Book Title: Adi Purana
Author(s): Pushpadant, 
Publisher: Jain Vidyasansthan Rajasthan

View full book text
Previous | Next

Page 615
________________ हिंदिरणयमयघरे दिहउमणितस्कोहर आसाश्यपरवितं एकुहिविचहिदत्तावतंक नायसवतेनादेगे हिमकवकहवचरविजपुगसङ्गासेविफरविम नातककोडरेम डंकरणचडहिविज्ञविगप्पाहागड़करविर्ष पिटा होतोउक्लेविख्यले निहुरुतहालवनसालयले उम्मयखंडणवियारियड माणनागदतुहकारिटाठाब पसंखएवबहारणजिउ अहरसुवधरिश्दपिडा धाणुहिमुजाबरजतने हारिउताहिपिसणेतनमजे परिसुवयुगगवियर तदवसकठममियाउ तण सउमघाहिरिडिमुडदेवाणपाययदमिसुड सुपुतणफणासरूपलियबाटपकिंद वगलछियउ मग्नतहोकिंपिनदिपुरुतासश्सप्पसंदविवसीयताविणिपसार लसणुवलसकेविस सोसाविसहरसाया किडमझुसडाराशपडिजपश्फणिग सारमण पविणणपजिप्पशदिवधणु पाणावहारुतहोकावरजसुषुष्मुसहसंचरशमन लोवितासमुक्तअलवद्धि मजायवयएएहालयहि सणुकणिवश्कासारवहरजवळिका पत्ता-दूसरे दिन नागभवन के तरुकोटर में दूसरे के धन का जिसे स्वाद लग गया है, ऐसे नागदत्त ने देवों के प्रभाव से मैं तुम्हें दूँगा"। फिर उसने (नागदत्त ने) नागराज से पूछा-हे देव, आपने मुझे क्यों दरिद्र कहीं एक मणि देखा ॥२६॥ बना दिया है? माँगते हुए भी कोई वर मुझे नहीं दिया। तब नाग कहता है-देता हूँ। २७ पत्ता-वणिक कहता है-भो-भो ! विषधर श्रेष्ठ आदरणीय, सुकेतु का नाश करनेवाला और बाहुओं किसी प्रकार रखने के लिए उसने उसे निकाला। फिर क्रोध की ज्वाला से विस्फुरित होकर, और यह का भूषण बल मुझे दीजिए॥२७॥ कहकर कि यह मेरे हाथ पर क्यों नहीं आता, हुंकार भरते हुए उसके भारी पत्थर से प्रहार करने पर वह मणि आकाश में उछलकर उसके भालतल से जा लगा। उसके उठे हुए खण्ड (नोक) से वह विदारित हो गया। नागदत्त को बुलाया गया। धन-संख व्यवहारी से जीता गया वसुन्धरा का पति (सुकेतु) हार को प्राप्त गम्भीर ध्वनिवाला साँप कहता है-“धन से दिव्य धन नहीं जीता जा सकता। जिसका पुण्य सहायक हुआ। लेकिन जितना धन उसका बढ़ा, वह दुष्ट उतना ही धन हार गया (जुए में)। धनगर्व से दुष्ट आदमी होकर चलता है उसके प्राणों का अपहरण कौन कर सकता है ? लोभी तुम मुझे उसके लिए समर्पित कर उद्दण्ड (उद्भट) हो जाता है। सुकेतु ने वह धन माँगा। उसने कहा-"तुम अपनी भौंहें टेढ़ी क्यों करते हो, दो, और यह मर्यादा वचन उससे कह दो। कहो कि नागराज कर्मभार धारण करना चाहता है। २८ Jain Education Internationa For Private & Personal use only www.jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 613 614 615 616 617 618 619 620 621 622 623 624 625 626 627 628 629 630 631 632 633 634 635 636 637 638 639 640 641 642 643 644 645 646 647 648 649 650 651 652 653 654 655 656 657 658 659 660 661 662 663 664 665 666 667 668 669 670 671 672 673 674 675 676 677 678 679 680 681 682 683 684 685 686 687 688 689 690 691 692 693 694 695 696 697 698 699 700 701 702 703 704 705 706 707 708 709 710 711 712