याधियों पर अव्यर्थ लाम प्रकट करती है।
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कामाङ्कश रस-इस रस में व्योमसिन्दूर लौहसिन्दूर, वनमस्म (हीरा भस्म) और स्वर्ण मस्म आदि उत्तमोत्तम पदार्थ डाले गये हैं। कैसा भी क्षीण व्यक्ति इस रस के प्रयोग से बलवान् बन जाता है। यह रस स्तम्भन के लिए भी अनुपम योग्यता रखता है। एक तो वैसे ही हीरे की शक्ति बलवती होती है, किन्तु उसमें तो स्वर्ण आदि हृदय और मस्तिष्क को पुष्ट करने वाली रसायन रूप चीजें डाली गई हैं। वास्तव में इस रसको सेवन करनेवाला पुरुष शत या सहल स्त्रियों को तृम कर सकता है, और तभी उसको शान्ति मिल सकती है।
प्रभावती वटी-इसके गुणों को देखकर आश्चर्य होता है। प्रत्येक रोग पर अनुपान योग से ही इसका प्रयोग है। आँखों की बीमारियों में नेत्रों में आँजने से, व्रणों और ग्रन्थियों में लेप करने से, ज्वर, शूल आदि में खाने से बहुत लाभ होता है। नेत्ररोग, उदररोग, रक्तविकार, मूत्रकृच्छ, षण्डता, सन्निपात आदि कौन सी बीमारियां हैं, जो इससे दूर न होती हों। ___ त्रिलोकचूडामणि रस-तूतिया की भस्म शायद ही किसी रस में डाली जाती हो किन्तु इसमें तूतिया का प्रयोग है। लाङ्गली गुजा आदि का भी सम्बन्ध है, हुलहुल, नागदौन और धतूरे आदि की भावना देकर इसको इतना शक्तिशाली बनाया गया है कि यह वटबोज-प्रमाण मात्रा में देने पर भी सन्निपात में पड़े हुए मरणासन्न रोगी को यमराज से छुड़ा लेता है। डाकिनी-शाकिनी, प्रेत-राक्षस आदि को बाधाएँ भी इसके अस्तित्व में नहीं रहने पाती। इसी तरह के और भी अनेक योग हैं, जो अनुभव में लाने योग्य हैं । हम वैद्य-संसार सेखास कर जैन वैद्यों से प्रार्थना करते हैं कि वह इस पर पारश्रम करके कुछ योग प्रचार में लावें, जिस से जनता का उपकार हो, तथा जैन वैद्यक ग्रंथों की तथा उनके रचयिता जैन
आचार्यों की धाक संसार में पुनः उच्च पद प्राप्त करे। ___इस भूमिका के लिखने में मेरे सहयोगी वैद्यराज पं० जयचन्द्रजी आयुर्वेदाचार्य, प्रधानवैद्य, जैन औषधालय, कानपुर ने सहायता दी है, इसके लिये उनका आमारी हूँ। अन्त में श्रीजिनेन्द्र देव से प्रार्थना है कि
सर्वे वै मनुजाः भवन्तु सुखिनो हयैश्वर्ययुक्ताः सदा पूर्णरोग्यसमन्विताः नयपराः दीर्घायुषः श्रीयुताः सद्धर्माचरणे सदैव निरताः धैर्यानुकम्पान्विताः सत्यक्षांतिविवेकदानविमलाचारप्रभाशालिनः ॥
विनीत
कन्हैयालाल जैन, कानपुर
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प्रकाशक की ओर से जर्मनी, अमेरिका और इंगलैण्ड आदि पश्चिम राष्ट्रों के विख्यात विद्वान् भी अब मानने लगे हैं कि संसार भर की चिकित्सा-प्रणालियों का जन्मदाता हमारा आयुर्वेद ही है। अपने दीर्घकालीन अविश्रान्त अनुसंधान के फलस्वरूप इतिहास-विशारदों का भी कहना है कि सर्वप्रथम बौद्धों ने चरक एवं सुश्रुत इन महान् प्रन्थों का अनुवाद पाली भाषा में करके जापान
और चीन देशों में फैलाया तथा आज भी उन देशों की चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद चिकित्सापद्धति से मिलती-जुलती है। इतना ही नहीं, अरबी भाषा के प्राचीन ग्रन्थों में भी अनेकत्र उल्लिखित चरकसुश्रुतों का उल्लेख दृष्टि-गोचर होता है। __ आयुर्वेदीय औषधों को ढूंढ़ निकालने वाले हमारे जितेन्द्रिय समदर्शी ऋषि-महर्षियों ने जंगलों में वास करते हुये केवल लोकहित के लिये इस ओर गम्भीर विचार के साथ विपुल परिश्रम किया है। निर्दोष, चमत्कारी एवं अधिक लाभकारी विशिष्ट औषधों को निर्माण करने के लिये स्वार्थ-शून्य विचार अधिक आवश्यक है। आयुर्वेद, ज्योतिष और मन्त्रवाद
आदि विद्याएं वास्तव में लोककल्याण के लिये ही पैदा हुई हैं। आजकल के चिकित्सकों में उपर्युक्त वे गुण बहुत ही कम मात्रा में मिलते हैं। इसीलिये आज हमारे आयुर्वेद की दशा इतनी गिर गई है। एक बात और है। आज हमारे आयुर्वेद-विद्वानों में इस विषय में परिपूर्णता प्राप्त कर नवीन नवीन आविष्कारों द्वारा आयुर्वेद के महत्त्व को संसार में प्रकट करने योग्य पण्डित भी नहीं हैं ! आजकल की आयुर्वेदाध्ययन की प्रणाली भी इस युग के अनुकूल नहीं है। अन्यान्य चिकित्सा-पद्धतियों में हमें प्रतिदिन नये-नये सुधार दृष्टिगत हो रहे हैं। परन्तु खेद की बात है कि हमारे बहुत से आयुर्वेदज्ञ अभी तक चरक-सुश्रुत युग का ही स्वप्न देख रहे हैं। ये सुधार नहीं चाहते हैं। अनुसंधान की ओर तो इनका लक्ष्य ही नहीं जाता। इसमें सन्देह नहीं है कि प्राचीन ऋषि-महर्षियों के प्रयोगों को ही थोड़ा-सा परिवर्तन कर अपने नाम से रजिष्ट्री कराने वाले वैद्य काफी मिलेंगे। किन्तु वास्तव में यह चीज उनको नहीं है। इस गुरुतर लोकोपकारी विद्या के लिये पसीना बहाने वाले हमारे यहाँ बहुत कम हैं। इसीलिये आज आयुर्वेद की अवस्था इतनी दयनीय हो गई है।
बहुधा बहुमूल्य एलोपैथिक औषध, सुई (इंजेक्शन) आदि के द्वारा आराम नहीं होने वाले सन्निपात, विषम ज्वर, क्षय, प्रसूत, संग्रहणी, मधुप्रमेह आदि असाध्य रोगों को हमारे पूर्वजों के द्वारा हजारों वर्षे के पूर्व.द्द निकाले गये मकरध्वज, जयमङ्गलरस, च्यवनप्राश, वसन्ततिलक एवं सुवर्णमस्म आदि अमूल्य औषध आसानी से दूर कर सकते हैं। आज मी विशुख विष किस रोगी को किस परिमाण में देना चाहिये, इस बात का विशद ज्ञान बड़े
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बड़े सर्जनों की अपेक्षा एक भारतीय वैद्य अधिक रखता है। इस संबंध में हमारे पूर्वजों ने पर्याप्त परिश्रम किया है। आयुर्वेद में नाड़ीज्ञान तो अपना एक खास स्थान रखता है। इस संबंध में 'द्विवेदी-अभिनन्दन ग्रन्थ' में प्रकाशित आयुर्वेदपंचानन पं० जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल के द्वारा लिखित भारतीय चिकित्सा-शास्त्र की विशेषता-नाड़ी-परीक्षा- शीर्षक लेख अवश्य पठनीय है । चरकसुश्रुतसदृश बहुमूल्य चिकित्सासंबंधी ग्रन्थ प्राचीन पाश्चात्य चिकित्सासाहित्य में एक भी उपलब्ध नहीं है इसीलिये प्रो० विलसन, सर विलीयम हंटर आदि पाश्चात्य विद्वानों ने भारतीय शल्यचिकित्सा, रसायनशास्त्र, धातृशास्त्र, सूचिकाभेदन, सर्पचिकित्सा, पशुचिकित्सा आदि विषयों की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा कर आयुर्वेद चिकित्सा-प्रणाली को ही संसार की आदिम चिकित्सा प्रणाली माना है।... .. हमारे पूर्वज शल्यचिकित्सा में पूर्ण निष्णातथे, इस बात को प्रमाणित करने के लिये मैं रायबहादुर महामहोपाध्याय श्रीमान् गौरीशंकर हीराचंद ओझा की मध्यकालीन भारतीय संस्कृति' से कुछ अंश यहां पर उद्धृत किये देता हूँ। इससे शायद हमारी उन्नति-प्राप्त प्राचीन शल्यचिकित्सा से अनभिज्ञ वर्तमान प्रगतिशील पाश्चात्य शल्यचिकित्सा के अनन्य भक्त भारतीय विद्वानों की आँखें खुलेंगी। हाँ, मैं इस संबंध में इतना और कह देना चाहता हूँ कि जो प्राचीन शल्यचिकित्सा के विषय में विशेष देखनो चाहें वे 'नागरी-प्रचारिणी पत्रिका', भाग ८; अंक १, २ में प्रकाशित 'प्राचीन शल्यतन्त्र' शीर्षक लेख अवश्य देखें। ____ "चीर फाड़ के शस्त्र साधारणतया लोहे के बनाए जाते थे, परन्तु राजा एवं सम्पन्न लोगों के लिये स्वर्ण, रजत, ताम्र आदि के भी प्रयुक्त होते थे। यन्त्रों के लिये लिखा है कि वे तेज खुरदरे, परन्तु चिकने मुखवाले, सुदृढ़, उत्तम रूपवाले और सुगमता से पकड़े जाने के योग्य होने चाहिये। भिन्न-भिन्न कार्यों के लिये शस्त्रों की धार, परिमाण आदि भिन्न-भिन्न होते थे। शस्त्र कुंठित न हो जाय, इसलिये लकड़ी के शस्त्रकोश (cases) भी बनाए जाते थे, जिनके ऊपर और अन्दर कोमल रेशम या ऊन का कपड़ा लगा रहता था। शस्त्र आठ प्रकार के छेद्य, भेद्य, वेध्य (शरीर के किसी भाग में से पानी निकालना), एष्य (नाड़ी आदि में व्रण का ढूँढ़ना), आगे (दाँत या पथरी आदि का निकालना), विस्त्राव्य (रुधिर का विस्त्रवण करना), सीव्य (दो भागों को सीना), और लैख्य (चेचक के टीके आदि में कुचलना) हैं। सुश्रुत ने यंत्रों (औजार, जो चीरने के काम में आते हों) की संख्या १०१ मानी है; परन्तु वाग्भट्ट ने ११५ मानकर आगे लिख दिया है कि कर्म अनिश्चित हैं, इसलिये यन्त्र संख्या भी अनिश्चित है वैद्य अपने आवश्यकतानुसार यंत्र बना सकता है। शस्त्रों की संख्या भिन्न-मिन्न विद्वानों ने मिन्न-भिन्न मानी है। इन यंत्रों और शस्त्रों का विस्तृत वर्णन भी उन ग्रन्थों में दिया है। अश, भगंदर, योनिरोय, मूत्रदोष, आर्त्तवदोष, शुक्रदोष आदि रोमों के लिये भिन्न-भिन्न यन्त्र
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[ ट ] प्रयुक्त होते थे । व्रणवस्ति, वस्तियंत्र, पुष्पनेत्र, (लिंग में औषध प्रविष्ट करने के लिये), शलाकायंत्र, नखाकृति, गर्भशंकु, प्रजननशंकु (जीवित शिशु को गर्भाशय से बाहर करने के लिये), सर्पमुख (सीने के लिये) आदि बहुत से यन्त्र हैं । व्रणों और उदरादि संबंधी रोगों के लिये भिन्न-भिन्न प्रकार की पट्टी बांधने का भी वर्णन किया गया है। गुदभ्रंश के लिये चर्मबंधन भी उल्लेख है । मनुष्य या घोड़े के बाल सीने आदि के लिये प्रयोग में आते थे । दूषित रुधिर निकालने के लिये जोंक का भी प्रयोग होता था। जोंक की पहले परीक्षा कर ली जाती थी कि वह विषैली है अथवा नहीं। टीके के समान मूर्छा में शरीर का तीक्ष्ण अस्त्र से लेख कर दवाई को रुधिर में मिला दिया जाता था । गति व्रण (Sinus) तथा अर्बुदों की चिकित्सा में भी सूचियों का प्रयोग होता था । त्रिकूर्चक शस्त्र का भी कुष्ठ आदि में प्रयोग होता था । आजकल लेखन करते समय टीका लगाने के लिये जिस तीन-चार सुइयों वाले औजार का प्रयोग होता है, वह यही त्रिकूर्चक है । वर्तमान काल का (Tooth-elevator) पहले दंतशंकु के नाम से प्रचलित था। प्राचीन आर्य कृत्रिम दाँतों का बनाना और लगाना तथा कृत्रिम नाक बनाकर सोना भी जानते थे । दाँत उखाड़ने के लिये एनीपद शस्त्र का वर्णन मिलता है। मोतियाबिंद (Cataract) के निकालने के लिये भी शस्त्र था । कमलनाल का प्रयोग दूध पिलाने अथवा वमन कराने के लिये होता था, जो आजकल के ( Stomach Pump) का कार्य देता था ।” [ पृष्ठ १२० – १२२ ]
इसी प्रकार भारतीय प्राचीन सपचिकित्सा और पशुचिकित्सा भी अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं। सिकन्दर का सेनापति नियार्कस लिखता है कि यूनानी लोग सर्पविष दूर करना नहीं जानते, परन्तु जो मनुष्य इस दुर्घटना में पड़े, उन सब को भारतीयों ने दुरुस्त कर दिया । दाहक्रिया एवं उपवास चिकित्सा से भी भारतीय पूर्णतया परिचित थे । शोथरोग में नमक देने की बात भी भारतीय चिकित्सक हजार वर्ष पूर्व जानते थे । हमारे पूर्वजों का निदान उच्चकोटि का था । 'माधवनिदान' आज भी संसार में अपना खास स्थान रखता है। शुद्ध जल का संग्रह और व्यवहार कैसे किया जाय, औषध द्वारा कुओं का पानी साफ करना, महामारी फैलने पर कृमिनाशक औषधों के द्वारा स्वच्छता रखना आदि बातों का उल्लेख 'मनुस्मृति' में स्पष्ट मिलता है। आयुर्वेद में शरीर की बनावट, मीतरी अवयवों, मांसपेशियों, पुट्ठों, धमनियों और नाड़ियों का भी विशद वर्णन उपलब्ध होता है । वैद्य निघंटुओं में खनिज, वनस्पति और पशुचिकित्सा - संबंधी औषधों का बृहद् भाण्डार है। भारतीय आयुर्वेद - विशारदों को शरीर विज्ञान का ज्ञान भी पर्याप्त था । अन्यथा वे स्त्री, पुरुष, पशु, पक्षी आदि की चित्ताकर्षक मूर्त्तियों को नहीं बना सकते थे। भारतीयों का रासायनिक ज्ञान आशातीत * वाइज ; हिस्ट्री आफ मैडिसिन ; पृष्ठ ६.
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[ 8 ] विस्मयकारक था। वे गंधक, शोरा आदि के तेजाब (Acid) जस्ता, लोहा, सीसा आदि के
ऑक्साइड (Oxide) तथा कारबोनेट और साल्फाइड आदि तैयार करते थे। इन रसायनों के द्वारा वे निराश रोगियों को पुनः स्वस्थ एवं वृद्धों को जवान बनाते थे। सूर्य की किरणें रोगोत्पादक कीटाणुओं को नष्ट करती हैं, इस बात को भारतीय पहले ही से जानते थे। वासरोग के लिये धतूरे का धुआँ पीने की विधि यूरोपियनों ने भारतीयों से ही सीखी है। 'विश्वबंधु' ५, अगस्त १९३४ के एक विद्वत्तापूर्ण लेख में लाहौर के कविराज श्रीहरिकृष्ण सहगल ने इस बात को सिद्ध कर दिखा दिया है कि हाल में अमेरिका में पुरुषसंयोग के विना ही जिन पिचकारियों द्वारा स्त्री गर्भवती बनाई गई है, उन पिचकारियों का उद्गम-स्थान भारतवर्ष ही है। भारतीय रसायन के द्वारा कृत्रिम सुवर्ण बनाना भी भली भांति जानते थे। इन सब बातों का विशद वर्णन इस छोटे वक्तव्य में नहीं हो सकता है। इस संबंध में अंग्रेजी पढ़ेलिखे विद्वानों को The Ayurvedic System of Medicine by Kaviraj Nagendra Nath Sen, A. History of Hindu Chemistry by Praphulla Chandra Roy, The Positive Sciences of the Ancient Hindus by Brajendra Nath Seal आदि पुस्तकों को अवश्य पढ़ना चाहिये।
संसार में जीवन से बढ़ कर प्यारी वस्तु दूसरी नहीं है। यही कारण है कि क्षुद्र से क्षुद्र कृमि-कीट से लेकर मनुष्य तक एवं जीर्ण रोगी से लेकर तन्दुरुस्त जवान तक सभी इस जीवनरज्जु को अधिक लम्बी करने के उद्योग में सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। जिस जीवन से ऐहिक
और पारलौकिक दोनों सिद्धियों मिलती हैं. उसे दीर्घकाल तक स्वस्थ तथा कार्यक्षम बनाये रखने के लिये ही प्राचीन आर्यों ने आयुर्वेद का अनुसंधान किया था। हिन्दू, जैन एवं बौद्ध इन तीनों भारतीय प्रधान धर्मों के आयुर्वेदीय ग्रन्थों को मिलाने से हमारा आयुर्वेदीय साहित्य बहुत बढ़ जाता है। पूर्व में आयुर्वेद यहाँ की एक सर्वसुलभ विद्या थी। इसीलिये आज भी बड़े-बड़े सर्जनों एवं वैद्यों से आराम नहीं होनेवाले कई एक कठिन रोगों को एक दिहातो अशिक्षित सामान्य व्यक्ति अच्छा कर देता है। भारत की उर्वरा भूमि ने इसके लिये सर्वत्र बहुमूल्य ओषधियाँ भी जुटा रखी है। यह भी ध्यान में रखने की बात है कि हमारे पूर्वजों ने स्पष्ट घोषित कर दिया है कि जो व्यक्ति जहाँ पैदा हुआ हो, उसे वहीं की ओषधियाँ अधिकालाभकारी होती हैं। इसके लिये केवल एक ही दृष्टांत पर्याप्त है कि कुनाइन सल्फेट आदि ओषध इंगलैण्ड आदि शीतप्रधान देशों में जितना काम करते हैं, उतना उष्णप्रधान हमारे भारतवर्ष में नहीं कर पाते। अस्तु, लेख बहुत बढ़ रहा है, अतः पाठकों का ध्यान प्रस्तुत विषय पर आकर्षित करता हूँ। ___ यह बात यथार्थ है कि प्रस्तुत 'वैद्यसार' के प्रयोग आचार्य पूज्यपाद के स्वयं के नहीं है। फिर भी इसमें सन्देह नहीं है कि इन प्रयोगों का आधार पूज्यपादजी का वही मूल
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[ ड ] प्रन्थ है, दुर्भाग्य से जिसका पता अभीतक हम लोग नहीं लगा सके हैं। इस बात को जैन ही नहीं, जैनेतर विद्वान् मी स्वीकार करते हैं कि आचार्य पूज्यपाद अन्यान्य विषयों के समान आयुर्वेद के भी एक अद्वितीय विद्वान् थे । खैर, इस विषय को मैं यहाँ पर बढ़ाना नहीं 1 चाहता हूँ । इसी प्रकार का एक संग्रह भवन में और है । इसमें लगभग ६५ प्रयोग हैं। इन प्रयोगों में भी प्रायः सर्वत्र पूज्यपादजी का उल्लेख मिलता है । 'वैद्यसार' के समान इसमें भी रसों की ही बहुलता है। हाँ, चूर्ण, घृत, लेप, तैल, गुटिका, अंजन आदि का भी थोड़ा-थोड़ा समावेश है। प्रति बहुत शुद्ध होने से वे प्रयोग इस 'वैद्यसार' में गर्भित नहीं किये जा सके। इनका प्रकाशन दूसरी शुद्ध प्रति की प्राप्ति से ही हो सकता है । यों तो 'वैद्यसार' की प्रति भो अशुद्ध ही रही । फिर भी यत्र-तत्र यह ठीक कर ली गई है। इस संग्रह का नाम ‘वैद्यसार' इस आधार पर रखा गया है कि इसकी हस्तलिखित मूल प्रति यही नाम अंकित था । वैद्यसार के संपादन एवं अनुवाद के संबंध में मैं अपनी ओर से कुछ भी न कह कर इसके गुणदोषों की जाँच का भार विज्ञ पाठकों को ही सौंप देता हूँ ।
I
अन्त में निःस्वार्थ भाव से केवल साहित्यसेवा की भावना से इस प्रन्थ का अनुवाद तथा संपादनकार्य को संपन्न करनेवाले सुयोग्य वैद्य, आयुर्वेदाचार्य श्रीमान् पं० सत्यंधरजी जैन, काव्यतीर्थ, छपारा एवं मेरी प्रार्थना को सहर्ष स्वीकार कर इसके लिये पाण्डित्यपूर्ण भूमिका लिखनेवाले सुविख्यात वैद्यराज, वैद्यरत्न श्रीमान पं० कन्हैयालालजी, आयुर्वेद भूषण, कानपुर को मैं प्रकाशक की ओर से हृदय से धन्यवाद देता हूँ, जिन्होंने प्रन्थ संशोधन में भी पर्याप्त सहायता की है । वास्तव में उपर्युक्त विद्वानों के सहयोग के विना यह गुरुतर कार्य इतना सुन्दर संपन्न नहीं हो सकता था ।
वीर सं० २४६८, माघ शुक्ल १०
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० भुजबली शास्त्री
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विषय-सूची
१ अजीर्ण पर अजीणेकण्टक रस २ अजीर्णादि पर अर्धनारीश्वर रस ३ अजीर्णादि पर प्रभावती वटी ४ अग्निमांद्य पर अग्निकुमार रस ५ अतीसार पर महासेतु रस ६ अनेक रोग पर त्रिलोकचूडामणि रस ७ अमृतार्णव रस ८ अमपित्तादि पर सूतशेखर रस ९ अर्शनाशक योग ... १० अर्शरोग पर अर्शनाशक लेप ११ आमदोषादि पर उदयमार्तण्ड रस १२ आमवात पर रसादि योग ... १३ आमादि पर मेघनाद रस ... १४ उदररोग पर राजचंडेश्वर रस । १५ उदररोग पर शंखद्राव ... १६ उन्मत्ताख्य नस्य १७ उपदंशादि पर कंदर्प रस १८ कासादि पर गगनेश्वर रस ... १९ कुष्ठ पर तालकेश्वर रस २० कुष्ठ पर ताण्डवाख्य रस ... २१ कुष्ठ पर महातालेश्वर रस ... २२ कुष्ठ पर विजय रस ... २३ कुष्ठरोग पर मेदिनीसार रस . २४ कुष्ठादि पर वज्रपाणि रस ... २५ कुष्ठादिपर चातक रस ... २६ कुष्ठादि पर महारसायन ... २७ गुल्मरोग पर वातगुल्म रस ...
...
"सर रस
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२८ गुल्मादि पर अग्निकुमार रस ... २९ गुल्मादि पर भैरवी रस ... ३० गुल्मादि पर लवणपंचक योग। ३१. ग्रहणीरोग पर अर्कादि योग ..... ३२ ग्रहणी रोग पर ग्रहणीकपाट रस ३३ ग्रहण्यादि पर कनकसुन्दर रस . ३४ ग्रहण्यादि पर रतिलीला रस ... ३५ ग्रहण्यादि पर रामबाण रस ... ३६ चिन्तामणि गुटिका ३७ जलोदर पर शूलगजांकुश रस ... ३८ जलोदरादि पर पंचाग्नि गुटिका ३९ जीर्णज्वर पर औदुम्बरादि योग ४० जीर्णज्वरादि पर घोड़ाचोली रस ४१ ज्वर पर लघुज्वरांकुश ... ४२ वरातिसारादि पर जयसंभव गुटिका ४३ ज्वरातीसार पर आनंदभैरव रस ४४ बरादि पर कलाधर रस ... ४५ ज्वरादि पर गजसिंह रस ... ४६ वरादि पर ज्वरकण्टक रस .... ४७ ज्वरादि पर ज्वरकुठार रस ... ४८ ज्वरादि पर ज्वरांकुश रस ... ४९, ज्वरादि पर प्रतापमार्तण्ड रस . ५० ज्वरादि पर प्राणेवर रस ... .. ५१ ज्वरादि पर प्राणेश्वर रस ... ५२ ज्वरादि पर महाज्वरांकुश रस ...... ५३ खरादि पर लघुज्वरांकुश ५४ ज्वरादि पर संजीवनी रस ...... ५५ द्राक्षादि क्वाथ , , ५६ द्वितीय इच्छाभेदी रस ५७ नववर पर करुणाकर रस ... ..
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५८ नवज्वर पर नवज्वरहर वटिका ५९ पारदादि योग
६० पाण्डुकामलादि पर उदयभास्कर रस ६१ पाण्डुरोग पर मण्डूर त्रिफलावसु
६२ पित्तदाह पर धान्यादि योग
६३ पित्तदाह पर दूसरा योग
६४ पित्तरोग पर चन्द्रकलाधर रस
६५ पूर्णचन्द्र रसायन
ww.
६६ प्रदशदि पर पंचबाण रस ६७ प्रमेहचन्द्रकला रस
६८ प्रमेह पर द्वितीय पंचवक्त्र रस... ६९ प्रमेह पर प्रमेह गजकेसरी रस ७० प्रमेह पर वंगमस्म ७१ प्रमेह पर वंगेश्वर रस ७२ प्रमेह पर मेहबद्ध रस ७३ प्रमेह पर मेहारि रस ७४ प्रमेह पर राजमृगांक रस ७५ प्रमेहादि पर कर्पूर रस
७६ बहुमूत्र पर तारकेश्वर रस
७७ भगंदर पर रसादि योग
७८ भेदिज्वरांकुश रस ७९ मन्दाग्नि पर उदयमार्तण्ड रस ८० मन्दाग्नि पर कालाग्नि रस ८१ मन्दाग्नि पर कालाग्निरुद्र रस ८२ मन्दाग्नि पर बडवाग्नि रस ८३ मन्दाग्न्यादि पर अमृत गुटिका ८४ मूत्रकृच्छ्र पर कृच्छ्रांतक रस ८५ मूत्रकृच्छ्रादि पर वंगेश्वर रस ८६ रक्तदोष पर तालकेश्वर रस
८७ रक्तपित्तादि पर चन्द्रकलाधर रस
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८८ रसादिमदन ८९ लूताविष चिकित्सा ९० वाजीकरण पर कामांकुश रस . ९१ वाजीकरण पर रतिविलास रस ९२ वाजीकरण पर रतिलीला रस ९३ वाजीकरण पर रतिलीला रस ९४ वाजीकरण पर त्रिलोकमोहन रस ९५ वाजीकरणादि प्रयोग पर मदनकाम रस ९६ वाजीकरणादि पर लीलाविलास रस ९७ वातरोग पर कल्पवृक्ष रस ९८ वातरोग पर कुठार रस ९९ वातरोग पर बडवानल रस ... १०० वातरोग पर स्वच्छन्द-भैरव रस १०१ वातरोग पर रसादि योग ... १०२ विनोदविद्याधर रस १०३ विषमज्वर पर चतुर्थज्वरहर वटिका १०४ विषमज्वर पर चन्द्रकान्त रस १०५ विषमजार पर प्रभाकर रस ... १०६ विबन्ध पर इच्छाभेदी रस ... १०७ विबन्ध पर इच्छाभेदी रस ... १०८ विबन्ध पर इच्छाभेदी रस ... १०९ विबन्ध पर चिंतामणि गुटिका ११० विबन्ध पर जयपाल योग ... १११ विबन्ध पर नाराच रस ... ११२ विबन्ध पर प्रथम इच्छाभेदी रस १९३ विबन्ध पर वनभेदी रस ... ११४ निबन्ध पर विरेचक तैल ... ११५ विबन्ध पर विरेचकतिक्तकोशातकी योग ... १९६ विषय पर विरेचन वटी ... ११७ प्रणादि पर अपामार्गादि योग
..
... १०१
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पृष्ठ सं०
११८ प्रणादि पर जात्यादि धृत ... .११९ शीतवात पर अग्निकुमार रस । १२० शीतज्वर पर कारुण्यसागर रस १२१ शीतज्वर पर बडवानल रस ... १२२ शीतज्वर पर शीतकण्टक रस १२३ शीतज्वर पर शीतकुठार रस १२४ शीतज्वर पर शीतकेशरी रस १२५ शीतज्वर पर शीतमंजी रस १२६ शीतज्वर पर शीतमंजी रस १२७ शीतज्वर पर शीतमातंगसिंह रस १२८ शीतज्वर पर शीतांकुश रस , १२९ शीतज्वर पर शीतांकुश रस १३० शोतज्वर पर श्वेतभास्कर रस १३१ शीतज्वरादि पर स्वच्छन्द भैरवी रस १३२ शूलरोग पर ज्वालामुख रस १३३ शूल पर शूलकुठार रस ... १३४ शूलादि पर तालकादि रस ... १३५ शूलादि पर शूलकुठार रस ... १३६ शूलादि पर शूलकुठार रस ... १३७ श्वासकासादि पर गजसिंह रस १३८ श्वासकासादि पर सूतकादि योग १३९ श्वास पर इन्द्रवारुणी योग ... १४० श्वास पर पारदादि योग ... १४१ श्वास पर सूर्यावत्तै रस ... १४२ श्वासादि पर अमृतसंजीवन रस १४३ श्वासादि पर शिलातल रस . १४४ षडांग गुग्गुल १४५ सन्निपात पर गंधकादि योग ... १४६ सन्निपात पर पंचवक्त्र रस .... १४७ सन्निपातादि पर भूतादिमैरव रस
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१४८ सन्निपात पर यमदण्ड रस ... १४९ सन्निपातादि पर वीरभद्र रस १५० सन्निपात पर सन्निपातगजांकुश १५१ सन्निरात पर सन्निपातविध्वंसक रस १५२ सन्निपात पर सन्निपातांजन १५३ सन्निपात पर सन्निपातान्तक रस १५४ सन्निपातादि पर सिद्धगणेश्वर रस १५५ स्फोटादि पर त्रिलोकचूडामणि रस १५६ सर्वज्वर पर चन्द्रोदय रस ... १५७ सर्वज्वर पर ज्वरांकुश रस ... १५८ सर्वज्वर पर मृत्युञ्जय रस ... १५९ सर्वज्वर पर विद्याधर रस ... १६० सर्वरोग पर प्रतापलंकेश्वर रस १६१ सर्वरोग पर मरीचादि वटी ... १६२ सर्वरोग पर मृत्युंजय रस ... १६३ सर्वरोग पर रसराज रस ... १६४ सर्वव्याधि पर उदयादित्यवर्ण रस १६५ हस्तिकर्ण तैल १६६ हृद्रोगादि पर सिद्ध रस .. १६७ क्षयकासादि पर अग्नि रस ... १६८ क्षयकासादि पर अग्नि रस ... १६९ क्षयरोग पर वजेश्वर रस ... १७० क्षयादि पर वनश्वर रस ... १७१ त्रिदोष पर महारस सिन्दूर ... १७२ त्रिदोषपारदादि योग ...
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वैद्य-सार:
१ – त्रिदोषे महारस सिन्दूरम्
शुद्ध पारदषड्गुणोक्तसुरभि - जीर्णीकृतं तद्रसं युक्त्योक्तं नवसारकं मणिशिला-पंचांशकं टंकणं । वज्रक्षारकलांशकैर्विमिलितं गंधार्धभागं क्रमात् सर्व तले व शुभगे योगादि दिने ॥१॥ कन्याभास्करहंस पाद्यनल कैजंबीरनीरार्जुनी गोजिह्वानखरंजितं फणिलतापार्थेश्च संमर्पितं । तत्कल्कात पशोषितं च सर्व संरुध्य कूप्यां तथा यंत्रे त्र्यंगुलवालुकास्थितयुतं तत्पूरितं भांडकं ॥२॥ पक्वं द्वादशयामकं क्रमगतं चोद्धृत्य सूतं गतं खल्वे पूर्वकृतं विधाय निखिलद्रव्यान्वितं मर्दयेत् । प्राग्वत् कूपिक संस्थितं दिनयुगं पक्त्वा क्रमानौ शनैः पश्चादागतसिद्धसूतमखिलं संमर्दयेत् तद्भवैः ||३|| यंत्रोक्तक्रमसिद्धकैः कृतचतुर्विंशानुयामं क्रमात् सूतं पक्वमिति त्रिवारमुचितं सिद्ध रसेन्द्रं बुधैः । एकं द्वित्रि यथाक्रमैः दशशताधिक्यात् सहस्राद् गुणैः तस्मात् सर्वगुणानुयोगमधिकं युक्त्या त्रिवारं पचेत् ॥४॥ पक्त्वादाय सुसिद्धमंगलमिदं पूजोपचारैः क्रमम् उद्यद्भास्करसंन्निभं च विमलं तत्सूर्यभारंजितं । सिद्ध सूतरसायनं गदहरं धर्मार्थकामप्रदं तत्सूतं मरिचाज्ययुक्तमनिलं हन्यात् सिताज्यैर्जयेत् ॥५॥ पित्तं क्षौद्रकरणान्विते कफगदं व्योषार्कत्तारेण सह मन्दाग्निं स च सन्निपातसकलं योगानुपानैर्जयेत् श्वासं कासमरोचकं चयहरं कामाग्निसंदीपनं तुष्टि पुष्टिबलावहं सुखकरं लावण्यहेमप्रभं ॥६॥ नित्यं सेवितशाश्वतं रसवरं योगोत्तरं सर्वदा रोगात् सज्जनरक्षणार्थभिषजः कीर्ति करोति सदा
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वैद्य-सार
सर्व लोकहितंकर विरचितं शास्त्रानुसारैः क्रमात्
विख्यातं करुणाकरं रसवरं श्रीपूज्यपादोदितम् ॥७॥ टीका-दोषरहित तथा छः गुणों से युक्त, स्वच्छ, शुद्ध तथा शोधन-मारण करने वाले द्रव्यों से जीर्ण, अर्थात् पाठ संस्कार अथवा अट्ठारह संस्कार से शुद्ध किया हुभा पारा, शुद्ध नौसादर तथा शुद्ध मेनशिला ये तीनों समान भाग तथा पारे से पांचवे भाग सुहामा, पारे से १६ वा भाग शातलातार (थूहर) तथा पारे से आधा शुद्ध गंधक (भावला. सार गंधक) सबको मिला कर शुभ दिन, शुभ नक्षत्र शुभ मुहूर्त में खरल में मर्दन करके घीकुमारी (गंवारपाठा), पाक का दूध, हंसराज (तिपतिया), चित्रक, जंबोरी नींबू का रस तथा नत्रिक, गोभी, नखरंजित (एक सुगंधित पदार्थ), नागरबेल (पान), कोहा-नके स्वरस में एक-एक दिन अलग-अलग खूब मर्दन करके घाम में सुखा करके कांच की शीशी में बंद करे तथा वालुकायंत्र में शीशी के नीचे ३ अंगुल वालुका रहे फिर शीशी के मुंह तक वालुका भर देवे और उसको क्रम से मन्द, मध्य, खर आँच १२ प्रहर तक देवे; फिर उस शीशी में से वह पारा निकाल कर उसे उपयुक्त सब औषधों के स्वरस में अलग-अलग मर्दन करे तथा दो दिन तक फिर वालुकायंत्र में पकावे। पाक होने पर पारा निकाल कर उन्हीं द्रव्यों के स्वरस में घोंट एवं सुखा कर वालुकायंत्र में पकावे तथा २४ प्रहर तक बराबर भांच दे। इस प्रकार तीन बार पाक करे तो यह योग सहस्र गुणों से युक्त होता है। इसलिये इसको युक्तिपूर्वक तीन बार अवश्य ही पकावे। यह पका हुआ पारा सिद्ध होने पर मंगलमय है तथा इसको इष्टदेव की पूजा करके सेवन करे। यह उदय हुए सूर्य के रङ्ग के समान स्वच्छ, उत्कृष्ट सूर्य की आभा-सहित सिद्ध पारद रसायन (महारससिन्दूर) अनेक रोगों को हरनेवाला धर्म, अर्थ, काम को देनेवाला होता है । काली मिर्च तथा घी के साथ खाने से वायु-रोग शान्त होते हैं तथा पीपल और मधु के साथ सेवन करने से कफजन्य रोग शान्त होते हैं। सोंठ, मिर्च, पीपल और अर्कतार (अकौने के क्षार) के साथ सेवन करने से मंदाग्नि शान्त होती है, तथा अनेक अनुपान के योग से सम्पूर्ण सनिपातों को और श्वास, कास अरोचक, तय को जीतता है, कामानि को दीपन करनेवाला, शरीर को
-पए करनेवाला, बल को देनेवाला, सुखप्रद, सुन्दरता को देनेवाला यह सुवर्ण के समान कान्तिवाला योग नित्य ही सेवन करना चाहिये। यह योग सज्जनों की रक्षा करने एवं वैद्यों को कीर्ति का देनेवाला तथा सम्पूर्ण लोक का हित करनेवाला शास्त्र के अनुसार भ्रष्ठ श्रीपूज्यपाद स्वामी ने कहा है। यह प्रसिद्ध और श्रेष्ठ रस है।
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वैद्य-सार
२-प्रमेहे वंग-भस्म शरावे निक्षिपेत् शुद्ध धंगं पलचतुष्टयम् । दीप्यकं तु तुःप्रस्थं विप्रस्थं रजनीरजः ॥२॥ विलीनवंगं तज्ज्ञात्वा गालयेद्गमवद्भवेत् । विदारीकंदो मुसली गोक्षुरो भूमिशर्करा ॥२॥ सुरवल्लो सारकः साम्यमेतेषां द्विगुणा सिता। पंगभस्म पणैकं तु योजयित्वा तु भक्षयेत् ॥३॥ चुलुकं सितोदकं पानं द्विदलैश्चाम्लवर्जितम् ।
सर्वप्रमेहविध्वंसि पूज्यपादनिरूपितम् ॥४॥ टीका-एक मिट्टी के गहरे सरावे में अथवा हांडी में शुद्ध वंग (रांगा) को १६ तोला लेकर डाल देवे और उसके नीचे अग्नि जलावे । जब वह गल जाय, तब उसमें ५२ छटांक जीरे का चूर्ण पोस कर डाले तथा ३२ छटांक हल्दी का चूर्ण डालता जाय। इस प्रकार डालते रहने से रंगे का भस्म तैयार हो जायगा। जब धंगभस्म वारितर हो जाय जल में तैर जावे अर्थात् नीचे नहीं डूबे) तब नोचे लिखे अनुपान से सेवन करे : यथा, विदारीकंद. मुसली, गोखुरू, भूमिशरा, गुर्च का सत ये पांचो तीन तीन मोशे लेकर सब का चूर्ण करे तथा सबके बराबर उत्तम मिसरी मिलाकर चूर्ण तैयार कर ले और फिर १ पण (५ एसी) वंग-भस्म लेकर उसमें मिलावे तथा प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकाल मिसरी की चाशनी से सेवन करे, तथा उसके ऊपर एक चुल्लू मिसरी का पानी पीवे तथा खटाई और दाल को बनी चीज नहीं सेवन करे। प्रमेहों का नाश करनेवाला यह योग श्रीपूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ है।
. ३-प्रमेहादौ कर्पूररसः शुद्ध सूतं पलमितं समादाय पुनस्ततः। सैन्धवं स्फाटिकं सम्यक् शुद्ध द्विचतुः पलं ॥१॥ चूर्णयित्वाथ जंबीररसेन परिमर्दयेत् । तस्योपरि रसं क्षिप्त्वा समालोज्य विमीलयेत् ॥२॥ हंडिकायां च तत्कल्कंक्षिप्त्वोपरि शराषकं । निकभ्य संधि बन्नीयात् द्दं मृण्मयकर्पटैः ॥३॥
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वैद्य-सार
रवियामं पचेयनादूचं भांडगतं भवेत् । तच्चूर्ण रूपिणं सूतं समादाय पुनस्ततः ॥४॥ नवसारं क्षिपेत् साधनिष्कमानं ततः पुनः । प्रथमं नवसारं तु चूर्णयित्वाथ भस्मकं ॥५॥ विचूर्ण्य मेलनं कृत्वा काचकूप्यां प्रपूरयेत्। कूपीद्वारं तु बन्नीयात् खट्या सूत्रेण बंधयेत् ॥६॥ द्वारं विहाय संपूर्य मृदा सम्यक प्रलेपयेत् । हंड्यामथ च वालुक्या चतुरङ्गलमात्रकम् ॥७॥ प्रपूर्य कूपिमूर्धानमूर्ध्व कृत्वा तिपेदथ । शेषं वालुकयापूर्य चतुरङ्गलसंमितं ॥८॥ ऊर्ध्वदेशं शरावेण समाच्छाद्याथ लेपयेत् । .. संधि मृदा गुढं यत्नाच्वुल्ल्यामारोप्य यंत्रकम् ॥९॥ दिवारानं पचेद्धीमान् चाग्नौ तत्क्रमवर्द्धनात् । ज्वालयेन्निनिमेषेण पारदं च परिक्षयेत् ॥१०॥ गुढं कर्पूररूपेण रसः कर्पूरतां व्रजेत् । मेहानां विशति हन्यात् चतुराशीतिवातजान् ॥११॥ . स्फोटं श्वासं च कासं च पांडु प्लोहं हलीमकम् । संधिशोफे तीणबले संधिवाते कफग्रहे ॥१२॥ अर्दिते पक्षघाते च हनुवाते गलग्रहे। चित्तभ्रमे भग्नकामे निःप्रतीते तुनीहते ॥१३॥ श्वेतकुष्ठे दगुरोगे प्रदातव्यं भिषग्वरैः। गंजामात्रमिदं खादेत् शर्करामधुनाथवा ॥१४॥ दुग्धं सेव्यं दिने तस्मात् द्राक्षाखरकं तथा। नारंग नारिकेलं च कदलीफलकं तथा ॥१५॥ तक्रसारः प्रदातव्यः रसे च कुपिते तथा ।
योगोऽयं प्रयुक्तः स्यात् पूज्यपादेन स्वामिना ॥१६॥ टीका-शुद्ध पारा ८ तोला लेकर तैयार रक्खे, फिर सेंधा नमक और फिटकरी दोनों को शुद्ध कर कम से ८ तोला और १६ तोला लेकर दोनों चूर्ण कर जंबीरी नींबू के रस में मर्दन कर लुगदी बनावे और फिर उस लुगदी में उस पारे को मिला देवे; फिर एक पक्की हांडी में कपड़मिट्टो करके उसके भीतर उस लुगदो को रख कर ऊपर एक सरावा दाँक कर
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वैद्य-सार
पक्की कपड़मिट्टी करे और उसको १२ प्रहर एक पाँच देवे. और ठंडा होने पर ऊपर लगा हुआ जो सफेद रंग का हो उसको यत्नपूर्वक निकाल लेवे, और फिर उस निकाले दुए द्रव्य में ४॥ माशा (६ आने भर) नौसादर मिलावे। दोनों को खूब पीसकर कांच की शीशी में बंद करे । कुप्पी का मुख खड़िया मिट्टी से अच्छी तरह बंद करे, और फिर हांडी में शोशी का ऊँचा मुख करके वालू भर देवे, परन्तु वालू इतना भरे कि शीशी की तली ४ अंगुल खाली रहे। ऊपर से एक सरावा ढांक देवे और कपड़मिट्टी कर देवे तथा चूल्हे पर चढ़ा देवे तथा एक दिनरात पकाषे; किन्तु आँव क्रम से होन, मध्यम, तोखी देवे, और जब स्वांग शीतल हो जाय तब खोलकर कपूर के समान जमा हुआ जो पारा है, वह निकाल लेवे; बस इसी का नाम रस-कपूर है। यह रस कपूर २० प्रकार के प्रमेह, ८४ प्रकार के वातरोग, फोड़ा, श्वांस, खाँसो, पांडुरोग, प्लोहा-हलीमक, संधिशोथ, क्षीणता, संधियों की जकड़ाहट, कफ की जकड़ाहट, अर्दित रोग, पक्षाघात, हनुवात, गलग्रह, चित्तभ्रम, अनिच्छा (नपुंसकता) इत्यादि रोगों में वैद्यवरों को देना चाहिये। इसकी मात्रा एक रत्ती है। इसको मिसरी तथा शहद के साथ देना चाहिये । इसके ऊपर दूध का सेवन अवश्य करना चाहिये, तथा इसके पथ्य में मुनक्का, खजूर, नारङ्गी, नारियल, केला अवश्य देना चाहिये। रसधातु के कुपित होने पर तक देना चाहिये । यह उत्तम योग पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
४-क्षयरोगे वनेश्वररसः कर्ष खर्परसत्वं च षण्मासे हेमविद्रुते। निक्षिपेच्चूर्णयेत् खल्वे षनिष्कौ सूतगंधकौ ॥१॥ अंकोलकं कुणोषीजं तुल्यांशं तालकश्चतुः। मुक्ताप्रवालचूर्ण तु प्रतिनिष्काष्टकं क्षिपेत् ॥२॥ मृतलौहस्य निष्कौ द्वौ टंकणस्याष्टनिष्ककं । द्वौ निष्को नीलकुटक्यौ वराटानां च विंशतिः ॥३॥ शीसा निष्कत्रयं योज्यं सर्व खल्वे विमर्दयेत् । चांगेयम्लेन यामैकं जंबीराम्लैः दिनद्वयम् ॥४॥ रुद्ध्वा पुटाष्टकं देयं हस्तमा तुषाग्निना। जंबोरोत्थद्रवैरेव पिष्ट्वा पिष्ट्वा पुटे पचेत् ॥५॥ ततो वनोत्पलैरेव देयं गजपुटं महत्। भादाय चूर्णयेत् श्लक्ष्णं चूर्णार्ध शुद्धगंधकं ।।६।।
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वैद्य-सार
गंधार्ध मरिचं चूर्णमेकीकृत्य हिमाषकं । लेहयेन्मधुना सार्ध नागवल्लीरसेन सह ॥७॥ पथ्यं तु प्रतियामं स्यादभुक्ते विषपद्भवेत् । एसो पजेश्वरः ख्यातः क्षयपर्वतभेवकः ॥८॥
उत्तमो राजयोगोऽयं पूज्यपादेन भाषितः । टीका-एक तोला खपरिया का सत्व लेकर छह माशे शुद्ध सोने को गला कर उसमें डाल दे; फिर दोनों को चूर्गा कर छः निष्क (१॥ तोला) पारागंधक तथा अकोलक १॥ तोला मालकांगनी, १॥ तोला शुद्ध तवकिया हरताल तथा अनकभस्म, कांत लौहभस्म, ताम्रभस्म चार-चार निष्क (१ तोला) तथा शुद्ध मोती और शुद्ध प्रवाल पाठ-पाठ निक (२ तोला) लेकर तथा लौहभस्म २ निष्क एवं सुहागा शुद्ध आठ निष्क (२ तोला) नील और कुटकी २ तोला, शुद्ध पीली गठीली कौड़ी २० तोला, शुद्ध शोशा भस्म तीन निष्क लेकर सबको एकत्र कर चांगेरी के रस में एक प्रहर तक घोंटे, फिर सबको टिकिया बनाकर संपुट में बंदकर एक हाथ का गड्डा करके तुष की अग्नि के द्वारा पुट देवे और फिर जंबीरी नींबू के रस की भावना देवे । इस प्रकार पाठ पुट देवे फिर आठ पुट के बाद अंबोरी नींबू के रस की भावना देकर जंगली कंडों से १ गजपुट देवे। फिर सब को चूर्ण करके चूर्ण से प्राधा शुद्ध
आंवलासार गंधक लेवे, तथा गंधक से अाधो काली मिर्च लेकर सबको एकत्र कर तीन तीन माशे शहद और पान के रस के साथ प्रातःकाल एक बार सेवन करे एवं इस दवाई के सेवन करने पर प्रत्येक पहर के बाद पथ्यपूर्वक भोजन करे। यदि इस औषध के सेवन करने पर पथ्य सेवन न किया जायगा तो यह औषध विष के समान काम करेगी। यह वनेश्वर रस क्षय अर्थात् राजयक्ष्मा-रूप पर्वत का नाश करने के लिये वन के समान है। यह उत्तम राजयोग पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ है।
५-शीतज्वरे शीतांकुशरसः तुत्थमेकं वयं तालं शिलाचैव चतुर्गुणं । धत्तूरस्य रसैमर्थः कुक्कुटीपुटपाचितः ॥१॥ शीतांकुशरसो नाम शीतज्वरनिवारणः । शीतज्वरविषनोऽयं पूज्यपादेन भाषितः ॥२॥
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वैद्य-सार
____टोका-१ भाग शुद्ध तूतिया, ३ भाग शुद्ध तवकिया हरताल, ४ भाग शुद्ध मेनशिला, ४ भाग जवाखार सषको एकत्र कर धतूरे के रस से मर्दन कर कुक्कुट पुट में पका कर रत्तियों के प्रमाण में सेवन करे, तो इससे शीतज्वर दूर होता है। यह शीतज्वररूपी विष को नाश करनेवाला पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
६-मूत्रकृञ्छु कृच्छांतकरसः पारदाभ्रकवक्रान्तहेमकांतनिगंधकम् । मौक्तिकं विदुमं चैव प्रत्येकं स्यात् पृथक् पृथक् ॥१॥ समं निंबूरसैमर्थ मूषायां संनिरोधयेत् । पंचविशंतिपुटान् दद्यात् ततः सर्व विचूर्णयेत् ॥२॥ माषमावरसं दद्यान्नवनीतसितायुतं । विदारी तुलसी रंभा जातो बिल्वं शतावरी ।।३।। मुस्ता निदिग्धका वासा धात्री छिन्नोद्भवा कुशा । पाषाणभेदो साक्षी चेक्षुकृष्णा त्रिकंटकं ॥४॥ एर्वारुखीजयष्ट्यमिधामेला चंदनवालुकं । सर्व संचगण्य यत्नेन क्याथयित्वा पिबेदनु ॥५॥ मूत्रकृच्छाश्मरीमेहवातपित्तकफामयान् । तयाद्यखिलरोगांश्च नाशयेनात्र संशयः ॥६॥
रसः कृच्छ्रांतको नाम पिटिकादिवणान् जयेत् ॥ टीका-शुद्ध पारा, अभ्रक भस्म, वैक्रांतमणि भस्म, सुवर्ण भस्म, कान्तलौह भस्म, शुद्ध गंधक, शुद्ध मोती, शुद्ध मूंगा, ये सब चीजें अलग-अलग बराबर-बराबर लेकर नींबू के स्वरस में मर्दन कर मूषा में बंद कर पश्चोस पुट देवे । प्रत्येक पुट में नींबू के रस की भावना देवे इस प्रकार सब का भस्म बन जाने पर सबको चूर्गा कर एक माशा प्रतिदिन मक्खन और मिसरी के साथ खावे तथा औषध के खाने के बाद ही नीचे लिखा काढा पीये। बिदारीकंद, तुलसी, केला कंद, चमेलो को पत्ती, बेल की छाल, शतावर, नागरमोथा, छोटी कटहली, अडूसा, आँवला, गुरबेल, कुश की जड़, पाषाणभेद, साक्षी, गन्ना, पीपल, गोखरू, ककड़ी के बीज, मुलहटी, छोटी इलायची, सुगन्धवाला, सफेद चन्दन, इन सब कीस चीजों को कूट कर काढ़ा बना कर पीये। यह ऊपर की दवा का अनुपान है। इसके सेवन करने से मूत्रकृच्छ, पथरी, प्रमेह, पात-पित्त, कफ के रोग तथा क्षय वगैरह संपूर्ण रोगों का नाश होता है। यह मूत्रकृच्छ्रांतक रस उत्तम है। . .
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वैद्य-सार
७-विबन्धे विरेचकतैलम्की रसगंधकनैपालदंतिबीजानि टंकणं । एरंडं तुंबिबीजानि राजवृक्षाभयानिवृत् ॥१॥ पलाशबीजमेकैकं वृद्धिभागोत्तरेण च। स्नुहोक्षीरेण संयुक्तं मर्दयेचिदिनान्तरम् ॥२॥ नारिकेलफले क्षिप्त्वा महागाढातपे स्थितम् । तत्तैलं जायते शीघ्र लेपोऽयं नाभिमभ्यतः ॥३॥ अणुमात्रविलेपेन सप्तवारं विरेचयेत् ।। तद्गन्धाघ्राणमात्रेण पंचवारं विरेचयेत् ॥४॥ गुंजावत्पादलेपेन दशवारं विरेचयेत्।।
वैरेचकप्रयोगोऽयं पूज्यपादेन भाषितः ॥५॥ टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, शुद्ध जमालगोटा, शुद्ध सुहागा, शुद्ध अंडीबीज, शुद्ध कड़ तोमर के बोज, अमलताश, बड़ी हरे का छिलका, निशोथ छिवले (पलाश) के बीज, ये चीजें एक-एक भाग क्रम से बढ़ती लेकर सबको एकत्र कर थूहर के दूध से ३ दिन तक बराबर मर्दन कर नारियल के फल में भर कर खूब तेज घाम में रख दे। सब दवाइयाँ घुलकर तेलरूप हो जायँ, तब जानो यह विरेचक तैल तैयार हो गया। यह तेल थोड़ा-सा नाभि पर लगाने से ७ बार दस्त होता है तथा १ रत्ती पाँव के तल भाग में लेप करने से दम बार दस्त होता है। और इस तेलको सूंघने से ५ बार दस्त होता है। विरेचन का यह प्रयोग पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
८-प्रमेहे राजमृगांकरसः सुवर्ण रजतं कति बपुषं चैव शीसकं।. भस्मीकृत्य च तत्सर्व क्रमवृद्धया क्रमांशकं ॥१॥ व्योमसत्वभवं भस्म सर्वैस्तुल्यं प्रकल्पयेत् । कजली सूतराजस्य सर्वे रेतैः समांशकम् ॥२॥ प्रदाय लौहभस्मानि पूर्वभस्मनि निक्षिपेत् । काष्ठेनालोड्य तत्सर्व दिनमेकं समाचरेत् ॥३॥ ततो विर्य तत्सर्व सप्तधा परिभावयेत्। ' आकुलधीजसंजातक्याथेनैवं हि यनतः ॥४॥
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वैद्य - सार
द्ध्वान्तं बल्लभूषायां सर्व संस्वेदयेच्छनैः । इति सिद्धो रसेन्द्रोऽयं चूर्णितः पटगालितः ||५|| कांतपत्रस्थितैः रात्रौ जलैस्त्रिफलसंयुतैः । तद्वलद्वयं सूतो दातव्यो मेहरोगिणां ॥ ६ ॥ नाम्ना राजमृगांकेाऽयं मेहव्यूहविनाशनः । निर्दिष्टोऽयं रसो राजमृगांको नाम कीर्तितः ॥७॥ दीपनः पाचनेो वृहो ग्रहणीपाण्डुनाशनः । मनो रुचिकरः सर्वरोगघ्नो योगसंयुतः ॥ ॥
टीका - सोने का भस्म १ भाग, चांदी का भस्म २ भाग, कांत लौह भस्म ३ भाग, बंग (रांगा का भस्म ४ भाग, सीसे का भस्म ५ भाग, ये पाँचों क्रम से एक २ भाग बढ़ती लेकर कत्रित करे तथा पागंधक की कजली ४२ भाग ले एकत्रित करे एवं लौह भस्म ८४ भाग लेकर सबको काठ की मूसली से १ दिन भर तक घोंटे। बाद सबकेा अकरकरा के काढ़े की सात भावना देवे तथा बल्लभूषा में बंद कर स्वेदन विधि से स्वेदन करे फिर वह चूर्ण कपड़े से छानकर २ बल्ल अर्थात् ६ रत्ती औषधि रात में कांत लौह के पत्रों में त्रिफला रखकर उस मैं जल डालकर उसके काढ़ से सेवन करे। यह औषधि प्रमेह रोगवालों केा देवे। यह राजमृगांक रस सम्पूर्ण प्रमेहों का नाश करनेवाला तथा दीपन और पाचन है । ग्रहणी, पांडु, प्रामदोषांका नाश करनेवाला, रुचि का बढ़ानेवाला और संपूर्ण रोगों का विनाशक है।
६ - शूलरोगे ज्वालामुखो रसः रसगंधकगोदंती कुनदी तीव्रताम्रके । वज्राभ्रकस्तु सर्वेषां श्लक्ष्णां कजलीं चरेत् ॥१॥ षट्कालं च चतुर्जातं वत्सनाभस्तु कट्फलं । वंध्या aarat कन्दधन्याकं कटुरोहिणी ||२|| विषतिन्दुकवीजानि सामुद्र मरिचानि च । एतेषां समभागानां पटगालितचूर्णितम् ॥३॥ कजलीं तत्समां दत्त्वा विमृश्य परिमर्द्य च । शिमूलस्य निर्गुड्याः जयंत्याश्चित्रकस्य च ॥४॥ द्रवैश्चैवमेकं दिवसं (?) मर्दयेच्चातियततः । पश्चाद्धिगुजलं दत्त्वा कुर्याच्चणमिता वदी ॥५॥
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वैद्य - सार
भयं ज्वालामुखा नाम पूज्यपादेन भाषितः । उष्णोदकानुपानेन सेविता च वटी नृणां ॥६॥ शूलं च गुल्मरोगं च दुःसाध्यं श्लेष्मगुल्मकं । ज्वरान् कफकृतान् हंति कफरोगान्विशेषतः ॥७॥ गलामयान् स्वरभ्रंशं पांडु शोफं कफं तथा । ग्रहणीं चातिमंदाग्नि चामकाष्ठं विशेषतः ॥ ॥ दुस्तर' चामवातं च जीर्णवातगदं तथा । सर्वव्याधिहरः शीघ्रं नाम्ना ज्वालामुखो रसः ॥६॥
टीका - शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, गोदंती हरताल, ताम्र भस्म तथा शुद्ध मेनसिल, वज्रभ्रक का भस्म, सब समान लेकर सब की कज्जली करे, फिर ३ तोला चतुर्जात (दालचीनी, इलायची, तेज पत्र, नागकेशर लेवे एवं शुद्ध विष नाग, कायफल, बांझ ककोड़ा, विदारीकंद, धनियाँ, कुटकी, शुद्ध कुचला, समुद्र नमक, काली मिरच, इन सबका एक एक तोला लेकर कूट कपड़छान कर इन सब के चूर्ण बराबर ऊपर की कजली लेकर मर्दन कर मीठे सोजना की जड़ और निर्गुडी जयंती ( अरनी) चित्रक इन सबके स्वरस में या काढ़े में लग अलग एक एक दिन भावना देकर सुखावे । पश्चात् हींग का पानी देकर चना बराबर गोली बांधे तब यह ज्वाला मुख नामक रस तैयार हो जाता है। यह पूज्यपाद स्वामी का बताया हुआ रस है । इसको गर्म पानी से सेवन करने से शूल रोग तथा दुःसाध्य कफजन्य गुल्म रोग, कफजन्य ज्वर, गले के रोग, स्वरभंग, पांडु रोग, शोथ रोग, कफजन्य कोई भी रोग, ग्रहणी, अत्यन्त मंदाग्नि, विशेष कर आम काष्ठ को तथा कठिन आमबात, जीर्ण बात आदि सम्पूर्ण रोगों को अनुपानयोग से यह नाश करता है
1
१०
- सन्निपाते - सन्निपातान्तको रमः रसं विषं रविं कृष्णां गंधकं चोषणं क्रमात् । द्विचतुः पंचत्रिदशव सुसंख्यकं (१) चाष्टकं ॥१॥ अर्कपत्ररसेनैव याममात्र तु मर्दयेत् । गुंजाप्रमाणवाटिकां छायाशुष्कां तु कारयेत् ॥२॥ कद्रवसंयुक्ता सन्निपात कुलांतिका । सर्वदोषविनाशनी पूज्यपादेन भाषिता ॥३॥
टीका - शुद्ध पारा २ भाग, शुद्ध विषनाग चार भाग, ताम्र भस्म पाँच भाग, पीपल १३ भाग, शुद्ध गंधक ८ भाग, कोली मिर्च ८ भाग इन सबको लेकर अकाना के पते के
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वैद्य-सार
स्वरस में एक प्रहर तक मर्दन करके एक एक रत्तो प्रमाण गोली बांध लेवे और छाया में सुखावे। इस गोली को अदरख के रस के साथ देने से सन्निपात शान्त होता है तथा यह सब दोषों का नाश करनेवाला है, ऐसा पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
११–जलोदरादौ पंचाग्नि-गुटिका पंचाग्निः पंचलवणं द्वितारं रामठं बचा। कटुनयाजमोदा च सर्षपं जीरकद्वयं ॥१॥ लशुनं निवृताप्रन्थिं समभागानि कारयेत् । सुधाक्षीरेण संपिण्य सूरणस्योदरे क्षिपेत् ॥२॥ घृतालिप्तं च कर्तव्यं पचेद् गोमयवह्निना। स्वांगशीतलमादाय सर्व पिष्ट्वा सुधारसैः ॥३॥ कोलबोजार्धमात्रेण बटकान् कारयेद्भिषक् । लेहयेदधिसारेण जलकूम च कुम्भजे ॥४॥ पथ्यं दध्योदनं तक हिता सर्वोदरापहा ।
पूज्यपादप्रयुक्तेयं सर्वोदरकुलान्तनी ॥५॥ टीका-पाँच भाग चित्रक, पांचो नमक (समुद्र नमक, काला नमक, संधा नमक, विड नमक, सांभर नमक) सजीक्षार, जवाखार, होंग दूधिया, वच, सोंठ, मीर्च, पीपल अजमोदा, सफेद सरसो, दोनों जीरा, लहसुन, निशोथ, पीपरामूल ये सब एक एक भाग लेकर सबको कूट कपड़छान कर थूहर के दूध से पीस कर सूरण का कुछ दल निकाल कर उसके भीतर सब दवाइयों को भर दे और उसका घी से लिप्त कर ऊपर से कपड़मट्टी कर सुखावे, इसके उपरांत जंगली कंडों की अग्नि में पकावे, जब स्वांग शीतल हो जाय तब सबको फिर से थूहर के दूध से पीस कर बेर की गुठली के आधे परिमाण के बराबर गोली बांधे और उस गोली को दही के तोड़ से एक एक या दो दो गोली खावे । इसके खाने से जलोदर, कूर्मोदर शांत होते हैं। इसके ऊपर दही भात पथ्य है। यह पूज्यपाद स्वामी की कही हुई सब प्रकार के उदर रोगों को नाश करनेवाली है।
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वैद्य-सार
१२- उपदंशादौ कंदर्पो रसः सुरसं दशभोगं च गंधकस्य तथैव च । नवसारार्धभागं तु सर्वमेवं प्रमर्दयेत् ॥१॥ हंसपादी जयंती च स्वरसैः कृष्णधूर्तकैः । कोचकूप्यां विनिक्षिप्य चावरुध्य प्रयत्नतः ॥२॥ ज्वालयेदग्निं यत्नेन दिनत्रयविनिर्मितम् । स्वांगशीतलमुद्धत्य ग्राह्य यत्नेन भस्मकं ॥३॥ देवकुसुमं च कर्परं दापयेत् समभागकम् ।। गुंजाद्वयं त्रयं चैव मधुना लेहयेन्नरः॥४॥ उपदंशहरप्रयोगोऽयं धातुवर्धनतत्परः।
कंदर्पसमतनुं कृत्वा पूज्यपादेनभाषितः ॥५॥ टीका-शुद्ध पारा १० भाग, शुद्ध गंधक १० भाग और नौसादर ५ भाग, सबको एकत्रित कर कजली बनावे तथा हंसराज, गनयारी, (अरनी) काला धतूरा इसके स्वरस में मर्दन करके सुखावे तत्पश्चात् काँच की शीशी में भरकर बालुकोयंत्र में तीन दिन तक पकावे जब ठीक पाक हो जाय तब ठंडा होने पर यत्नपूर्वक निकाल ले तथा उसमें लवंग
और कपूर समान भाग मिलाकर २ रत्ती अथवा तीन रत्ती मधु के साथ दे, तो यह अनेक कठिन से कठिन उपदंश को नाशकर मनुष्य के शरीर को कामदेव के सदृश बनाकर धातु को बढ़ाने में समर्थ होता है यह पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
१३-विषमज्वरे चतुर्थज्वरहरवटिका टंकणं दरदं तं कणावोलं तु तुत्थकं । कांतं गंधं शिलातालं नवसारं तथा विषं ॥१॥ कारवल्लीरसैर्मर्च वटी गुंजाप्रमाणिका।
गुडेन सह मिश्रं तु चातुर्थिकहरीपरम् ॥२॥ टीका-शुद्ध चौकिया सुहागा, शुद्ध सिंगरफ, शुद्ध पारा, पीपल, शुद्ध बोल, शुद्ध तूतिया, कान्तिसार, शुद्ध आंवलासार गंधक, शुद्ध मेनशिल, शुद्ध तकिया हरताल, शुद्ध नौसादर, शुद्ध सिंगिया, इन सबको घोंट, कर कूट, पीस और कपड़छन कर, करेले के स्वरस में १ रत्ती प्रमाण गोली बनावै तथा पुराने गुड़ के साथ चौथिया ज्वर माने के पहले, एक एक गोली खाने से लाभ होता है।
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वैद्य-सार
१४-अग्निमांद्ये अग्निकुमाररसः रसगंधकयोः कृत्वा कजली तुल्यभागयोः । पादांशममृतं दत्त्वा शुक्तिभस्मसमांशकम् ॥१॥ हंसपादीरसैः सम्यङ् मर्दयित्वा दिनत्रयम् । स्थूलगोलांस्ततः कृत्वा परिशोष्य खरातपे ॥२॥ निरुध्य बालुकायंत्र क्रमवृद्धेन वन्हिना । पचेदेकमहोरात्र ततः शीतं विचूर्णयेत् ॥३॥ पादांशममृतं दत्त्वा मर्दयेदाकद्रवैः । नियुज्यस्थालिकामध्ये ततोऽन्यस्थालिकादरे ॥४॥ पलार्धममृतं दत्वा रसस्थाली च तन्मुखे । न्युब्जां दत्त्वा दृढं रुद्ध्वा चुल्यामारोप्य यत्नतः ॥५॥ यामं प्रज्वालयेदग्निं विचूर्ण्य तदनंतरम् । करंडके विनिक्षिप्य स्थापयेति यत्नतः ॥६॥ रसोह्यग्निकुमाराख्यो पूज्यपादेन भाषितः । हन्यादेषोऽग्निमांद्य ज्वरगमखिलं वातजातां क्षयाति ॥ शोफाढ्यं पांडुरोगं कफजनितगदान :प्लीहगुल्मौ गदाति । सर्वाङ्गीणं च शूलं जठरभवरुजं खंजतां पङ्गलत्वम् ।
सर्वाश्चासाभ्यरोगान् जिन इव दुरितं रक्तगुल्मं वधूनाम् ॥७॥ टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक ये दोनों बराबर बराबर लेकर उनकी कजली बनावे तथा पारे से चौथाई भाग शुद्ध विष लेवे और विष के बराबर शुक्तिका भस्म लेकर सबको तीन दिन तक हंसराज के रस से घोंटे, तत्पश्चात् उसका गोला बना कर तेज घाम में सुखावे, सूख जाने पर बालुकायन्त्र में रख कर क्रम से मृदु, मध्यम और तीव अग्नि से एक दिन-रात पकावे फिर ठंढा होनेपर सबका चूर्ण कर उससे चौथाई शुद्ध विषनाग मिलाकर अदरख के रस के साथ घोंटे तथा उसको एक कोरी हंडी के अंदर रख देवे या लेप कर देवे। बाद दूसरी हंडी में२ तोला विषनाग के चूर्ण को पानी से गीला कर सब में छिड़क देवे। पहली हंडी पर दूसरी हंडी का उल्टी कर (मुख से मुख मिलाकर) रख दे। दोनों के मुख को कपड़मिट्टी से बंद कर और सुखाकर चूल्हे पर रख एक प्रहर तक भौच देवे और {दा होने पर चूर्ण करके शीशी में रख लेवे, बस ऐसे हो अग्निकुमार रस तैयार हो जाता है। यह पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ रस है। यह अग्नि की मन्दता, सर्व प्रकार के ज्वर,
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वैद्य-सार
बातरोग, क्षय, शोथरोग, पांडुरोग, कफजन्य रोग, प्लीहा, गुल्मरोग, सांग. का शुल, उदरशूल, खंजपना, लंगड़ापन, स्त्रियों के रक्त गुल्म तथा और भी असाध्य रोगों को यह रस नाश करता है जैसे जिन भगवान पापों को नाश करते हैं ।
१५-उदर-रोगे राजचंडेश्वररसः रसं गंधं विषं ताम्र सप्ताहं मर्दयेत् दृढं। निर्गुड्या कनिर्यासैः पृथक् सिद्धो भवेद्रसः ॥१॥ राजचण्डेश्वरो नाम गुंजैकं चाई-वारिणा।
उदररोगनिवृत्यर्थ पूज्यपादेन भाषितः ॥२॥ टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, शुद्ध विष, ताम्रभस्म इन चारों को सात दिन तक निर्गुन्डी के स्वरस में तथा अदरख के स्वरस में अलग अलग घोंटकर एक एक रती की गोली बनावे और उस एक एक गोली को सुबह, शाम अदरख के स्वरस के साथ सेवन करे तो सर्व प्रकार के उदर रोग शांत हो जाते हैं ऐसा पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
१६--वरादौ ज्वरांकुशरसः सूतभस्म दरदं समं मृतं शंखनाभिवरशुद्धगंधकं । नागरक्वथितमर्दितं च तद्वलमात्रमिव नूतनज्वरे ॥१॥ आर्द्रकद्रवविमिश्रितं ददेव त्र्यूषणस्य त्रिफलारजःसमैः।
पूज्यपादकथितो महागुणः सर्वदोषप्रशमः ज्वरांकुशः ॥ -. टीका-पारे का भस्म, शुद्ध सिंगरफ, ताम्रभस्म, शुद्ध शंखनाभि, शुद्ध गंधक इन सबको बराबर लेकर सोंठ के काढ़े से मर्दन करके गोली बनावे और इसको एक बल्ल अथवा रोगानुसार मात्रा कल्पना करके नवीन ज्वर में अदरख के रस के साथ तथा सोंठ, कालीमिर्च, पीपल के काढ़े के साथ और त्रिफला के काढ़े अथवा चूर्ण के साथ देवे, तो सर्व प्रकार का ज्वर शांत होवे।
१७–सन्निपातादौ मूतादिभैरवरसः सूतं च गंधकं चेति ग्राह्यचैव समांशकम् । समांशव्योषसंमिश्रं मर्दयेन्निम्ब-चारिणा ॥१॥
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वैद्य-सार
दिनेनैकेन सततं सूर्यतापेन शोषितं । चतुर्थाशविषं ग्राह्य रससिद्धिर्भषिष्यति ॥२॥ भक्षयेद्गुञ्जमात्रेण चाकस्य रसेन तु। सर्वाणि संनिपातानि त्रिदोषद्वन्द्वजं हरेत् ॥३॥ सर्वशैत्यं च मूकत्वं प्रलापं तन्द्रिकं हरेत् ।
भूतादिभैरवो नाम पूज्यपादेन भाषितः ॥४॥ टीका-शुद्ध पारा तथा शुद्ध गंधक दोनों समान भाग लेकर कजली बनावे फिर दोनों के बराबर सोंठ, मिर्च, पीपल लेकर मिलावे और नीम की पत्ती के स्वरस में दिन भर घोंटता रहे और धूप में सुखावे तत्पश्चात् उस सम्पूर्ण औषधि से चौथाई शुद्ध विष लेकर मिलावे और खूब घोंटे बस रस तैयार होगया। इसको १ रत्ती प्रमाण अदरख के रस के साथ सेवन करने से सर्व प्रकार के सन्निपात, त्रिदोषज ज्वर, ईन्द्वज ज्वरों को नाश करता है तथा सर्व प्रकार के शीत रोग, मूकता, प्रलाप, तंद्रा इत्यादि रोगों का भी नाश करता है। यह भूतादिभैरव नाम का रस पूज्यपाद स्वामी का बनाथा हुआ बहुत उत्तम है।
१८-सर्वज्वरे चन्द्रोदयरसः रसगंधं तथा वगं चाभ्रकं समभागतः। मेलयित्वा तु पंगेन समं सूतं विमर्दयेत् ॥१॥ तत्रकीकृत्य धंगानं जंबीराम्लेन मर्दयेत् । सामान्यपुटमादद्यात् सप्तधा भावितो रसः ॥२॥ कुमार्या चित्रकेणापि भावयित्वा तु सप्तधा। गुडेन जीरकेणापि ज्वराजीणे प्रयोजयेत् ॥३॥ इत्येवं रोगतापजचन्द्रोदयरसः स्मृतः।
सर्वदोषविनिर्मुक्तः पूज्यपादेन भाषितः ॥४॥ टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, वंग भस्म और अभ्रकरस ये चारों बराबर लेवे, यहां पर पहले बंग को गलावे जब बंग गल जाय तब उसमें पारा डालकर मिलावे पश्चात् दूसरी
औषधि मिलावे और जंबीरी नीबू के रस से मर्दन करे और पुट देवे, इस प्रकार सात बार भावना देकर पुट लगावे, कुमारी के स्वरस से तथा चित्रक के स्वरस से सात सात भावना देकर पुट लगावे इस प्रकार जब इक्कीस पुट हो जाय तब तैयार हुआ समझे। यह पुराना गुड तथा सफेद जीरा के साथ सेवन करने से सब प्रकार का ज्वर एवं अजीर्ण रोग को नाश करनेवाला है। यह सब दोषों से रहित चन्द्रोदय रस पूज्यपाद स्वामी को कहा हुमा है।
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वैद्य - सार
१६ - नवज्वरे नवज्वरहर टिका वचामृता रसं गंधं मरिचं ताम्र भस्मकं । टंकणं च समं कृत्वा अकोलरसमर्दितां ॥१॥ द्विदिनं गुंजमात्रां तु वटिकां कारयेद्भिषक् । आर्द्रस्य रसैर्देया नवज्वरहरी व सा ॥२॥ पथ्यं दध्योदनं कुर्यात् पूज्यपादेन भाषिता 1
टीका - दूधिया बच, गिलोय, शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, काली मीर्च, ताम्र भस्म, सुहागे का भस्म इन सबके । एकत्रित कर अंकोल के स्वरस में दो दिन तक मर्दन करके एक एक रती की गोलियां बांध लेवे तथा अदरख के रस के साथ सेवन करे तो नवीन ज्वर शांत हो जाता है। इसके ऊपर दही-भात का पथ्य सेवन करे । यह पूज्यपाद स्वामी की कही हुई नवज्वरहर वटिका उत्तम है ।
२० --- नवज्वरे करुणाकररसः
रसगंधकं भागैकं तथा लौहटंकणं । मनःशिला मयस्कांतं नागं गगनमेव च ॥ १॥ सवंगशुल्वसंयुक्तं कृत्वा कज्जलिकां बुधैः । लौहपात्रे पचेत् सम्यक् यावद्दारुणवर्णता ||२|| करुणाकररसो नाम नवज्वरनिवारणः । निमित्तदेषदोषेभ्यञ्चानुपानं प्रयोजयेत् ॥३॥ पूज्यपादकृतो योगः नराणां हितकारकः । सर्वरोग समूहो कथितो विज्ञसंम्मतः ॥४॥
टीका - शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, लौहभस्म, कच्चा सुहागा, शुद्ध मैनशील, कान्त, लौहभस्म, शीसाभस्म, अभ्रक भस्म, बंगभस्म और ताम्र भस्म ये सब बराबर बराबर लेकर कज्जली बनावे और लोहे की कड़ाही में डालकर पकावे, जब पकते पकते लाल वर्ण हो जाय तब तैयार समझे। यह करुणाकर नाम का रस नवीन ज्वर को नाश करनेवाला है। इसको ज्वर तथा वात, पित्त, कफ दोषों के अनुसार अनुपान भेद से सेवन करना चाहिये । यह पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ योग मनुष्यों का हित करनेवाला, संपूर्ण रोगों को नाश करनेवाला विद्वानों द्वारा मान्य कहा गया है
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वैद्य-सार
२१–आमादौ मेघनादरसः हिंगुलं टंकणं व्योष सैधवं त्रिवृतानि च। दन्ती हिंगुविडंगं च दीप्ययुग्मं समांशकम् ॥१॥ तच्चूर्णसमभागं च जैपालफलमिश्रितः। मर्दयेत्खल्वमध्ये तु जंबीररसभावितः॥२॥ बटिकां गुंजमात्रषु उष्णांबुना पिवेन्नरः। आम विरेचनं कुर्यात् मेघनादस्त्रिदोषजित्॥३॥ पंचगुल्मं क्षयं पांडुकामलाजीर्णदुर्बलं । मूत्ररोग हरेच्छवासं कासप्लीहमहोदरान् ॥४॥ आकरसेन नाशयति अम्लप्लीहजलोदरान् । शूलहृद्रोगदुर्नामकृमिकुष्ठहलीमकं ॥५॥ मंडलं गजचर्माणि योगेन तिमिरापहः । मांसोदरे च मंदाग्नौ मधुना खल्वरोचके ॥६॥ मेघनादरसः प्रोक्तः त्रिदोषमलनाशनः । अनुपानविशेषेण रोगान् मुंचति कार्मकान् ॥७॥
पूज्यपादकृतो योगो नराणां हितकारकः। टीका-शुद्ध सिंगरफ, शुद्ध सुहागा, सोंठ, काली मिर्च, पीपल, सेंधा नमक, निशोथ, दन्ती, हींग, वायविडंग, अजमोद, अजवायन ये सब बराबर बराबर लेवे तथा इन सबके बराबर शुद्ध जमालगोटा मिलावे और खल में जंवीरी नींबू के रस में भावना देकर एक एक रत्ती की गोली बनाकर प्रातःकाल एक एक गोली गर्म जल के साथ सेवन करे तो इससे आमदोष का विरेचन होता है, तथा यह मेघनाद रस तीनों दोषों को जीतनेवाला पांचों प्रकार के गुल्मरोग, क्षय, पांडु, कामला, अजीर्ण, दुर्बलता, मूत्ररोग, श्वास, खाँसी, तिल्ली, महान उदर रोग, अदरख के रस के साथ सेवन करने से अम्लरोग प्लीहा, जलोदर, शूल, हृदयरोग, बवासीर, कृमिरोग, कुष्ठरोग, हलीमक, मंडल (चकते पड़ना) गजचर्म (गजकर्ण रोग) विशेष अनुपान से तिमिर रोग को भी, मांसोदर, मंदाग्नि अथवा मधु के साथ सेवन करने से सर्व प्रकार के अरोचक को और त्रिदोष का नाश करनेवाला है यह मेघनाद रस अनुपान-विशेष से अनेक प्रकार के रोगों को नाश करता है। यह पूज्यपाद स्वामी का बनाया हुआ योग मनुष्यों का हित करनेवाला है।
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१८
वैद्य - सार
२२ - जीर्णज्वरादौ घोडाचोलीरसः
पारदं टंकणं गंधं विषं व्योषं फलत्रयम् । तालकं च समोपेतं जैपालं समभागकम् ॥१॥ किंशुकस्य रसे दत्त्वा याममात्रं तु पेषयेत् । गुंजाप्रमाणवाटिकां छायाशुष्कां तु कारयेत् ॥२॥ मरिचैः क्षोधितैः स्वरसैश्वाद्रकस्य च पाययेत् । जीर्णज्वरं शूलमेहं कठिनं तु महोदरं ॥३॥ प्लीहां च कृमिदेोषं च हरेत् कुंभाह्वयं गदं । घोड़ाचूलिरितिख्यातो पूज्यपादेन भाषितः ॥४॥
टीका - शुद्ध पारा, शुद्ध सुहागा, शुद्ध गंधक, शुद्ध विष, सोंठ, मिरच, पीपल, त्रिफला, शुद्ध तर्वाकया हरताल का भस्म और शुद्ध जमालगोटा ये सब चीजें बराबर बराबर लेकर पलास के फूल के स्वरस में एक प्रहर तक घोंट कर एक पक रत्ती की गोली बांधकर छाया में सुखावे । इस गोली का एक रती पीसी हुई काली मिर्च तथा अदरख के रस के साथ पिलावे । यह जीर्णज्वर, शूल, प्रमेह, कठिन उदर रोग, प्लीहा, कृमि और कुंभकामला har नाश करता है। यह घोड़ाघोली रस पूज्यपाद स्वामी का बतलाया हुआ योग बहुत उत्त I
२३ विबंधे इच्छाभेदिरमः
सूतं गंधं च मरिचं टंकणं नागराभये । जैपालबीजसंयुक्तो क्रमेण वर्धनं करेत् ॥१॥ सर्वतुल्यैर्गुडैर्मर्य इच्छाभेदिरसः स्मृतः । चतुर्गुञ्जावटी योग्या ततः तोयं पिबेन्मुहुः ॥२॥ विबंधज्वरगुल्मं च शोफशुलोदरभ्रमम् ।
पांडुकुष्टाग्निमान्धं च श्लेष्मपित्तानिलं हरेत् ॥३॥
सोंठ, बड़ी हर्र का
टीका - शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, काली मिर्च, सुहागे का फूल, बकला, शुद्ध जमाल (गोटा, ये क्रम से एक एक भाग बढ़ा कर लेवे अर्थात् पारा १ भाग गंधक २ भाग, मिर्च ३ भाग, सुहागा ४ भाग, सोंठ ५ भाग, हर्रे ६ भाग, जमालगोटा ७ भाग लेवे और इन सबको पीसे तथा सबके बराबर पुराना गुड़ मिला कर चार चार रती की गोली बनावे, सुबह शाम एक एक गोली सेवन करे और ऊपर से २ तोला पानी पीये
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वैद्य-सार
तथा प्यास लगने पर कई बार पानी पीवे इससे रेचन होता है। यह दवा ज्वर, गुल्म, सूजन, शूल, उदर रोग, भ्रम रोग, पांडु, कुष्ट, अग्निमांद्य-कफ, पित्त और बात इन सब रोगों का नाश करनेवाला है।
२४-विबंधे विरेचकतिक्तकोशातकीयोगः तिक्तकोशातकीवीर्ज तिन्तडीबीजसंयुतम् । पातालयंत्रमार्गेण तैलं तत्तिक्ततुंबके ॥१॥ सार्धे सषीजे मासार्ध क्षिपेत् सिद्ध भवेत्ततः। तेन पादप्रलेपेन नाभिलेपेन वा भवेत् ॥२॥ आमं विरेचयत्याशु वान्तौ तु हृदयं पुनः ।
लेपयेत् क्षालयेन्निम्बवारिणा स्तंभनं भवेत् ॥३॥ टीका-कड़वी तुरई के बीज, तिन्तडीक के बीज, इन दोनों को बराबर बराबर लेकर पाताल यंत्र के द्वारा उनका तेल निकाले और उस तैल को कड़वी तुमरियाबीजसहित आधी काट कर उसमें भर कर १५ दिन तक रखे तो यह तैलसिद्धि हो एवं फिर उसको निकाल कर काम में लावे। उस तैल को पैरों में लगाने से तथा नाभी पर लेप करने से आम दोष का विरेचन होता है, यदि बमन हो जाय तो हृदय पर लेप करे और नीम की पत्ती के ठंढे पानी से प्रक्षालन करे तो बमन शान्त हो जाता है।
२५–विबंधे प्रथम इच्छाभेदिरसः जैपालरसगंधांश्च स्नुहीतीरेण मर्दयेत् । विश्वाहरीतकी शृङ्गबेरद्रावेण संयुतः ॥१॥ माषमानं ददेश्चैव इच्छाभेदि विरेचनम् ।
यथेष्टं रेचनं भूयात् पूज्यपादेन भाषितः ॥२॥ टीका-शुद्ध जमालगोटा, शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, इन तीनों को लेकर थूहर के दूध से घोंटे और उसमें सोंठ, बड़ी हर्र का बकला अदरख के रस के साथ मर्दन करके रख लेवे उसको एक मासे की मात्रा से देवे तो यथेष्ट इच्छानुकूल विरेचन होवे। ... . ..
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२०
वैद्य-सार
२६ - द्वितीय इच्छाभेदिरसः
व्योषं गंधं सुतकं टंकणं च तेषां तुल्यं तिन्तडीबीजमेतत् । खल्वे यामं मर्दयेन्नागवल्लीपर्णेनैवंवल्लमात्रप्रवृत्तिः ॥ इच्छाभेदिं दापयेचाथ सेव्यं तांबूलांते तोयपानं यथेच्छं । यावत्कुर्याद् रेचनं तावदेव शूलेषदावर्तपांडूदरेषु ॥१॥
टीका - सोंठ, मिर्च, पीपल, शुद्ध पारा, सुहागा इन सबको बराबर बराबर और सबके बराबर तिन्तड़ीक के बीज ले I खरल में एक प्रहर तक पान के स्वरस में घोंट कर तीन तीन रत्ती के प्रमाण से देवे तथा ऊपर से एक पान का वीड़ा खावे पीना होय पीवे इससे उत्तम विरेचन हो जाता है तथा सर्व प्रकार उदर रोग शान्त हो जाते है ।
।
के
मोट- जितने बार दस्त लेना होय उतने बार पान का बीड़ा खाकर पानी पीवे ।
पश्चात् जितना पानी
शूल उदावर्त, पांडु
२७ - श्वासकासादौ गजसिंहरसः
रसलोहं शुल्वभस्म वत्सनाभं च गंधकं । तालीसं चित्रमूलं च पला मुस्ता च ग्रन्थिकं ॥ १॥ त्रिकटु त्रिफलायुक्त' जैपालं तु विडंगकम् । सर्वसाम्यं विचूण्यैव शृगवेरद्रवैर्युतम् ॥२॥ चणप्रमाणवाटिकां भक्षयेद्गुडमिश्रिताम् । श्वासकासक्षयं गुल्मप्रमेहं तृड्जरागदम् ॥३॥ वातमूलादिरोगाणि हंति सत्यं न संशयः । ग्रहणीं पांडु शुलं च गुदकीलं गूढगर्भकम् ॥४॥
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गजसिंहरसो नाम पूज्यपादेन भाषितः ।
टीका- शुद्ध पारा, लोह भस्म, ताम्रभस्म, शुद्ध विष, शुद्ध गंधक, तालीस पत्र, चित्रक, छोटी इलायची, नागरमोथा, पीपरामूल, सोंठ, मिर्च, पीपल, हर्र, बहेरा, आंवला, शुद्ध जमालगोटा, वायविडंग ये सब औषधियां बराबर २ लेकर अदरख के रस के साथ घोंट कर चना के बराबर गोली बनाबे तथा पुराने गुड़ के साथ एक एक गोली प्रातःकाल और सायंकाल सेवन करे तो श्वांस, खाँसी, क्षय, गुल्म, प्रमेह, तृषा, ग्रहणी, शूल, पांडु, गुदकील (बवासीर का भेद) मूढ़ गर्भ तथा अनेक प्रकार के बातरोग नाश हो जाते हैं इसमें कोई संशय नहीं है, ऐसा पूज्यपाद स्वामी ने कहा है ।
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वैद्य-सार
२८ - श्वासकासादौ सुतका दियोगः सूतकं गंधकं भाङ्ग चामृतं चित्त्रपत्त्रकं । विडंगरेणुका मुस्ता चैलाकेशर थिका ॥१॥ फलत्त्रयं कटुत्त्रयं शुल्वभस्म तथैव च । पतानि समभागानि गुडं द्विगुणमुच्यते ॥२॥ सर्वेषां गुटिकां कृत्वा मात्रां चरणकमात्रिकां । एकैकां भक्षयेन्नित्यं तेषां चैव विचक्षणः ॥३॥ श्वासकासक्षये गुल्मे प्रमेहे विषमज्वरे । तृष्णायां ग्रहणीदोषे शूले पांड्रामये तथा ||४|| मूढगर्भे बातरोगे कृच्छ्ररोगे च दारुणे । कृमिरोगेषु मन्दाग्नौ मांसोदररुजासु च ॥५॥ कंठग्रहे हृद्ग्रहे हिक्कामूर्धरुजासु च । अपस्मारे तथोन्मादे रक्तवृद्धौ च दारुणे ॥६॥ सर्वागेषु च कुष्ठेषु सर्वस्मिन्नश्मरीगदे । लूतायां सन्निपाते च दुष्टसर्पे च वृश्चिके ॥७॥ हस्तपादादिरोगेषु सर्वषु गुलिका मता । सूतकादिरयं योगः पूज्यपादेन भाषितः ||८||
टीका - शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, भारंगी, शुद्ध विष, चित्रक, तेजपत्त्र, वायविडंग, रेणुकाबीज, नागरमोथा, छोटी इलायची, नागकेशर, पीपरामूल, त्रिफला, सोंठ, मिर्च, पीपल, ताम्रभस्म, इन सबको समान भाग लेकर कूट कपड़छन करके सब चूर्ण से दूना गुड़ लेकर एक चना के बराबर गोली बनावे और एक एक गोली प्रतिदिन प्रातः काल सेवन करे, तो इससे श्वास, खांसी, क्षय, गुल्म, प्रमेह, विषमज्वर, तृष्णा, ग्रहणी, दोष, भूल, पांडु रोग, मूढ गर्भ, बातरोग, कठिन मूत्रकृच्छ्र, कृमिरोग, मंदाग्नि, नासिका रोग, कंठरोग, हद्रोग, हिचकी शिरोरोग, अपस्मार, उन्माद, रक्तवृद्धि, सर्वाङ्ग में होनेवाला कुष्ठ रोग, पथरी रोग, मकड़ी के विष में, सन्निपात में, सर्प के काटने पर, बिच्छू के काटने पर, हाथ-पैर के किसी भी रोग में यह सूतकादि योग बहुत उत्तम है ऐसा पूज्यपाद स्वामी ने कहा है ।
२६ - क्षयकासादौ अग्निरसः
सूतं द्विगुणगंधेन मदयेत् कज्जलीं यथा । तयोः समं तीक्ष्णचूर्ण कुमारीवारिणाद्भुतम् ॥१॥
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२२.
वैद्य सार
सर्वस्य गोलकं कृत्वा ताम्रपात्रे विनिक्षिपेत् । आच्छाद्यैरण्डपत्रेण यामार्द्धे चोष्णतां नयेत् ॥२॥ धान्यराशौ विनिक्षिप्य द्विदिनं चूर्णयेत्ततः । त्रिकटुत्रिफला चैलाजातीफललवंगकम् ॥३॥ चूर्णमैषां समं पूर्वरसस्यैतन्मधूयुतम् । द्विनिष्कं भक्षयेन्नित्यं स्वयमग्निरसोह्ययं ॥४॥ क्षयका सत्तयश्वास हिक्कारोगस्य नाशकः । ज्वरादितरुणे प्रोक्तान् चानुपानान् प्रयोजयेत् ॥५॥ सर्वकासेषु मतिमान् कासोकैरनुपानकैः । क्षयादिनाशको योगः पूज्यपादेन भाषितः ॥ ६ ॥
धान्य की राशि में दो दिन
टोका - शुद्ध पारा तथा दूना गंधक लेकर कज्जली बनावे और दोनों के बराबर तीक्ष्ण लौहभस्म लेकर घीकुआरि के स्वरस में गोली बनाकर ताम्बे के पात्र में रख कर बंद करके डेढ़ घंटे तक आँच देकर गर्म करे और फिर उसी संपुट को तक रख देवे, पश्चात् निकाल कर सबकेा पीसकर चूर्ण बनाले त्रिफला, छोटी इलायची, जायफल, लवंग इनका चूर्ण पहले के घोंट कर तैयार करले । यह स्वयं अग्निरस तैयार हो गया समझो। साथ सेवन करना चाहिये तथा ज्वर इत्यादि में जो अनुपान कह श्वास में जो अनुपान कह चुके हैं उन्हीं अनुपानों से इनका भी देना चाहिये। यह क्षय यादि को नाश करनेवाला पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ उत्तम योग है ।
तथा सोंठ मिरच, पीपल, रस के बराबर ले एवं
इस चूर्ण को मधु के चुके हैं, खाँसी और
३० वाजीकरणे रतिविलासरसः
हरजभुजगकांताश्चाभ्रकं च त्रिभागं कनकविजययष्टी शाल्मली नागवल्ली । सितमधुघृतयुक्तं सेवितं बल्लयुग्मम् । मदयति बहुकांतं पुष्पधन्वा बलायुः ||१||
टीका - शुद्ध पारा, शुद्ध शीसा, कांतलौह भस्म ये तीनों बराबर बराबर लेवे तथा अभ्रक भस्म, तीसरा भाग ले और सबको घोंट कर तैयार कर लेवे, फिर शुद्ध धतूरा के बीज, बिजया की पती, मुलहठी, सेमल का मूसला एवं पान इनके साथ मिश्री तथा शहद के साथ साथ रती प्रमाण सेवन करने से बहुत स्त्री वाले पुरुष को कामदेव तथा बल और आयु मदत कर देते हैं अर्थात् वह क्षीण-शक्ति नहीं होता ।
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वैद्य-सार
३१ वाजीकरणादौ लीलाविलासरसः
अहिफेनं वार्धिशोकं च त्रिसुगंधं च तत्समम् । धूर्तबीजसमायुक्तं विजयावीजतत्समम् ॥१॥ तद्रसैः भावनां कुर्याद्रसो लीलाविलासकः । चणकप्रमाणवटिका दीयते सितखंडया ॥२॥ बहुमूत्रविनाशश्च शुक्रस्तंभं करोति च ।
यामिनीमान-भंगं च कामिनीमदभजनम् ॥३॥ टीका-शुद्ध अफीम, समुद्रशोष, छोटी इलायची, दालचीनी, तेजपात, ये तीनों बराबर तथा शुद्ध धतूरे के बीज और उसी के बराबर भांग के बीज लेकर धतूरा और भांग के स्वरस की भावना देकर चना के बराबर गोली बांधे। इस गोली को मिश्री के साथ देने से बहुमूत्र रोग शांत हो जाता है तथा वीर्य का स्तम्भ होता है और रात्रि का मानभंग और कामिनी के मद का नाश होता है।
३२--प्रामदोषादौ उदयमार्तण्डरसः हिंगुलं च चतुनिष्कं जैपालं च त्रिनिष्ककं । वत्सनाभं चैकनिष्कं निकटु चैकनिष्ककं ॥१॥ हरीतकी चैकनिष्क निष्कमेरंडमूलकं। करंजबीजं निष्कं च नीलांजनमनःशिला ॥२॥ रसतुत्थं पिप्पली च वराटं शंखभस्मकं । कनकं निम्बबीजं च प्रत्येकं च निशाद्वयम् ॥३॥ सर्वच प्रतिानष्कं च दिनं खल्वे विमर्दयेत्। अजक्षीरेण संमिश्रश्वणमात्रवटीकृतम् ॥४॥ वटकं गुडमिश्रेण ऊषणेन समन्वितम् । सेव्यश्चोष्णकीलाले चामदोषविरेचकः ॥५॥ पंचगुल्महरः शूलहरो वातविशोधनः ।
रसोऽयं पूज्यपादोक्तः सर्वशीतज्वरापहः ॥६॥ टीका-शुद्ध सिंगरफ, १ तोला, शुद्ध जमालगोटा ६ माशा, शुख सिंगिया ३ माशा, सोंठ, मिर्व, पीपल तीन तीन माशा, बड़ी हर्र का छिलका ३ माशा अरगड की जड़ की छाल
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वैद्य-सार
२४
और
३ माशा, पूतकरंज की मींगी ३ माशा, नीला सुरमा तथा शुद्ध मैनशिल, शुद्ध पारा, तूतिया भस्म, पीपल, कौड़ी भस्म, शंख भस्म, शुद्ध धतूरे के बीज, नीम की निबोड़ी की गिरी, हलदी, दाहलदी ये सब तीन तीन माशा लेकर सब औषधियों को बकरी के दूध में एक दिन भर खरल में मर्दन करे तथा चना के बराबर गोली बनावे, इस गोली को गुड़ काली मिर्च के साथ सेवन करे और ऊपर से उष्णा जल का पान करे तो इससे आमदोष का रेचन होता है, पांचों प्रकार के गुल्म रोग दूर होते हैं, शूल को नाश करता, वायु का शोधन करता तथा शीत ज्वर का नाश करनेवाला है । यह पूज्यपाद स्वामी का बनाया हुआ उत्तम योग है।
३३ – प्रमेहे प्रमेहगजकेसरी रसः सुतं च वंगभस्मानि नाकुलीबीजमभ्रकम् । यस्कांतं शिलाधातु कनकस्य च बीजकम् ॥१॥ गुडूची सत्वमित्येषां त्रिफलाक्काथमर्दिताम् । गुंजामालवीं कृत्वा छायाशुष्कां तु कारयेत् ॥२॥ शर्करामधुसंयुक्तो प्रमेहान् हंति विशंतिं । नष्टेन्द्रियं च दाहं च मन्दाग्निं मद्यदोषकं ॥३॥ सोमरोगं मूत्रकृच्छ्र वस्तिशूलं विनश्यति । पूज्यपादप्रयोगोऽयं प्रमेहगजकेसरी ||४||
टीका - शुद्ध पारा, बंगभस्म, शुद्ध रासना के बीज, अभ्रक भस्म, कांत लौहभस्म, शुद्ध शिलाजीत, शुद्ध धतूरे के बीज, शुद्ध गुरुव का सत्त्व इन सब औषधियों को त्रिफला के काढ़ े में घोंट एवं एक एक रप्ती के बराबर गोली बनाकर छाया में सुखावे। मिश्री या शहद के साथ इसका सेवन करने से बीस प्रकार के प्रमेह को नाश करता है, नपुंसकता, दाह, मंदाग्नि तथा मद्य के दोष को जीतनेवाला एवं सोमरोग मूत्रकृच्छ्र वस्ति के शूल को भी नाश करता है । यह सब प्रकार के शूलों को नाश करनेवाला पूज्यपाद स्वामी का बनाया हुआ प्रमेहगज केशरी उत्तम प्रयोग है ।
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वैद्य-सार
३४--मन्दानौ बड़वाग्मिरस: शुद्धं सूतं ताम्रभस्म तालबोलं समं समं । अर्कतीरेण संमी दिनमेकं द्विगुंजकम् ॥१॥ बड़वाग्निरसं खादेन्मधुना स्थौल्यशांतये।
पूज्यपादप्रयुक्तोऽयं खलु मंदाग्निनाशकः ॥२॥ टीका-शुद्ध पारा, ताम्रभस्म, तवकिया हरताल भस्म, शुद्ध बोल बराबर बराबर लेकर इन सबों को अकौवा के दूध में दिन भर घोंटे तथा दो दो रत्ती की गोली बनावे। इसी का नाम बड़वाग्नि रस है-इसको शहद के साथ सेवन करने से स्थूलता दूर होती है। यह पूज्यपाद स्वामी का प्रयोग मंदाग्नि का नाश करनेवाला है।
३५---रक्तदोषे तालकेश्वररसः तालकं मृततानं च समं खल्वे विमर्वयेत् । वंध्याकर्कोटकीकंदस्वरसेन दिनत्रयम् ॥१॥ द्विगुंजं मधुना दद्यात् पश्चात् क्षौद्रोदकं पिबेत् ।
रक्तदोषप्रशांत्यर्थं पूज्यपादेन भाषितः ॥२॥ टीका-तकिया हरताल का भस्म तथा ताम्रभस्म ये दोनों खरल में बांझककोड़ा के कंद के स्वरस में तीन दिन तक घोंट कर दो दो रत्ती की गोली बांधे। उस गोली को सुबह शाम मधु के साथ सेवन करे और ऊपर से मधु का पानी पिये। यह रक्तदोष की शांति के लिये पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
३६--बहुमूत्रे तारकेश्वररसः मृतं तारं मृतं वंगं मृतं कांताम्रक समम् । मर्दयेन्मधुना दिवसं रसोऽयं तारकेश्वरः ॥१॥ माषैकं लेहयेत् क्षौद्रः बहुमूलनिवारणः ।
मूत्रदोषप्रशांत्यर्थं पूज्यपादेन भाषितः ॥२॥ टीका-चांदी का भस्म, वंग का भस्म, कांत लौह भस्म तथा अभ्रक भस्म ये चारो बराबर बराबर लेकर मधु के साथ एक दिन भर बरावर घोंटे और एक माशे की मात्रा से प्रातःकाल मधु के साथ सेवन करे। इसका बहुमूत्र रोग की शांति के लिये पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
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वैध-सार
• ३७–भेदिज्वरांकुशरसः रसस्य द्विगुणं गंधं गंधसाम्वं च टंकणम् । रससाम्यं विषं योज्यं मरिचं पंचभागकं॥१॥ कट्फलं दंतिवीजं च प्रत्येकं मरिचान्वितम् । गुड़, चीसुरसास्वरसैः मर्दयेद्याममात्रकम् ॥२॥ मापैकेन निहत्याशु ज्वराजीर्ण त्रिदोषजं । क्षणे चोष्णं क्षणे शीतं क्षणेऽपि ज्वरमुत्कटं ॥३॥ क्वचिद्रानौ दिवा क्वापिं द्वितीयं व्याहिकं च तत्।
ज्वरचातुर्थिकं चापि विषमज्वरनाशनः ॥४॥ टीका-शुद्ध पारा १ भाग, शुद्ध गंधक २ भाग, सुहागे का फूल २ भाग, शुद्ध विष १ भाग, काली मिर्च ५ भाग, कायफल ५ भाग तथा शुद्ध जमालगोटा ५ भाग इन सबको गुर्च तथा तुलसी के रस से घोंट कर रख लेवे। एक माशा को माना से अनुपानविशेष के द्वारा देने से सब प्रकार के ज्वर, अजीर्ण, पित्तरोग, शीतजन्य रोग तथा उत्कट ज्वर सर्व प्रकार के विषम एवं व्याहिक, त्र्याहिक, चातुर्थिक ज्वर आदि को शान्त करता है।
३८-क्षयकासादौ अमिरसः शुद्धसूतं द्विधा गंधं खल्वेन कृतकज्जली। तत्समं तीक्ष्णचूर्ण च मर्दयेत् कन्यकाद्रवः ॥१॥ यामद्वयात् समुद्धृत्य तद्गोलं ताम्रपानके । आच्छाद्यैरंडपश्च यामार्धेनोष्णतां व्रजेत् ॥२॥ धान्यराशौ न्यसेत् पश्चात् पंचाहातं समुद्धरेत् । सुपेष्य गालयेद्वको सत्यं वारितरं भवेत् ॥३॥ कन्याभृङ्गीकाकमाचीमुंडोनिर्गुडिकानलम् । कोरटं वाकुची ब्राह्मो सहदेवी :पुनर्नवा ॥४॥ शाल्मली विजया धूर्तद्रवैरेषां पृथक् पृथक् । सप्तधा सप्तधा भाव्यं सप्तधा त्रिफलोद्भवः ॥५॥ कषाये घृतसंयुक्तं ताम्रपाने क्वचित् क्षणे । त्रिकुटत्रिफला चैला जातीफललवंगकम् ॥६॥
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वैद्य-सार
एतेषां नव मागानि समं पूर्व रसंक्षिपेत् । लिह्यान्माक्षिकसर्पिभ्या पांडुरोगमनुत्तमम् ॥७॥ स्वयमग्निरसो नाम क्षयकासनिकृन्तनः। ....
अर्घ्यपादप्रकथनः सर्वरोगनिकृन्तकः ॥८॥ टीका-शुद्ध पारा १ भाग, शुद्ध गंधक २ भाग इन दोनों की कजली करे तथा कजली के बराबर शुद्ध तीक्ष्ण लौह का चूर्ण लेवे फिर सबको घोकुवांरी के स्वरस से २ पहर तक घोंटे और गोला बनाकर तांबे के संपुट में बंद करके ऊपर से एरंड के पत्ते से आच्छादन करके ॥ घंटे तक आंच देवे जिससे यह औषधि गर्म हो जाय फिर वह संपुट धान्य की राशि में रख देवे तथा ५ दिन तक धान्य राशि में रहने के बाद निकाले और अच्छी तरह पीस कर कपड़ा से छान ले। पश्चात् जल में डालकर देखे, यदि जल के ऊपर तैर जाय तो सिद्ध हुमा समझे। तदुपरांत धीकुवारि (गवारपाठा) मोगरा, मकोय, मुंडी, नेगड, (सम्हालू) चित्रक, कुरंट, वाकची, ब्राह्मी, सहदेवी, पुनर्नवा, सेमल, भांग, धतूरा इन सबके काढ़े से या स्वरस से अलग अलग सात सात भावना देवे तथा उसमें थोड़ा घी मिलाकर तामे के बर्तन में क्षण भर के लिये रक्खे फिर सोंठ, मिर्च, पीपल, त्रिफला छोटी इलायची जायफल, लोंग इन सबका चूर्ण और सब के बराबर ऊपर कहा हुआ अग्निरस लेकर घी तथा मधु के साथ सेवन करे तो पांडुरोग शांत होता है एवं क्षय खांसी को भी इससे लाभ होता है। यह सब रोगों को नाश करनेवाला पूज्यपाद स्वामी का कहा हुश्रा उत्तम योग है।
नोट-यह ऐसा योग है कि इस योग में इसी प्रकार से लौह भस्म हो जाता है-वेद्य महानुभाव संदेह न करें।
३६-ज्वरादौ महाज्वरांकुशरसः शुद्धसूतं विषं गंधं धूर्तबीजं त्रिभिः समम् । सर्वचूाद्विगुणव्योषं चूर्ण गुंजप्रमाणकम् ॥१॥ वटकं भृगनीरेण कारयेच विचक्षणः। महाज्वरांकुशो नाम ज्वरान्सर्वान् निकृन्तति ॥२॥ एकाहिकं द्वयाहिकं वा व्याहिकं च चतुर्थकम् ।
विषम वा त्रिदोषं या हंति सत्यं न संशयः ॥३॥ टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध विष, शुद्धगंधक, एक एक भाग, बराबर बराबर तथा शुद्ध धतूरे के बीज तीन भाग, सब के चूर्ण से दूना सोंठ, मिर्च, पीपल का चूर्ण मिलाकर घोंट
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वैद्य-सार
लेवे। फिर इस रस की एक एक रत्ती के बराबर भंगरा के स्वरस में गोली बनावे । यह महाज्वरांकुश रस अनुपान भेद से सब प्रकार के ज्वरों को तथा एकाहिक, छ्याहिक ज्याहिक और चतुरााहक त्रिदोषज आदि सब ज्वर को नाश करता है।
४०-उदररोगे शंखद्रावः स्फाटिक्यं नवसारकं च लवणं तुल्यं च भागत्रयम् । सार्ध भूलबणं हितं द्रवमिहैतद् भैरवीयंत्रके ॥१॥ मापीतमिदं भगंदरमजीर्ण मुदरादिशूलादिकम् ।
शंखद्राववराभिधानमुदरे भूतान् रोगान् हरेत् ॥२॥ टीका-फिटकरी, नौसादर, सेंधा नमक ये बराबर बराबर लेकर ॥ भाग कलमी शोरा सम्मिश्रण कर भैरवस्त्र के द्वारा शंखद्राव निकाले। इसके पीने से भगंदर, अजीर्ण, उदरशूल प्रादि अनेक उदर रोगों का नाश होता है।
४१-विबंधे जयपालयोगः जयपालस्य च बीजानि पिप्पली च हरीतकी । तत्सम शुल्वचूर्ण तु बज्रीक्षीरेण भावतम् ॥१॥ मरिचप्रमाणगुटिकां तांबूलेन च मर्दयेत् ।
उष्णोदकेन बमनं शीतलेन विरेचनम् ॥२॥ टोका-शुद्ध जमालगोटा के बीज, पीपल, बड़ी हर्र का छिलका, बड़ी हर्र के बराबर ताम्रभस्म इन सबको थूहर के दूध की भावना देवे तथा पान के रस के साथ काली मिर्च के परावर गोली बांध लेवे। इसको गर्म पानी से सेवन करने से बमन होता है तथा शीतल जल के साथ खाने से विरेचन होता है।
४२--शीतज्वरे शीतकेशरीरसः हिंगुलं टंकणं गंधं सूतं पुनस्तु गंधक। विषं तुत्थं कांतशिलाबोलतालनवसागरं ॥१॥ कारवल्लीरसे पिष्ट्वा मर्दयेद्याममात्रकम् । चणमानवीं कुर्यात् गुड़मिश्रंतु सेधयेत् ॥२॥ चातुर्थिकज्वरं हंति पथ्यं दध्योदनं हितम्। सितेमकेशरी नाम पू यपादेन निर्मितः ॥३॥
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बैद्य-सार
____टीका-शुद्ध सिंगरफ, सुहागा, शुद्ध गंधक, शुद्ध पारा, शुद्ध विष, तुत्य भस्म, कांतलौह भस्म, शुद्ध शिला, शुद्ध बोल, शुद्ध तवकिया हरताल और शुद्ध नौसादर ये सब ची. बराबर बराबर तथा गंधक दो भाग लेकर करेले के रस में एक प्रहर घोंट कर चना के बराबर गोली बनावे। इसको पुराने गुड़ के साथ सेवन करने से सब प्रकार का ज्वर नाश होता है। इसका पथ्य दही-भात है।
४३-शीतज्वरे शीतांकुशरसः तुत्थं पारदटंकणे विषवलो स्यात् खर्पर तालकं । सर्व खल्बतले विमर्थ गुटिकां स्यात्कारबेल्ल्याः द्रवः॥ गुंजैकप्रमितः सुशर्करयुतः स्याजीरकैर्वा युतः।
एकद्वित्रिचतुर्थकज्वरहरः शीतांकुशो नामतः ॥१॥ टीका-शुद्ध तूतिया भस्म, शुद्ध पारद, शुद्ध सुहागा, शुद्ध विष नाग, शुद्ध गंधक, शुद्ध खपरिया, शुद्ध तवकिया हरताल इन सबों को लेकर खल में करेले के रस से मर्दन करके एक एक रत्ती प्रमाण गोली बनावे। मिश्री और जीरे के साथ एक एक गोली देने से सब प्रकार के विषमज्वर दूर होते हैं।
४४-हृद्रोगादौ सिद्धरसः जातीफलं सैंधवहिगुलं च सुवर्णमित्रं विषपिप्पलीनाम् । महौषधी बायुविडंगहेमबीजं समञ्चोन्मत्तजंबुनीरैः ॥१॥ तदाद्र तोयैः पृथुयाममात्रं निरंतरं कल्कं खल्वमध्ये ।। सुमर्दनीयं वटकं च कुर्यात् गुंजाप्रमाणं सितया समेतम् ॥२॥ निहंति हृद्रोगप्रमेहबातं बातातिसारं ग्रहणीशिरोरुक् ।।
करोति निद्रां कफशूलसिद्धरसोऽयमानदयति प्रसिद्धम् ॥३॥ टीका--जायफल, सेंधा नमक, सिंगरफ, शुद्ध सुहागा, शुद्ध विष, पीपल, सोंठ, वायविडंग, और सत्यानाशी के बीज ये सब बराबर भाग लेकर जंबीरी नींबू के स्वरस में दो प्रहर घोंट कर एक एक रत्ती के प्रमाण गोली बनावे। यह गोली मिश्री की चासनी के साथ सेवन करे तो हृदयरोग, प्रमेह, बातरोग, बातातीसार, प्रहणी तथा शिरोरोग शान्त होता है, बल्कि इससे निद्रा भी आती है और कफजन्य शूल इससे शान्त होता है।
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वैद्य-सार
४५-शूलादौ शूलकुठाररसः त्रिकुटः त्रिफलासूतं गंधटंकणतालकं । ताम्रविषविषमुष्टिं च समभागं समाहरेत् ॥१॥ भागस्य विंशतियुतं जयपालं च पृथक् ददेत् । सर्व भृङ्गरसे पिष्ट्वा गुलिका कारयेत् भिषक् ॥२॥ प्रायः शूलकुठारोऽयं विष्णुचक्रमिवासुरान् ।
सर्वशूले प्रयुक्तोऽयं पूज्यपादमहर्षिणा ॥३॥ टीका--त्रिकटु, त्रिफला, शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, शुद्ध सुहागा, हरतालभस्म, ताम्रभस्म विषनाग और शुद्ध कुवला ये सब एक एक भाग तथा बीस भाग शुद्ध जमालगोटा लेवे । सबको भंगरा के रस में घोंट कर एक रत्ती प्रमाण गाली बनावे और एक एक गोली गर्म जल से देवे तो कैसा ही शुल हो अवश्य ही लाभ होगा। जिस प्रकार विष्णु के सुदर्शनचक्र से असुरों का नाश हुआ उसी प्रकार इससे शूल का नाश होता है।
४६-अजीर्णादौ अर्धनारीश्वररसः विषं सगंधं हरितालकं च मनःशिला निस्तुषदंतिवीज ।
सूतं सताम्र दरदैः समेतं प्रत्येकमेतत् समभागकं स्यात् ॥१॥ निर्गुडिपत्रस्य रसेन पेष्यं धतूरपत्रं सहमंजरी च। दिनत्रयं मर्दित एव सम्यक् गुंजाप्रमाणां गुटिकां प्रकुर्यात् ॥२॥ छायाविशुष्कं सगुडं च भक्ष्पं अपक्कदुग्धमनुपानमेव ।
सकोष्णवारिसदनानुपानं रसोऽर्धनारीश्वरनामधेयः ॥३॥ टीका--शुद्ध विष, शुद्ध गंधक, हरिताल भस्म, शुद्ध मेनशिल, शुद्ध जमालगोटा, शुद्ध पारा, ताम्रभस्म तथा शुद्ध सिंगरफ ये सब समान भाग लेकर सम्हालू की पत्ती के रस की भावना देवे फिर धतूरे के पत्तों के रस की बाद में तुलसी के पत्तों को रस की भावना देवे। इन तीनों के रस की तीन दिन तक लगातार भावना देने के पश्चात् एक एक रत्ती प्रमाण गोली बांधे और छाया में सुखावे। पुराने गुड़ के साथ सेवन करने के बाद एक पाव कच्चा दूध पिये और यदि अजीर्ण हो तो यह गाली गर्म जल के भनुपान से देवे। यह अर्धनारीश्वर रस उत्तम है।
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वैद्य-सार
४७-प्रमेहचन्द्रकलारसः एलातु कर्पूरशिलासुधात्रीजातीफलं गोक्षुरशाल्मलोत्वक् । सूतं च बंगायसभस्म एतत्सम समं तत्परिभावयेश्च ॥१॥ गुड़ चिकाशाल्मलिकारसेन निष्कार्धमानं मधुना च दद्यात्।।
घद्ध्वा गुटी चन्द्रकलेतिसंशा मेहेषु सर्वेषु नियोजयेश्च ॥२॥ टीका-छोटी इलायची, शुद्ध कपूर, शुद्ध शिलाजीत, आँवला, जायफल, गोखरू, सेमल की छाल, शुद्ध पारा, बंगभस्म और लौहभस्म ये सब बराबर बराबर लेकर खरल में गुर्च तथा सेमर के कंद के स्वरस में घोंट कर गोली बनावे और सुबह शाम ॥ माशे की मात्रा से शहद में सेवन करने से सम्पूर्ण प्रकार के प्रमेह शान्त होते हैं।
४८ वाजीकरणे रतिलीलारसः स्वर्णभस्म बत्सनाभं व्योमसिन्दूरसंयुतम् । दरदं धूर्तबीजं च जातीपां निजातकम् ॥१॥ अहिफेनं वराटं व वाधिशोकं समांशकम्। मर्दयेत्तप्तखल्वे तु त्रिदिनं विजयाद्रवः ॥२॥ धूर्तबीजस्य तैलेन त्रिदिनं मर्दयेदृढम् । कुक्कुटांडरसेनैव सप्ताहं भावयेत् पुनः ॥३॥ रतिलीलारसः सेोऽयं गुंजात्रयमधुप्लुतम्। भक्षयेद्वीजरोधं स्यान्मधुराहारभुक् भवेत् ॥४॥ क्षीरशर्करया धातुवीर्यवृद्धिं करोति सः। रमयेत् त्रिशतं नित्यं द्रावयेदबलाकुलम् ॥५॥ जगत्संमोहकारी स्यात् पूज्यपादेन भाषितः ।
रतिलीलारसो नाम सर्वरोगविनाशकः ॥६॥ टीका-सोने का भस्म, शुद्ध सिंगिया, अभ्रकभस्म, रससिन्दूर, शुद्ध सिंगरफ, शुद्ध धतूरा के बीज, जायपत्री, दालचीनी, इलायची, तेजपत्ता, शुद्ध अफीम, कौड़ी का भस्म तथा समुद्रशोष ये सब बराबर लेकर तपे हुए खरल में तीन दिन तक भांग के रस से घोंट कर धतूरा के बीज के तैल से तीन दिन तक घोटे, फिर लीची की पत्ती के स्वरस से सात दिन तक घोटे और गाली बांध कर रख लेवे। तीन तीन रत्ती के प्रमाण से मधु के
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वैद्य-सार
साथ सेवन करे तो इससे वीर्य का स्तम्भन होता है, इसको सेवन करने के समय मधुर भोजन करे, दूध तथा शक्कर का सेवन करे तो उसके पश्चात् ही वीर्य की वृद्धि करता है तथा इसका सेवन करने से सैकड़ों स्त्रियों को तृप्त कर सकता है जगत को संमोह करनेवाला यह रतिलीलानामक रस सर्वश्रेष्ठ है।
४६ -अम्लपित्तादौ सूतशेखररसः शुद्धसूतं मृतं लौहं टंकणं वत्सनाभकं । व्योषमुन्मत्तबीजं स्याद्वाधकं ताम्रभस्मकं ॥१॥ चातुर्जातं शंखभस्म बिल्वमजा सुचारकम् । एतानि समभागानि खल्वमध्ये विनिक्षिपेत् ॥२॥ भृगराजरसैनेव मईयेदिवसत्रयम्। बिल्वलाजकषायेण चोशीरक्वथनेन वा ॥३॥ चणमानवटीं कृत्वा छायाशुष्कं मधुप्लुतम् । भक्षयेदम्लपित्तघ्नं छर्दिशूलविनाशनं ॥५॥
पूज्यपादेन कथितः सेोऽयंतु सूतशेखरः । टीका-शुद्धपारा, कान्तलौह भस्म, सुहागे का फूला, शुद्ध विषनाग, सोंठ, काली मिर्ड, पीपल, धतूरा के बीज, शुद्ध गंधक, तोम का भस्म, दालचीनी, इलायची, तेजपत्न, नागकेशर, शंख भस्म, बेलगिरी, और नरकचूर इन सबको समान भाग लेकर खरल में डालकर भंगरा के रस से तीन दिन तक लगातार घोंटे तथा बेल के काढ़े एवं लाई के काढ़े से क्रमशः तीन तीन दिन तक पृथक् पृथक् घोंट कर चना के बराबर गोली बना कर छाया में सुखावे और
और अम्लपित्त और शूल का नाश करनेवाला सूतशेखर रस पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ है।
५०-ग्रहण्यादौ रामवाणरसः शुद्धपारदसिन्दूर चाभ्रकं लौहजं विषं। प्रत्येकं निष्कमात्र स्याद्विनिष्कं चाहिफेनकम् ॥॥ काकिलाक्षस्य बीजानि बराटं टंकणं तथा।। प्रत्येक निष्कमात्र स्थाविज्ञ यम् कालोपमम् ॥२॥
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वैद्य-सार
मर्दयेद्विजयानीरैः कृष्णधत्तूरजद्रवैः । प्रत्येकं दिनमेकं तु गुंजामात्रवटोकृतम् ॥३॥ एकां द्वित्रिवटीं चैव भक्षयेन्नागरैः युताम् । ग्रहण्यां चामशूले वा चातिसारे विशेषतः ॥४॥ मंदाग्नित्वं ज्वरं मूर्च्छा नाशयेन्नात्र संशयः । सर्व रोग समूहघ्नः रामवाणरसोत्तमः ॥५॥ वाणवद्रामचन्द्रस्य पूज्यपादेन भाषितः ॥
टीका - शुद्ध पारा, रस सिन्दूर, अभ्रक भस्म, लौह भस्म, शुद्ध विषनाग तीन तीन माशा, तथा ६ माशा अफीम, तालमखाने के वीज, कौड़ी की भस्म, सुहागे का फूल तीन तीन माशा, इन सब को एकत्रित कर कज्जल के समान घोंट कर भांग के स्वरस से अथवा. काले धतूरा के काढ़े से एक एक दिन घोंट कर रतो रती के बराबर गोलो बनावे । यक दो या तीन गोली सोंठ के काढ़े के साथ सेवन करे तो ग्रहणी, ग्रामशूल अतिसार, मंदाग्नि, ज्वर, मूर्च्छा इन सब को यह रामबाण रस लाभ पहुँचाता है यह पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ उत्तम रामवाण रस है ।
५१ - वाजीकरणे त्रिलोकमोहनरसः
दरदं वत्सनाभं च धूर्तबीजाहिफे निकम् । समुद्रशोषं बज्राभ्र सिंदूरं च समांशकम् ॥१॥ मयेतप्तखल्वे तु त्रिदिन बिजयाद्रवैः । धूर्ततैलेन सप्ताहं वटीं गुंजाप्रमाणिकाम् ॥२॥ मधुना च समायुक्तां त्रिगुंजां च समालिहेत् । सर्करां च क्षीर-घृतं चानुपानं च पाययेत् ॥३॥ मधुराहारं भुजीत गोधूमांगारपाचितम् । परमान्नं घृतं शुभ्रशर्करया सह भोजयेत् ॥४॥ त्रिलोकमोहनो नाम रसः सर्वसुखकरः । शुक्रस्तंभ शुक्रवृद्धिं करोति मदमदनं ॥५॥ कामिनीतोषणकरो पूज्यपादेन भाषितः ।
३.३
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2. टीका - शुद्ध सिंगरफ, शुद्ध विषनाग, शुद्ध धतूरा के बीज, शुद्ध अफीम, समुद्रशोष, बाभ्रक की भस्म और रस सिन्दूर सब बराबर बराबर लेकर तये हुए खल में तीन दिन
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वैद्य-सोर
तक लगातार भांग के स्वरस से घाँटे। बाद, सात दिन तक धतूरा के तैल से घोंट कर एक एक रती प्रमाण को गोलो बनावे। शहद के साथ तीन रत्तो के प्रमाण से सेवन करे तथा खोर बनाकर सेवन करे तो यह त्रिलोक मोहन नाम का रस सबको सुखी करनेवाला तथा वीर्य का स्तम्मन एवं घोर्य को वृद्धि करनेवाला है। काम से पोड़ित मनुष्य को तथा कामिनियों को संतोष देनेवाला है। यह पूज्यपाद स्वामी का बनाया हुआ सर्वश्रेष्ठ
रस है।
५२-वातरोगे स्वच्छन्द-भैरवरसः शुद्धसूतं मृतं लौह ताप्यं गंधं च तालकं । पथ्याग्नि-मन्थनिर्गुडो त्र्यूषणं टंकणं विषं ॥१॥ तुल्यांशं मर्दयेत् खल्वे दिनं निर्गुडिकाद्रवैः। मुंडीद्रावैः दिनकन्तु द्विगुजं वटकं कृतम् ॥२॥ भक्षयेत् सर्ववातात्तः नाम्ना स्वच्छन्दभैरवः।।
सर्ववातविकारतः पूज्यपादेन भाषितः ॥३॥ टीका-शुद्ध पारा, गंधक, लौहभस्म, सोनामक्खी का भस्म, हरताल भस्म, बड़ी हर्र का छिलका, गनयारी सम्हालू के बीज, सोंठ, मिर्च, पीपल, सुहागा, विषनाग, इन सब को बराबर बराबर लेकर सम्हालू को पत्ती के स्वरस में तथा गोरखमुंडी के स्वरस में एक एक दिन घोंटकर दो दो रत्ती की गोली वनावे और इसको अनुपान-विशेष से वातपोड़ित मनुष्य सेवन करे तो अवश्य ही लाभ हो। यह सर्व प्रकार के बात-विकारों को नाश करनेवाला स्वच्छन्द भैरव रस पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
५३-सन्निपात्तादौ वीरभद्ररसः यूषणं पंचलवणं शतपुष्पादिजीरकान् । क्षारत्रयं समांशेन गृह्यत पलसंमितम् ॥१॥ गंधकं सूतमनंच सर्व प्राह्य पलं पलम् । पाकस्य रसेनैव दिनमेकं विमर्दयेत् ॥२॥ वीरभद्र इति ख्यातो रसोऽयं माषमात्रकः। सन्निपातं हरेत शीघ्र चित्रका कबारिणा ॥३॥.. ... पथ्यं क्षीरोदनं देयं पूज्यपादेन भाषितः। .....
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वैद्य-सार
टीका-सोंठ, काली मिर्च, पीपल, समुद्र नमक, काला नमक, सेंधा नमक, साम्हर नमक, कच नमक, सौंफ, स्याह जोरा, सफेद जीरा, जवाखार, सजी बार, टंकण क्षार, शुद्ध गंधक, शुद्ध पारा, अभ्रक भस्म ये सब बराबर बराबर लेकर प्रदरख के रस के साथ एक दिन भर मर्दन कर इसकी एक एक रत्ती प्रमाण गोली बनाये। यह वीरभद्र नामक रस एक माशे की मात्रा से चित्रक तथा अदरख के रस के साथ सेवन करने से सब प्रकार के सन्निपातों को दूर करता है। इसका दूध-भात पथ्य है।
५४-सन्निपाते सन्निपातांजनम् निष्कजैपालबीजानि दशनिष्काणि पिप्पली । मरिवं पारदं चैव निष्कमेकं विमर्दयेत् ॥१॥ सप्ताहं भावयेत्सम्यक् चूर्ण जंबीरवारिणा ।
सन्निपातहरं चैतत् अंजनं परमं हितं ॥२॥ टीका-३ माशा जमालगोटा, २॥ तोला पीपल, ३ माशा कालोमोर्च, ३ माशा पारा इन सबको जंबीरी नीबू के रस में घोंट कर अञ्जन बनावे। इस अञ्जन को सन्निपात-दोष में भांख में प्रांजने से सन्निपात दूर होता है।
५५--शीतज्वरे शीतभंजी रसः पारदं रसकं तालं शिखितुत्थं च टंकणं । गंधकं च समान्येतान्येकीकृत्य विमर्दयेत् ॥१॥ दिनद्वयं कारवल्लीरसेनाथ विलेपयेत्।। ताम्रपानोदरे तञ्च भांडमध्येऽप्यधोमुखं ॥२॥ निक्षिप्य रुन्या संशोय बालुकाभिः प्रपूरयेत् । तत्पृष्ठे निक्षिपेत् ब्रीहीन चुल्ल्यां मंदाग्निना पचेत् ॥३॥ . स्फुटितं ब्रीहिणं यावत् तावत्सिद्धो भवेद्रसः । स्वांगशीतलमादाय प्रदद्याद्वांतजे ज्वरे ॥४॥
शीतभंजी रसो नाना सर्वज्वरकुलांतकः । ___टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध खपरिया, शुद्ध तवकिया हरताल, शुद्ध तृतिया, सुहागा, गंधक इन सब को समान भाग लेकर २ दिन तक करेले के रस में घोंट कर शुद्ध तामे के किसो
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वैद्य-सार
कटोरे के भीतर लपेट देखे और उस वर्तन को एक बड़ी हंडी में जिसमें सात कपडमिट्टी की गयी हो नीचे को मुख कर देवे भोर उस हंडी में बालू भर तथा बीच से पांच जलाकर तामे की कटोरी के ऊपर जो रेत है उसपर धान रख देवे। जब पांच लगाते लगाते थे धाग्य के कण चिटककर फट जावे तब जाने कि रस सिद्ध हो गया। जब हा हो जाय, तब निकाल और घोंट कर रख लेवे। वहाएक रत्ती रस दो रत्ती काली मिर्च के साथ सेवन करे तो इससे बातज्वर तथा सर्व प्रकार के ज्वर शांत हो ।
___५६--भगंदरे रसादियोगः
रसगंधकसिन्धूत्यतुत्थनागासजीरकाः ।
. तितकोशातकी-सारं पिष्ट्वा प्रन्ति भगंदरं ॥१॥ ____टोका-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, सेंधा नमक, तूतिया भस्म, शीशा भस्म, ये सब एकत्रित कर के सफेद जीरा तथा कड़वी तुरई के सार के साथ मलहम बनाकर भगंदर पर लेप करे तो भगंदर शान्त होता है।
५७-सर्वरोगे प्रतापलंकेश्वररसः टंकणं सितगुंजा च गंधकं शुल्ब भस्म च । अयस कुष्ठमंजिष्ठं पिप्पली च निशाद्वयम् ॥१॥ संचूर्ण्य सूतकं तुल्यं मातुलुंगेन प्रमर्दितम् । भष्टादशविधं कुष्ठं भृशं हंति रसोत्तमः ॥२॥ लंकेश्वरो यथा सत्वलोकानां भयकारकः।।
प्रतापलंकेश्वरश्चासौ योगोऽयं सर्वरोगहा ॥३॥ टीका-सुहागे का फूला, शुद्ध सफेद गुंजा, शुद्ध गन्धक, ताम्र भस्म, कांत लौह भस्म, कूट मीठा, मंजीठ, पीपल, हल्दी, दारु हल्दी, शुद्ध पारा, इन सब को लेकर पहिले पारे गंधक की कजली बनावे, पश्चात् सब चीजों को मिला कर विजोरा नीबू के रस से मर्दन कर के एक एक रत्ती की गोली बांध कर इसे सेवन करे तो अट्ठारह प्रकार का कोढ़ दूर होवे। यह प्रताप लंकेरखर रस प्राणियों का उपकारक है।
जिस प्रकार लंकेश्वर (रावण ) बड़ा पराक्रमी वीर था उसी प्रकार यह प्रताप लंकेश्वर सर्व रोगों को जीतने वाला है।
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वैद्य-सार
५८-कुष्ठे विजयरसः शुद्धतालं रसः गन्धं निभिस्तुल्या हरीतकी। सर्वतुल्ये गुड़े पक्त्वा निष्कमात्र निषेवयेत् ॥१॥ विजयश्च रसो क्षे यो रसोऽयं सर्वकुष्टनुत् ।
पूज्यपादप्रयोगोऽयं चर्मरोगकुलांतकः ॥२॥ टीका-हरताल भस्म, शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक एक एक भाग तथा तीनों के बराबर बड़ी हर्र का छिलका और इन सबों के बराबर बराबर पुराना गुड़, सबों को मिला एवं गोली बनाकर एक एक टंक प्रमाण अर्थात् तीन तीन मोशा सुबह शाम सेवन करे तो इससे सब प्रकार के काढ़ दूर होवे। साथ ही साथ सब प्रकार के चर्म रोगों के लिये उत्तम है।
५६-कुष्ठादौ बज्रपाणिरसः शुद्धसूतं ताम्रभस्म सिन्दूरं चाम्रभस्म च । यामं वाकुचोमिस्तु मर्दयित्वाथ गालयेत् ॥१॥ लौहपाने विनिक्षिप्य बाकुचीतल संमिते । द्विगुणं शुद्धगन्धं च पचेरैलेऽथ जोर्यति ॥२॥ तत्सम लौहभस्माथ पंचांग निबुभूरुहः ।। संमिल्य मिथुने सर्व निष्कं नित्यं निषेवयेत ॥३॥ निशाकणा नागराग्निबेल्लताप्यानि च क्रमात् । भागोत्तराणि संचूर्ण्य गोमूत्रण पिबेदनु ॥४॥ बज्रपाणिरसो नाम्ना कीटिभ हति दुर्जयं ।
दशाष्टविधकुष्ठानो पूज्यपादेन भाषितः ॥५॥ टोका-शुद्ध पारा, ताम्र भस्म, रस सिन्दूर, अभ्रक भस्म, एक एक भाग लेकर इन सब को एक पहर तक बकची के तेल से मर्दन कर के गोला बनावे तथा लोहे के बर्तन में बकची के तेल में आंवलासार गन्धक २ भाग लेकर पकावे। जब पक जावे तब गन्धक को गर्म जल से धो एवं सुखा कर उस पूर्णा में मिला देवे और गन्धक के बराबर लौहभस्म लेवे। नीम का पञ्चांग तथा चिरायते का पञ्चांग मिलाकर सब को मर्दन करे और घोंट कर चूर्ण बनाकर रख लेवे। इसकी तीन माशे की मात्रा है। प्रातः काल सेवन करे। ऊपर से हल्दी, पीपल, सोंठ, विनक, काली मिर्च, सोनामक्खी ये कम से एक एक भाग बढ़ती लेकर घूर्ण
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वैद्य-सार
बना गोमूत्र में घोल कर पिये तो इससे सब प्रकार की कमिजन्य ब्याधि तथा सब प्रकार की कोढ़ वगैरह दूर होवे।
६०-कुष्ठादौ चर्मातकरसः शुद्धसूतं विषं गन्धं माक्षिकं व शिलाजतुः । मृतानि तीक्ष्णलौहार्क पत्राणि च दिनत्रयम् ॥१॥ काकमाची देवदाली कोटी चन्यवारिभिः । संमथ शरावांतर्निक्षिप्य च पिधाय च ॥२॥ रोधयित्वा करीषानौ विरानं विपचेत्ततः। बाकुचीतैलतो भाज्यं निष्काध चर्मकुष्ठिने ॥३॥ दापयेत् खादिरं सारं वाकुचीबीजच किम् । मधुनाज्येन संमिश्य लेहयेदनु नित्यतः ॥४॥ चर्मान्तकाभिधानोऽयं रसेन्द्रश्चर्मनाशनः।
प्रयोगसर्वश्रोष्ठः स्यात् पूज्यपादेन भाषितः ॥५॥ टीका-शुद्ध पारा, विषगंधक, सोनामक्खी, शिलाजीत, लौहभस्म और ताम्रभस्म इन सबको समान भाग लेकर तीन दिन तक मकोय, देवदाली, बांझककोड़ा, चाव इन सबके काढ़े से अलग अलग तीन दिन तक मर्दन करके सुखा कर शरावों के भीतर बंद कर कपड़मिट्टी करके करीष (कंडों के टुकड़े) को अग्नि में संपुट देवे। इस प्रकार तीन रात तक पका कर अन्त में बाकुचो के तेल की भावना देकर सुखा लेवे और तीन तीन मासे की मात्रा से सेवन करे। ऊपर से खैर की छाल तथा बकची के बीज का चूर्ण शहद और घी के साथ मिलाकर खावे तो इससे सब प्रकार की कोढ़ दूर होती हैं। ऐसा पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
६१-पांडुकामलादौ उदयभास्कररसः भागेकं रसगंध एवद्विगुणं शुल्वं च भागाष्टकं । शैलायाः वयतालकद्वयमितं शुद्धच भस्मीकृतम् ॥१॥ संमर्य जलराशिभिश्च मरिचं भागद्वयं चामृतम् । निर्गुण्ड्या कभृगराजसहितं भाव्यं जयंतीरसैः ॥२॥
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वैद्य-सार
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प्रत्येकं दिनसप्तके व सुदृढ़ सूर्यातपे शोषितं । योज्यं गुंजयुगं रसासहितं ज्योषेण संमिश्रकं ॥३॥ पांडूं कामलरोगराजमनिलं श्वासं च कासं क्षयं । वाताति कृमिगुल्मशूलमखिलं सम्यक् त्रिदोषं हरेत् ॥४॥ मेहं प्लोहजलोदरं प्रहणिकां कुष्टं धनुर्वातकं । रोग सर्वमपास्य दुष्टजनितं सप्तवारेण यत् ॥५॥ पथ्यं पौष्टिकतंण्डुलं दधियुतं तकंच शाल्योदनं । नृणां चोदयभास्करोऽतिफलदो रोगांधकारं जयेत् ॥६॥
सर्वं नश्यति ज्यपादरचितो योगस्त्रिलोकोत्तमः। टोका-शुद्ध पारा १ भाग, शुद्ध गंधक २ भाग, ताम्रभस्म ८ भाग, शुद्ध मेनशिल ३ भाग, और तकिया हरताल को भस्म दो भाग ले सबको एकत्रित कर पानी से मर्दन करे तथा उसमें १ भाग काली मिर्च और २ भाग शुद्ध विषनाग लेकर सबका नेगड़ की (संभाल) पत्ती तथा भंगरा की पत्ती के स्वरस से सात सात दिन मर्दन करके सुखा कर रख ले। फिर इसका दो दो रत्ती के प्रमाण से अदरख के रस के साथ या त्रिकुटा के रस के साथ देवे तो इसके सेवन से पांडु, कामला, राजयक्ष्मा, बातव्याधि, श्वास, खांसी, कृमिरोग, गुल्मरोग सब प्रकार का शूल तथा त्रिदोषज व्याधि, प्रमेह, प्लीहा जलोदर, ग्रहणी; कुष्ठ, धनुर्वात इत्यादि सब दोषों को दूर करता है। इसको २१ दिन सेवन करना चाहिये इसके ऊपर पौष्टिक भोजन दही, चावल, मही, भात हितकारी है। यह योग मनुष्यों के रोगरूपी अन्धकार को नाश करनेवाला उदय भास्कर रस है तथा सम्पूर्ण रोगों को नाश करनेवाला है। यह पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
६५-सर्वव्याधौ उदयादित्यवर्णरस: रसस्य द्विगुणं गंधं गंधसाम्यं च टंकणं । तत्समं मृतलौहेन तत्सम नागभस्मकं ॥१॥ तत्समं हेमभस्मैव रसभस्म पुनः पुनः। सर्वमेकोत्तरं वृद्धि हंसपाचा च मर्दयेत् ॥२॥ रससाम्यं विषं योज्यं कांतभस्म पुनः पुनः । मुकाप्रवालभस्म तु विषस्य द्विगुणं भवेत् ॥३॥ तत्समं ताम्र भस्म व कांस्यभस्म पुनः पुनः। सर्वमेतत्तुसंमिध्य काकमाच्या व मर्दयेत् men
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कन्यानिर्गुडिकाभिध हंसपाचा रसेन च। . पृथक् पृथक् मदयेत् खल्वे सप्तवारं पुनः पुनः ॥५॥ ततोऽक्षमावान् वटकान् स्थापयेत् काचकूपिका । एतल्लवणयंत्रस्थं यंत्र खेचरकं पृथक् ॥६॥ इष्टिकायंत्रकं प्रोक्त चूर्णविस्तरं भवेत् । उदयादित्यवर्णाख्यो नाना चोदयभास्करः ॥७॥ सर्वव्याधिहरं नाना वलमात्रं तु सेवयेत् । चातुर्थिकप्रशमनं पथ्यं दभ्योदनं हितम् ॥८॥ सर्वज्वरहरं नाना सर्वरोगनिद्वतनः । अष्टादशविधं कुष्ठं सन्निपातत्रयोदशं ॥६॥ नाशनं राजयक्ष्माणां चानुपानविशेषतः। निकूटस्त्रिफलाचूर्ण निर्गुण्डी चावारिणा ॥१०॥ शर्करामिश्रितं देयं तत्तद्योगेन योजयेत् । महारसमिदं प्रोक्तं नाना चोदयभास्करः ॥१९॥
इन्द्रियाणां बलकरो पूज्यपादेन भाषितः । टीका-शुद्ध पारा १ भाग, शुद्ध गंधक २ भाग, शुद्ध सुहागा २ भाग, लौह भस्म २ भाग, शीशाभस्म २ भाग, सोने की भस्म २ भाग इस प्रकार वृद्धि करके सबको एकवित हंसपादी (हंसराज) के स्वरस में घोंटे तथा ? भाग शुद्ध विषनाग, कांतलौह को भस्म १ भाग, मोती की भस्म, मूंगे की भस्म दो दो भाग, तामे की भस्म २ भाग, विष शुद्ध २ भाग, कांसे की भस्म २ भाग इन सबको लेकर मकोय, घोकुवांरी, नेगड़ (सम्हाल) तथा हंसपादी के स्वरस में अलग अलग सात सात बार मर्दन कर इनकी एक एक तोला की गोली बनावे और कांच की कूपी में रख देवे इसको लवण यंत्र, इष्टिका यंत्र एवं खेचर यंत्र में कम से पकावे। इन सबका चूर्ण बनाकर यह उदय हुये सूर्य के वर्ण के समान उदयादित्य वर्ण रस तीन तीन रत्तो की मात्रा से सेवन करने से सम्पूर्ण व्याधियों को नाश करनेवाला तथा चौथिया ज्वर को दही भात के पथ्यपूर्वक शांत करनेवाला यह सर्वप्रकार के ज्वरों को दूर करनेवाला है। इसके अतिरिक्त अट्ठारह प्रकार के कोढ़, तेरह प्रकार के सभिपात तथा भनुपान विशेष से राजयक्ष्मा को नाश करनेवाला है। यह रस सोंठ, मिर्च, पीपल, त्रिफला के चूर्ण के साथ तथा नेगड़ और अदरख के साथ देने से वातादि रोगों को भी नाश करता है। अनुपान भेद से सब रोगों पर चलता है। पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ यह रस अत्यन्त बलकारी है।
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वैद्य-सार
४१.
६३ - कासादौ गगनेश्वररसः
'प्रश्नकं वत्सनाभं च सूतं गंधक । लौहभस्म ताम्र भस्म व्योषधरबीजकम् ॥१॥ बिल्वमज्जा वा श्राह्मा धातुअतिबिडंगकम् । सर्व तुल्ये क्षिपेत् खल्वे मद्यं भृंगरसैदिनम् ॥२॥ विजयारससंयुक्त यानमेकं विमदयेत् । गुंजाइयं हित् तौद्रः पंचकासयापहः ॥३॥ गुल्मशूलादिश्चाम्लपित्तविनाशनः । सन्निपातं बातरोगं प्रहण्यामयशोधनम् ॥४॥ गगनेश्वरनामायं रसोऽयं सर्वरोगजित् । कासादिविषयं पूज्यपादेन भाषितः ॥५॥
:
टीका - अभ्रक भस्म, विषनाग, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सुहागा, लौहभस्म, ताम्र भस्म, सोंठ, मिर्च, पीपल, धतूरे के शुद्ध बीज, बेलगिरी, सफेदवच, दालचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर और विडंग सब बराबर-बराबर लेकर खल में डाल कर भंगरा के रस में मर्दन करे, फिर भांग के रस में घोंटे और जब तैयार हो जाय, तो दो-दो रती के प्रमाण से शहद के साथ सेवन करे तो पांच प्रकार की खांसी, तय, गुल्मशूल, अम्लपित्त, सन्निपात, वातरोग और संग्रहणो इत्यादि को लाभ करनेवाला है । यह गगनेश्वर रस सम्पूर्ण रोगों को जीतनेवाला है तथा खांसी और विष के दोष को नाश करनेवाला उत्तम योग है।
६४ -- शीतज्वरे कारुण्य - सागररसः पारदं वत्सनाभं व शुद्धा चैव मनःशिला । हरितालं शुभं गंधं निर्गुडी कारवल्लिका ॥१॥
श्वासां सदा कुर्यात् वटीं सर्षपमालिकाम् । मृद्वीकाजीरकेणापि प्रदद्यात् भिषगुत्तमः ॥२॥ शीतज्वरहरो नाम कारुण्यरससागरः । सर्वशीतज्वरध्वंसी पूज्यपादेन भाषितः ॥३॥
टोका - पारा, विषनाग, मैनशिल, हरिताल भस्म और गन्धक इन पांचों को शुद्ध कर कजली बना कर नेगड़ तथा करेले के रस में इनकी सरसों बराबर गोली बनावे और यह गोली सुबह शाम मुनक्का तथा जीरे के साथ देवे तो सब प्रकार का शीतज्वर दूर होवे ।
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ર
वैद्य - सार
६५ -- सन्निपाते सन्निपात-विध्वंसकरसः
सूतं गंधं समं शुद्ध तालकं माक्षिकं तथा । मृतताम्राभ्रकं बोलं विषं धत्तूरबीजकं ॥१॥ arrai चाहिंगुपाठा गिपटोलकम् । बंध्यानिंनत्रयं शुण्ठीकंदलांगुलिजं समम् ॥२॥ सिन्दुवारद्रवैः सर्व मद्य जंबीरजेद्रवैः । harsaमतां कुर्यात् सिन्दुवारद्रः बढीम् ॥३॥ अत्युग्रसन्निपातोत्थं सर्वोपद्रवसंयुतम् । निहन्यादनुपानेन दशमूलाई केण वै ॥ ४ ॥ कषायेण न संदेहः पथ्यं दध्योदनं हितम् । रसो विध्वंसका नाम सन्निपातनिकृन्तनः ॥५॥
टीका - शुद्ध पारा, शुद्धगन्धक, हरताल भस्म, सोनामक्खीभस्म, ताम्र भस्म, अभ्रक भस्म, शुद्ध बोल, शुद्ध विषनाग, शुद्ध धतूरा के बोज, सज्जोखार, जवाखार, सुहागा, बचदूधिया, हींग, सोनापाठा, कांकड़ासिंगी, परवल के पत्ता, बांझ ककोड़ा, नोम, सोंठ, लांगली का कंद इन सब को लेकर कूट पोस कर कपड़छान करके नेगड़ को पत्ती के रस में तथा जंबीरी नीबू के रस में घोंट कर नेगड़ की पत्ती के रस में चना के बराबर गोली बनावे | यह गोली अत्यन्त बढ़ा हुआ जो सन्निपात है उसको भो शान्त करता है। अनुपान में दशमूल का क्वाथ या प्रदरख रस या क्वाथ देना चाहिये ।
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६६ - सन्निपाते पंचवक्ररसः
शुद्ध सूतं विषं गंधं मरिचं टंकणं करणा । मर्दयेत् धूर्तजद्रायैः दिनमेकं विशोषयेत् ॥१॥ पंचवक्ररसो नाम द्विगुंजं सन्निपातजित् । अर्कमूलकषायेण सव्योषमनुपाययेत् ॥२॥ दाडिमैरिदंडं च दधिभोजनशीतलं ।
पूर्ववत्स्थाप्यते पथ्यं जलयोगं च कारयेत् ॥३॥
टीका - शुद्धपारा, शुद्ध गन्धक, शुद्धविष, काली मिर्च, सुहागे का फूला और पीपल इन सब को धतूरे के रस में एक दिन घोंट कर सुखा लेवे, यह पञ्चवक्र रस दो दो रती के प्रमाण से सेवन करने पर अनेक प्रकार के सन्निपातों को जीतनेवाला है। इसका अनुपान प्राक
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वैद्य-सार
को जड़ की छाल का काढ़ा सोंठ, मिर्व, पोपन के सहित ऊपर से पिलावे तथा अनार पोड़ा (गन्ना) दही-भात तथा ठंढा जल का पथ्य दे। इसका सेवन करना चाहिये, सिर पर पानी डालना चाहिये।
६७ -प्रमेहे द्वितीयः पंचवक्ररसः मृतं लौहाभ्रकं तुल्यं धात्रीफलनिजद्रवैः। सप्ताहं भावयेत् खल्वे रसोऽयं पंचवक्रकः ॥१॥ मासमेकं रसं खादेत् सर्वमेहप्रशांतये । महानिबस्य बीजानि पूर्ववतंडुलोदकैः ॥२॥ सघृतैः पाययेश्चानु ह्यसाध्यं साधयेत् क्षणात् ।
अनेन चानुपानेन पंचवकरसो हितः ॥३॥ टीका-अभ्रक भस्म तथा कांतलौह भस्म इन दोनों को बराबर बराबर लेकर आंवले के फल के रस में सात दिन तक खरल में लगातार घोंटे, तब यह पञ्चवक्र नाम का रस तैयार होता है। यह रस एक माह तक सेवन करने से सब प्रकार का प्रमेह शांत करता है। इसका अनुपान वकायन के बीजों की गिरी को चावल के पानी में पीस कर उसमें घी डाल कर ऊपर से पीना चाहिये तथा इस रस की एक एक रत्ती के प्रमाण से शहद या मिश्री की चाशनी में खाना चाहिये । इससे असाध्य प्रमेह भी शान्त हो जाता है।
६८-श्वासादौ शिलातलरसः तालं द्वादशभागं च चतुर्भागा मनःशिला। त्रिकंटकरसैर्भाव्यं वालुकायंत्रपाचितम् ॥१॥ यामद्वयात् समुद्धृत्य तत्तुल्यं च कटुनयम्। निर्गुण्डीमूलचूर्ण तु सर्वतुल्यं प्रदापयेत् ॥२॥ शिलातलरसो नाम मासैकं श्वासकासजित् ।
योगोऽयं सर्वश्रेष्ठः स्यात् पूज्यपादेन भाषितः॥३॥ टीका-हरताल तबफिया भस्म १२ भाग तथा शुद्ध मैनशिल ४ भाग इन सब को गोखरू के रस से भावना देवे तथा सुखा कर वालुका यंत्र में दो पहर तक पावन करके बाद निकाल- लेवे, उसमें सबके बराबर सोंठ, मिर्च और पीपल मिलाकर फिर सबके बराबर सम्भालू (निर्गुण्डी ) की जड़ का चूर्ण मिलावे, बाद इसको अनुपान विशेष से ,
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एक माह तक सेवन करे, तो सब प्रकार के श्वासकास नष्ट होते हैं । यह योग सर्वश्रेष्ठ है - पूज्यपाद स्वामी ने कहा है ।
६६ - कुष्ठरोगे मेदिनीसाररस:
पलक्षयं मृतं लौहं मृतं शुल्यं पलत्रयं । भृंगराजाम्बुगोमूत्रत्रिफलाक्का थितैः पृथक् ॥ १ ॥ पुटे त्रिवारं यत्नेन तस्मिन्नेव परिक्षिपेत् । बीजपूररसस्यापि क्वाथे यामचतुष्टयम् ॥२॥ पुनश्च तुल्यं गंधेन पुदामां विशंति दहेत् । पलमात्र मृतं सूतं रुद्रांशममृतं तथा ॥३॥ कटुनयं समं सर्वैः पिष्टवा सम्यग्विदापयेत् ।
सोऽयं मेदिनीसारो नाम्ना च परिकीर्तितः ॥४॥ सेवितो वल्लमानेन घृतं त्रिकुटान्वितम् । हंत सर्वाणि कुष्ठानि चित्राणि विविधानि च ॥५॥ गुल्मप्लीहामयं हिक्कां शूलरोगमनेकधा । उदावर्ते महावातं कफमन्दानलं तथा ॥ ६ ॥ गलग्रहं महोम्मादं कर्णनादामदं तथा । सर्पादिकं विषं घोरं वृणं लूताभगंदरं ॥७॥ विद्रधिं चांडवृद्धिं च शिरस्तों च नाशयेत् । पूज्यपादप्रयुक्तोऽयं मेदिनीरस उत्तमः ॥८॥
तामे की भस्म, इन दोनों को
टीका - तीन पल कांत लौह की भस्म, तथा तीन पल read करके भंगरा के रस, गोमूत्र एवं त्रिफला के काढ़ से अलग अलग भावना देकर पुट देवे तथा बीजौरा नीबू के रस से चार पहर तक घोंट कर सुखा लेवे, तब उसी रस के बराबर शुद्ध गन्धक डाल कर घोंट कर पुट देवे । इस प्रकार बिजौरा के रस की २० पुट देवे तथा उसमें १ पल रससिन्दूर तथा उस चूर्णा से ११ वां हिस्सा शुद्ध विषनाग और त्रिकटु का चूर्ण सब के बराबर ले कर सब को उसी तेयार हुये रस में मिलाकर घोंटे, बस यह मेदिनी सार रस तैयार हो गया समझें । इसको तीन २ रती की मात्रा से घी तथा त्रिकटु चूर्ण के साथ खाने से अनेक प्रकार के कुष्ठ रोग दूर होते हैं। अनुपान - विशेष से गुल्म, लोहा, हिचकी, शूलरोग, उदावर्त, महावात, कफजन्य व्याधि, मन्दाग्नि, गले के रोग, उन्माद, कर्णरोग तथा सर्पादिक के विष की पीड़ा, भय
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वैद्य-सार
दूर व्रण, लूता ( मकड़ी का विष ), भगंदर, विधि, अण्डवृद्धि, शिर की पोड़ा वगैरह सब शांत होते हैं। यह पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ मेदिनीसार रस उत्तम है।
७०-ज्वरादौ ज्वरकुठाररसः सहस्रभेदी कनकस्य बीजं यष्टिलदंगकम । शिलात्वचा च संयुक्त चैतेषां समभागकम् ॥१॥ नालिकेरांबुना पिष्ट्वा तदलामे तुषांबुना। चणकप्रमाणगुटिकां कृत्वा छायाविशेषिता ॥॥ नालिकेरांबुना पेयादथवा तुषवरिणा। शर्करासहिता जीर्णगुड़ेन सहसा तथा ॥३॥ जिलादोषं सन्निपातं प्रलापं कफदोषज। दोषत्रयोक्तरोगं च वरं सद्यो नियच्छति ॥४॥ रसो ज्वरकुठारश्च सर्वज्वरविमर्दनः।
अनुपानविशेषेण पूज्यपादेन भाषितः ॥५॥ टीका - अमलबेत, शुद्धधतूरा के बीज, मुलहठी, लौंग, शुद्ध मेनशिल, दालचिनी इन सब को बराबर-बराबर लेकर नारियल के पानी में घोंटे यदि नारियल न मिले तो धान की तषा के जल से घोंट कर चने के बराबर गोली बांध लेवे, तथा छाया में सुखावे और नारियल के या धान्य के तुषा के जल से अथवा शक्कर या पुराने गुड़ के साथ सेवन करावे तो इससे जिहादोष, सन्निपात, प्रलाप, कफ-दोष, त्रिदोषज सम्पूर्ण रोग तथा सब प्रकार के ज्वर शान्त होते हैं। यह ज्वर-कुठार विविध ज्वरों को नाश करनेवाला है। यह रस पूज्यपाद स्वामी का कहा हुभा है।
७१-शीतवाते अग्निकुमाररमः रसभस्म.च भागैकं मृतशुल्वं तथैव च। विषं च तत्समं प्राह्य गंधकं त्रिगुणं कुरु ॥१॥ निर्गुण्डी चामिमंथानि वहिव्याम्रिद्वयं तथा । पावालतुंबिका प्राह्या चेन्द्रवारुणिका तथा ॥२॥ सर्वेषां स्वरसैनेव भावयेदेकविंशतिम्। रसो ह्यग्निकुमारोऽयं पूज्यपादेन निर्मितः ॥३॥
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मुंछ
शीते वाते सन्निपाते यमालयगतेऽपि च । गुंजिकाष्ठमात्रेण सर्वज्वरनिषूदनः ||४|| सूचिका प्रदातव्यः मृतो जीवति तत्क्षणात् ॥५॥
टीका - पारे की भस्म, तांबे को भस्म, शुद्ध विषनाग एक-एक भाग तथा शुद्ध गंधक ३ भाग इन सब को एकत्रित करके नेगड़, गनयारी, चित्रक, बड़ी कटहली, छोटी कटहली, पाताल गरुड़ी, इंद्रायन इन सब के रस से तीन तीन अलग अलग भावना देवे तब यह अग्निकुमार रस तैयार हो जाता है। यह पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ रस शीत में, में, सन्निपात में ६ रती के प्रमाण देने से एवं तीव्र हैजा में भी मृत प्राय हो जाने पर भी इससे लाभ हो जाता है ।
७२ ज्वरे लघुज्वरांकुशः
रसगंधकाम्राणां प्रत्येकं चैकभागकं । खल्वे दिग्गज भागांशं देयं च धूर्तबीजयोः ॥१॥ मातुलुंगरसेनैव मर्दयेद्वा रसं बुधैः । कासमर्दकतोयेन सिद्धोऽयं जायते रसः ॥२॥ निंबमज्जाद करसे: वल्लू देयं त्रिदोषजित् । ज्वरे दध्योदनं पथ्यं शाकतुंडिफलं ददेत् ॥३॥ लघु ज्वरांकुशो नाम पूज्यपादेन भाषितः ।
वैद्य-सार
टीका- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, ताम्र भस्म इन तोनों को एक एक भाग लेकर तथा
चार भाग धतूरे के शुद्ध बीज लेकर सब को खल में डाल बिजोरा नीबू के रस में मर्दन करे और सोंदन के रस में मर्दन एवं सुखा कर रख रती की मात्रा से नीम की मोंगी के और अदरख के रस के त्रिदोषज ज्वर में लाभ होवे। इसका पथ्य दही भात है तथा कौवाटोंडी का शाक भी दे सकते हैं। यह सब प्रकार के ज्वरों में दे सकते हैं। यह पूज्यपाद स्वामी ने कहा है ।
६...
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लेवे, इसको तीन तीन साथ दिया जाय तो
७३ - स्फोटादौ त्रिलोक-चूड़ामणिरसः
पारदं टंकणं तुत्थं विषं लांगुलिकं तथा । पुत्रजीवस्य मज्जानि गंधकं कर्षमात्रया ॥१॥ देवदाल्या रसैर्मद्यः त्रिशुली समर्दितः । विष्णुक्रांता नागदंती धन्त रनागकेशरैः ॥२॥
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वैद्य-सार
भाव्योऽन्यान्यदिने एव वटवीजप्रमाणकः ।
पानलेपननस्यके ॥३॥
जंबीररसतो प्राह्यः चांजने सर्वकार्ये वा कालस्फोटमहाविषं । ear' थिं गलग्र ंथि कटि थि- महारसं ॥४॥ स्फोटानां तु शतं रोगज्वरज्वालाशताकुलं । ब्रह्मराक्षस - भूतादि - शाकिनी - डाकिनी - गणं ॥५॥ कालव्रजमहादेवीमदमातंगकेशरि ।
वृषभादिजिनं स्थाप्य (१) श्रीदेवीश्वरसूरिणं ॥६॥ कथितोऽयं त्रिलोकस्य चूडामणिमहारसः । पूज्यपादेन कृतिना सर्वमृत्युविनाशनः ॥७॥ पार्श्वनाथस्य स्तोत्र स्तंभं कृत्वा तु तत्क्षणात् ।
टीका - शुद्ध पारा, सुहागे का फूला, तुत्थ भस्म, शुद्ध विषनाग, शुद्ध लांगली ( कलिहारी विष), पुत्रजीवक की मज्जा तथा शुद्ध गन्धक ये सब एक एक तोला लेकर सब को एकत्रित कर देवदाली के रस से तथा त्रिशूली (शिवलिंगी) के रस, विष्णुकांता के रस, नागदन्ती के रस तथा धतूरे के रस से और नागकेशर के काढ़ से अलग अलग एक एक दिन भावना देवे और बट के बीज के समान गोली बांधे तथा जंबीरी नीबू के रस से पान करने में, नस्य लेने में तथा लेप करने और अञ्जन कर और भी अनेक कर्मों में प्रयोग करना चाहिए । महा विषैला कालस्फोट तथा कांख की प्रन्थि, गले की ग्रन्थि, कमर की प्रन्थि और अनेक प्रकार के व्रणों पर लेप करने से लाभ होता है । इस रस को योग्य अनुपान के द्वारा खाने से महा भयानक ज्वर में भी लाभ होता है। इस रस का सेवन ब्रह्मराक्षस, भूत, डांकिनी, शाकिनी वगैरह के स्वामी श्रीजिनेन्द्र का स्थापन कर पूजन करके तथा श्रीपार्श्वनाथ स्वामी जी के स्तोत्र से इस रस के सेवन करने से उसी समय सम्पूर्ण रोग शांत हो जाते हैं। यह पूज्यपाद स्वामी ने कहा है ।
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७४ -- रक्तपित्तादौ चन्द्रकलाधररसः
रसकं गंधकं ताम्र काशीसं शीसमेव च । वंग शिलाजतुयष्टिचैलालामजकं समं ॥१॥ नालिकेरं च कूष्माडं रंभाजेत्तुरसेन च । पंचवल्कलक्वाथेन द्वात्रिंशत् भावनां ददेत् ॥२॥
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वैद्य सार
मालिकेररसेनेव दद्याल सशर्करें। पथ्यं च लाजसंसिद्ध शमयेगदान ज्वरान् ॥३॥ रक्तपित्ताम्लपित्तं च सोमं पागडंच कामलां ।
पूज्यपादेन कथितः रस चन्द्र कलाधरः ॥४॥ टीका-शुद्ध खपरिया, शुद्ध गंधक, तामे की भस्म, काशीस की भस्म, शीसे की भस्म, चंग की भस्म, शुद्ध शिलाजीत, मोलहटी, छोटी इलायची, लजनी के बीज ये सब औषधियां बराबर बराबर लेवे और इन सब को एकत्रित करके नारियल, कूष्मांड (पेठे), केले के तथा गन्ने के जल से पञ्च वल्कल वृक्ष (बड़, ऊमर, पीपल, पाकर और कठऊमर ) इनके काढ़े से सब मिला कर ३२ भावना देवे और सुखा कर रख लेवे। इसको नारियल के पानी के साथ ३ रत्ती चीनी मिला कर देने से यह रस पिपासा आदि ज्वर बीमारियों को, रक्तपित्त, अम्लपित्त, सोमरोग, और पीलिया आदि गरमी के रोगों को शान्त करता है। धान को खील का पथ्य देना चाहिये। .
७५--विषमज्वरे चन्द्रकांतरमः कर्ष शुद्धरसत्वस्य द्विमासे चालविद्रुते । निक्षिपेन्मदयेत्खल्वे पण्णिष्कं शुद्धगंधकं ॥१॥ तुत्थांकोलकुणीबीजं शिलातालं चतुश्चतुः। तत्समं मृतलौहस्य निष्कौ द्वौ टंकणस्य च ॥२॥ तत्समं कुटकीनीलं बराटांजनविशति । निष्कत्रयं सितं योज्यं सर्व चोक्तमनुक्रमात् ॥३॥ शुभक्षणे शुभदिने खल्बमध्ये विमर्दयेत् । चांगेरीभिश्च यामांस्त्रीन् जंबोराम्लैः दिनद्वयम् ॥४॥ पुटं हस्तप्रमाणं तु वसुसंज्ञे तुषाग्निना। जंबोरेश्च द्रवेरेव पिष्ट्वा-पिष्ट्वा पचेत्पुटे ॥५॥ ततो वनोत्पलै रेष देयं गजपुटं महत् । आदाय श्लक्ष्णचूर्ण तु चूर्णीशं शुद्धगंधक ॥६॥ तदर्धमरिचं ग्राह्य तदर्धा पिप्पली मता। तदर्धनागरो 'ग्राह्यः एकीकृत्य निमासकं ॥ लेहयेन्माक्षिकैः साधं नागवल्लीदलस्थितं । पथ्योऽस्ति याममात्रं तु चाभुक्ति विषमज्वरे ॥८॥
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वैद्य-सार
चन्द्रकांतरसो नाम रसश्चन्द्रप्रभाकरः। क्षयव्याधिविनाशश्च सर्वज्वरकुलांतकः ॥६॥ एकमासप्रयोगेण देहचन्द्रप्रभाकरः ।
कथितः व्याधिविध्वंसः पूज्यपादेन निर्मितः ॥१०॥ टीका-१ तोला शुद्ध पारा, दो मास तक खटाई में मर्दन करके निकाल लेवे, फिर खल में डाल कर १॥ तोला शुद्ध गन्धक तथा तूतिया की भस्म, अकोले के बीज, कुणी के बीज, शिलाजीत, कांतलौह की भस्म, ये सब एक एक तोला लेकर ६ मासे सुहागे का फूला तथा कुटकी, और शुद्ध विषनाग लेवे, और कौड़ी की भस्म, कृष्णांजन शुद्ध दोनों मिला कर २० तोला लेवे तथा तीन तोला मिसरी लेवे, इस प्रकार ऊपर कहे हुये परिमाण से सब औषधियों को लेकर शुभ मूहुर्त में, शुद्ध नक्षत्र में खल में डाल कर चांगेरी के रस से ३ पहर जंबीरी नीबू के रस से २ दिन मर्दन करे और ८ हाथ प्रमाण गहरे गड्ढे में तुषा की अग्नि से पांच देवे। इसी प्रकार जंबीरी नीबू के रस में घोंट कर पाठ पुट देवे तथा एक महागज पुट देवे । इस प्रकार जब भस्म हो जाय तब वह भस्म तथा उसके बराबर शुद्ध गन्धक लेवे, एवं गंधक से अाधो काली मिर्च का चूर्ण
और काली मिर्च के चूर्ण से प्राधा पीपल का चूर्ण तथा पीपल से आधा सोंठ का चूर्ण लेकर सब को एकत्रित करके तीन तीन मासा पान का रस तथा शहद के साथ सेवन करे। विषमज्वर में भोजन नहीं करना यहो पथ्य है। यह चन्द्रकांत नाम का रस चन्द्रमा के समान कांति को देनेवाला तथा क्षय रूप व्याधि को नाश करनेवाला तथ सम्पूर्ण ज्वरों को नाश करनेवाला एक माह तक सेवन करने से शरीर को कांति को कपूर के समान करनेवाला और अनेक व्याधि को नाश करनेवाला है। यह चन्द्रकांतरस पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
७६-मूत्रकृच्छादौ बंगेश्वररस: रसवंगं सममादाय (१) द्वयोः कृत्वा च मेलनं । कुमारीरससंयुक्त दिनमेकं च मर्दयेत् ॥ १॥ त्रिफलाकषाय-संयुक्त त्रिदिनं मर्दयेत्तथा । बालुकायंत्रयोगेन क्रमवृद्धन वहिना ॥२॥ मृदुमध्यदीप्तज्वालेन पर्पटी-यंत्रपाविता। अश्वगंधामृताविश्वमोचारसशतावरी ॥३॥
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वैद्य-सार
गोतुरकर्कटाख्यौ च वाराही कंदमागधी। त्रिफला कर्कटीचैव यष्टीचमधुका समा ॥ ४॥ समांशं सितया मिश्रं मुंजीत निष्कमात्रकम् । रसो बंगेश्वरो नाम तवक्षीरेण सह लिहेत् ॥ ५॥ प्रातःकाले च पीयूषलवणानं च वर्जयेत् । मूत्रकृच्छ्र च बहुमूत्र रक्तशुक्रप्रमेहकं ॥ ६ ॥ मधुप्रमेह दौर्बल्ये नष्टलिंग तथैव च । सर्वप्रमेहशांत्यर्थ बंगेश्वररसः स्मृतः ॥ ७ ॥ अन्नं तु पंचरात्रेण दशरात्रण दुग्धकम् । दधि विंशतिरानण घृतं मासेन जोति ॥८॥ एतदंगेश्वरो नाम सर्वयोगेषु चोत्तमः ।
सर्व-रोगनिकृत्यर्थ पूज्यपादेन भाषितः ॥ ६॥ टोका-शुद्ध पारा तथा वंग दोनों को बराबर मिला कर घ कुवार के रस में बराबर एक दिन तथा त्रिफला के काढ़े में३ दिन तक मर्दन करे तब सुखा और शीशी में भर कर बालुकायंत्र से क्रमपूर्वक मृदु, मध्यम तीव्र आंच देवे। जब बालुका रंः की शीशी में पर्पटी के समान बन जाय तब निकाल कर असगंध शतावर, गुर्च, सोंठ सल का कंद गोखुरू, बांझ ककोड़ा बाराही कंद, पीपल, त्रिफला, कोंच के बीज तथ. मुलहठी इन सब का चूर्ण बना कर इसके समान मिश्री मिलाकर तवाखीर के साथ सेवन करे तो इससे नीचे लिखे रोग शांत होवें। इसे प्रातः काल खाना चाहिए। किन्तु नमक और आम न खाये। इसके सेवन से मूत्रकृच्छ्र, तथा बहुमूत्र, रक्त प्रमेह, शुक्रप्रमेह, मधुप्रमेह, दुर्वलता एवं इन्द्रिय की कमजोरी शांत हो जाती है। सब प्रकार के प्रमेहों को शांत करने के लिये यह दंगेश्वर रस उत्तम है। इसके सेवन करने से पांच दिन में अन्न, दश दिन में दूध, बीस दिन में दही, तथा एक माह में घी हजम होने लगता है। यह बङ्गेश्वर नाम का रस सब योगों में उत्तम योग है। यह पूज्यपाद स्वामी ने सब रोगों को दूर करने के लिये कहा है। इसकी मात्रा एक निष्क प्रमाण है।
७७-विबन्धे बज्रभेदीरसः चित्रक निवृता प्राह्या, त्रिफलां च कटुवयम् । प्रत्येकं सूक्ष्मंचूर्ण तु द्विगुणं च स्लुहीपयः॥१॥
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वैद्य - सार
पंचगुंजमिदं खादेद्वज्रभेदिर सोह्ययं ।
त्रिबंधं नाशयत्याशु पूज्यपादेन भाषितः ॥ २ ॥
टीका - चित्रक, निशोथ, त्रिफला, सोंठ, मिर्च और पीपल यह प्रत्येक चीज समान भाग लेकर कूट कपड़छन कर के एकत्रित करे फिर इसमें दूना थूहर का दूध मिलाकर घोंटे, और सुखा कर तैयार कर रख ले। इसकी पांच रती की मात्रा है। अवस्था के अनुसार सेवन करे तो वराबर दस्त होवे । कब्ज को दूर करनेवाला यह रस पूज्यपाद स्वामी ने कहा है ।
७८ - विबंधे इच्छा भेदिरसः
सूतं गंधं तथा ज्येोषं टंकणं नागराभये । जयपाल बीज संयुक्त' इच्छाभेदी रसः स्मृतः ॥ १ ॥ चतुर्गुजाप्रमाणेन विरेकः कथ्यते बुधैः ।
शीघ्र विरेचयत्याशु पूज्यपादेन भाषितः ॥ २ ॥
५१
टोका - शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, सोंठ, मिर्च, पीपल, भुना हुआ चौकिया सुहागा, सोंठ, बड़ी हर्र का छिलका, तथा जमालगोटा के शुद्धबीज इन सब का समभाग एकत्रित करके चार चार रती के प्रमाण से सेवन करे तो बराबर शीघ्र ही दस्त हो । ऐसा पूज्यपाद ने कहा है ।
ને
७६ ज्वरादौ ज्वर - कण्टकैरसः पारदं टंकणं चैव सैंधवं त्रिफला युतं । त्रिकटु च समं सर्व जयपाल सर्व तुल्यकं (१) ॥ १ ॥ चतुर्गु जमिदं खादेत् रसोऽयं ज्वरकंटकः । सर्वज्वरविनाशोऽयं पूज्यपादेन भाषितः ॥ २ ॥
टोका - शुद्ध पारा, सुहागे का फूला, सेंधा नमक तथा त्रिफला त्रिकटु ये सब समान भाग लेकर कूट कपड़छन करे तथा सब के बराबर जमालगोटा लेकर पोस कर रख लेवे । इसके चार चार रन्ती के प्रमाण से अनुपान विशेष के द्वारा सेवन करने से सब प्रकार का शांत होता है, यह पूज्यपाद स्वामी की उक्ति है ।
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वैद्य-सार
८०-शीतज्वरे शीत-कण्टकरसः पारदं टंकणं तालक्रमाद्विगुणसंयुतं । कारवेल्ल्याः द्रवैर्मयस्ताम्रपानो विलेपयेत् ॥१॥ दिनकं बालुकायंत्रे पाचयेत्स्वांगशीतलं। चतुगुंजमिदं खादेत् पर्ण-खंडेन योजयेत् ॥२॥ दध्योदनमिदं पथ्यां रसोऽयं शीत-कंटकः ।
शीघ्र शीतज्वरं हंति पूज्यपादेन भाषितः ॥३॥ टीका-शुद्ध पारा १ भाग सुहागा २ भाग, एवं शुद्ध हरताल ४ भाग (इस क्रम से एक से दसरा दूना २ लेकर) सब का एकत्रित कर करेले के फल के रस में मर्दन कर के शुद्ध तामे के पत्र पर लेपन करे तथा उसको ताम्रपत्र सहित बालुका-यन्त्र में पकावे। जब स्वांग शीतल हो जाय तब उस को निकाल और घोंट कर रख लेवे तथा चार रत्ती के प्रमाण से पान के रस के साथ सेवन करे तो शीतज्वर दूर होवे। इसके ऊपर दहीभातका पथ्य है। पूज्यपाद स्वामी ने इसे शीतज्वर को नाश करनेवाला बतलाया है।
८१-शीतज्वरे शीतकुठाररसः पारदं रसकं तालं समं निर्गुडिकाद्रवेः। मर्दयेत्ताम्रपत्रण लेपयेद् वैद्यपुंगवः॥१॥ बालुकायंत्रमध्यस्थं दिनकं पाचयेत्तथा । तद्भस्म च समं योज्यं यत्नाद्भस्म च टंकण ॥२॥ कारवेल्याः द्रवैस्सर्व बटी गुंजाप्रमाणिका ।
नागवल्याः द्रवैया रसः शीतकुठारकः ॥ ३ ॥ टोका-शुद्ध पारा, शुद्ध खपरिया हरताल, तबकिया ये तीनों भाग बराबर लेकर नेगड़ की पत्ती के रस में मर्दन करके तथा शुद्ध ताम्र पत्र पर लेप करे और उसको बालुकायंत्र में १ दिन भर पकावे तथा जब पक जाय तब उसको ठंडा होने पर निकाल लेवे। उसके बराबर चौकिया सुहागे का फूला लेकर दोनों को करेले के रस के साथ मर्दन कर के एक एक रत्ती प्रमाण गोली बना लेवे और पान के रस के साथ देखें तो शीतज्वर शांत होता है।
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वैद्य - सार
८२ -- प्रददौ पंचबाणरसः
मृतसुताभ्रमं च विधाय पर्पटी तथा । अरण्यकदलीकंदमश्वगंधाशतावरी ॥१॥ त्रिकंटकामृता विश्ववानरीबीजयष्टिका । धात्री च शाल्मली सौरश्च तु सारेण मर्दयेत् ॥२॥ बटी गुंजाप्रमाणेन सिताक्षीरं पिबेदनु । पथ्यं च मधुराहारं पंचबाणरसोऽहागं ॥३॥ योगोऽयं सर्वरोगघ्नो विशेषं प्रदरे तथा । प्रमेहे सेतुवज्ज्ञ यो पूज्यपादेन भाषितः ॥ ४ ॥
टीका ---ारे की भस्म, अभ्रक भस्म एवं सोने की भस्म इन तीनों का बराबर लेकर एकत्रित कर घोंट कर पपड़ी बनावे फिर जंगली केले के कन्द के रस में, तथा असगंध, शतावरी, गोखरू गुर्च, सोंठ, कोंच के बीज, मुलहठी, आंवला, सेमल तथा गन्ना, इन सब के रस में एक एक दिन अलग अलग मर्दन करे एवं एक एक रत्ती के बराबर गोलियां बनावे । रोग की अवस्था को देख कर सर्व रोगों में प्रयोग करे और ऊपर से दूध, मिश्री पिलावे तो इससे सर्व प्रकार के धातु-सम्बन्धी रोग अच्छ े होते हैं। तथा खास कर प्रदर प्रमेह शांत है।ते हैं। पथ्य मीठा भोजन करे- ऐसा स्वामी जी ने कहा है ।
८३ - मन्दाग्नौ कालाग्निरसः
शुद्ध सूतं विषं गंधमजमोदं पलत्रयम् । सज्जीक्षारयवक्षारौ वह्निसैंधवजीरकम् ॥ १॥ सौवर्चलं विडंगानि टंकणं च कटुत्रयम् । विषमुष्टि सर्वतुल्यं जंबीररसमर्दितम् ॥ २ ॥ मरिचप्रमाणवाटिकां चाग्नि मान्द्यप्रशांतये ।
अशीतिबात जान रोगान् गुल्मं च ग्रहणीं जयेत् ॥ ३ ॥ रसः कालाग्निरुद्रोऽयं पूज्यपादेन निर्मितः ।
५३
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टीका - शुद्ध पारा, शुद्ध बिषनाग शुद्ध आंवलासार गंधक ये एक एक पल तथा प्रजमोदा ३ पल, सज्जीखार १ पल, जवाखार १ पल, चित्रक १ पल, सेंधा नमक १ पल, सफेद जीरा - १ पल, काला नमक १ पल, बायविडङ्ग १ पल, भुना चौकिया सुहागा १ पल, सॉट मिर्च पोपल ये तीनों १-१ पल तथा शुद्ध कुचला सब के बराबर ले, कूट एवं कपड़
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वैद्य सार
छन कर जम्बीरो नीबू के रस में मर्दन कर के काली मिर्च के बराबर गोली बनावे। यह गोली अनुपान विशेष से अग्निमांद्य की शान्ति के लिये लाभदायक है। यह अस्सी प्रकार के वायु के रोग सर्व प्रकार के गुल्म रोग तथाग्रहणी रोग इन सब रोगों के नाश करने के लिये हितकारी है। यह कालाग्नि रुद्ररस श्री पूज्यपाद स्वामी जी ने कहा है। ___ भावार्थ-आचार्य जी ने इस रसका अनुपान तथा माना नहीं बतलाई है। इस लिये वैद्य लोग रोगी का तथा रोग का बलाबल विचार कर मात्रा तथा अनुपान की कल्पना स्वयं करें।
८४ -अजीर्णो अजीर्णकंटकरमः शुद्ध' सूतं विषं गंधं समं सई विचूर्णयेत् । मरिचं सर्वसाम्यांश कंटकारीफलद्रवैः॥१॥ मर्दयेत् भावयेत्सर्वं चैकविंशतिवारकं ।। बटी गुंजात्रयं खादेत् सर्बाजीणं च नाशयेत् ॥ २॥ अजीर्ण-कंटकाख्योऽयं रसो हंति बिषूचिकाः ।
अग्निमांद्यविषन्नोऽयं पूज्यपादेन भाषितः॥ ३ ॥ टोका-शुद्ध पारा, शुद्ध विषनाग, शुद्ध गंधक ये तीनों बराबर बराबर लेकर सब के बराबर काली मिर्च सब का कूट और कपड़छन करके छोटी कटहली के फलों के रस की इक्कीस भावना देवे तथा तीन रत्ती की प्रमाण गोलियां बांधे इन गोलियों को अनुपानविशेष से सेवन करावे तो सब प्रकार का अजीर्ण तथा सब प्रकार की विषचिका शांत होती है तथा यह अजीण कण्टक रस अग्निमांद्य-रूपी विष को नाश करनेवाला श्रीपूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
८५-वातरोगे रसादियोगः रसभागो भवेदेकेा गंधको द्विगुणो मतः । त्रिगुणां तु विषं ग्राह्य कणभागवतुष्टयम् ॥१॥ मरिचं पंचभागं च सर्व खल्वे विमर्दयेत् । खल्वे तु दिनमेकं तु निंबूनीरैश्च मर्दयेत् ॥ २॥ सितसर्षपमात्रां तु बटिकां कारद्भिषक् । चतुरशीति बात-रोगान् चत्वारिंशत् कफोद्भवान् ॥ ३ ॥
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वैद्य-सार
रोगान् कुष्टाग्निसर्वाणि गुल्ममेहादराणि च । हन्यात् शुलानि सर्वाणि विषूची ग्रहणीमपि ॥ ४॥ दीपनं कुरुते चाग्निं पूज्यपादेन भाषितः।।
दध्यन्नं दापयेत् पथ्यं शैत्रमुपचारयेत् सदा ॥५॥ टीका -शुद्ध पारा १ भाग, शुद्ध गंधक २ भाग, शुद्ध विषनाग ३ भाग, पीपल ४ भाग, काली मिर्च ५ भाग, इन सबको मिला कर कूट कपड़छन कर खरल में नीबू के रस में घोंट तथा सफेद सरसो के बराबर गोली बांधे तथा रोगी के बलानुसार योग्य अनुपान से इसका सेवन करावे तो ८४ प्रकार के बातरोग, ५० प्रकार के कफरोग, सव प्रकार के कोढ़, सब प्रकार के गुल्म प्रमेह उदर रोग, शूल, विचिका, एवं संग्रहणो वगैः रह को नाश करता है। अग्नि को भी संदीपन करता है। इसके ऊपर दही-भात का पथ्य है। और इसके सेग्न पर शीतल उपचार करना चाहिये ऐसा श्रीपूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
८६--शूले शूलकुठाररसः टंकणं पारदं गंधं त्रिफला-व्योषतालकं । विष ताम्र च जयपालं भृगस्य रसमर्दितम् ॥ १॥ गुंजमानण गुटिकां नागवल्लीरसेन तु। आकस्य रसेनेव यथायोग्य प्रयोजयेत् ॥२॥ शूलान् शूलकुठारोऽयं विष्णुचक्रमिवासुरान् ।
विशेषेणानुपानेन पूज्यपादेन भाषितः॥३॥ टीक-चौकिया सुहागे का फूला, शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, बड़ी हर्र का छिलका, बहेरे का बकला, आंवला तकिया हरताल की भस्म, शुद्ध विषनाग, तामे की भस्म
और शुद्ध जमालगोटा इन सबको बराबर बराबर लेकर भंगरा के रस में दिन भर मर्दन करके एक एक रत्ती प्रमाण गोली बनावे तथा इसको पान के रस के साथ अथवा अदरख के रस के साथ योग्य मात्रा से देवे। विशेष अवस्था में विशेष अनुपान से देने से सम्पूर्ण प्रकार के शूलों को नाश करे। जिस प्रकार कृष्णचन्द्र जी ने सुदर्शन चक्र से असुरों का नाश किया था वेसा ही यह रस उल्लिखित रोगों का नाश करता है। ऐसा पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
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वैद्य-सार
८७- शीतज्वरे श्वेतभास्कररसः
एकं च रुद्रबीजं च दश भागं विषोपलं । क्षीरेण संमर्द्यः दिनमेकं निरंतरं ॥ १ ॥ गुलं वाकां क्षिप्त्वा मूत्रायां रसगोलकं । मूषायाश्च निःसार्य दद्यात् लघुपुटं पचेत् ॥२॥ पश्चादुद्धृत्य तद्भस्म काकमाची रसेन तु । मुद्र- प्रमाणगुटिकां दद्यात् क्षीरेण मिश्रिताम् ॥३॥ शीतज्वरहरचैव रसोऽयं श्वेतभास्करः । क्षीरान्नं भोजयेत् पथ्यं लवणाम्र' च वर्जयेत् ॥४॥
टीका - एक भाग शुद्ध पारा तथा दश भाग शुद्ध संखिया इन दोनों का मिला कर खरल में अकोड़े के दूध में एकदिन मर्दन करे तथा सुखा कर एक कांच की भूषा (शीशी ) में भरकर कपड़मिट्टो करके वालुकायंत्र में पकावे । जब स्वांग शीतल हो जाय तब निकाले तथा कूपी से निकाल कर मकोय के रस से मर्दन करके एक लघु पुट देवे और इसको एक मूंग के बराबर एक पाव गोदुग्ध के अनुपान से सेवन करावे ते। यह शीतज्वर को दूर करता है । इसके ऊपर दूध भात का तथा और भी दूध के भोजन का पथ्य देवे, नमक और खटाई खाने का परित्याग कर देवे ।
ग्रहणीरोगे ग्रहणीकपाटरसः
दरदामृतान्तरबीजं टंकणधातकी । लवंगातिविषावार्धिशोकबीउ ' समांशकम् ॥ ॥ सर्व समं च तस्यार्धं गगनं च नियोजयेत् । तस्याधं फेनं संयाज्य मर्दयेत् दिवसत्त्रयम् ॥२॥ अत्तूरमूलक्काथेन व कुर्य्याश्च बुद्धिमान् । लेोऽयं ग्राह्यवस्तूनामेकेन मधुमिश्रितम् ॥३॥ लिहेत् प्रवाहे ग्रहणीनाशनो नात्र संशयः । ग्रहणीकपाटनामोऽयं पूज्यपादेन भाषितः ॥४॥
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वैद्य-सार
टीका-शुद्ध सिंगरफ, शुद्ध विषनाग, शुद्ध धतूरे के बीज, सोहागे का फला, धई के फूल, लौंग, अतीस, समुद्रशोष के बीन ये सब बराबर बराबर लेवे और अभ्रक भस्म सबसे आधा तथा अभ्रक भस्म से आधा समुद्रफेन मिलावे फिर सबको एकत्रित करके तीन दिन तक धतूरे की जड़ के काढ़े से घोंटे और गोली बनावे। बेलगिरी अथवा जायफल या अतीस के अनुपान से शहद के साथ देवे तो इससे प्रवाहिका-ग्रहणी शांत होवे। यह प्रहणी-कपाटरस पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
८९--शूलादौ ताल कादिरसः तालकं रसकमातिकाशिला गंधसूतमपि साम्यमानतः । सर्वमेव खलु.चूर्णितं पचेत् चाटरूपसुरसावारिणा ॥१॥ मर्दितं तदनु ताम्रहेमजौ संपुटे तिपितसूतसाम्यको। मृत्पटेन पारवेष्ट्य पाचितो व्योषनागररसैविभावितः ॥२॥ तालकादिरसमस्ति सः स्वयं भास्करस्तु कुरुते खरो यथा। एष एव विनियोजितो द्रुतं रोगराजतमसो विनाशकः ॥३॥ चित्रका करसेन योजितो घोरशूलकफवातनाशनः ।
नागराज जयपालमिश्रितोऽजीर्णगुल्मकृमिनाशने परः ॥४॥ टोका-शुद्ध तकिया हरताल, शुद्ध खपरिया, शुद्ध सोनामक्खी, शुद्ध मेनशिल, शुद्ध गंधक, शुद्ध पारा ये सब वस्तुएँ बराबर बराबर लेकर सबको एकत्रित कर अड़सा, तुलसी एवं अदरख के स्वरस से अलग अलग घोंटे, जब घुट जावे तव पारे के बराबर ताम्बे की भस्म तथा सेोने की भस्म डाले और सबको सुखाकर संपुट में बंदकर कपड़मिट्टी करके भस्म कर लेवे। जब स्वांग शीतल हो जाय तब निकालकर त्रिकुट और सोंठ के काढ़े की अलग अलग भावना देवे और सुखाकर रख लेवे-स यह तालकादिरस सि हो गया समझे। यह रस युक्तिपूर्वक प्रयोग किया जाय तो जिस प्रकार प्रखर सूर्य अन्धकार का नाश करता है, उसी प्रकार यह तालकादिरस अनेक रोगों को नाश करनेवाला होता है तथा विशेषकर यह रस चित्रक और अदरख के रस के साथ देने से भयंकर शूल अथवा कफजन्य और बातजन्य अनेक रोग शांत होते हैं। सोंठ, घी, शुद्ध जमालगोटा के साथ देने से अजीर्ण, गुल्मरोग और कृमिरोग भी शांत होते हैं।
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६०
वैद्य-सा
१० - पित्तरोगे चन्द्रकलाधररसः प्रत्येकं तालमानेन - सूतकांताभ्रभस्मकं । समं समस्तैर्गधञ्च कृत्वा कज्जलिकां त्र्यहं ॥१॥ मुस्तादाडिमदूर्वाकैः केतकीस्तनवारिभिः । सहदेव्या कुमार्याश्च पर्पटप वारिणा ॥२॥ एषां रसेन क्वाथैर्वा शतावर्या रसेन च । भावयित्वा प्रयत्नेन दिवसे दिवसे पृथक् ॥३॥ तिकागुडूविकासवं पर्पटोशीर माधवी । श्रीगंधं निखिलानां तु समानं सूक्ष्मचूर्णकम् ॥४॥ तद्राक्षादिकषायेण सप्तधा परिभावयेत् । सर्वेषां परिशोष्याथ वटिकाश्चणकैः समाः ॥५॥ घरचन्द्रकलानाम - रसेद्रः परिकीर्तितः । सर्वपित्तगदध्वंसी बातपित्तगदापहः ॥ ६ ॥ अन्तर्बाह्यमहाताप-विध्वंसनमहाधनः । ग्रीष्मकाले शरत्काले विशेषेण प्रशस्यते ॥७॥ हरते चाग्निमाद्यं च महातापज्वरं जयेत् । बहुमूत्र हरत्याशु स्त्रीणां रक्तमहास्रवम् ॥ ८॥ ऊर्ध्वगं रक्तपित्तं च रक्तवांतिविशेषकं । मूत्रकृच्छ्राणि सर्वाणि नाशयेनात्र संशयः ॥ ॥
टोका - शुद्ध पोरा १ भाग, अभ्रक भस्म १ भाग -कांतलौह भस्म १ भाग तथा शुद्ध गंधक ३ भाग लेने चाहिये । पहले पारा और गंधक को तीन दिन तक कज्जली बनावे, फिर उसमें अभ्रक भस्म तथा कांतलौहभस्म मिलाकर उसको खरल में डालकर नागरमोथा, अनार की छाल, दूर्वा, केवड़े का दूध तथा सहदेवी, घीकुमारी, पित्तपापड़ा और शतावरी के रस से अथवा काढे से अलग-अलग एक-एक दिन भावना देवे । भावना देने के बाद कुटकी का सत्त्व, गुर्च का सत्व, पित्तपापड़ा, खस, माधवीलता और चन्दन इन सब का चूर्ण करके उसी औषधि के बराबर लेकर मिला देवे--और उसमें द्राक्षादि के काढ़े से सात भावना देवे तथा चना के बराबर गोली बांध लेवे। यह चन्द्रकलाधर सेवन करने से सब प्रकार के पित्तजन्य रोग तथा बात-पित्तरोग, बाह्याभ्यन्तर के महाताप को शांत करने के लिये घनघोर मेघ के समान है। ग्रीष्म ऋतु एवं शरद ऋतु में विशेष लाभप्रद है । यह रस अग्निमांद्य को तथा महाताप सहित ज्वर को जीतता है और हरएक प्रकार की थकावट, बहुमूत्र, स्त्रियों का रक्तप्रदर, उर्ध्वगरक्तपित्त, रक्त की कमी, और मूत्रकृच्छ्रता इत्यादि रोगों को दूर करता है, इसमें संशय नहीं करना चाहिये ।
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वैद्य-सार
११-वातरोगे कल्पवृक्षरसः मृतं लौहं मृतं सूतं मृतं ताम्र'च रौप्यकम् । मौक्तिकं नीलगंधं च चामृतं मर्दयेत्तथा ॥१॥ अर्कमू रक्तचित्र गजकणा च पुनर्नवा। वृहती चेश्वरी मूल-कषायैः मर्दयेद्भिषक् ॥२॥ चतुर्गाप्रमाणेन लशुनं कटुकनयम्। रक्ताचन-कषायेण निर्गुण्ड्या मार्कवैश्च सः॥३॥ अनुपानविशेषेण बातरक्तहरश्च सः। कल्पवृक्षरसो नाम विख्यातः सिद्धसम्मतः ॥७॥ चतुरशीतिबातानि गुल्मरोगत्रयाणि च । अग्लपि निहत्याशु रक्तवांतिप्रशांतये ॥५॥ नानारोगहरश्चैव तत्तद्रोगानुपानतः।
पूज्यपादेन विभुना सर्वरोगविनाशकः ॥६॥ टीका-लौह भस्म, पारे की भस्म, तामे की भस्म, चांदी की भस्म, शुद्ध माती, नीलवर्ण का शुद्ध गंधक, शुद्ध विषनाग इन सबको समान भाग लेवे तथा इनको खरल में डालकर अकोड़े की जड़, लाल चित्रक, गजपीपल, पुनर्नवा, बड़ी कटेहली, ईश्वरमूल इन सब के काढ़े से अलग अलग भावना देवे तया सुखाकर रख लेवे और चार चार रती के प्रमाण से लहसुन के रस के साथ एवं त्रिकटु, लालचित्रक, नेगड़, भंगरा के काढ़े के साथ मथवा अनुपान विशेष से देखें तो इससे बातरक्त रोग शांत होता है। यह कल्पवृत्त रस सर्व रसों में श्रेष्ठ है। यह ८४ प्रकार के वातरोगों को, सर्व प्रकार के गुल्मरोगों को, क्षयरोग, अम्लपित्त, रक्तवाति को तथा अनुपानविशेष से अनेक रोगों को हरनेवाला है, ऐसा पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
१२-शूलादौ शूलकुठाररसः रविरसभावितसद्यः क्षारत्रयं पंचलवणं च । प्रत्येकं च समानं लशुनरसैराकस्य संयुक्तम् ॥१॥ हंति पारणामशूलं जलोदरं पार्श्वशूलकटिशूले । हरते च कुक्षिशूलं सयोऽयं शूलकुमररस एषः ॥२॥
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वैद्य-सर
टोका - सज्जीखार, जवाखार टंकणचार, समुद्र नमक, काली नमक, सैंधा नमक, विडानमक और साम्हर नमक (पांगा) इन आठों को समान भाग लेकर प्रकौड़े के दूध की भावना देकर सुखाकर घर लेवे, फिर इसको लहसुन एवं अदरख के रस के साथ सेवन करावे तो इससे परिणाम-शूल, जलोदर, पार्श्वशूल, कटिशूल तथा कुक्षिशुल शांत होते हैं ।
६३ - त्रिबंध इच्छाभेदिरसः
त्रिकटुं टंकणं चैव पारदं शुद्ध गंधकं । जयपालचूर्ण गुण्यं गुडेन वटिकां कुरु ॥१॥ विरेचनकरश्चासौ मूत्ररोगविनाशनः । दीपने पाचने कुष्ठे ज्वरे तीव्र च शूलगे ॥२॥ मन्दाग्नौ चाश्मरीरोगे चानुपानविशेषतः । रोगिणश्च बलं दृष्ट्वा प्रयुज्यात् भिषगुत्तमः ||३|| संशोधनः शीतजलेन सम्यक् संग्राहक श्चोष्णजलेन सत्यम् ।
सर्वेषु रोगेषु च सिद्धिदः स्यात् श्रीपूज्यपादैः कथितोऽनुपानैः ॥४॥
टीका - सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, चौकिया सुहागा, शुद्ध पारा और शुद्ध गंधक इन सबको बराबर लेवे तथा पहले पारे और गंधक की कज्जली बनावे पश्चात् ऊपर की औषधियां मिलावे और शुद्ध जमालगोटा तीन भाग लेकर खूब पीसे तथा पुराने गुड़ के साथ गोली बांध लेवे। इसको अनुपान - विशेष से सेवन करने से विरेचन एवं मूत्ररोग शांत होता है । अग्नि को दीपन करनेवाली, पाचन करनेवाली, कोढ़ में हितकारी, ज्वर में, शुल में, अग्निमांद्य में एवं अमरी रोग में, उत्तम वैद्य रोगी का बल देखकर इसका प्रयोग करें तो यह इच्छाभेदी रस की गोली हितकारी है। यह इच्छाभेदीरस शीतल जल के साथ दोषों को शुद्ध करनेवाला तथा उष्ण जल के साथ संग्राहक है अर्थात् दस्तों को रोकनेवाला है।
६४ - गुल्मादौ भैरवीरस:
सूतकं कृष्णजीरं च विडंगं गंधकानि च । सौवर्चलं समं व्यो त्रिफलातिविषाणि च ॥१॥ सैधवं चामृतं युक्तं हेमतोर्याश्च तद्रसैः । मर्दयेत् गुटिकां कृत्वा प्रमाणं गुंजमानया ॥२॥
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वैद्य-सार
गुंजाद्वयं च वटिका दातव्या चाद्रकैः रसैः । बातजन्यं च गुल्मं च शूलं च जठरानलम् ॥३॥ पूज्यपादेन कथितश्चोत्तमो भैरवीरसः ।
टीका - शुद्ध पारा, स्याहजीरा, वायविडंग, शुद्ध गंधक, काला नमक, सोंठ, मिर्च, पीपल, त्रिफला, अतीस, सेंधा नमक, शुद्ध विषनाग इन सबको समान भाग लेकर पहिले पारे और गंधक की कज्जली बनावे, पश्चात् सब औषधियां कूट कपड़छन करके हेमक्षीरी (सत्यानाशी) के स्वरस में घोंट कर एक-एक रत्ती की गोली बांधे । दो-दो गोली सुबह शाम अदरख के रस के साथ देवे तो बातजन्य गुल्मरोग एवं शूल रोग के विनाश के साथ जठराग्नि दीप्त हो जाती है । यह भैरवीरस पूज्यपाद स्वामी ने कहा है ।
१५ - शीतज्वरादौ स्वच्छन्द भैरवीरसः
समभागं च संग्राह्य पारदामृतगंधकम् । जातीफलं च भागाधं दत्त्वा कुर्याश्च कज्जलीम ॥१॥ सर्वार्धमागधी चूर्णं खल्वयिश्वा तु दापयेत् । गुंजाद्वयं त्रयं चापि नागवल्लीदलेन वा ॥२॥
स्रसेनापि यत्नात् पूर्व निषेवितम् । शीतज्वरे सन्निपाते विषचीविषमज्वरे ॥३॥ जीर्णज्वरे च मन्दाग्नौ शिरोरोगे च दारुणे । प्रयुज्य भिषजः सर्वे रसं स्वच्छन्दभैरवं ॥४॥ मुहूर्तात्सेवने पश्चात् ततः कुर्यात् क्रियामिमां । तवक्षीरं सितां दद्यात् ततः शीतेन वारिणा ॥५॥ पथ्यं दध्योदनं कुर्यात् आर्द्राहारं तु कालजित् । यथा सूर्योदयेण स्यात्तमसः नाशनं परम् ॥६॥ स्वच्छन्दभैरवेण स्यात्तथा सर्वामयस्य तु । स्वच्छन्द भैरवीनामा पूज्यपादेन भाषितः ॥७॥
६ ३
टीका - शुद्ध पारा, शुद्ध विषनाग, शुद्ध गंधक एक-एक भाग लेवे तथा जायफल आधा. भाग लेवे। इन सब की कज्जली करके सब से आधी पीपल लेकर सबको सूखा एवं खरल कर २ रप्ती या तीन रती पान के रस के साथ अथवा अदरख के रस के साथ यक्षपूर्वक देवे तो इससे सन्निपात, विषूचिका, विषमज्वर, जीर्णज्वर, मन्दाग्नि तथा कठिन से कठिन
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बैव-मार
शिरोरोग भी अच्छे हो जाते हैं। वैद्य महाशय इसको यमपूर्वक प्रयोग करें। इस रस को देने के एक मुहूर्त पश्चात् तवाखीर तया शक्कर ठंडे पानी के साथ खाने को देवे और वही भात का पथ्य देवे तथा तरल (पतली) वस्तु का आहार देवे। जिस प्रकार सूर्योदय से अन्धकार का प्रय हो जाता है उसी प्रकार स्वच्छन्द भैरवरस के सेन करने से रोगरूपी प्रकार प्रष्ट हो जाता है, ऐसा पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
१६-मन्दामौ कालाग्निरुद्ररसः बज्रसूताभ्रस्वर्णाकंतारातीक्ष्णायसं क्रमात् । भागवृद्धयामृतं सर्व सप्ताहं वित्रकद्रवे ॥१॥ मर्दयेत् मातुलुंगाम्लैः जंबीरस्य दिनत्रयम्। शिव मूलद्रवः क्वाथैः कणाक्वाथैः दिनत्रयम् ॥२॥ निदिनं त्रिफला-क्वार्थः शुंठीमारीवजैः त्रयम् । जातीफलं लवंगलात्वचापत्रककेशरैः ॥३॥ कोलांजनयुतक्वाथैः भावयेदिवसत्त्रयम् । आकस्य द्रः सप्तदिवसं भावयेत् पुनः ॥४॥ शोषितं चूर्णयेत् श्लक्ष्णं चूर्णपादं च टंकणम् । टंकणांशं वत्सनाभं चूर्णीकृत्वा विमिश्रयेत् ॥५॥ निकटुप्रिफलाब्राह्मीचातुर्जातिकसैंधवम् । सौवर्चलं च सामुद्र चूर्णमेषां च तत्समम् ॥६॥ समं कृत्वा प्रयोज्यं च तत्सर्व चाकद्रवेः। शिन त्थमातुलंगाम्लः घोटयित्वा घटी कृता ॥ रसः कालाग्निरुद्रोऽयं त्रिगुंजं भक्षयेत् सदा। अग्निदीप्तकरः ख्यातः सर्ववातकुलांतकः ॥८॥ स्थूलानां कुरुते कार्य कृशानां स्थौल्यकारकम् । भनुपानविशेषात्तु तत्तद्रोगे नियोजयेत् ॥६॥ लेपसेकावगाहादीन् योजयेत् कार्यवुक्तितः। साभ्यासाभ्यं निहत्याशु मंडलानां न संशयः । पूज्यपादेन विभुना चोको वातविनाशनः । ...
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वैद्य-सार
टीका-बज की भस्म १ भाग, पारे की भस्म २ भ ग, अम्रक को भस्म ३ भाग, सोने की भस्म ४ भाग, तामे की भस्म ५ भाग, चांदी की भस्म ६ भाग, और कांतलौह भस्म ७ भाग इन सब को एकत्रित कर चित्रक के काढ़े से ७ दिन तक मर्दन करे पश्चात् विजौरां नींबू, जम्बीरी नींबू के रस से, मीठा सोजना की जड़ के काढ़े से, पीपल के काढ़े से, निफला, सोंठ, काली मिर्च, जायफल, लौंग, इलायची, दालचीनी, तेजपत्र, नागकेशर, बेर, और अञ्जन इन सब के काढ़े से अलग अलग तीन तीन दिन तक तथा अदरख के रस से ७ दिन तक मर्दन करे फिर उसको सुखाकर महीन चूर्ण करे। चूर्ण से चौथाई भाग सुहागे का फूला तथा सुहागे के बराबर शुद्ध विषनाग लेकर सबको मिलावे। बाद त्रिकटु, त्रिफला, चित्रक, दालचीनी, इलायची, तेनपत्र, नागकेशर, सेंधानमक, काला नमक इन सबका सम भाग से चूर्ण बनावे और ऊपर के चूर्ण के बराबर ही लेकर सबको एकत्रित करके मीठा सोंजना तथा विजौरा नींबू के रस से घोंट कर एक एक रत्ती की गोली बनावे। तीन तीन रत्तो के प्रमाण से इस गोली को योग्य अनुपान से देवे तो यह अग्नि को दीप्त करनेवाला, बात के सब प्रकार के विकारों को दूर करनेवाला, मोटे मनुष्यों को कृश और कृश मनुष्यों को मोटा करनेवाला होता है। अनुपानविशेष से यह अनेक रोगों को नाश करनेवाला है। (इसके प्रयोग के समय, यदि लेप; सेंक, अवगाह (जल में बैठाना) इत्यादि क्रियाएँ करनी है तो युक्तिपूर्वक करे)। इसके सेवन से साध्यासाध्य वातरक्त भी शांत हो जाता है। सर्वरोगों को नाश करनेवाला पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ यह उत्तम योग है।
१७-शीतज्वरे वडवानलरसः रसाष्टकममृतं सप्त षड्गंधं षष्ठतालकम् । इंतिवीजानिषड्भार्ग पंचभागं सटंकणम् ॥१॥ चतुर्थ धूर्तवीजस्य शुल्बभस्म त्रयस्य च। एतानि सर्वमागानि (?) वह्निमूलकवायकैः ॥२॥ मुद्रमानवी कृत्वा वाद्र कद्रवसंयुतम् । शीतज्वरं सनिपातं सर्वज्वरविनाशनः ॥३॥ बड़वानलनामायं सर्वातामयापहः। . .
शीतज्वरविषप्नोऽयं पूज्यपादेन भाषितः ॥४॥ टीका-शुद्ध पारा आठ भाग, शुद्ध विषनाग सातभाग, शुद्ध आंवलासार गंधक छ:
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६४
वैद्य-सार
भाग, शुद्ध तवकिया हरताल छ: भाग, शुद्ध जमालगोटा के बीज छः भाग, सुधागे का फूला पांच भाग, शुद्ध धतूरे के बीज़ चार भाग तथा तामे की भस्म तीन भाग इन सब को एकत्रित कर के चित्रक की जड़ के काढ़े से घोंटकर मूंग के बराबर गोली बनावे तथा अदरख के रस के साथ सेवन करे तो शीत ज्वर तथा सन्निपात ज्वर शांत होता है। यह बड़वानल रस पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ शीतज्वर तथा सम्पूर्ण वात रोगों को हरने वाला है।
१८-ग्रहण्यादौ रतिलीलारसः जातीकणाहिफेनं च विजयाचूर्णसंयुतम् । बराटं धर्तवीजं च टिवारिधिशोकजं ॥१॥ तुल्याशं निक्षिपेत् खल्वे यामैकं विजयारसेः । मर्दयेत् बटिकां कुर्यात् गुंजामात्रप्रमाणिकाम् ॥२॥ रतिलोलारमा येषः द्विगुंजो हि मधुप्लुतम् । भक्षयेद्वीथैरोधश्च मधुराहारसंयुतः ॥३॥ प्रहगयाश्चातिसारस्य वातरोगविनाशनः ।
सर्वोत्तमरसश्चासौ पूज्यपादेन भाषितः ॥४॥ टीका-जायपत्री, पीपल, अफीम, भांग, तथा कौड़ी की भस्म, शुद्ध धतूरे के बीज़, छोटी इलायची, समुद्रशोष, इन सब को बराबर बराबर ले एक पहर तक भांग के रस से घोंटकर एक एक रत्ती के बराबर गोली बना कर २ रत्ती शहद के साथ सेवन करे एवं ऊपर से मोठा भोजन करे तो इससे वीर्य को रुकावट हो तथा संग्रहणी और अतीसार, वानरोग शांत होता है-यह सर्वोत्तम रस पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
___88-वातरोगे बड़वानल रसः सूतहाटकबज्रार्ककांतभस्मानि माक्षिकं । तालं नीलांजनं तुत्थं चाब्धिफेने समांशकम् ॥१॥ पंचानां लवणानां च भागेकं च विमर्दयेत् । बज्रीक्षीरैः दिनकं तु रुद्ध वा च भूधरे पचेत् ॥२॥ उद्धरेत् खल्वमध्यस्थे रसपादं विषं क्षिपेत् । मासकमाकद्रावैः लेहयेद्वडवानलं ॥३॥
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वैद्य-सार
पिप्पली मूलकक़ाथं सपिप्पल्या पिबेदनु । दंडवतं धनुर्वात शृंखलाबातमेव च ॥४॥ खञ्जातं पंगुवा कंपवातं जयेत् सदा । मातंगवातसिंहोऽयं पूज्यपादेन भाषितः ॥५॥
टोका - शुद्ध पारे की भस्म, हीरे की भस्म, तामे की भस्म, कांतलौह भस्म, सोना Hear की भस्म naकिया हरताल की भस्म, शुद्ध नीला सुरमा, तूतिया की भस्म तथा समुद्रफेन ये सब बराबर बराबर तथा पांचों नमक १ भाग लेवे और सब को मिला कर थूहर के दूध से दिन भर मर्दन कर बाद भूधर यंत्र में पुटपाक करे पश्चात् और सब को खरल में डालकर पारे से चौथाई भाग शुद्ध विषनाग डाले एवं खूब घोंटे और उसको १ माह तक अदरख के रस के साथ सुबह शाम सेवन करे तथा ऊपर से पीपल और पीपरामूल का काढ़ा पिये तो इससे दंडवात, धनुर्वात, शृंखलाबात, खंजनात, पंगुबात कंपवात वगैरह सब शांत हो जाता है । यह पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ बड़बानल रस बहुत उत्तम है।
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६५
१००
सन्निपातादौ सिद्धगणेश्वररसः
पारदं दरदं गंध वृद्धया चेकोत्तरं क्रमात । नीलग्रीवस्य सर्वाशं मयेत् खल्वके बुधः ॥ १ ॥ विजयाकनकषैः सप्त वा विमर्दयेत् । दीयते बल्लमात्रेण पिप्पल्या मधुनार्द्रा कैः ॥२॥ त्रिदेोषं सन्निपातादिसर्वदुष्टज्वरं जयेत् । शोतेोपचारः कर्तव्यः मधुराहारसेवनं ॥३॥ सिद्धो गणेश्वरा नाम पूज्यपादेन निर्मितः । टीका - शुद्ध पारा १ भाग, शुद्ध सिंगरफ २ भाग, शुद्ध गंधक ३ भाग, तथा शुद्ध विषनाग छः भाग, इन सब को एकत्रित कर के भांग और धतूरा के स्वरस से तथा सोंड मिर्च पीपल के काढ़े से अलग अलग सात सात बार मर्दन करे और इसको तीन तीन रती की मात्रा में प्रदख तथा मधु के साथ देवे तो त्रिदोष, सन्निपात ज्वर भी शांत होता हैं। इसके ऊपर शीतोपचार तथा मधुर भोजन का सेवन करना चाहिये। यह सिद्ध गणेश्वर रस श्री पूज्यपाद स्वामी ने बनाया है ।
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वैद्य-सार
१०१-सन्निपाते सन्निपातगजांकुशः मृतं सूतं मृत ताम्र शुद्धतालकमाक्षिके। तथा हिंगुसमान्येतान्याकस्य च वारिभिः॥१॥ वंध्यापटोलनिर्गुडीसुगंधानिचिनजैः । धतूरलांगलापानभृङ्गवीरसंभवः ॥२॥ त्रिदिनं मईयित्वाथ विक्षारं सैंधवं विषं। वालं मधूकसारं च प्रत्येकं रससंमितम् ॥३॥ सम्मिथ्य मर्दयेत् सिद्धः सन्निपातगजांकुशः।
माषमात्रण हत्याशु पूज्यपादेन भाषितः ॥४॥ टीका-पारे की भस्म, तामे की भस्म, तकिया हरताल की भस्म, शुद्ध सोनामक्खी और शुद्ध हींग, इन सब को समान भाग लेकर अदरख के रस से तथा बांझ ककोड़ा और परपल के पत्तों के रस से, नेगड़ के रस से, सुगंधा (तेजपत्र ) के रस से, नीम को पत्ती के रस से, चित्रक की जड़ के रस से धतूरे के रस से लांगली ( कलिहारी) के रस से, पान के रस से, भंगरा के रस से और जंबीरी नींबू के रस से पृथक् पृथक् और तीन तीन दिन तक मर्दन करे फिर उसमें जवाखार, सजी खार, सुहागा, सेंधा नमक शुद्ध विषनाग, सुगंध वाला तथा महुवे की लकड़ी का सार ये सब पारे के बराबर बराबर लेकर घोंटकर तेयार करले। यह एक मासे को मात्रा से खाने पर सन्निपात को नाश करता है।
५०२-ज्वरादौ गजसिंहरसः अविषद्रदयुग्मं शुद्धसूतं व गंधं । सुरसस्वरसमो वल्लयुग्मं च दद्यात्॥ ज्वरहरगजसिंहो शृंगबेरोदकेन ।
हरति प्रथमदाहं तक्रभक्तं च योज्यम् ॥ टीका-शुद्ध विषनाग, शुद्ध सिंगरफ दो दो भाग, सुद्ध पारा और शुद्ध गंधक एक एक भाग इन चारों की कजली बनाकर तुलसी के स्वरस में घोंटे तथा तीन तीन रती के प्रमाण से अदरख के रस के साथ सेवन करे तो ज्वरशांति हो तथा दाह की भी शांति होती है। जिस दिन इस औषधि का सेवन करे उस दिन छांछ और चावल का भोजन करना उचित है।
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वैद्य-सार
१०३ गुल्मादौ लवण पंचक योगः
संख्यातं लवणं सुवह्नभिमजौ क्षारद्वयं टंकणं । जीरं दीप्ययुगं च रामठविडंग चैव जैपालकं ॥ शोषं वै लशुनं निकुंभमिलितं अर्काम्भसा मर्दयेत् । तत्कल्कं मरिचप्रमाणवाटिकां चाज्येन संभत्तयेत् ॥१॥ संपूर्ण गदहः प्रयोगशुभगः रोगानुपानेन वै । गुल्मं पंचकमूलरोगमुदरं श्वासं च कास-क्षयम् ॥ वाताशीति महोदरं च क्षपयेत् शूलं च रकस्रवम् । पतद्रोगविनाशनो हितकरः श्री पूज्यपादादितः ॥२॥
टीका -- समुद्र नमक, सेंधानमक, काला नमक, विटनमक, साँभर नमक, चितावर, सोंठ, सज्जीखार, जत्राखार भूना हुआ सुहागा, सफेद जीरा, अजमोदा, अजवायन, भूनी हुई हींग, वायविडंग, शुद्ध जमालगोटा के बीज, लहसुन की मींगो (घी में सिंकी हुई) काली मिर्च, पीपल और जमालगोटे को जड़ इन सबको समान भाग लेकर कूट पीस कपड़छन कर अकौवा के दूध से मर्दन करके काली मिर्च के बराबर गोली बनावे और रोगको प्रस्थानुसार योग्य मात्रा से गाय के घी के साथ देवे तो यह शुभ प्रयोग सम्पूर्ण रोगों को नाश करनेवाला है तथा प्रत्येक रोग के पृथक् पृथक् अनुपान से पाँचों प्रकार के गुल्म, उदर रोग, श्वास- कास, क्षय अस्सी प्रकार के वातरोग, जलोदर, शूल एवं अधोरक्तनाव इन सब रोगों को नाश करनेवाला यह पूज्यपाद स्वामी का कक्ष हुआ लवणपंचकयोग सर्वोत्तम है।
१०४. - सर्वरोगे रसराजरसः
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६७
रसेन्द्र सिन्दूर - मथाभ्रकान्तं गंधं रवेः भस्म व रौप्यभस्म । सयाज्य सर्वं त्रिफलाकषायैः विमर्ध पश्चाद्विनियोजनीयः ॥ १ ॥ कटुत्त्रयेणापि फलत्त्रयेण युक्तो रसेन्द्रः सकलामयन्नः । रसोत्तमोऽयं रसराज एषः श्रीपूज्यपादेन सुभाषितः स्यात् ॥२॥ टीका - शुद्ध पारा, रससिन्दूर, प्रभ्रकभस्म, कांतलौह भस्म, शुद्ध गंधक, तामे की भस्म तथा चांदी की भस्म इन सबको बराबर बराबर लेकर खरल में डालकर त्रिफला के काढ़े में घोंटे और उसको त्रिकटु त्रिफला के काढ़े से ही सेवन करे तो अनेक रोग शांत हों। यह रसों में श्रेष्ठ रस पूज्यपाद स्वामी ने कहा है ।
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वैद्य-सार
१०५-ज्वरातिसारादौ जयसंभवगुटिका
सूतेन्द्रायसभस्महिंगुलविषं व्योषं च जातीफलं । धत्तूरस्य च वीजटकमिदं गंधाजमादाजया ॥ वाराटं हि प्रदाय भस्म सुभिषक् संमईयेत् धूर्त। स्वरसैः वै जयसंभवां च गुटिका गुंजामितां कल्पयेत् ॥१॥ वरातिसारं क्षपयेत् जयसंभवभाग घटी
अनुपानविशेषेण पूज्यपादेन भाषिता । टीका-शुद्ध पारा, लौहभस्म, शुद्ध सिंगरफ, शुद्ध विषनाग, सोंठ, मिर्च, पीपल, जायफल, धतूरे के बीज, सुहागे की खील, शुद्ध गंधक, अजमोदा और अरबी, कौड़ी की भस्म इन सब को बराबर बराबर लेकर धतूरे के रस से मर्दन करे और गोली बनावे। यह गोली अनुपान-विशेष से एक एक रत्तो खाने पर ज्वरातिसार को नाश करती है यह पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
१०६-कुष्ठे महातालेश्व सः तालं ताप्यं शिलासूतं शुद्ध सेंधवटंकणम् । समां चूर्णयेत् खल्वे सूताद्विगुणगंधकम् ॥१॥ गंधसाम्यं मृतं तानं सुवर्णकान्तमभ्रकम् । नीलग्रीवं द्विरजनीतालभागयुतं समम् ॥२॥ जंबीरनीरैः संमर्यः तत्सर्व दिनपंचकम् । सहि षड्भिः पुटैः पाच्यो भूधरे संपुटरोदरे ॥३॥ पुटे पुटे द्रवर्मयः सर्वमेतञ्च षट्पलम् । द्विपलं मारितम् तानं लौहभस्म चतुःपलम् ४॥
जंवीराम्लेन तत्सर्व दिनं मद्य पुटे लघु। निशच्चांशं विषं क्षिप्त्वा तत्र सर्व विचूर्णयेत् ॥५॥ महिषाज्येन च संमिश्रः निष्कश्च पुंडरीकनुत्। मध्वाज्यैः कर्कटीवीजं कर्षमात्रं लिहेदनु ॥६॥ मधुनाज्येन वा सेवेत् कुष्ठरोग विनाशयेत् ।
महातालेश्वरोनाम: पूज्यपादेन भाषितः ॥७॥ टीका-राद्ध तकिया हरताल, सोनामक्खी, शुद्ध शिलाजीत शुद्ध पारा, सेंधानमक
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वैद्य-सार
६. ह
और सुहागा ये सब समान भाग तथा शुद्ध गंधक पारे से दूना एवं गंधक के बराबर ताम्र भस्म, सोने की भस्म, कांत लौह भस्म और अभ्रक भस्म लेवे, बाद सुद्ध विष नाग, हारूहल्दी ये हरताल के बराबर लेकर इन सबको एकत्रित करके जंबीरी नींबू के रस से पाँच दिन तक मर्दन करे एवं भूधरयंत्र में छः पुट लगावे। बार बार निकाल कर जंबीरी से घोंट कर पुट दे पश्चात् नींबू से घोंटकर हल्की पुर दे । पश्चात् २ पल तामे की भस्म, ४ पल लौह भस्म डाले । सब द्रव्य से तीसवाँ भाग शुद्ध विष डाले और फिर सबको चूर्ण करके रख लेवे। इसको भैंस के घी के साथ एक एक टंक अथवा रोग तथा रोगी के बलाबल अनुसार सेवन करे एवं ऊपर से शहद तथा घी के साथ मिलाकर १ तोला ककड़ी के बीज चाटे अथवा ऊपर कहा हुआ रस ही घी तथा शहद विषम मात्रा में लेकर उसके साथ सेवन करे तो यह महातालेश्वर रस सब प्रकार के कुष्ठ रोगों को एवं श्वेत कुष्ठ को नष्ट करता है । यह पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ है।
तालकेश्वर रस ७६ तरह का लिखा है- -यह दसवाँ प्रकार है ।
7
बातरोगे
कुठाररसः
रसहिंगुल कॉताम्रशिला तालकगंधकं । खरी वत्सनाभं च तुत्थशुशिलाजतु ॥१॥ त्रिक्षारं पंचलवणं त्रिकटु त्रिफलाजटाः । जैपालं त्रिवृतादन्ती विडंगं चत्र्यचित्रकान् ॥२॥
रामजमोदं च दीप्यकं द्विनिशा रुजं । जातीफलं त्रुटिर्भागो घातकीपुष्पगुग्गुलुं ॥३॥ eargadar हिंगुं णामूलद्विजीरकं । प्रत्येकं समभागानि मयेच्चाद्रकैः रसैः ॥४॥ दिनैकं मातुलुंगस्य भृङ्गराजरसान्वितैः । टिका चणमात्रं तु चानुपान विशेषतः ||५|| सर्ववातं हरत्याशु सर्वज्वरविनाशनः । सर्वगुल्मपरिच्छेदी पाण्डुक्षयविनाशनः ॥६॥ अजीर्णकामलाशूलमूत्ररोगकुठारकः ।
विशेषं वातरोगघ्नः पूज्यपादेन भाषितः ॥७॥
टोका - शुद्ध पारा, शुद्ध सिंगरफ, कांतलौह भस्म, अभ्रक भस्म, शुद्ध शिला, तबकिया
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७०
वैद्य-सार
हरताल भस्म, शुद्ध गंधक, खपरिया भस्म, शुद्ध विषनाग, तूतिया की भस्म, तामे की भस्म, शिलाजीत, सज्जीखार, जवाखार, सुहागा, समुद्र नमक सेंधा नमक, काला नमक, सांभर नमक, विड नमक, सोंठ, मिर्च, पीपल, हर्र, बहेरा, आंवला, बटकी जटा, शुद्ध जमालगोटा, निशोथ, जमालगोटे की जड़, वायविडंग, चाव, चित्रक, कौड़ी की भस्म, अजमोदा, अजवायन, हली, दारुहल्ली, कूट, जायफल, इलायची, भारंगी, धवई के फूल, गूगल, शुद्ध नागरमोथा, पुनर्नवा, (साठी) हींग भुनी, पोपरामूल, स्याहजीरा और सफेद जीरा इन सबको एकत्रित कर कूट कपड़छन कर के अदरख के रस, बिजौरा नींबू के रस तथा भंगरा के रस के साथ घोंट कर चना के बराबर गोली बनावे। यह गोली विशेष अनुपान से संपूर्ण वातरोगों को तथा सर्व प्रकार के ज्वरों को गुल्म, पांडु, क्षय, अजीर्ण, कामला, शल इन सबको नाश करनेवाला है-यह पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ उत्तम योग है।
१०८-वाजीकरणे कामांकुशरसः शुद्धसूतकसिन्दूरव्योमसिन्दूरगंधकं । कांतसिन्दूरमुन्मत्तवीजकं वत्सनाभकः ॥॥ घनभस्म स्वर्णभस्म अहिफेनं वार्धिशोकजं । निसुगंधं च मिलितं जोतीपत्नवराटकं ॥२॥ तुल्याशं निक्षिपेत्खल्वे मर्दयेत् वासरत्रयम् । शतावरीरसैर्वाथ मुशलीस्वरसेन वा ॥३॥ सप्ताहं भावयेद्यनात् कुक्कुटांडरसेन च। घटकान्कारयेत्तस्य गुंजामाप्रमाणकान् ॥४॥ देयं गुंजाद्वयं नित्यं भक्षयेत्तन्मधुप्लुतम् । महानंदकरः सम्यक्वीर्यस्तंभ करोत्यसौ ॥५॥ शर्करांषा दुग्धघृतमनुपानं पिबेत्सदा । कामांकुशरसोह्यषः कामिनां तृप्तिकारकः ॥६॥ कामिनीनां सहस्राणां तर्पयेदिवसांतरे। . रसायनमिदं श्रेष्ठं वपुःकांतिबलप्रद ॥॥ घाजीकरणप्रयोगोऽयं मदनानंदनंदनः।
कामांकुशरसो नाम पूज्यपादेन भाषितः ॥८॥ टीका-शुद्ध पारा, रससिन्दूर, व्योमसिन्दूर, शुद्ध गंधक, लौह सिन्दूर, शुद्ध धतूरा के बीज, शुद्ध विषनाग, हीरे की भस्म, सोने की भस्म, शुद्ध अफीम, समुद्रशोष, दालचीनी,
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वैद्य-सार
तेजपत्ता, इलायची, जायपत्री, कौड़ी की भस्म ये सब बरावर बराबर लेकर तीन दिन तक : अलग अलग शतावरी तथा मूसली के रस से सात दिन तक घोटे और उसकी एक एक रत्ती की गाली बनावे और दो दो रत्ती की मात्रा से शहद के साथ सेवन करावे तो यह वीर्य को स्तम्भन करनेवाला है और ऊपर से शक्कर, दूध एवं घी का सेवन करे। यह कामांकुशरस कामी जनों को आनन्द देनेवाला, हजारों स्त्रियों को तृप्तकरनेवाला उत्तम रसायन है। शरीर की कांति तथा बल को देनेवाला है। यह बाजीकरण पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ उत्तम प्रयोग है।
टिप्पणी-यह रस भी बहुत बढ़िया मालूम होता है लेकिन बहुत कीमती है। हरएक नहीं बना सकता है। इसमें जो व्योमसिंदूर शब्द आया है सो मलसिंदूर, ताम्र सिंदूर, ताल सिंदूर तो पाये हैं लेकिन व्योमसिंदर की जगह एक अभ्रसिंदूर रसयोगसागर में लिखा है, जो एक प्रकार की अभ्रक की भस्म ही है इसमें पारद नहीं है। बाजीकरण औषधियों के ३६ पुट लिखे हैं। कांतसिंदूर नहीं मिला, यह भी एक प्रकार का सिंदूर मालूम होता है जो लौहभस्म डालकर बनाया जाता है ।
१०६-कुष्ठे तांडवाख्यरसः तालं गंधं माक्षिकं च कुष्ठं पारदभस्म च | श्वेतापराजिताम्भोभिः मर्दयेहिवसत्रयम् ॥१॥ धात्रीफलरसेनापि सप्तधा भावयेदमुं। अन्धमूषागतं रुद्ध वा चोर्ध्व मृण्मयवेष्टितं ॥२॥ कुक्कुटाख्ये पुटे दग्ध्वाथगोमूत्रेण मर्दयेत् । तांडवाख्यो रसो ह्यषः गुंजाद्वयनिषेवितः ॥३॥ कुष्ठानां वमनं पूर्व विरेचनमतः परं । ततो महाकषायश्च मंजिष्ठादिः प्रशस्यते ॥४॥ अष्टादशविधानां हि कुष्ठानां च विनाशकः।
तांडवाख्यरसश्चासौ पूज्यपादेन भाषितः ॥५॥ टीका-तवकिया हरताल की भस्म, शुद्ध गंधक सोनामक्खी की भस्म, मीठा कूट, पारे की भस्म (रससिन्दूर) इन सब को खरल में एकत्रित करके सफेद कोयल के स्वरस से तीन दिन तक बराबर मर्दन करे, फिर आँवले के फल के रस से सातबार भावना देवे बाद मुखाकर अंधभूषा में बंद करदे ऊपर से सात कपड़मिट्टी करके सुखा लेवे और फिर कुक्कुटपुट में
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वैद्य-सार
पकावे जब स्वांग शीतल हो जाय तब इसको गोमूत्र से घोंट कर रख लेवे। इस रस को दो दो रत्ती अनुपान-विशेष से सेवन करे तथा ऊपर से महामंजिष्ठादि काढ़ा पीवे। इस रस के सेवन करने के पहले वमन, विरेचन, अवश्य करना चाहिये। यह रस अठारह प्रकार के कुष्ठों को नाश करनेवाला है। यह पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ उत्तम रस है।
११०-कुष्ठे तालकेश्वररसः तालस्य सत्वमादाय तत्समा तु मनाशिला । द्विभागं सूतकं चापि गंधकं च समं तमं ॥१॥ गोकर्णिकारसैधापि धात्रीमोचोद्भवैः रसैः। मर्दयित्वा तथा सर्व खल्वे तत् पंचवारकं ॥२॥ रसैः पुनर्नवायाश्च पिष्टवा पिष्ट्वा पुनः पुनः। तस्य पिण्ड प्रदातव्यो मूषिकायां तथापरं ॥३॥ कृत्वांध्रमूषिकां चापि वेष्टितां वसनादिभिः। ततः पातालयंत्रेण पाच्यश्च करिणीपुटे ॥४॥ ततस्तत्सममाकृष्य गुंजकां वा द्विगुंजकां । भक्षयेत् प्रातरुत्थाय पर्णखंडेन केनचित् ॥५॥ गोऽजापयश्च धारोषामनुपानं कुष्ठरोगिणे । श्वेतापराजिता देया कामलाव्याधिपीडिते ॥६॥ पयसा शर्करा देवा जीर्णकुष्ठे च पुष्कले । ' सप्तधातुगते कुष्ठे सप्ताहं च पिबेदनु ॥७॥ तालकेश्वरनामाऽयं पूज्यपादेन भाषितः ।
नानाकुष्ठमहान्याधिवने चरति सिंहषत् ॥८॥ टीका तपकिया हरताल का सत्त्व, शुद्ध मेनशिल, एक एक भाग, शुद्ध पारा २ भाग, शुद्ध गंधक २ भाग इन सब को एकत्रित कर खरल 'में घोंटकर गोकणिका (मूर्वा), भावले और केले के रस से पाँच पाँच बार अलग अलग घोंट कर तथा पुनर्नवा के रस से भी पांच बार घोंट कर उसका पिंड बना कर अन्धमूषा में बंद करे एवं ऊपर से पल से वेषित कर और पाताल में गजपुट की आँच देवे । जब स्वांग शीतल हो जाय तव निकालकर एक रत्ती अथवा २ रत्ती प्रातःकाल पान के रस के साथ सेवन करे और ऊपर से गाव या बकरी का धारोष्ण दूध पिये। यह अनुपान कुष्ठ रोग का है। कामला से
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वैद्य-सार
७.३
पीड़ित मनुष्य के लिये सफेद कोमल (विष्णुकान्ता) का अनुपान देवे तथा पुराना कुष्ठरोग हो एवं सातो धातुओं में प्रविष्ट हो गया हो तो दूध और शक्कर सात दिन तक बराबर अनुपान में पिलावे । यह तालकेश्वर रस अनेक प्रकार के कुष्ठरोग को दूर करनेवाल पूज्यपाद स्वामी ने कहा है ।
१११ - अतीसारे महासेतुरसः जातीफललवंगैलाकर्कोटजटिलांबुदाः । प्रन्थिका दीपकद्वन्द्वालु विल्वाम्रदाडिमाः ॥१॥ सैंधवातिषा मोचो (?) वनयक्षात्क्षिवीजकाः (१) । धातकीकुसुमं व्योषजयाचित्रकजांबवं ॥२॥ लौहभस्माभ्रसिन्दूर विषपारदहिंगुलं । पतानि समभागानि सर्वाणि खलु मेलयेत् ॥३॥ गुंजामाaar कुर्यात् मर्द्य श्वोन्मत्तवारिणा । अनुपानविशेषेण सर्वातीसारनाशनः ॥४॥ महासेतुरिति ख्यातः महावेगस्य रोधकः । सर्वश्रेष्ठ प्रयोगोऽयं पूज्यपादेन भाषितः ॥५॥
टीका - जायफल, लवंग, छोटी इलायची, बॉझककोड़ा, जटामांसी, नागरमोथा, पीपरामूल, अजमोदा, अजवायन, श्योनाक, बेल की गिरी, आम की छाल, अनार का बकला, सेंधा नमक, अतीस, मोचरस, बहेरा, तालमखाने की लाई, धवई के फूल, सोंठ, मीर्च, पीपल, अरनी, चित्रक, जामुन की छाल, लौह भस्म, अभ्रक की भस्म, रससिन्दूर, शुद्ध विषनाग, शुद्ध पारा, और शुद्ध सिंगरफ इन सब को समान भाग ले और सबको एकत्रित करके धतूरे के रस से घोंट कर गोली बना लेवे। यह सब प्रकार के अतीसारों को नाश करनेवाला है। अतीसार के बढ़े हुए वेग को रोकनेवाला यह महासेतु रस पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ उत्तम प्रयोग है।
११२ -- प्रमेहे मेहारिरसः
सूतं गंधक कांत बंगगगनं मडूरकं शोसकं सौवीराद्विजगैरिकंशशिशिला बब्बूलबीजं दलं | · कार्पासास्थिजलारिसिंधुलवणं चिंचासुवीजत्वचं । सारं बिल्वकपित्थनिंबकुटजमत्स्यात्रिमेदायुगं ॥१॥
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वैद्य-सार
गुंजायुग्मकिरीटनक्तजतुका भृगं वराभिः समम्। चूर्णपाणितलं सतक्रमथवा मध्वन्वितं तलिहेत् । पिष्याकोदनभोजनं प्रतिदिने तैलेन तक्रण वा
विशतिमेहजयी रसोनिगदितः श्रीपूज्यपादेन वे ॥२॥ टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, कांत लौह भस्म, बंगभस्म, अभ्रक भस्म, मंडूर भस्म, शीशा भस्म, सफेद सुरमा, गेरू, शिलाजीत, कपूर, शिला, (मनशल), बबूल का बीज़ तथा पत्ती, कपास के बीज की गिरी, चित्रक, सेंधा नमक, इमली का बीज और इमली की छाल, बेल का सार, कवीट का सार, नीम का सार, कुरैया का सार, मछली, मेदा, महामेदा दोनों प्रकार के घुघुचियों का फूल, हल्दी, लाख, दालचीनी, त्रिफला ये सब बराबर लेकर योग्यमात्रा से छाँछ के साथ, मधु के साथ तथा पथ्य में रबड़ी मलाई, चावल खावे अथवा तैल से तथा छाँछ से भोजन करे तो यह रस बीस प्रकार के प्रमेह को नाश करता है।
११३-प्रमेहे मेहबद्धरसः भस्मसूतं भृतं कांतं मुंडभस्म शिलाजतु । शुद्ध ताप्यं शिलान्योषं त्रिफला कोलवीजकम् ॥१॥ कपित्थरजनीचूर्ण समं भाव्यं च भृङ्गिणा । विषमेनहिभागेन सघृतं समधुलिहेत् ॥२॥ निष्कमात्रं हरेन्मेहान् मेहबद्धरसो महान् । महानिंबस्य बीजानि शिलायां पेषितानि च ॥३॥ . पलतंडुलतोयेन . घृतनिष्कद्वयेन च।
एकीकृत्य पिबेच्चानु हंति मेहं चिरन्तनम् ॥४॥ टीका-पारे की भस्म, कांतलौह भस्म, मंडूरभस्म, शिलाजीत, शुद्ध सोनामक्खी, शुद्ध शिला, त्रिकटु, त्रिफला, बेर की गुठली, कवीट (कैथा), हल्दी ये सब बराबर लेकर भंगरा के रस से गोली बनावे और बलाबल के अनुसार घी तथा शहद विषमभाग से मिला कर उसके साथ देवे तो सब प्रकार के प्रमेहों को दूर करे। इसका बकायन के बीजों को ४ तोला चांवल के पानी में पीसकर तथा उसी में ६ मासे घी मिलाकर ऊपर से पिलावे तो प्रमेह की शांति होवे ।
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वैद्य-सार
११४-वाजीकरणादि प्रयोगे मदनकामरसः .. सूतं गंधकतालक मणिशिला ताप्यं तथा रौप्यक
आरं वंगभुजंगहेमदरद शुल्वं च लौहत्रयम् बनवदुममौक्तिक मरकतं भस्म निरुत्थम् समम् सर्व भस्मकृतं पृथक्क्रममतं वृद्ध च तत्संमितम् ॥१॥ खल्वमध्ये विनिक्षिप्य चार्कक्षीरेण मर्दितः। कुमारीपत्ननिर्यासैः मर्दयेहिवसत्रयम् ॥२॥ वज्रमूषां द्वढा कृत्वा तस्यां कल्कं विनिक्षिपेत् । मृद्वग्निना पचेत् सम्यक् स्वांगशीतलमुद्धरेत् ॥३॥ मर्दयेत् मुसलीस्वरसैः छायायां च विशोषयेत् । दातव्यः कुक्कुटपुटे पंचविंशतिवारकम् ॥४॥ खल्वमध्ये विनिक्षिप्य शाल्मलिद्रावसंयुतः। शतावरीरसैश्चापि मुसलीचरसैस्तथा ॥५॥ कोकिलाक्षा मुद्रपर्णी गोतुरश्च पुनर्नवा।। प्रत्येकैषां रसेनैव मर्दयेत्तूर्यवासरं ॥६॥ निक्षिपेत् वज्रमूषायां पुटं मध्यन्तु दीयते। मर्दितस्य पुनवः पुटं सप्त यथाविधि ॥७॥ स्वांगश तलमुद्धृत्य चातसीपुष्पद्रावकैः। . कृष्णोन्मत्तरसेनैव विजयानागकेशरैः॥८॥ चातुर्जातस्य निर्यासैः प्रत्येकः मर्दितं तथा । शुष्कं कृत्वा समालोक्य पूरयेत् काचकूपिकाम् ॥६॥ यंत्रमध्ये विनिक्षिप्य चतुर्विशतियामकम् । धमेदग्निक्रमेणैव दीप्तमध्यसुवह्निना ॥१०॥ स्वांगशीतलमादाय चोद्धरेत् काचकूपिकाम्। स्थापयेच शिलाखल्वे भावनाकारयेबहु ॥११॥ इक्षुदाडिमखर्जूरमुसलीकनकगोक्षुराः । चातुर्जातं गवांक्षीरः शर्करा मधुजीरकाः ॥१२॥ नीलोत्पलं च वकुचीनालिकेरैश्च भावना । . अपामागश्च विजया गुडूची त्रिफला तथा ॥१३॥
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वैध-सार
श्वेतवानरिवीजञ्च कौमारीकेतकीपयः। रंभापक्वफलं चैव मोक्षमतश्च पिप्पली ॥१४॥ अश्वगंधा च कूष्मांड विल्वकोवीजपूरकः। प्रियालशुद्धवीजञ्च तीरवृत्तस्य पल्लवाः ॥१५॥ एषां निर्यासमुद्धृत्य प्रत्येकं पंचविंशतिम् । भावनाः कारयेद्यस्तु शाल्मलीशतभावनाः ॥१६॥ भावितः शोषितः सिद्धः मदनकाम इतिस्मृतः। एक गुंजो द्विगुंजो वा रसोऽयं सेवितः सदा ॥१७॥ अनुपानविशेषेण सर्वथा तु विवर्धनः।
बपुकान्तिकरः श्रेष्ठः पूज्यपादेन भाषितः॥१८॥ टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक इन दोनों की कजली बनावे फिर तकिया हरताल की भस्म, शुद्ध मैनशिल, शुद्ध सोनामक्खी, चांदी की भस्म, पीतल की भस्म, बंगभस्म, शीश की भस्म, सोने की भस्म, शुद्ध सिंगरफ, तामे की भस्म तीनों लौह (कांत, तीक्ष्ण, मुंड) की भस्म, हीरा की भस्म, प्रवाल भस्म, मोती की भस्म, मरकतमणि (पन्ना) की भस्म, इन सब की निरुत्थ भस्म, अलग करके तथा इनको एक से दूसरा क्रमशः बढ़ा कर लेवे (जैसे पारा एक भाग, गंधक २ भाग इत्यादि) इस प्रकार सबको एकत्रित कर खरल में मौवा के दूध से घोंटे पश्चात् घीकुमारी के स्वरस से तीन तीन दिन तक लगातार घोंटे। बाद सुखाकर बनमूषा को बना उसमें उसको रखे और मंद मंद अग्नि से पकावे, जब स्वांगा शीतल हो जाय तब निकाल कर मुसली के स्वरस में अथवा काढ़े में घोंटकर छाया में सुखावे और कुक्कुटपुट में पच्चीसबार फूके । प्रत्येक बार मुसली के स्वरस की भावना देता जाय, फिर खरल में डालकर सेमल की जड़ के स्वरस से भावना तथा शतावरी मूसली, ईख, तालमखाने, मुद्रपर्णी, गोखरू और पुनर्नवा इन आठों के स्वरस की चार चार दिन तक भावना देवे और सुखाता जावे, अन्त में बनमूषा में मध्यम पुट देवे। इस प्रकार यह एक पुट हुई। इसी तरह सात पुट देवे। स्वांग शीतल होने पर निकाल ले तथा अलसी के फूल, काले धतूरे, भांग, नागकेशर, तथा चातुर्जात (इलायची, दालचीनी, तेजपत्र, नागकेशर) के स्वरस की एक एक भावना दे सुखाकर कांच की शीशी में कपड़मिट्टी करके उसको भरे एवं बालुकायंत्र में २४ प्रहर तक पाक करे | यह पाक क्रम से मृदु एवं मध्यम आंच से पकावे । जब पाक हो जाय और जब ठंडा हो जाय तब निकालकर पत्थर के खरल में डालकर ईख, अनार खजूर, मूसली, धतूरे, गोखरू और चातुर्जात के रस की, गाय के दूध की, शक्कर की, शहद की, जीरे, नीलोफर, बकची, नारियल, अपामार्ग, भांग, गुरबेल, त्रिफला,
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वैद्य-सार
कपिकच्छू, घीकुमारी केवड़े, केला के फल, मोखा (पाढल), बहेरे, असगंध, कुम्हड़ा, बेल, बिजौरा नींबू तथा चिरौंजी, इन सब के स्वरस से पच्चीस पच्चीस भावना देवे एवं सेमर के स्वरस की १०० एक सौ भावना दे। इस प्रकार भावना दे सुखाकर रख लिया जाय तो यह मदन काम नामका रस तैयार हो जाता है। इसको एक रत्ती, दो रत्ती के प्रमाण से विशेष अनुपान द्वारा सेवन किया जाय तो सब धातुओं की वृद्धि होती है। तथा शरीर की कांति को बढ़ानेवाला यह पूज्यपाद स्वामी का कहा हुभा है।
११५-अजीर्णादौ प्रभावती बटी हरिद्रा निंबपत्राणि पिप्पली मरिचानि च । भद्रमुस्ता विडंगानि सप्तमं विश्वभेषजम् ॥१॥ चित्रकं गंधक सूत विर्ष पाणहरीतकी। एतानि समभागानि चाजमूत्रेण पेषयेत् ॥२॥ चणप्रमाणवटिकां छायाशुष्कं तु कारयेत् । उष्णोदकेन पीतेन अजीर्ण नाशयेगृढम् ॥३॥ द्वयं विषूचिका हंति तथैवोष्णोन वारिण। पंच लूतानि विस्फोटकांजयत्यत्न निश्चितम् ॥४॥ वणादावन्यरोगे च पानलेपं च कारयेत् । पनिता स्तनदुग्धेन चांजने पटलापहा ॥५॥ राज्यधं तिमिरं कांचं अन्यदाकवारिण। गोमूत्रेण सहैषा हि तृतीयादिज्वरं जयेत् ॥६॥ गुडोदकेन संपीतो वातदोषं प्रशाम्यति । गुडोदकेन लेपेन क्षतजातं प्रशाम्यति ॥७॥ लेपनादेव नश्यति . शिरःशूलशिरोगदा। स्त्रीस्तन्येनांजनं कार्य नेननापविमुक्तये ॥६॥ मधुना पिच्छिल हंति ताम्रपत्रेण घर्षतः। . पुष्पं च पटलं हंति कदलीकंदधारिणा ॥६॥ नेत्रकाचं जयत्याशु कासमदरसान्विता । छागमूनान्विता लेपैः नेत्रभारं विनाशयेत् ॥१०॥ अर्कतीरान्वितो लेपो लूतादोषविनाशनः । गुटिकासेधनेनैव मूत्रकृष्ट विनाशयेत् ॥११॥..
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७८
वैद्य-सार
महारक्तप्रवाहे च गंधकेन समं पिबेत् । तक्रण सहितं पीत्वा चातिसारं निकृन्तति ॥१२॥ अर्कदुग्धसमैः लेपो वृश्चिकाणां विषंहरेत् । गुटिका केवला च स्यात् नित्यज्वरप्रणाशिनी ॥१३॥ नारिकेलोदकैः लेपात् पुरुषव्याधिनाशिनी | ऊषणैः मधुपुष्पैस्तु संनिपातांस्त्रयोदशान् ॥१४॥ मासमेकं प्रयोगेण सर्वव्याधिहरा परा।
वटी प्रभावतीनाम्ना पूज्यपादेन भाषिता ॥१५॥ टीका-हल्दी, नीम की पत्ती, छोटी पीपल, काली मिर्च, नागरमोथा, वायविडंग, सोंठ, चित्रक, शुद्ध गंधक, शुद्ध पारा, शुद्ध विषनाग, सोनापाठा, बड़ी हर का बकला इन सबको बराबर बराबर लेकर बकरी के मूत्र से घोंट कर चना के बराबर गोली बना छाया में सुखावे | इस गोली को गर्म जल से सेवन करे तो तीव्र अजीर्ण को नाश करती, दो दो गोली गर्म जल से सेवन करे तो विषूचिका की शांति, पाँच पाँच गोली सेवन करे तो मकड़ी का का हुआ विष शांत होता है। विस्फोटक तथा व्रण इत्यादि में इसके लेप करने से अथवा इसको खिलाने से लाभ होता है। स्त्री-दुग्ध के साथ आँख में अञ्जन करने से नेत्र के पटलरोग की शांति होती है। अदरख के रस के साथ अञ्जन करने से रतौंधी, नेत्रांधता इत्यादि शांत होती है। गोमूत्र के साथ सेवन करने के तिजारी इत्यादि विषमज्वर नष्ट होता है। गुड़ के पानी के साथ सेवन करने से बातदोष दूर होता है । तत से उत्पन्न हुआ व्रण भी शांत होता है। इसको शिर में लेप करने से शिर का शूल जाता रहता है। स्त्री के दूध के साथ अञ्जन करने से आँखों का स्राव ठीक होता है। शहद के साथ तामे के पत्र पर घिसने से नेत्र का पिच्छिल दोष शांत होता है, केला के कन्द के पानी के साथ घिस कर लगाने से नेत्र की फुली, माड़ा जाला सब शांत हो जाता है । कंसोदन के रस के साथ आँख में लगाने से आँख का कांच दोष शांत होता है। बकरी के मूत्र के साथ लेप करने से नेत्र की सूजन शांत होती है। अकौवा के दूध के साथ लेप करने से मकड़ी का काटा हुआ विष शांत हो जाता है। इस गोली को अनुपान विशेष के साथ सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र (सुजाक) शांत होता हैं। शुद्ध गंधक के साथ सेवन करने से रक्त का कैसा ही प्रवाह हो बन्द हो जाता है । छाँछ के साथ पीने से अतीसार दूर होता है। भकौवा के दूध के साथ लेप करने से बिच्छू का काटा हुआ विष शांत हो जाता है। इसकी एक-एक गोली अनुपान के बिना सेवन करने से भी ज्वर निर्मूल हो जाता है। इस गोली को नारियल के पानी के साथ इन्द्रिय पर लेप करने से नपुंसकता दूर होती है।
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वैद्य-सार
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इसका काली मिर्च तथा महुए के फूल के साथ सेवन करने से तेरह प्रकार का सत्रिपात दूर हो जाता है। इस गोली को एक मास तक लगातार सेवन करने से सब प्रकार की व्याधि शांत हो जाती है। यह श्रीपूज्यपाद स्वामी की कही हुई प्रभावती बटी है।
११६-ज्वरादौ लघुज्वरां-कुशः रसगंधकताम्राणां प्रत्येकं चैकभागकम् । खल्वे सूर्याग्निभागांशं हयारि धूर्तवीजयोः ॥१॥ मातुलुंगरसेनैव मर्दयेद्वासर-त्रयम् । कासमर्दकतोयेन सिद्धोऽयं जायते रसः॥२॥ निंबमजाकरसैः बल्लो देयः त्रिदोषजित् । वरे दयोदनं पथ्यं शाकः स्याप्तण्डुलीयकः ॥३॥ सर्वज्वरविषघ्नोऽयं चानुपानविशेषतः।
लघुज्वरांकुशो नाम पूज्यपादेन भाषितः॥४॥ टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक; तामे की भस्म, ये तीनों एक एक भाग, शुद्ध कनेर की जड़ १२ भाग एवं शुद्ध धतूरे के बीज ३ भाग इन सब को एकत्रित कर विजोरा नीबू और कसोंदन के रस में/३ दिन तक मर्दन कर एक एक रत्ती की गोली बांध लेवे, फिर नीम को निबोड़ी की गिरी तथा अदरख के साथ तीन गोली देवे तो विदोषज ज्वर भी शान्त होवे । इस रस के ऊपर दही भात का भोजन करना तथा चौलाई का शाक खाना चाहिये। यह लघु ज्वरांकुश अनुपान-भेद से सब ज्वरों को नाश करनेवाला श्रीपूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
११७-अनेकरोगे त्रिलोक-चूड़ामणि-रसः
पारदं टंकणं तुत्थं विषं लांगलिकं तथा । पुत्रजीवस्य मजा च गंधकं गुंजपत्रकम् ॥१॥ देवदाल्या रसैमद्यः त्रिपादीरसमर्दितः। विष्णुकांतानागदंतीधतूरनागकेशरैः ॥२॥ मर्दनं दिनमेकं तु वटबीजप्रमाणकम् । अंबीररसतो लेयं पानलेपननस्यके ॥२॥
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2.
वैद्य-सार
अंजनं सर्वकार्ये वा ज्वरज्वालाशताकुले । ब्रह्मराक्षसभूतादिशाकिनीडाकिनीगण-॥४॥ कालवजमहादेवीमदमातंगकेशरिवृषभादि सुसंस्थाप्य श्रीदेवीश्वरसूरिणम्॥५॥ पूजनं चाशु कृत्वा च यथायोग्यं प्रकल्पयेत् । . कथितोऽयं त्रिलोकस्य चूड़ामणिमहारसः॥६॥ पार्श्वनाथस्य मंत्रेण स्तंभोभवति तत्क्षणम् ।
पूज्यपादेन कथितः सर्वमृत्युविनाशनः ॥७॥ टीका-शुद्ध पारा, सुहागे की भस्म, तूतिया की भस्म, शुद्ध विष, लांगली (कलिहारी) की जड़, जियापोता की रींगी, शुद्ध आँवलासार गंधक तथा गुंजावृक्ष के पत्ते इन सब को बराबर-बराबर लेकर पहले पारे, गंधक की कजली बनाये ; पीछे और सब दवाइयाँ अलग अलग कूट-कपड़-छन करके मिलावे तथा देवदाली, हंसराज, हुलहुल नागदौन, धतूरा, नागकेशर इन सबके स्वरस से अथवा क्वाथ से एक-एक दिन अलग घोटे और बट के बोज-समान गोली बनाकर जंभीरी के रस के साथ सेवन करावे। मूविस्था में नास भी देवे, आवश्यकता आने पर या सन्निपात की दशा में अञ्जन भी लगाके । इसका सेवन करने से कठिन से कठिन ज्वर भी शांत होता है। इसका जब सेवन करे तब ब्रह्मराक्षस, डाकिनी, .शाकिनी इत्यादि व्यन्तर-रूपो मातंग के लिये सिंह सदृश श्रीजिनेन्द्र देव की स्थापना करके पूजन करे तो शीघ्र ही लाभ होता है और श्रीपार्श्वनाथ स्वामी के मंत्र से तो उसी क्षण रोग का स्तम्भन होता है। यह तीन लोक का शिरोमणि त्रिलोक चूडामणि रस पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ अपमृत्यु का नाश करनेवाला है।
११८-सर्वज्वरे ज्वरांकुशरसः पारदं गंधकं ताप्यं टंकणं कटुकत्रयम् । चित्रकं निंबबीजानि यवक्षारं च तालम् ॥१॥ एरंडवीजसिंधूत्थं हारीतक्यं समांशकम् । शुद्धस्य वत्सनाभस्य पंचभागं च निक्षिपेत् ॥२॥ जैपालं द्विगुणां चैव निर्गुण्ड्याः मदयेद्धैः ।। पशव्रीहिसमो देयः सर्वज्वरगजांकुशः ॥३॥ पृथिव्या चाजमोदेन पिष्टश्च सहितं जलैः । ज्वरानिष्वपि रोगेषु सर्वेषु हितकद्भवेत् ॥४॥
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वैद्य - सार
अनुपानविशेषेण सर्वरोगेषु योजयेत् । पथ्या शुंठी गुंड चानु चार्शरोगे प्रयोजयेत् ॥ ७ ॥ क्षीरान्नमाज्यं भुंजीत शिशु तोयेन पाययेत् । आर्द्रस्य रसेनापि यथादोषविशेषिते ||६|| शीतज्वरे सन्निपाते तुलसीरससंयुतः । मरिचेन सहितश्वासौ सर्वज्वरविषापहः ॥७॥
टीका - शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, सोने की भस्म, सुहागा, सोंठ-मिर्च, पीपल, चित्रक, नीम के बीज, जवाखार, तबकिया हरताल की भस्म, अण्डी के बीज, सेंधा नमक, बड़ी हर्र का छिलका ये सब बराबर बराबर लेवे और शुद्ध वच्छनाग, पाँच भाग, शुद्ध जमालगोटा २ भाग, इन सब को एकत्रित कर के नेगड़ के स्वरस में घोटे एवं दसइस चावल के बराबर बड़ी इलायची तथा अजमोदा के पानी के साथ देवे तो सब प्रकार शांत होवे | यदि बवासीर रोग में देना हो तो हर्र, सोंठ, गुड़ का अनुपान देवे और दूध-भात का भोजन करावे । के साथ, सन्निपात में तुलसी के देवे | यह रस सर्व ज्वरों को नाश करता है ।
I
शीतज्वर में मुनका के काढ़े रस के साथ एवं
से तथा अदरख के रस वषमज्वर में काल मिर्च के साथ
११६ - प्रमेहे बंगेश्वररसः
सूतं च बंगभर च नाकुलीबीजमभ्रकम् | शिलाजतु लौहभस्म कनकं कतकवीजकम् ॥१॥ गुडूचीत्रिफलाक्वाथैः मर्दयेद्गुटिकां दिनं । बंगेश्वररसो नाम चानुपानं प्रकल्पयेत् ॥२॥ कपित्थफलद्रात्ता च खर्जूरीयष्टिकेन च । नष्टेन्द्रियं च दाहं पित्तज्वरपथश्रमम् ॥३॥ मेहानां मज्जदोषाणां नाशको नात्र संशयः । सर्वप्रमेहविध्वंसी पूज्यपादेन भाषितः ॥५॥
टोका - शुद्ध पारे की भस्म, बंगभस्म, रासना के बीज, अभ्रक भस्म, शुद्ध शिलाजीत, लौह भस्म, सोने की भस्म, कतक के बीज, निर्मली इन सब का एकत्रित कर के गुर्च तथा त्रिफला के काढ़े से दिन भर मर्दन करे तो यह बंगेश्वर रस तैयार हो जाता है । इसको सेवन कराने के लिये वैद्यगण अनुपान की कल्पना करें अथवा कवीर, मुनक्का, खजूर,
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वैद्य-सार
मुलहठी इन सब के अनुपान से उसको सेवन करावे । इसके सेवन कराने से इन्द्रिय की कमजोरी, दाह, पित्तज्वर, मार्ग में चलने की थकावट, सर्व प्रकार के प्रमेह, मजा, धातु के दोष इन सब को नाश करनेवाला है, इसमें कुछ संदेह नहीं है। यह सब प्रकार के प्रमेहों को दूर करनेवाला श्रीपूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
१२०-सर्वज्वरे मृत्युञ्जयरसः रसगंधकौहि जयपालः तालकश्च मनःशिला । ताम्रश्च माक्षिकः शुंठीमुसलीरसमर्दितः ॥१॥ कुक्कुटे च पुटे सम्यक् पक्तव्यः मृदुवह्निना । स्वांगशीतलमुद्धृत्य गुंजामात्रप्रमाणकम् ॥२॥ शुद्धशर्करया खादेत् शीततोयानुपानतः। पथ्ये क्षीरं प्रयोक्तव्यं दधि वापि यथारुचि ॥३॥ संततादिज्वरनोऽयमनुपानविशेषतः।
मृत्युञ्जयरसश्चासो पूज्यपादेन भाषितः ॥४॥ टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, शुद्ध जमालगोटा, हरताल भस्म, शुद्ध मेनशिल, तामे की भस्म, शुद्ध सोनामक्खी , सोंठ इन सब को मुसली के रस से मर्दन करे तथा कुक्कुट पुट में पाक करे और ठंडा होने पर निकाल कर एक-एक रस्ती के प्रमाण से मिसरी की चासनीके साथ शीतल जलके अनुपान से सेवन कराधे। पथ्य में दूध देवे तथा रोगी को अरुचि होवे तो दधि भी खिलावे (१)।यह संततादि ज्वरों को नाश करनेवाला मृत्युञ्जय रस पूज्यपाद स्वामीने कहा है।
मतान्तर ताप्यतालकनेपाल-वत्सनामं मनःशिला। ताम्रगन्धकसूताश्च मुसलीरसमर्दिताः॥ मृत्युखय इति ख्यातः कुकुटीपुटपाचितः । वल्लद्वयम् प्रमुंजीत यथेष्टं दधि भोजनम् ।।
नवज्वरं सन्निपातं हन्यादेष महारसः॥ १९ तरहका मृत्युखय रस है यह १४ के पाठ से मिलता है। एक चीज का फर्क है, इस में सोंठ है उसमें सिंगिया लिखा है। इस ग्रन्थ के रस रसरत्न-समुच्चय, रससुधाकर, रसपारिजात से अधिक मिलते हैं। रसरत्नसमुच्चय बौद्धों का बनाया हुआ ग्रन्थ प्रसिद्ध है; मुमकिन है यह उसी समयका हो।
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वैद्य-सार
८३
१२१-शीतज्वरे शीतभंजरसः पारदं रसकं तालं शिला तुत्थं च टंकणम् । गन्धकं च समं पिष्टवा कारवेल्ल्या रसैदिनम् ॥ १॥ शिव मूलरसैः पिष्ट्वा निर्गुण्डी स्वरसेन च। ताम्रपत्रे प्रलिप्वा च भाण्डे पत्नमधोमुखम् ॥२॥ कृत्वा रुद्ध्वा मुखं तस्य वालुकाभिः प्रपूरयेत् । पश्चादग्निना तुल्या ताम्रपत्नस्य रक्तता ॥३॥ एवं पुटत्रयं दद्यात् स्वांगशीतलमुद्धरेत् । ताम्रपत्रं समुद्धृत्य चूर्णयेन्मरिचं समम् ॥ ४॥ शीतभंजरसो नाम पर्णखंडरसेन च ।
शीतज्वरविषघ्नोऽयं पूज्यपादेन भाषितः ॥ ५॥ टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध खपरिया की भस्म, हरताल की भस्म, शुद्ध शिला, शुद्ध तूतिया को भस्म, टंकण भस्म, शुद्ध गन्धक इन सबको बराबर-बराबर लेकर खरल में एकत्रित करके करेले के पत्तों के रस से एक दिन भर घोंटे तथा एक दिन 'मुनगा के स्वरस से घोंटे, एक दिन नेगड़ के रस से घोंटे और शुद्ध पतले तामे के पत्रों पर लेप करके एक डी में रख कर नीचे को मुख करके उसका मुख बन्द करके बाकी की जगह बालू से पूर्ण कर नीचे से अग्नि जलावे, जब वह तामे का पत्र लाल वर्ण हो जाय तब निकाल लेवे। इस प्रकार तीन पुट देवे, जब ठीक पाक हो जाय तामे के पत्रों को निकाल कर सब चूर्ण बना कर रख लेवे और काली मिर्च बराबर मिला कर पान के रस के साथ यथा योग्य मात्रा से यह शीतज्वर रूपी विष को नाश करनेवाला शीतभंज रस पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
१२२-श्वासादौ अमृतसंजीवनो रसः
सूतश्च गन्धको लौहो विषश्चित्रकपनको । विडंग रेणुका मुस्ता चैला प्रन्थिककेशरौ । त्रिकटुत्रिफला चैव शुल्वभस्म तथैव च ॥ पतानि समभागानि द्विगुणं गुड़मेव च । तोलप्रमाणवटिकाः प्रातःकाले च भक्षयेत् ।। श्वासे कासे क्षये मेहे शूलपांडुगुदांकुरे ।
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८४
वैद्य-सार
चतुरशीतिवातेषु योजयेन्नान संशयः॥
अमृतसंजीवनो नाम पूज्यपादेन भाषितः॥४॥ टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लौह भस्म, शुद्ध घिष, चित्रक, तेजपत्र, पायविडंग, रेणुका बीज, नागर मोथा, छोटी इलायची, पीपरामूल, नागकेशर, सोंठ, मिर्च, पीपल, त्रिफला, तामे की भस्म, इन सबका बराबर-बराबर लेकर सबके दुगुना पुराना गुड़ लेकर गोली बनावे तथा प्रातःकाल में अनुपान-विशेष से सेवन करे तो श्वास, खांसी, राजयक्ष्मा, प्रमेह, शूलोदर, पांडु रोग, बवासीर तथा ८४ प्रकार के वायु रोग शांत होते हैं । यह अमृतसंजीचन रस भी पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
१२३-विबंधे नाराचरसः अष्टौ निस्तुषदंतिवीजशुद्ध भागत्रयं नागर । द्वे गंधे मरिचं च टंकणरसौ भागैकमेकं पृथक् ॥ गुआमात्रमिदं विरेचनकर देयं च शीतांबुना ।
गुल्मप्लीहमहोदरादिशमनो नाराचनामा रसः॥१॥ टीका-आठ भाग शुद्ध जामालगोटाके वीज तीन भाग सोंठ, दो भाग शुद्ध गन्धक, काली मिर्च, सुहागा, शुद्ध पारा एक-एक भाग खरल में डाल कर खूब घोंटे तथा एक-एक रत्ती की मात्रा से शीतल जलके अनुपान से सेवन करावे तो इस से गुल्म, प्लीहा और उदररोग शांत होता है।
१२४-शीतज्वरे शीतमातंगसिंहरसः रसविषशिखि तुत्थं खर्परं चैकभागम् । अनलद्विकसमानभागमेतत्क्रमेण ॥ कनकदलरसेन पीतगुंजैकमात्रः ।
परिमितगुटिकः स्यात् शीतमातंगसिंहः ॥ १ ॥ टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध विषनाग तूतिया की भस्म, खपरिया भस्म एक-एक भाग, चित्रक दो भाग इन सब को एकत्रित करके धतूरेके रस से .घोंटै तथा एक-एक रप्ती प्रमाण सेवन करे तो इससे शीतज्वर दूर होवे।
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वैद्य - सार
१२५ - ज्वरादौ प्राणेश्वररसः भस्म सूतं यदा कृत्वा मात्तिकं चाभ्रसत्त्वकम् । शुल्वभस्मापि संयोज्य भागसंख्याक्रमेण च || तालमूलीरसं दत्त्वा शुद्धगंधकमिश्रितम् ! मर्दयेत् खल्वमध्ये च नितरां यामयोद्वयम् ॥ निक्षिप्य काचकूप्यां च मुद्रया कूपिकां तथा । खटिकामृदं समादाय लेपयेत् सप्तवारकम् ॥ विपरीतं परिस्थाप्य पूरयेत् बालुकामयम् | यंत्र' प्रज्वालयेद्यामं चतुरो वह्निना पुनः ॥ सिध्यते रसराजेन्द्रो बलिपूजाभिरर्चयेत् । अनुपानं तदा देयं मरिचं नागरं तथा ॥ त्रिचारं पंचलवणं राम ं चित्रमूलकम् । अजमोद जीरकं चैव शतपुष्पाचतुष्टयम् ॥ चूर्णयित्वा तथा सर्व भक्षयेच्चानुवासरं । रसराजेन्द्रनामायं विख्यातो प्राणिशांतिकृत् ॥ अयं प्राणेश्वरो नाम प्राणिनां शांतिकारकः । प्राणनिर्गमकालेऽपि रक्षकः प्राणिनां तथा । भक्षयेत् पखण्डेन कटूष्णेनापि वारिणा ॥ ज्वरे त्रिदोषजे घोरे सन्निपाते च दारुगो ! प्लीहायों गुल्मवाते च शूले च परिणामजे ॥ मन्दाग्नौ ग्रहणीरोगे ज्वरे चैवातिसारके अयं प्राणोश्वरो नाम भवेन्मृत्युविवर्जितः । सर्वरोगविषघ्नोऽयं पूज्यपादेन भाषितः ॥
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忍
टोका - पारे की भस्म १ भाग, सोना मक्खी की भस्म २ भाग, अभ्रक की भस्म ३ भाग, तामे की भस्म ४ भाग, ये सब लेकर मुसली के स्वरस में घोंटे तथा उसमें १ भाग शुद्ध गन्धक मिलावे, खलमें ६ घण्टे तक बराबर घोंटे, सुखा कर कांच की शीशी में रख कर मुद्रा देकर बन्द करे । उसके ऊपर खड़िया मिट्टी से सात कपड़मिट्टी करे और सुखाव, फिर सुखा कर उसके चारों तरफ बालुका से पूरण करे, १२ घण्टे बराबर आंच जलावे, तब रसों में राजा यह प्रागोश्वर रस सिद्ध हो जाता है। अब सिद्ध हो जाय तब देवतापूजा वगैरह धार्मिक क्रिया करे। इस औषधि के सेवन करनेके बाद नीचे लिखा- चूर्णा अनुपानरूप सेवन करें।
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देई
वैद्य-सार
अनुपान
काली मिर्च, सोंठ, सज्जीखार, जवाखार, सुहागा, पांचो नमक, हींग, चित्रक, अजमोदा, जीरा सफेद एक-एक भाग तथा सौंफ ४ भाग 'सब को चूर्ण करके प्रतिदिन सेवन करे । इस रस का दूसरा नाम रस राजेन्द्र है । यह प्राणियों को शांति करनेवाला प्रसिद्ध है । वास्तव में इस का दूसरा नाम प्राणेश्वर रस है । प्राणों के निकलने के समय भी यह प्राणों का रक्षक है। इसको पानके रसके साथ गर्म जल तो यह त्रिदोषज ज्वर, कठिन से कठिन सन्निपात, प्लीहा, गुल्म रोग, बात रोग, परिणाम-जन्य शूल, मन्दाग्नि, ग्रहणी और ज्वरातिसार में लाभदायक है । रोगरूपी विष का नाश करनेवाला और मृत्यु को जीतनेवाला यह प्राणोश्वररस पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ है
के साथ सेवन करे
१२६ - जलोदरे शूलगजांकुशरसः निष्कवयं शुद्धसूतं द्विनिष्कं शुद्धटंकणम् | गंधक पंचभागं च चैकनिष्कश्च तिन्दुकः ॥ १ ॥ चतुर्निष्कश्च जैपालः तस्य द्विगुणताम्रकम् | सर्वतुल्य - तिलक्षारः वृत्ताम्लं क्षारमेव च ॥ २ ॥ तद्वत्पलाशभस्मं च षरिणष्कं सैंधवोषणम् | यवतारविड्लवणानि वर्चलसामुद्रके तथा ॥ ३ ॥ पिप्पलीतयनिष्कं वै चार्कदुग्धेन मर्दयेत् । निष्कमात्रप्रयोगेण जलोदरहरश्च सः
॥४॥
शूलगजांकुशरसः पूज्यपादेन भाषितः ।
टीका- - माशा शुद्ध पारा, ६ माशा शुद्ध सुहागा, १ तोला शुद्धगन्धक, ३ माशा शुद्ध कुचला, १ तोला शुद्ध जमालगोटा, २ तोला तामे की भस्म, ५॥॥ तोला तिली का क्षार, ५|| तोला तिन्तड़ीक का क्षार, ५ तोला पलास का क्षार, १॥ तोला संधा नमक, १॥ तोला काली मिर्च, १॥ तोला जवाखार, १॥ तोला विड नमक, १॥ तोला काला नमक, १॥ तोला समुद्र नमक, ६ मासा पीपल इन सब को कूट कपड़छन करके अकौवा के दूध में घोंट कर - तीन-तीन रती के प्रमाण से गोली बनाकर अनुपानविशेष से देवे तो जलोदर दूर होवे । यह शूलगजांकुश रस पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ है ।
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वैद्य-सार
१२७ -ज्वरादौ कलाधररसः सुरसं गंधर्क चाभ्र काशीसं शीसमेव च। बंग शिलाजतु यष्टि चैला लामजकं समम् ॥१॥ नालिकेरैश्च कूष्माण्डैः रंभाजेचरसेन च । पंचवल्कलस्वरसेन (?) द्वात्रिंशद्भावना तथा ॥२॥ नालिकेररसेनैव दद्याद्वल्लं सशर्करं। पथ्ये संसिद्धलाजं हि शमयेत्तृटगदान ज्वरान् ॥३॥ रक्तपित्ताम्लपित्तं च सोमं पाण्डं च कामलां ।
पूज्यपादेन कथितः रसः चन्द्रकलाधरः ॥४॥ · टोका-शुद्ध पारद, शुद्ध गंधक, अभ्रक भस्म, शुद्ध कसीस, नागभस्म, बंगभस्म, शुद्ध शिलाजीत, मुलहठी, छोरी इलायची, मंजीठ (एक सुगंधित तृण) ये सब बराबर लेकर नारियल के दूध से, कूष्मांड के स्वरस से, केला के कद के स्वरस से, ईख के स्वरस से तथा पंच वल्कल (पीपल, बर, ऊमर, पाकर, कठऊपर) के काढ़े से अलग अलग बत्तीसबत्तीस भावना देवे और सुखाकर गोली बांधे। इस गोली को नारियल के दूध के साथ तीन-तीन रत्ती की मात्रा से मिश्री के साथ देवे तथा सिद्ध की गयी (पकायी हुई) लाई को पथ्य में देवे। इसके सेवन करने से तृषा एवं तृषा से उत्पन्न होनेवाले ज्वरों को लाभ होता है तथा रक्तपित्त, अम्लपित्त, सोमरोग (सफेद प्रदर) पांडु, कामला इन रोगों को भी लाभ होता है। यह रस श्रीपूज्यपाद स्वामी ने कहा है। .
१२८-मन्दाग्नी उदयमार्तण्डरसः जयपालं विषटंकणं च दरदं त्रैलोक्यनेत्रांबुधि। मर्यश्चार्द्र रसैद्विगुंजवटिका कार्या चतुर्बुद्धिभिः ॥१॥ मंदाग्निं विगुणानिलं च गुल्मं श्वासं च कासं क्षयं ।
प्रोक्तः शूलविनाशकश्च मुनिना मार्तण्डनामा रसः॥२॥ टीका शुद्ध जमालगोटा ३ भाग, शुद्ध विषनाग २ भाग, टंकणक्षार २ भाग, शुद्ध सिंगरफ ४ भाग इन सबको एकत्रित करके अदरख के रस के साथ मर्दन करे तथा दो-दो रत्ती की गोली बनावे और इसको बुद्धिमान् अनुपान-विशेष से बलाबल के अनुसार देवे तो इससे मंदाग्नि, वायु की विगुणता तथा गुल्म, श्वास, कास, क्षय, शूल इन सब का नाश होता है, यह पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
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८६
वैद्य-सार
१२६-ग्रहण्यादौ कनकसुन्दररसः हिंगुलं मरिचं गंधं पिप्पली टंकणं विषं । कनकस्य च वीजानि समाशं विजयाद्रवैः ॥१॥ मद्य येद्याममात्रं तु चणमात्रा वटी कृता । भक्षयेद्गुंजयुग्मं तु ग्रहणीनाशने परः ॥२॥ अग्निमांद्य ज्वरं शीघ्रमतीसारविनाशनः।
कनकसुन्दरसश्चासौ पूज्यपादेन भाषितः ॥३॥ टीका-शुद्ध सिंगरफ, काली मिर्च, शुद्ध गंधक, पीपल, सुहागे की भस्म, शुद्ध विषनाग, शुद्ध धतूरे के बीज ये सब बराबर-बराबर लेकर भांग के स्वरस से चार पहर तक मर्दन करे और चना के बराबर गोली बांधे। दो-दो रत्ती अनुपान-विशेष से सेवन करे तो ग्रहणी को लाभ होता है तथा मंदाग्नि, ज्वर, अतीसार को भी लाभ हो। कनकसुन्दर रस पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
१३०-मन्दाग्न्यादौ अमृतगुटिका त्रिकटु सूतगंधं च ग्रन्थिकं चव्यचित्रकं । अमृतं लवणं चैव भृङ्गस्य रस-मर्दिता ॥१॥ एषा चामृतगुटिका च कृतवह्निविवर्धना । अमृता गुटिका नाम विंशतिश्लेष्तरोगजित् ॥२॥ अशीतिवातजान् रोगान् नाशयेन्नात्र संशयः।
विधं नाशयेच्छीघ्र पूज्यपादेन भाषिता ॥३॥ टीका-तोंठ, मिर्च, पीपल, शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, पीपरामूल, चाव, चित्रक, शुद्ध विषनाग और संधानमक ये सब बराबर-बराबर भाग लेकर भंगरा के रस से घोंटे और गोली बांध लेवे। यह गोली अनुपान-विशेष से दी जावे तो बीस प्रकार के कफरोग शांत हो, तथा अग्नि को बढ़ानेवाली, अस्सी प्रकार के वातरोगों को नाश करनेवाली और विबंध को नाश करनेवाली यह अमृतगुटिका पूज्यपाद स्वामी ने कही है।
१३१-सर्वरोगे मरीचादिवटी मरिचं नागरं नाभित्रितयं तत्समं तथा । पिप्पली ताम्रभस्मानि प्रत्येकं सममानकम् ॥२॥
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वैद्य-सार
भृङ्गराजरसैमा वटिका माषमानका ।
ए हि क्षीरसंयुक्ता सर्वव्याधिविनाशिनी ॥२॥ टीका–काली मिर्च, सोंठ, कस्तूरी तथा पीपल, तामे की भस्म ये पांचों समान भाग लेकर भंगरा के रस से मर्दन करे और एक माशे की गोली बांध कर दूध के साथ रोग तथा रोगी के बलाबल के अनुसार देवे तो सर्व प्रकार की ज्याधि दूर हो।
१३२-विवन्धे विरेचनवटी रामवृक्षफलं सारं त्रिफला गुडमेव च। दंतितुत्थसमायुक्तं निष्कमात्रवटीकृतं ॥१॥ उष्णोदकं च ससितं वमने सौख्यमेव च ।
गुडक्षीरेण संयुक्तं वरेके च प्रशस्यते ॥२॥ टीका-अमलतास का गूदा, बड़ो हर्र का बकला, बहेरे का बकला, घला, पुराना गुड, शुद्ध जमालगोरा तथा तूतिया की भस्म ये सब बराबर-बराबर ले और गुड उतने परिमाण में दे कि जितने में गोली बंध जावे। इसकी तीन-तीन माशे की गोली बना कर एक-एक गोली मिश्री के साथ तथा गर्म पानी से सेवन करने से वमन सुखपूर्वक होता है। गर्म दूध एवं पुराने गुड के साथ सेवन करे तो उत्तम जुलाब हो।
टिप्पणी-यहाँ पर तुत्थ भस्म का पाठ आया है और वह भी सब के समान भाग ही है परंतु वह अधिक है। वद्यगण विचार कर उसकी मात्रा ग्रहण करें।
१३३-ज्वरादौ प्रतापमार्तण्डरसः विषटंकणजयपालं हिंगुलं क्रमवर्द्धितम् । तुलसीरस-संपिष्टं वटिकागुंजमात्रकाः ॥१॥ ज्वरादिनाशनश्चासौ विशेषैश्चानुपानकैः। ...
मार्तण्डप्रतापश्च पूज्यपादेन भाषितः ॥२॥ .. टीका-शुद्ध विषनाग, सुहागे की भस्म, शुद्ध जमालगोटा, शुद्ध सिंगरफ ये क्रम से एक भाग, दो भाग, तीन भाग, चार भाग लेकर खरल में घोंटकर तुलसी की पत्ती के रस से घोंट एक एक रत्ती के प्रमाण की गोली बनावे। यह अनुपान विशेष से ज्वर को नाश करवेवाला प्रताप मार्तण्डरस पूज्यपाद स्वामी ने कहा है। : ....
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वैद्य-सार
१३४-विषमज्वरे प्रभाकररसः कर्ष शुद्धरसस्यापि द्विमासे चाम्लविद्रुते । नितिपेन्मर्दयेत्खल्वे परिणष्कं शुद्धगंधकं ॥१॥ तुत्याकोलकुणीवीजं शिलातालं चतुश्चतुः । तत्सम मृतलौहस्य निष्कौ द्वौ टंकणस्य च ॥२॥ तत्समं कुटकीनीलवराटांजनशुद्धकम्।। निष्कत्रयं सितं योज्यं सर्व चोक्तकमेण वै ॥३॥ शुभे मुहूर्ते शुभदिने खल्बमध्ये विमर्दयेत् । चांगेर्यम्लेन यामनीन् जवीराम्लैः दिनद्वयम् ॥४॥ पुटं हस्तप्रमाणं तु वसुसंख्यं तुषाग्निना । जंबीरस्य द्रवैरेव पिष्ट्वा पिष्ट्वा पचेत् पुटे ॥५॥ ततो वनोत्पलैरेव देयं गजपुटं महत् । आदाय चूर्णश्लक्ष्णं तु चूर्णाशं शुद्धगंधकं ॥६॥ तदर्धमरिचं चूर्ण तदर्धं पिप्पलीरजः। तदर्ध नागरजं चूर्ण चैकीकृत्य त्रिगुंजकम् ॥७॥ लेहयेन्मातिकैः साधं नागवल्लीरसेन च । पथ्यं दुग्धं विजानीयादभुक्तिः विषमज्वरे ॥८॥ चन्द्रकान्तिसमो नाम्ना रसश्चन्द्रप्रभाकरः। क्षयव्याधिविनाशश्च सर्वज्वरकुलांतकः ॥६॥ एकमासप्रयोगेण देहश्चन्द्रप्रभाकरः।
कथित व्याधिविध्वंसो पूज्यपादेन निर्मितः ॥१०॥ टीका-शुद्ध पारा १ तोला लेकर उसको २ मास तक खटाई में मर्दन करे तत्पश्चात् २॥ तोला शुद्ध गंधक एक खरल में डालकर कजली बनावे, उसके बाद तूतिया की भस्म, अडोल के बीज, कुणी के बीज (तुनवृत्त), शुद्ध शिला, तवकिया हरताल की भस्म, लौह की भस्म एक-एक तोला तथा सुहागे की भस्म, कुटकी, नील की पत्ती, कौड़ी की भस्म, शुद्ध सरमा ये सब दवाएँ छः-छः माशे और नौ माशा मिश्री लेकर सब को एकत्रित करके शुभ दिन एवं शुभ मुहूर्त में खरल में डालकर चांगेरो के स्वरस से तीन प्रहर तक, जंबीरी नांबू के स्वरस से दो दिन तक घोटे एवं सुखाकर संपुट में बंद करके कपड़मिट्टी कर एक हाथ गहरे गड्डे में पुट लगावे। इस प्रकार आठ पुट दे। ये सब आठों पुट जंबीरी नींव के स्वरस से ही घोंट कर पुट तुष की अग्नि में देवे और अन्त में एक जङ्गली कण्डों
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वैद्य-सार
से बड़ी गजपुट देवे। स्वांग शीतल हो जाने पर चूर्ण कर के संब चूर्ण से आधा शुद्ध गंधक, गंधक से आधा काली मिर्च का चूर्ण तथा उससे प्राधा सोंठ का चूर्ण मिला सब को बराबर मिलाकर घोंटकर तीन-तीन रत्ती की मात्रा से शहद तथा पान के रस के साथ सेवन करे। इसके ऊपर दूध को पथ्यरूप में सेवन करे और यदि इसका विषमज्वर में देना हो तो दूध भी न देकर लंघन करावे। यह चन्द्रमा की कांति के समान चन्द्रप्रभाकर नाम का रस राजयक्ष्मा को नाश एवं सब ज्वरों को अन्त करनेवाला है। यह एक माह के प्रयोग से शरीर की कांति को चन्द्रमा की कांति के समान बनाने तथा अनेक व्याधियों को नाश करनेवाला पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
१३५-ज्वरादौ संजीवनीय रसः हिंगुलशुद्धनिभागकं सुरसकं भागद्वयं चोषणं.। भागैकं नवनीतकेन मर्यः निंबुकरसेनैव च ॥१॥ सिद्धोऽयं रसराज एष मधुना देयस्त्रिदोषज्वरे।
संतापज्वरदाहनाशनपरः संजीवनीयो रसः ॥२॥ टीका-शुद्ध सिंगरफ, तीन भाग, खपरिया की भस्म दो भाग तथा काली मिर्च १ भाग इन सब को कपड़छन करके नैनू (मक्खन) म घोटे । पश्चात् नींबू के रस में तबतक घोटे जब तक उसकी चिकनाई न मिट जाय। जब वह गोली बांधने योग्य हो जाय तो गोलो बांध लेवे। इस गोली को शहद के साथ सेवन करे तो इससे त्रिदोषजन्य, संताप जन्य ज्वर एवं दाह की भी शांति होती है।
. १३६-सर्वज्वरे विद्याधररसः रसगंधार्कही धात्री रोहतनिवृतावरा । व्योषाग्निहिंगुलं शुद्ध टंकणं च विनिक्षिपेत् ॥१॥ जयपालं शुद्धकं चापि मर्दयेद्वनिवारिणा | दंतिकाथेन मर्यः शोषयेत् सूर्यरश्मिभिः ॥२॥ वदरास्थिप्रमाणेन वटिका कारयेद्भिषक् । गुडेन सह वटिकैका नित्यं सर्वज्वरापहा ॥३॥ अनुपानविशेषेण प्रतिश्यायज्वरापहः। पूज्यपादेन मुनिना प्रोक्तो विद्याधरो रसः ॥४॥
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ह२
वैद्य-सार
टीका - शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, तामे की भस्म, लजनू के बीज, आँवले की उरगठी, . बहेडे की छाल, निशोध, हर्र, बहेरा, आँवला, सोंठ, काली मिर्च, पीपल, चित्रक, शुद्ध सिंगरफ सुहागे को भस्म और शुद्ध जमालगोटा ये सब बराबर-बराबर भाग लेकर थूहर के दूध से और दंती के काढ़े से एक-एक बार मर्दन करे और एक-एक दिन धूप में सुखावे । बेर बराबर बराबर गोली बना गुड के साथ एक-एक गोली प्रतिदिन खाये तो सर्व प्रकार का ज्वर शांत हो तथा विशेष अनुपान द्वारा खाये तो जुखाम का ज्वर भी शांत हो जाता है। यह विद्याधर रस पूज्यपाद स्वामी ने कहा है ।
१३७ - गुल्मादी अग्निकुमाररसः
जयपालशुभगंधरसाभ्रकाणां सवर्बलं तुला कंटुल यस्य | मूत्रेण च षोडशभागमाने संमद्यं सवं च दिनत्रयं च ॥ १ ॥ afai विधाय वदप्रमाणां सेव्या वटी चोष्ण जलानुपानात् । एषा प्रयुक्ता सहसा निहंति सुरेच्य चादौ मलजातमेव ॥२॥ गुल्मं पडुविबद्धशूलबद्धोदरादींश्च जलोदरादीन् ।
कुमारो मुनिना प्रयुक्तः प्रकाशितो दीप इवधिकारे ॥३॥
टीका - शुद्ध जमालगोटा, शुद्धगंधक, शुद्ध पारा, अभ्रकभस्म, काला नमक, सोंठ, मिच, पीपल इन सब को एकत्रित कर के सब दवाइयों से सोलह भाग गोमूत्र लेकर तीन दिन तक बराबर घोंटे और बेरी के बराबर गोली बनावे तथा गर्म जल से सेवन करे तो इससे पहिले संचित हुए मल को निकाल कर गुल्म रोग, यकृत् रोग, पांडुरोग, बिन्दतो, शूलरोग, बद्धोदर, जलोदर इत्यादि संपूर्ण पेट के रोग शांत होते हैं । यह अग्निकुमार रस पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ रोगरूपी अन्धकार को नाश करने के लिये दीपक के समान है ।
१३८ - सन्निपाते यमदंडरसः
बंगस्य सप्तभागः स्यात् सप्तभागरसस्तथा । एकीकृत्य रसो मद्य श्वार्धश्च खलु गंधकः ॥१॥ अर्धभागं तथा तौलं वत्सनाभश्च तत्समः । सर्वमैकीकृतं चूर्ण धूर्तद्रावेण मर्दयेत् ॥२॥
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वैद्य-सार
गुंजामात्रप्रमाणेन सन्निपाते च दारुणे | अनुपानप्रभेदेन प्रयोक्तव्यः सदैव सः ॥३॥ त्रयोदश सन्निपातान् नाशयत्याशु निश्चितम् ।
यमदण्डरसः ख्यातः पूज्यपादेन भाषितः ॥४॥ टीका-बंगभस्म सात भाग, शुद्ध पारा सात भाग, इन दोनों को खरल में डालकर मर्दन करे । पीछे उसमें ३॥ भाग शुद्ध गंधक मिलावे तथा आधा भाग तवकिया हरताल भस्म, प्राधा भाग शुद्ध विषनाग इन सब को एकत्रित घोंटकर कजली बना धतूरे के रस से मर्दन करके एक-एक रत्ती की गोली बनावे। अनुपान-भेद से उन कठिन से कठिन सन्निपात में भी सदैव प्रयोग करना चाहिये। यह यमदण्ड रस तेरह प्रकार के सन्निपातों को नाश करता है। यह पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ उत्तम योग है।
१३६-क्षयादौ बज्रेश्वररसः कर्षोंकणायोः सत्त्वञ्च पण्णिष्के हेमविद्वते । परिणष्कसूतं गंधं च ह्यष्टनिष्कं प्रवेशयेत् ॥१॥ प्रवालमुक्ताफलयोः चूर्ण हेमसमांशकम् । क्रमाद्वित्रिचतुनिष्कं मृतायः शीसबंगकान ॥२॥ चांगेर्यम्लेन यामैकं मर्दितं चूर्णितं पृथक् । निष्कद्वयनीलकटुकी व्योमायः कांततालकाः ॥३॥ अङ्कोलकं कुणीवीजतुत्थभस्मं पृथक् पृथक् । अष्टौ तु टंकणक्षारः वराटानां च विंशतिः ॥४॥ महाजंबीरनीरस्य प्रस्थद्वन्द्वन पेषयेत् । पिष्ट्वा रुद्धवा शरावे च भस्मीभूतं समाचरेत् ॥५॥ मधुना लोडितो लेह्यः तांबूलीस्वरसेन सः । वह्निदीप्तकरः शीघ्र धातून वर्धयतितराम् ॥६॥ अनुपानविशेषेण क्षयरोगधिनाशकः।
रसो वजेश्वरो नाम पूज्यपादेन भाषितः ॥७॥ टीका-१ तोला पीपल का सत ले १॥ तोला शुद्ध सोना पिघलाकर उसमें डाल देवे. और १॥ तोला शुद्ध पारा, २ तोला शुद्ध गंधक लेकर सब की कजली बनावे। पश्चात् १॥ तोला मोती घुटा हुआ, १॥ तोला प्रवाल घुटी हुई लेकर उसी में डाल दे और उसी में
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वैद्य-सार
आधा तोला लौह की भस्म, पौन तोला शीसे की भस्म, १ तोला बंग भस्म डाल सब को खरल में एकत्रित कर चांगेरी के रस से १ प्रहर तक घोंट कर सुखा लेवे और उसमें छ:-छ: माशे नील की पत्ती, कुटकी, अनक-भस्म, कांतलौह भस्म, तवकिया हरताल भस्म, अकरकरा, कुणी का बीज़, तूतिया की भस्म, २ तोला सुहागे की भस्म, ५ तोला कौड़ी की भस्म देकर उसी में मिलावे तथा जंबीरी नींबू के दो सेर रस में घोंट एवं सुखा संपुट में बंद करके सुखा कर भस्म करे। इस भस्म को योग्य मात्रा से शहद तथा पान के स्वरस के साथ सेवन करे तो अग्नि दीप्त हो, धातुओं की पुष्टि होवे और अनुपानविशेष के बल से क्षयरोग का नाश करनेवाला यह बज्रेश्वररस पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ श्रेष्ठ है।
१४०-द्राक्षादि काथः द्राक्षामधूकमधुकं कोद्रवश्वापि सारिवा । मुस्तामलकहीवेरपाकेशरपनकं ॥१॥ मृणालं चन्दनोशीरनीलोत्पलपरूषकः । द्राक्षादेः हिमसंयुक्तः जातीकुसुमेन वा ॥२॥ सहितो मधुसितालाजैर्जयत्यनिलपित्तजं । ज्वरं मदात्ययं छवि दाहमूर्छाश्रमभ्रमं ॥३॥ ऊर्ध्वाधोरक्तपित्तं च पांडुतां कामलामपि ।
सर्वश्रेष्ठहिमश्चायं पूज्यपादेन भाषितः ॥४॥ टीका-मुनक्का, महुवा, मुलहठी, कोद्रवधान्य, सारिवा, नागरमोथा, आंवला, सुगंधवाला, कमलकेशर, पद्माक्षचन्दन, उशीर, लालचन्दन, खस, नीलकमल, फालसा इन सब को बराबर-बराबर लेकर हिम (पांच प्रकार के काढ़े में से एक प्रकार का हिम काढ़ा में) बनावे
और वह काढ़ो शहद, मिश्री, लाई, चमेली के फूल इन सब के साथ सेवन करे तो बातपित्त से उत्पन्न हुआ ज्वर तथा मदात्यय नाम का रोग, वमन, दाह, मूर्छा, भ्रम उर्ध्वग रक्त-पित्त, अधोग रक्तपित्त, पांडुरोग, कामला इत्यादि शांत होते हैं। यह सर्वश्रेष्ठ योग पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ है।
इस काढ़े को पकावे नहीं बल्कि सब दवाइयाँ रात को भींगो देवे तथा सुबह मल एवं छान कर पीये।
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वैद्य-सार
१४१-अर्शनाशकयोगः देवदाल्याश्च बीजानि सैंधवं निंबबीजकम् । तक्रण पेषितं सर्व मर्शरोगनिकृन्तनम् ॥ देवदाल्याः कषायेण चार्मोघ्न शौचमाचरेत् ।
गुडस्य स्वरसेनैव शांतिमाप्नोति निश्चितम् ॥ टीका-देवदाली ( यह बहुत कड़वी होती है, इसमें फल लगते हैं और बोज होते हैं ) के बीज, सेंधा नमक तथा नीमके बीज इन सब को बराबर-बराबर लेकर मही के साथ पीस कर इनको सेवन करे तो अवश्य ही बादी बवासीर को लाभ हो तथा देवदार का काढ़ा बना कर उससे एवं गुड़ के स्वरस से भी शौच (आबदस्तलेवे ) करे तो लाभ हो।
१४२-ज्वरातीसारे आनंदभैरवरसः हिंगुलं वत्सनाभं च व्योषं टंकणं कां । मर्दयेच्चाकेणैव रसोऽह्यानंदभैरवः ॥१॥ गुंजैकं वा द्विगुंजं वा बलं ज्ञात्वा प्रयोजयेत् । मधुना लेहयेच्चानु कुटजस्य त्वचं तथा ॥२॥ तच्चूर्ण कर्षमात्रं तु त्रिदोषोत्थातिसारजित्।
पूज्यपादप्रयोगोऽयं रसश्वानंदभैरवः ॥३॥ टीका-शुद्ध सिंगरफ, शुद्ध वत्सनाभ सोंठ, मिर्च, पीपल, सुहागा इन सब को बराबर बराबर लेकर अदरख के रस के साथ गोली बांध लेधे और फिर इसको एक रत्ती अथवा दो रत्ती प्रमाण से रोगी का बलाबल देख कर देवे और उसके बाद कुरैया की छाल का चूर्ण १ तोला बलाबल के अनुसार कमी-बेशी मधु के साथ चटावे तो इससे विदोषजन्य अतीसार भी शांत होता है। यह आनंद भैरवरस पूज्यपाद का कहा हुआ है।
१४३-अर्शरोगे अर्शनाशक-लेपः पोरनालेन संपिष्य सबीजां कटुतुंबिका ।
सगुडां हंति लेपेन चार्शीसि मूलतो गुढं ॥१॥ टीका-बीज सहित कड़वी तुमरियाको कांजी (मही-छांछ) के साथ पीसकर उसकी लुगदी में पुराना गुड़ मिलाकर बवासीर के मस्सों पर लेप करने से मस्से जड़ से कट जाते हैं। ..
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हछ
वैद्य-सार
१४४ - ग्रहणी रोगे अर्कादियोगः अर्कवातार्कवह्नीनां प्रत्येकं षोडशं पलं । चतुष्पलं सुधाकांडं त्रिपलं लवणत्रयं ॥ १ ॥ वार्ताकोत्थद्रवैः पिष्ट्वा रुद्ध्वा सर्व पुटे पचेत् । वार्ताकोत्थद्रवैरेवं निष्कांशं गोलकं कृतम् ॥ २ ॥ भोजनांते सदा खादेत् ग्रहणीश्वासकासजित् । पदभुक्ते तज्ज्चरत्याशु नदीवेगप्रभाववत् ॥ ३ ॥
टीका – सूखे अकौना (आक) के पके पत्ते १६ पल (६४ तोला), सूखे बैंगन १६ पल, चित्रक १६ पल, थूहर के सूखे डंडे ४ पल, ४ तोला सेंधा नमक, ४ तोला काला नमक, ४ तोला समुद्र नमक, इन सब को एकत्रित कूट कर बैंगन के रस से भावना देकर सब को मिट्टी के शरावे में बंद कर के पुटपाक करे। जब पुटपाक हो जाय तब बैंगन के रस से ही इसकी तीन तीन माशे की गोली बाँधे और सदैव भोजन के बाद सेवन करे तो यह ग्रहणी, श्वांस, खाँसी को नदी के बेग की तरह शीघ्र नष्ट कर देती है ।
१४५ - सन्निपाते गंधकादियोगः गंधकार्द्रकरसं तुत्थं शिलाविषं तु हिंगुलं । मृतमान्त्रिककांताभ्रताम्रलौहाः समं समं ॥१॥ अम्लवेतस जंबीरचांगेर्या हि रसेन च । निर्गुण्ड्याः हस्तिशुंड्याश्च रसेन सह मर्दितं ॥२॥ पुटपक्वं कषायेण चित्रकस्य विभावितं । जग्ध्वा - सहिंगुकर्पूर व्योषार्द्रकरसानुपः ॥३॥
मृतोऽपि सन्निपातेन जीवत्येव न संशयः । पूज्यपादप्रयोगोऽयं सन्निपातरुजांतकः ॥४॥
टीका - शुद्ध गंधक आंवलासार, शुद्ध पारा, आदा (सोंठ), शुद्ध तूतिया की भस्म, शुद्ध मैनशिल, शुद्ध विषनाग, शुद्ध सिंगरफ, सोनामक्खी की भस्म, कांतलौह की भस्म, अभ्रकभस्म, तामे की भस्म, लोहे की भस्म ये सब प्रौषधियाँ बराबर-बराबर लेकर इकट्ठी करे और अमलवेंत जंबोरी नींबू, चांगेरी (चोपतिया) नेगड़ एवं हाथीशुंडी (शाक विशेष) के रस से अलग अलग भावना देकर सुखावे और पुटपाक करे एवं बाद में चित्रक के स्वरस से भावना देवे । जब सूख जावे तब योग्य माला से हींग एवं कर्पूर के साथ से
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वैद्य-सार
करे तथा उसके ऊपर सोंठ, मिर्च, पीपल, अदरक इनका रस पीवे | इसका सेवन करने से सन्निपात के द्वारा मरा हुआ भी प्राणी जो जाता है । यह पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ योग सन्निपात रोग को अन्त करनेवाला है।
१४६-जीर्णज्वरे औदुम्बरादियोगः
औदुंबरांकुरं चैव मधुवृक्षं च सूतकम् । . नागरं लशुनं चैव गंधं पाषाणभेदकम् ॥१॥ जीरकं तगरं धान्यं चूर्णयेत् सर्वसाम्यकम् । . उष्णोदकं पिवेत्तच्च पुराणज्वरनाशनम् ॥२॥ बालमध्यमवृद्धानां कटुक्याश्च रसेन च । निष्कद्विनिष्कमात्रेण सितया सह संयुतः ॥३॥ पिवेच्च ज्वरनाशाय परं पाचनमुच्यते।। कोठे बद्धरसेनैव चामयागुडसंयुतं ॥४॥ अग्निधूमस्य पानेन हिक्कायाश्च विनाशनम् । दूर्वादाडिमपुष्पेण मधुकैः सह संयुतं ॥५॥ स्तनक्षीरेण संयुक्तं हिक्कावंशविनाशनम् |
औदंबरादियोगोऽयं पूज्यपादेन भाषितः॥६॥ टीका-ऊमर के अङ्कर, महुवा की छाल, शुद्ध पारा, सोंठ, लहसुन, शुद्ध गंधक, पाषाणभेद्, सफेद जीरा, तगर और धनिया सब को बराबर-बराबर एकत्रित कर पहले पारे और गंधक की कजली बनावे, फिर बाकी औषधियों का चूर्ण कर उस कजली में मिलाकर घोंटे, जब बराबर मिल जावे तब इसको कुटकी के स्वरस अथवा हिम के साथ एवं मिश्री की चासनी के साथ ज्वर को दूर करने के लिये देवे। इससे ज्वर का पाचन होता है। यदि दस्त न हुआ हो या कोष्टबद्धता हो तो इसको योग्यमाना से बड़ी हर्र तथा गुड़ के साथ देवे। यदि इसको अग्नि में डालकर इसका धूम्रपान किया जाय तो इससे हिचकी शांत होती है तथा दूब, अनार का फूल, मुलहठी और स्त्री-दुग्ध के साथ देने से भी हिचकी नहीं आती।
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वैद्य - सार
१४७ - आमवाते रसादियोगः
भास्यैकं रसं कुर्यात् द्विभागं गंधकं तथा । विभागं त्रिफला चूर्ण चतुर्भागं विभीतकं ॥ १ ॥ गुग्गुलुं पंचभागं तु षड्भागं च चित्रकम् । सप्तभागा च निर्गुण्डी चैरंडतैलसंयुतं ॥ २ ॥ भक्षयेद् गुडसंयुक्तञ्चामवातं तु नाशयेत् । पूज्यपादोक्तयोगोऽयं अनुपान विशेषतः ॥ ३ ॥
टीका - एक भाग शुद्ध पारा, दो भाग शुद्ध गंधक, तीन भाग त्रिफला का चूर्ण, चार भाग बहेड़े के बकले का चूर्ण, पांच भाग शुद्ध गुग्गुल, छः भाग चितावर, सात भाग नेगड़ के बीज इन सब को एकत्रित कर कूट कपड़छन कर के अन्डी का तेल तथा पुराने गुड़ के साथ योग्य अनुपान एवं योग्य मात्रा से सेवन करे तो उसके सेवन से ग्रामवात नाश होता है। यह पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ उत्तम योग है ।
१४८ - रसादिमर्दनः
गंधौ समौ शुद्ध विष्णुक्रान्ताद्रवैर्दिनं । आरक्तागस्त्यजैर्द्रावैः स्त्रीस्तन्येन हि मर्दयेत् ॥ १ ॥ मध्वाज्ययवसंयुक्तमेतदुद्वर्तनं हितम् ।
काश्यं जयति परमासाद् वत्सरान्मृत्युद्भिवेत् ॥ २ ॥
टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक इन दोनों को सफेद कोयल के रस से फिर लाल अगस्ति (हथिया) के रस से तथा स्त्री दुग्ध से एक-एक दिन पृथक्-पृथक् खरल करे । तैयार होने पर शहद, घी तथा जौ का आटा इन तीनों को मिला कर उबटन करावे तो इससे शरीर की कृशता दूर होती है । एक वर्ष लगातार उबटन करने से मृत्यु को जीतनेवाला होता है अर्थात् शरीर विशेष बलवान हो जाता है।
१४६ – पूर्णचन्द्ररसायनः
मृतं सुताम्रलौहं च शिलाजतु विडंगकं । ताप्यं क्षौद्रं घृतं तुल्यमेकीकृत्य विचूर्णयेत् ॥ १ ॥
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वैद्य-सार
पूर्णचन्द्ररसो नाम मासैकं भक्षयेत् सदा । अश्वगंधापलाध च गवां क्षीरं पिबेदनु ॥ २॥ शाल्मलीपुष्पचूर्ण वा तौदैः कः लिहेदनु ।
दुर्बलो बलमादत्ते मासकेन यथा शशी ॥ टीका-पारे की भस्म, अभ्रक भस्म, लौह भस्म, शुद्ध शिलाजीत वायविडंग, माक्षिक भस्म, शहद तथा घी इन सब को बराबर लेकर एकत्रित कर के तैयार करले। यह पूर्णचन्द्ररस एक माह तक सेवन करने से तथा इसके ऊपर २ तोला असगंध गाय के दूध में डाल कर पीने से अथवा सेमल के फूल का चूर्ण १ तोला शहद के साथ खाने से दुर्बल मनुष्य बल को प्राप्त होता है।
१५०-उन्मत्ताख्यनस्यम् रसगंधं समांशं तु धतूरफलजैवैः । मर्दयेहिनमेकं तु तत्समं त्रिकटु क्षिपेत् ॥१॥
उन्मत्ताख्यो रसो नाम्ना नस्यं स्यात् सन्निपातजित् । टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक दोनों बराबर-बराबर लेकर धतूरे के फलों के रस से एक दिन भर खूब घोटे, फिर पारा और गंधक के बराबर ही उसमें सोंठ, काली मिर्च तथा पीपल डालकर घोटे, जब आंख में आँजने के योग्य अञ्जन के सदृश हो जाय तब यह उन्मत्तरस नाम का नस्य तैयार समझे। इस नस्य को सन्निपात की दशा में सुंघाने से मूर्छा दूर हो जाती है।
१५१-कृष्णादौ महारसायनः कांतमभ्रकचूर्णानि शिलामाक्षिकगंधकं । तालकं शुल्वचूर्णानि टंकणं कुनटीयुतं ॥१॥ पारदं नागभस्मानि त्रिफला तीक्ष्णलौहकं । बाकुचीबीजकं भृगं सर्व चूर्णसमं युतं ॥२॥ भक्षयेन्मधुसर्पिाम् विभिमंडलसंयुतं । अष्टादशानि कुष्ठानि सप्त चैव महातयाः॥३॥ स्नेहवातादिताः गुल्माः ते च सर्वभगंदराः। दशाष्ट योनिदोषाश्च त्रिदोषा यान्ति चान्तगं॥४॥
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ܘ ܘ ܕ
वैद्य-सार
कुंचितफेन (?) केशश्च गृद्धात्तश्च प्रजायते । वारणश्रुतसंपन्नो वराटश्रावणः भवेत् ॥ ५ ॥ बणमासप्रयोगेण दिव्यदेहो भवेन्नरः । संवत्सरप्रयोगेण कायपरिवर्तनं भवेत् ॥ ६॥
टोका-कांत लौहभस्म, अभ्रक भस्म, शुद्ध शिला, माक्षिक भस्म, शुद्ध गंधक, तकिया • हरताल की भस्म, तामे की भस्म, सुहागे का फूला, शुद्ध शिला, शुद्ध पारा, शीसे को भस्म, हरे, बहेरा, आंवला कांत लौहभस्म, बकची के बीज, तज ये सब बराबर लेकर एकत्रित करके खूब घोंट कर तैयार करले और फिर विषम मात्रा शहद एवं घी लेकर तथा समयानुसार विशेष अनुपान से प्रयोग करे तो अट्ठारह प्रकार के कोढ़ रोग, सात प्रकार का क्षय रोग, स्नेहवात, गुल्मरोग, भगंदर रोग, १८ प्रकार के योनिदोष और त्रिदोष नाश को प्राप्त होते हैं । इस रसायन के सेवन करने से शिर के केश कुंचित तथा मुलायम होते हैं एवं गीध के समान तेज आँखें हो जाती हैं। हाथी और बराह के समान तेज सुननेवाला हो जाता है। और तो क्या छः महीना इसके सेवन करने से मनुष्य वििor (सुंदर) शरीरवाला हो जाता है और एक वर्ष प्रयोग करने पर शरीर का एक विशेष परिवर्तन हो जाता है ।
१५२ – अमृतार्णवरस:
• रसभस्मतयो भागाः भागकं हेमभस्मकं । भागार्धममृतं सत्त्वं सितमध्वाज्यमिश्रितं ॥ १ ॥ किं मर्दितं खल्वे मासैकं भत्तयेत् सदा । कृशानां कुरुते पुष्टिं रसोऽयममृतार्णवः ॥ २ ॥
टीका-गरे की भस्म तीन भाग, सोने को भस्म १ भाग तथा आधा भाग निषनाग का सत्व इन सब को मिश्री शहद एवं घी के साथ एक दिन भर खूब मर्दन करे । इसे एक माह तक सेवन करे तो दुर्बल मनुष्य भी बलवान होता है । यह अमृतार्णवरस सर्वश्रेष्ठ है ।
१५३ - व्रणादौ जात्या दिघृतम् जातीपत्र पटोल च निंबोशीरकरंजकं । मंजिष्ठं मधुयष्टी च दार्वी पत्त्रकसारिवा ॥ १ ॥
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वैद्य-सार
प्रत्येकं चूर्णयेत् कर्ष गव्याश्च द्वादशं पलम् । घृताश्चतुर्गुणं तोयं पक्त्वा घृतावशेषितं ॥२॥ तेनाभ्यंगैः मर्मघातं व्रणं नाडीवणं तथा।
स्रवन्तं सूक्ष्मछिद्रं च पूरयेन्नात्र संशयः ॥ ३॥ टीका-जायपत्री, परवल के पत्ता, नीम के पत्ता, खस, पूतकरंज की पत्ती, मंजीठ, मुलहठी, दारु हल्दी, तेजपत्ता, सारिखा ये सब एक-एक तोला, गाय का घी ४८ तोला, तथा पानी घी से चौगुना लेकर सब को मिला पकावे । जब सब पानी जल जाय सिर्फ घी मात्र बाकी रह जाय तो घी निकाल कर छान लेवे। यह दवा हर प्रकार के फोड़ों पर लगावे तो इससे बहनेवाला बारीक छेदवाला भी नाडीव्रण ठीक हो जाता है।
१५४-व्रणादौ अपामार्गादियोगः अपामार्गस्य पत्रोत्थद्रवेणापूरयेद् व्रणं। किंवा तद्वीजचूर्णेन व्रणं दुष्टं प्रलेपयेत् ॥१॥ पुरातनगुडंस्तुल्यं टंकणं सूक्ष्मपेषितं ।।
तद् वा पूरयेच्छीघ्र व्रणं नाडीव्रणं महत् ॥ टीका-अपामार्ग के पत्तों का स्वरस निकाल कर उस रस से फोड़ा भरे अथवा अपामार्ग के बीजों को पीस कर दुष्ट फोड़े के ऊपर लेप करे अथवा पुराना गुड़ तथा सुहागे का फूला इन दोनों को खूब मिला कर उसकी बत्ती बना कर फोड़े में भरने से फोड़ा भर कर अच्छा हो जाता है।
१५५-ज्वरादौ प्राणेश्वररसः भस्म सूतं यदा कृत्वा माक्षिकं चाभ्रसत्वकं । शुल्वभस्मापि संयोज्य भागसंख्याक्रमेण च ॥१॥ तालमूलीरसं 'दत्त्वा शुद्धगंधकमिश्रितं ।। मर्दयेत् खल्बमध्ये च नितरां यामयो यम ॥२॥ निक्षिप्य काचकृप्यां च मुद्रया कूपिकां तथा ।। खटिकामृदं समादाय लेपयेत् सप्तवारकं ॥३॥ यथारीत्या परिस्थाप्य पूरयेत् बालुकामयं । यंत्रं प्रज्वालयेद्यामं चतुरोव हिना पुनः॥४॥
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वैद्य-सौर
सिभ्यते रसराजेन्द्रो बलिपूजाभिरचयेत् । अनुपानं तदा देयं मरिचं नागरं तथा ॥५॥ विक्षारं पंचलवणं रामठं चित्रमूलकं। अजमोदं जीरकैकं मासं चूर्णचतुष्टयम् ॥ ६ ॥ चूर्णयित्वा तथा सर्व भक्षयेश्चानुवासरं । भक्षयेत् पर्णखंडेन कदुष्णेनापि वारिणा ॥७॥ प्राणनिर्गमकालेऽपि रक्षकः प्रणिनां तथा । ज्वरे त्रिदोषजे घोरे सन्निपाते च दारुणे ॥ ८॥ प्लीहायां गुल्मवाते च शूले च परिणामजे। मंदाग्नौ ग्रहणीरोगे ज्वरे चैवातिसारके || ९ ॥ अयं प्राणेश्वरो नाम भवेन्मृत्युविवर्जितः ।
सर्वरोगविषघ्नोऽयं पूज्यपादेन भाषितः ॥१०॥ टीका-पारे की भस्म तथा माक्षिक भस्म, अभूक का सत्व (भस्म होने के बाद सत्व निकाला जाता है ) तामे की भस्म कमसे कम १-२-३-४ भाग लेवे, तथा सफेद मुसली के स्वरस में एक भाग शुद्ध गन्धक मिला कर खरल में डाल कर दोपहर तक घोटे तथा घोंट कर सुखा कर कांच की शीशी में बन्द कर शीशी का मुंह बन्द कर देवे और
और शीशी को चारों तरफ से खड़िया मिट्टी से सात वार लेपन कर शीशी को बालुका यंत्र में रख देवे तथा उसको वालू से पूरी भर देवे और उस को भट्ठी में रख कर चार पहर तक पकावे। जब पाक हो जावे तब सिद्ध होना जाने और अपने इष्ट देवता का पूजन करके उसका सेवन करे। इस के खाने के बाद नीचे लिखे चूर्ण को बना कर ४ मासा की मात्रा से अनुपान रूपसे देवेः -
काली मिर्च, सोंठ; तीनों क्षार ( सज्जीक्षार जवाखार टंकणक्षार ), पांचों नमक ( काला नमक, सेंधा नमक, विड नमक, समुद्र नमक, साम्हर नमक ), हींग, चित्रक, अजमोदा, सफेद जीरा, ये सब बराबर-बराबर भाग लेकर चूर्ण बनावे । इसकी मात्रा ४ माशे की है।
यह चूर्ण भी पान के रस के साथ तथा थोड़े गर्म जल के साथ देवे। यह प्राणेश्वर रस प्राणान्त काल में भी प्राणों की रक्षा करनेवाला है।
त्रिदोषज ज्वर के भयंकर सन्निपात, प्लीहा, गुल्म रोग, बाल-रोग, परिणामज शूल, मन्दाग्नि, ग्रहगी रोग, ज्वर और अतिसार में यह प्राणेश्वर रस मृत्यु से छड़ानेवाला संपूर्ण रोगों को नाश करनेवाला पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
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वैद्य-सार
१५६-श्वासे इन्द्रवारुणी-योगः इन्द्रवारुणिका-मूलं देवदारुकटुवयं ।
शर्करासहितं खादेदूर्ध्वश्वासहरं परं ॥१॥ टीका-इन्द्रायण की जड़, देवदार चंदन, सोंठ, काली मिर्च और पीपल इन सबको मिश्री की चासनी के साथ सेवन करने से उर्ध्वश्वास भी अच्छी हो जाती है।
१५७-पांडुरोगे मण्डूरत्रिफलावसु . मंडूरं चूर्णयेत् श्लक्ष्णं त्रिफलावसुगुणे पचेत् । यूषणं त्रिफला मुस्तां विडंग चव्यचित्रकं ।।१।। दावी प्रन्थिं देवदारु तुल्यं तुल्यं विचूर्णयेत्। सर्वसाम्यं च मण्डूरं पाकान्ते मिश्रयेत्ततः॥२॥ भक्षयेत् कर्षमात्रं तु जीर्णगे तकभोजनं । पाण्डुशोथं हलीमं च उरुस्तभं च कामलां ॥३॥
नाशयेन्नान संदेहः पूज्यपादेन निर्मितम् । टीका-मंडूर को लेकर आठ गुणा त्रिफला में पकावे अर्थात् शुद्ध करे तथा फिर मंडूर की भस्म कर लेवे और सोंठ, मिर्च, पीपल, हर्र, बहेरा, आँवला, नागरमोथा, वायविडंग, चव्य चितावर, दारुहल्दी, पीपरामूल, देवदार, चंदन ये सब बराबर-बराबर लेवे तथा सबके बराबर मंडूरभस्म लेवे और फिर पाक कर के उसमें मिलाकर गोली बांध लेवे। इनको योग्य मात्रा से योग्य अनुपान से सेवन करावे और दवा (पच जाने ) पर मही के साथ भोजन करावे। इससे पांडुरोग, शोकरोग, हलोमक रोग, उरुस्तंभ, कामला रोग शांत होते हैं, इसमें संदेह नहीं है।
१५८-बिवन्धे चिंतामणि-गुटिका मरिचं पिप्पली शुण्ठी पथ्याधात्री समं समं । सौवर्चलं समं ग्राह्य टंकणं च द्विभागकं ॥१॥ शुद्धहिंगुलषड्भागं जयपालः सर्वतुल्यकः। जंबीरनिधुनीरेण मर्दयेदिवसद्वयम् ॥२॥
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वैद्य-सार
पिष्ट्वा गुंजामितां वटिकां गोघृतेन निषेवयेत्।। विरेचनकरी शीघ्र हृदुनं नाशयेत्परं ॥३॥ शूलं गुल्मं च शोथं च पांडुप्लीहां च नाशयेत् ।
चितामणिः गुटिश्चासौ पूज्यपादेन भाषिता ॥४॥ टीका-काली मिर्च, पीपल, सोंठ, बड़ी हर्र का बकला, आँवला, काला नमक ये सब बराबर लेवे तथा सुहागा दो भाग, शुद्ध शिंगरफ छः भाग एवं सब के बराबर शुद्ध जमालगोटा ले सबको एकत्रित कर जंबीरी नींबू के रस से दो दिन तक मर्दन करे, जब खूब पिस जावे तब एक-एक रत्ती की गोली बांध लेवे। बलाबल के अनुसार गाय के घी के साथ सेवन करावे तो शीघ्र ही दस्त लाता है तथा हृदय-रोग को नाश करता है।
और शूलरोग, गुल्मरोग, शोथरोग, पांडुरोग, प्लीहा रोग को नाश करता है । यह चिंतामणि नाम की गोली पूज्यपाद स्वामी की कही हुई बहुत ही योग्य है।
१५६-वाजीकरणे रतिलीलारसः रसो नागश्च लौहं व भागेकं चाभ्रकस्य च। त्रिभागं स्वर्णवीजानि विजया मधुयष्टिका ॥१॥ शाल्मली नागवल्ली च समभागान्विता तथा । मधुघृतान्विता सेव्या वल्लयुग्मस्य मात्रया ॥२॥ संतोषयेश्च बहुकांताः पुष्पधन्वबलान्वितः।
रतिलीलारसश्चासौ पूज्यपादेन भाषितः ॥३॥ टोका-शुद्ध पारा, शीसे की भस्म, लोह भस्म तथा अभ्रक भस्म ये सब एक-एक भाग तथा धतूरे के शुद्ध बीज तीन भाग, भांग, मुलहठी, सेमल की जड़, नागरवेल (पान) ये भी समान भाग लेकर एकत्रित कर गोली बांध ले। योग्य ६ रत्ती की मात्रा से मधु तथा घी के साथ देवे तो पुरुष की इतनी ताकत बढ़े कि सैकड़ों स्त्रियों को संतोष कर सके तथा कामदेव के समान बहुत बलवान होवे। यह रतिलीला-रस पूज्यपाद स्वामी ने कहा है।
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वैद्य-सार
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१६०-त्रिदोष-पारदादियोगः पारदं द्विरदं गंधं कृत्वा भागोत्तरं क्रमात् । नीलवीजश्च भागैकं मर्दयेत्खल्वके बुधैः ॥१॥ विजयाकनकव्योषैः सप्तवारेण मर्दयेत् । आर्द्रकैः मधुपिप्पल्ल्या दीयते वलमात्रया ॥२॥ त्रिदोषं सन्निपातं च नाशयेद्विषमज्वरम् । शीतोपचारः कर्तव्यः मधुराहारसेवनं ॥३॥
सर्वज्वरविषघ्नोऽयं पूज्यपादेन भाषितः। टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध सिंगरफ, शुद्ध गंधक क्रम से १, २, ३ माग, नील के बीज १ भाग लेकर खरल में भांग तथा धतूरा के पत्ते के स्वरस से तथा सोंठ, मिर्च, पीपल के काढ़े से अलग-अलग सात-सात बार मर्दन करे और अदरख, शहद् तथा पीपल के साथ तीन-तोन रत्ती को मात्रा से देवे तो त्रिदोष, सन्निपात, विषमज्वर को नाश करता है। यदि कुछ गर्मी मालूम हो तो ऊपरी शीतोपचार करना चाहिये और मधुर रस का आहार करना चाहिये। यह सब प्रकार के ज्वरों को नाश करनेवाला योग पूज्यपाद स्वामी ने
कहा है।
१६१-सर्वरोगे मृत्युञ्जयरसः भागैकं मरिचं च लौहकरसौ गंधस्य भागद्वयं । लौहे न्यस्य गवां घृतेन गुटिकामेतां पचेत्पावके ॥१॥ तालं वै समभागकं प्रविददेन म्लेच्छं शराशंविषं। सर्वार्ध जयपालकं च कुटकीक्वाथेन दध्यंबुना ॥२॥ भाव्यं सूर्यमितं तथाकरसैः त्रिसप्तकृत्वः दूदैः। संमतपशोषितं शतदलैः पुष्पैः समभ्यर्चयेत् ॥३॥ योज्यं गुंजमिते ज्वरे च सहसा सामे निरामेऽथवा । जीर्णे वा विषमे समीरणभवे पित्तोत्थिते श्लेष्मजे ॥४॥ द्वन्द्वोत्थेषु च संनिपातजनिते शोकज्वरे चोल्वणे । शैत्ये स्वेदयुदग्निमांद्यजनिते रोगे च शोफैर्युते ॥५॥
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वैद्य-सार
पांडौ चार्शगदादिते सुमनसा व्योषाकैः सिंधुना । जंबीराम्लद्रवैः परिनु तरसः पित्तोद्भवे चामये ॥६॥ . मृत्युञ्जयरसो नाम सर्वरोगनिकृन्तनः ।
कथितोऽयं प्रयोगश्च पूज्यपादमहर्षिभिः ॥७॥ टीका-रक भाग काली मिर्च, लौहभस्म, शुद्ध पारा तथा, शुद्ध गंधक दो भाग इन सब को लोहे के खरल में डाल कर गाय के घी से मिला कर गोली सी बांध लेवे और अग्नि में पकावे। पकने पर जब ठंढी होने को आवे तब उसमें एक भाग हरिताल की भस्म, पाँच भाग तामे की भस्म और शुद्ध विषनाग तथा सब से आधा शुद्ध जमालगोटा सब को मिलाकर कुटकी के काढ़े से और दही के पानी से भावना दे धूप में सुखावे एवं कमल-पुष्पों से पूजा करे। फिर एक-एक रत्तीप्रमाण से कच्चे तथा पक्के ज्वर में जीर्णज्वर में, विषमज्वर में, वातजवर में पित्तज्वर में कफज्वर में, द्वन्द्वज ज्वर में, सन्निपात ज्वर में शोफ ज्वर में, शीतज्वर में, पसीना-सहित ज्वर में, अग्निमांद्य-जनित रोग में, सूजनसहित रोग में, पांडुरोग में, बवासीर में, सोंठ, मिर्च, पीपल, अदरख, सेंधानमक इनके अनुपान से यथायोग्य देवे तथा पित्तजन्यरोगों में जंबीरी नींबू के रस से देवे। यह मृत्युञ्जय रस सब रोगों को नाश करनेवाला पूज्यपाद स्वामी का कहा हुआ प्रयोग है।
१६२-गुल्मरोगे बातगुल्मरसः शुद्धगंध रसानं च त्रिफला सैंधवं वचा । चित्रकं च द्वयक्षारं विडंगं समभागकम् ॥१॥ मातुलुंगरसैर्मधः बातगुल्महरश्च सः।
अग्निसंदीपनश्चापि गुल्मशूलातिसारजित् ॥२॥ टीका-शुद्ध गंधक, शुद्ध पारा, अभ्रकभस्म, त्रिफला, सेंधा नमक, दूधिया वच, चित्रक सजीखार, जवाखार, वायविडंग ये सब समान भाग लेकर विजौरा (मातुलुंग) नींबू के रस से घोंटे और घोंट कर तैयार कर ले। यह रस अग्नि को बढ़ानेवाला गुल्मरोग, शूलरोग को नाश करनेवाला है।
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वैद्य-सार
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१६३-चिंतामणिगुटिका मरिचं पिप्पली शुंठी पथ्या धात्री विभीतकम् । भागैकं रुचकं लवणं टंकणानां द्विभागकम् ॥१॥ दरदं चैकभागं च जैपालषड्भागकम् । सर्व जंबीरनीरेण मयं च दिवसद्वयम् ॥२॥ चणकप्रमाणवटिकां कारयेच्छुद्ध-बुद्धिभिः । गोघृतेनावलेह्यः स्यात् सद्यः रेच्यः सुजायते ॥३॥ हृद्रोगं शूलगुल्मं च शोकं च ज्वरप्लीहकम् । पाण्डं च नाशयेत् शीघ्रमसौ चिंतामणिगुंटी ॥४॥
संपूर्णजनहितकरो पूज्यपादेन भाषिता। टीका-कालो मिर्च, पीपल, सोंठ, हर्र, आँवला, बहेरा और काला नमक ये सब एकएक भाग; सुहागा २ भाग, शुद्ध सिंगरफ १ भाग और शुद्ध जमालगोटा ६ भाग इन सबको एकत्रित कर के जंबीरी नींबू के स्वरस से दो दिन तक घोंटे और चना के बराबर गोली बांधै। इसको गाय के घी के साथ खाने से शीघ्र ही रेचन करती है तथा हृदय-रोग, शूलरोग, गुल्मरोग, शोथ रोग, ज्वर, प्लीहा, पांडु इन रोगों को यह चिंतामणि गुटिका शीघ्र ही नाश करनेवाली है एवं यह संपूर्ण मनुष्यों को हित करनेवाली है।
१६४-षडांगगुग्गुलुः रास्नामृता देवदारु शुंठी च चव्यचित्रकम् ।
गुग्गुलु सर्वतुल्याशं कुट्टयेत् घृतवासितम् ॥१॥ - टीका-रासना, गिलोय, देवदारु, सोंठ, चव्य, चित्रक ये सब बराबर ले तथा सब के बराबर शुद्ध गुग्गुल लेकर घी के साथ गोली बांधे और १ तोला प्रति-दिन सेवन करे तो लाभ होवे। नोट-इसमें १ तोला की मात्रा लिखी है सो यह प्राचीन काल के मनुष्यों के
बलानुसार है। इस समय मनुष्य बहुत कमजोर हैं इसलिये कम मात्रा अर्थात् तीन माशा की मात्रा से खाना चाहिये।
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वैद्य-सार
१६५-लूताविष-चिकित्सा नरनीरेण साक्षी पिष्ट्वा लेपं तु कारयेत् ।
असाध्यां नाशयेल्लूतां त्रिदोषोत्थां मुनेर्वचः ॥१॥ टोका-मनुष्य के मूत्र से साक्षी को पीस कर लेप करने से असाध्य भी मकरी का विष शांत हो जाता है। चाहे त्रिदोष भी हो गया हो तो भी शांत हो जाता है। नोट-मकरी जब शरीर पर फिर जाती है और वह अपना जहर शरीर पर छोड़ती
है तब कोदों के बराबर फुसी सी हो जाती है, ये पकती नहीं है और बड़ा कष्ट होता है। इस पर उक्त प्रयोग करने से शीघ्र ही शांत हो जाता है ।
१६६-पित्तदाहे धान्यादियोगः धान्यकं मधुक चैलां समभागेन शर्करां।
नवनीतं पयः पीत्वा पैत्त-दाह-विनाशनम् ॥२॥ टीका-यनिया, मुलहठी, छोटी इलायची ये तीनों बराबर लेवे और सबके बराबर शर्करा ले एवं मक्खन में मिला कर खाये तथा ऊपर से दूध को पीवे तो पित्त-संबंधी दाह कम हो जाता है।
१६७-दूसरा योग नवनीतं क्षीरसंयुक्तं शर्करा-पिप्पलीयुतं ।
पित्तदाहं च तापं च चातुर्थ-विनाशयेत् ॥१॥ टीका-मक्खन, शक्कर, पीपल इन सब को मिला कर दूध के साथ पीने से पित्तज, दाह एवं चौथिया ज्वर शांत हो जाता है।
१६८-श्वासे पारदादियोगः .पारदं गंधकं शुद्ध मृतं लौहं च टंकणं ।
रास्ना विडंगं त्रिफलां देवदारु कटुवयम् ॥१॥ अमृता पद्मकं क्षौद्रं विषं तुल्यांशचूर्णितम् ।। त्रिगुंजं श्वोसकासार्थी सेवयेन्नात्र संशयः ॥२॥
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वैद्य-सार
टीका-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, लौहभस्म, सुहागा, रासना, वायविडंग, त्रिफला, देवदारु, सोंठ, मिर्च, पीपल, गिलोय, पद्माख, ,चन्दन, शहद. शुद्ध विषनाग ये सब वस्तुएँ बराबर लेवे और सब को एकत्र घोंट कर तीन-तीन रत्ती के प्रमाण से सेवन करे तो श्वांस और खांसी कम होती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
१६६-श्वासे सूर्यावरसः सूतार्ध गंधक मद्य यामाद्ध कन्यकाद्रवैः। द्वयोस्तुल्यं ताम्रपत्रं पूर्णपत्रं च लेपयेत् ॥१॥ दिनक हंडिकामध्ये पश्वमादाय चूर्णयेत् ।
सूर्यावर्तरसो ह्यषः श्वासकासहरः परः ॥२॥ टीका-शुद्ध पारा १ भाग, शुद्ध गंधक आधा भाग-इन दोनों को घीकुमारी के रस से आधे पहर तक मईन करे और दोनों के बराबर तामे का पत्र लेकर उस पर लेप करे तथा एक दिन तक हंडी के बीच में रख कर पाक करे। जब पाक हो जावे तब पत्रों पर से निकाल कर चूर्ण कर के अच्छी तरह घोंट लेवे तब यह सूर्यावर्त रस तैयार हुआ समझे। यह श्वास तथा खाँसी को हरनेवाला है।
१७०-हस्तिकर्णतैलम् षोडशपलं च कंदं च विल्यपत्रं पलाष्टकम् । आरनालं चतुःप्रस्थं कषायमवतारयेत् ॥१॥ तैलं च कुडवं चैकं मृदुपाकं भिषग्वरः ।
हस्तिकर्णमिदं नाम्ना सर्वशीतज्वरापहं ॥२॥ टीका–१६ पल कंदविशेष, ८ पल बेल की पत्ती, चार प्रस्थ (१३ छटॉक) कांजी लेकर सब को एकत्रित कर के ४ कुडव पानी में पकावे। जब १ कुडवं बाकी रहे तब उतार कर छान ले और फिर उसमें १ कुडव तेल डाल कर मृदु पाक से पाक करे। तैल मात्र बोकीरहे: तब छान कर रख लेवे। यह तैल सब प्रकार के शीतज्वर को दूर करनेवाला है।
१७१ ---विनोद विद्यापसल । सिन्दूरसागरफलवत्सनागाः ह्यष्टकैकांशमन मेण । जवीरगोक्षीरसुनासिकरमीजासावरजीका ॥१॥
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________________ वैद्य-सार जीवंतिकाबालुकमेघनादाः एषां रसानां सुरसैः सुपिष्य / कस्तूरिकाचंदनकेन सार्ध निधाय शुल्वे वहुशोषयेत्तथा // 2 // निक्षिप्य भांडोदरके पिधाय पचेत् क्षणं मंदहुताशनेन। टीका-रस सिन्दूर, 5 भाग, समुद्रफल 8 भाग, शुद्ध विषनाग 1 भाग, इन तीनों को मिलाकर नीचे लिखी वस्तुओं के रस से मर्दन करे:-जंबीरी नींबू, गाय का दूध, नारियल का पानी, चंदन का काढ़ा, अडूसा का स्वरस, जीरे का काढ़ा, जीवंतीका-स्वरस, सुगंधबाले का काढ़ा, चौलाई का स्वरस इन सब के स्वरस से अलग-अलग भावना देकर कस्तूरी करके मन्द-मन्द अग्नि से पकावे। जब वह अत्यन्त शुष्क हो जावे तब तैयार हुआ समझे। यह शीतज्वर में हितकारी है। इसकी मात्रा 1 माशे की है। नोट-यह मात्रा अधिक है। वैद्य महाशयों को चाहिये कि रत्ती के प्रमाण में देखें। १७२-पारदादि-योगः . पारदं द्विरदं गंधं सद्धिमं क्रमवृद्धिना। सर्व च मर्दयेत् खल्वे कनकस्वरसेन च // 1 // विजयास्वरसैर्वापि व्योषस्य क्वथनेन वा / सप्तवारं पृथक्कृत्य मर्दयेत् गुंजमात्रया // 2 // आर्द्रकैः मधुपिप्पल्या विदोषं सन्निपातकम् / / सर्वज्वरहरश्वाशु सर्वव्याधि विनाशनः // 3 // शीतोपचारः कर्तव्यः मधुराहारसेवनम् / योगोऽयं ज्येष्ठसिद्धश्च पूज्यपादेन भाषितः // 3 // टीका-शुद्ध पारा 1 भाग, शुद्ध हिंगुल 2 भाग, शुद्ध गंधक 3 भाग, शुद्ध विष 4 भाग लेकर इन सब को खरल में डालकर धतूरे के रस से 7 बार, भांग के स्वरस से 7 बार, त्रिकटु के स्वरस से 7 बार भावना देवे और 2 रत्ती के प्रमाण से अदरख तथा पीपल के साथ देवे तो त्रिदोष सन्निपात भी शांत हो। यह सब प्रकार के ज्वरों एवं सर्व व्याधियों को नाश करनेवाला है। इसके सेवन करने के बाद शीतोपचार करना चाहिये। यह श्रेष्ठ तथा सिद्धयोग पूज्यपाद स्वामी ने कहा है। . Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com