Book Title: Adi Purana
Author(s): Pushpadant, 
Publisher: Jain Vidyasansthan Rajasthan

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Page 598
________________ यालाहिउपयलिदान दमवउपपरियाविनालियबाहकटएलमतकंचुअन शहदोहनिदेह कपुयनाएकसासखाखालसियन जसुजलेषदायासासिम एडजास्तूसोधखलता विहुदिहमपवरवल सोसन्निसपुराणनसूयणु संसरहिनकिंतुकहलसमा वृद्धिजठजम्मुणि हालियातादेविणसिरुसंवालियमश्वमपुविधारिउडानजहिसिरियानिरिकमितावतर हिअमरविकपपिपुसिरकमलपुणुपिउदापपविसरलाचता वालविरमारसहजेणा। | पिहलणेदहा पारावयसउपनखहनिम्तयरतशाशमुण्ठपणापविज्ञाहणियाज्ञा मसापारमाणिवाई सवठविडालतलवटजाईतउविरुवाछदानिउसोपवहिलायय गडमडसठसंसारुविचितगपरिलावण्याहातणियमकिसर्विअहवमश्ज्ञ यपिवियवमहसहा आसप्पणिसाजश्यरहो कतवदाणपछिमधमविहि रिसिता सश्रमसत्रणागणिहि सो सडलसासेखमुणि गातियपकहितवमुणि दकिंपिनयाय ठणवसमण किदवईकरमिधामसवणु विवगाहहातिनसहानमरहिमतपत्तासुतिज़ यधिकहिट जिहजावाजावणगच्छजिहवाहियाटपानसममाजियासवसंवरनिजरज्ञा जिहवंधमारकलावंतातिहमुषिणसयखपयासिमलातणिसुपवित्तिय संसासियन पईला रण यहाँ ऊपरी वस्त्र गिर गया था। यहाँ कंचुक से काँटा लगा था। यहाँ हम दोनों को कम्प उत्पन्न हुआ था। जो कि प्राचीन समय से पाप-निरत था, वह इस समय यति हो गया है इस विचित्र गतिवाले संसार को जलाने पक्षियों से विभूषित यह वह सरोवर है जिसके जल से देह साफ होती है। यहाँ पर वह दुष्ट जब हमें पकड़ना के लिए। चलो इसकी बुद्धि की परीक्षा करें कि यह हमसे क्रुद्ध होता है या हमें क्षमा करता है ! इस प्रकार चाहता था तो इतने में उसने वहीं पर एक प्रबल सेना देखी। वह सज्जन शक्तिषेण राजा था। हे सखी, क्या विचारकर कामदेव के तीरों को नष्ट करनेवाले यतिवर के आसन के निकट जाकर वे बैठ गये। उन्होंने वन्दना तुम्हें उसकी याद नहीं आ रही है ! जब उसने पूर्व दिखला दिया तब देवी ने अपना सिर हिला दिया। जबतक की और धर्म की विधि पूछी। मुनि कहते हैं-हे पुत्र, श्रुतज्ञान के निधि-गुणी यह लेश्यासंख मुनि संघ के उसने ये शब्द कहे तबतक उसने एक मुनि को देखा । देव ने अपना सिर-कमल हिलाकर, शब्दों और पंक्तियों साथ आ रहे हैं, इनसे तत्त्व पूछो। मैं कुछ भी नहीं जानता, मैं नवश्रमण हूँ। देव के लिए मैं क्या धर्मश्रवण सहित यह बात कही। कराऊँ! पर आग्रह करनेवाले देव से वह बच नहीं सका। तब उसने फिर उससे त्रिजग का कथन किया। घत्ता-जिस कारण से रमणरस में दक्ष वे दोनों अपने घर में जला दिये गये। पारावत जन्म को प्राप्त जिस प्रकार जीव-अजीव, पुण्य गतियाँ, जिस प्रकार बढ़ी हुई पापबुद्धि, जिस प्रकार आसव-संवर और हुए बाहर जाने के प्रेम में अनुरक्त वे मार्जार के द्वारा (बिलाव द्वारा) खा लिये गये थे॥२॥ निर्जरा, जिस प्रकार बन्ध-मोक्ष और जन्मान्तर हैं वह उस मुनि ने सब प्रकार कथन किया। यह सुनकर देव बोलाफिर हम विद्याधर उत्पन्न हुए और हम मुनिवर आग में होम दिये गये। भवदेव, मार्जार और कोतवाल, Jain Education Internation www.jans579org For Private & Personal Use Only

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